प्रताप पीयूष/ककाराष्टक।ककाराष्टक।

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
प्रताप पीयूष  (१९३३) 
द्वारा प्रतापनारायण मिश्र
[ १२० ]

( १०८ )


छै, कोई कीचड़ उछारै छै ! क्या करें बिचारे एक तो हिन्दू,दूसरे कमजोर, तीसरे परदेशी सभी तरह आफ़त है। दूसरे नई रोशनीवाले देशभाइयों की बैलच्छ देख देख जले जाते हैं । यह चाहते हैं सब ज्यैंटिलमैन बन जायँ, वहां आदमी बनना भी नापसंद है। ...."मुंह रंगे हनूमान जी की बिरादरी में मिले जाते हैं। तीसरे दाढ़ीवाले हिन्दू दिनभर रंग अबीर धोत्रो, ‘पर ललाई कहां जाती है । जो किसी ने गंधा पिरोजा लगा दिया तो और भी आफ़त है। लो, इतने हमने बता दिए, कुछ तुम भी सोचो।


ककाराष्टक।

ज्योतिष जाननेवाले जानते हैं कि होडाचक्र के अनुसार एक अक्षर पर जितने नाम होंगे उनका जन्म एक नक्षत्र के एक ही चरण का होगा, और लक्षण भी एक ही सा होगा। व्यव- हार-सम्बन्धी विचार में ऐसे नामों के लिए ज्योतिषियों को बहुत नहीं विचारना पड़ता। बिना विचारे कह सकते हैं कि एक राशि, एक नक्षत्र, एक चरण के लोग मिल के जो काम करेंगे वह सिद्ध होगा। लोक में भी नाम-राशी का अधिक सम्बन्ध प्रसिद्ध है। इसी विचार पर सतयुग में सत्य, सज्जनता, सद्धर्मादि का बड़ा गौरव था। हमारे पाठक जानते होंगे कि श्री महाराजाधिराज

कलियुग जी देव (फारसी में भी तो) बड़े छंटे बड़े नीतिनिपुण
[ १२१ ]

(१०९ )


हैं । वे काहे को चूकते हैं । जब द्वापर के अंत में इस देश की ओर आने लगे तो अपना नाम राशी-नगर समझ के इस कान-पुर को अपनी राजधानी बनाया, और बहुत से ककार ही नाम वाले मुसाहब बनाए । जिनमें से छः सभासद हम पर बड़ी कृपा करते हैं । अतः हमने सोचा कि अपने रत्न दयालु जजमानों की स्तुति न करना कृतघ्नता है। छः मुसाहब, एक महाराज, एक उनकी राजधानी की स्तुति में अष्टक बना डालें तो संसारी जीव धर्म कर्मादि से शीघ्र मुक्ति पा सकेंगे। हमारे छः देवता या कलि- राज के मुख्य सहायक यह हैं,-एक कनौजिया यद्यपि कान्य- कुब्ज-मंडली इत्यादि कार्रवाइयां उन्हों ने महाराज की मरजी के खिलाफ़ की हैं, पर महाराज तो बड़े गंभीर हैं, वे बहुत कम नाराज हुए हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि इनकी पैदाइश विराट भगवान के मुख से है, और मुख ऐसा स्थान है जहां थूक भरा रहता है। फिर जो थूक के ठौर से जन्मेंगा वह कहां तक थुकैल- पना न करेगा। दूसरे कायस्थ हैं, इन पर भी कायस्थ-सभा, कायस्थ-पाठशाला का इलज़ाम लग सकता है, और बाजे लोग वैष्णव हो जाते हैं, इससे कलियुग जी नाखुश हो जाय तो अजब नहीं। पर चूंकि कलियुगराज की माशूका बी उरदूजान की सिफ़ारिश है, इससे कोई डर नहीं रहा । तीसरे मुसाहिब कलवार हैं, इनमें वेशक वही लोग हुजूर के कृपापात्र हैं, जो कलवारिया के कार्याध्यक्ष हैं। चौथे कहार, पांचवें कसाई, छठे कसबी यह

वेशक बेऐब हैं । इन छहों मुसाहिबों में इतना मेल है कि एक
[ १२२ ]

( ११० )


दूसरे के मानों अंग प्रत्यंग हैं। एक के बिना दूसरा निर्बल है,और उन्हीं के एका का फल है कि कलिदेव राज करते हैं । यह परिचयस्तोत्र पाठकों की श्रद्धा बढ़ाने मात्र को दिया है।


मुक्ति के भागी।

एक तो छः घर के कनवजिये, क्योंकि वैराग्य इनमें परले सिरे का होता है । सब जानते हैं कि स्त्री का नाम अर्धाङ्गी है । बेपढ़े लिखे लोग तक आपस में पूछते हैं “कहौ घर का क्या हाल है ?" इससे सिद्ध हुआ कि घर स्त्री ही का नामांतर है। उस स्त्री को यह महा तुच्छ समझते हैं। यहां तक कि 'हे: मेहरिया तौ आय पायें कै पनहीं', बरंच पनहीं के खो जाने से तो रुपया-वेली का सोच भी होता है, परन्तु स्त्री का बहुतेरे. मरना मनाते हैं। अब कहिये, जिसने अपने आधे शरीर एवं ग्रह-देवता को भी तृणवत् समझा उस परम त्यागी वैरागी की मुक्ति क्यों न होगी?

दूसरे अढ़तिए, क्योंकि प्रेतत्व जीते ही जी भुगत लेते हैं। न मानो कानपुर आके देख लो, बाजे बाजों को आधी रात तक दतून करने की नौबत नहीं पहुंचती। दिन रात बैपारियों की हाव २ में यह भी नहीं जानते कि सूरज कहां निकलता है। भला जिसे जगत्-गति व्यापती ही नहीं, जिसे क्षुधा-तृषा लगती ही नहीं है, उस जितेंद्री महापुरुष को मुक्ति न होगी,


PD-icon.svg यह कार्य भारत में सार्वजनिक डोमेन है क्योंकि यह भारत में निर्मित हुआ है और इसकी कॉपीराइट की अवधि समाप्त हो चुकी है। भारत के कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अनुसार लेखक की मृत्यु के पश्चात् के वर्ष (अर्थात् वर्ष 2023 के अनुसार, 1 जनवरी 1963 से पूर्व के) से गणना करके साठ वर्ष पूर्ण होने पर सभी दस्तावेज सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं।

यह कार्य संयुक्त राज्य अमेरिका में भी सार्वजनिक डोमेन में है क्योंकि यह भारत में 1996 में सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आया था और संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका कोई कॉपीराइट पंजीकरण नहीं है (यह भारत के वर्ष 1928 में बर्न समझौते में शामिल होने और 17 यूएससी 104ए की महत्त्वपूर्ण तिथि जनवरी 1, 1996 का संयुक्त प्रभाव है।

Flag of India.svg