पृष्ठ:Yuddh aur Ahimsa.pdf/१४

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समझौते का कोई प्रशन ही नहीं

जिस समय मैं दिल्ली से कालका के लिए गाड़ी पर सवार हो रहा था उस समय एक भारी भीड़ ने सद्भाव से ‘महात्मा गांधी की जय !' के साथ-साथ यह भी नारा लगाया कि 'हम समभौता नहीं चाहते ।' मेरा साप्ताहिक मौन था, इसलिए मैं केवल मुस्कराकर रह गया ।

मेरे पास गाड़ी के पायदान पर खड़े हुए लोगों ने भी मेरी मुस्कराहट के जवाब में मुस्करा दिया और सलाह दी कि मैं वाइसराय महोदय से समझौता न करूँ। मुझे एक कांग्रेस कमेटी ने भी पत्र द्वारा ऐसी ही चेतावनी दी थी । मुझे अपनी सीमित शक्ति का ज्ञान कराने के लिए चेतावनी की जरूरत नहीं थी । दिल्ली के प्रदर्शन और कांग्रेस की चेतावनी के अतिरिक्त यह बता देना मेरा फ़र्ज है कि वाइसराय महोदय से बातचीत में क्या कहा-सुना गया ? मैं यह बात भली भाँति जानता था कि इस सम्बन्ध में कार्य समिति ने मुझे कोई आदेश नहीं दिया । मैं तार द्वारा भेजे गये निमन्त्रण को स्वीकार करके पहली गाड़ी से रवाना हो गया था । यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरी अदम्य और पूर्ण अहिंसा मेरे साथ थी। मैं जानता था कि राष्ट्रीय