बिरजा/ भाग 1

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बिरजा  (1891) 
द्वारा राधाचरण गोस्वामी

[ १३ ] करके सभी ने घर की यात्रा की। उस दिन वह लोग घर नहीं पहुँच सके मार्ग में एक चट्टी में रात्रियापन की दूसरे दिन तीसरे पहर घर पहुंचे। इनलोगों का घर गंगा तीर से १६ कोस दूर था। विरजा इनलोगों के संग जाय कर इनके घर में रहने लगी, और घर के सब जने यथेष्ट स्नेह करने लगे।

तृतीयाध्याय।

जिस वृद्ध को पाठकों ने गंगातीर तनु त्याग करते देखा है उमका नाम रामतनु भट्टाचार्य था, यह विलक्षण मंगति मन्यन्त्र ग्रहस्त था। दम बीघा भूमि घेर कर उसका घर था और एक घर के बाहर और एक घर की खिरकी के पास यह दो पुकारिणी थी प्राय: दो सौ बीघा भूमि जोती बोई जाती थी। बाहर के घर और भीतर के दो उठान ऐसे घे जैसे घुड़दौड़ को होते हैं। एतङ्गित्र रुपया पैसा भी उधार दिया जाता था भट्टाचार्य महाशय के दो पुत्र हैं जिनमें ज्येष्ठ का नाम गोविन्दचन्द्र और कनिष्ट का गंगाधर है, इनके विवाह हो गये हैं इस समय गोविन्द का वय:क्रम पहविंशति और गंगाधर का अष्टादश वर्ष होगा। गंगाधर ने वर्द्धमान के इंगलिश विद्यालय में यत्किञ्जित लिखना पढ़ना सीख लिया था, हम यत्विरित कहते है किन्तु रामतनु भट्टाचार्य अपने मन में जानते थे कि [ १४ ] इस्की अपेक्षा अधिक लिखना पढ़ना नहीं हो सका। यकिञ्चित् लिखना पढ़ना सीख कर लो दोष हो जाता है वह गंगाधर में हो गया था किन्तु गोविन्दचन्द्र बड़े धीरस्वभाव थे। यद्यपि उन्होंने कभी विद्यालय के काष्टासन का स्पर्श नहीं किया, तथापि वह सचरित्र थे। गोविन्दचन्द्र सर्वदा संसार को लेकर व्यस्त रहते थे। न तो समय में आहार होता या और न समय में निद्रा होती थी। प्रात: काल चौपाल में आते, एक दो बजे के समय घर में प्राय कर खानाहार करते। आहारान्त में फिर तटाटान (तक़ाज़ा) के लिये घर से निकलते। किन्तु गंगावर इन सब बातों को किमान का काम मानता था। वह सवेरे सवेरे ही खानाहार करके ग्राम के निष्कर्मा लोगों के संग तास पीटता और वही टीपटाप मे समय संहार करता। गुप तो यह था, पर यदि इस्के कोई वस्तु 'दो' कहने पर वह वस्तु घर से न मिले, तो माता के प्रति क्रोध बड़ी बहन के प्रति क्रोध, दास दासियों के प्रति क्रोध होता था। सब जने गंगाधर को बाबू कहते थे, और सब सनेही गंगाधर बाबू के भय से भीत रहते थे। ज्येष्ठ भ्राता गंगाधर को बहुत प्यार करता था। उसकी आखों में गंगाधर का दोष दोषरूप में नहीं बोध होता था। गोविन्दचन्द्र की पत्नी अत्यन्त साधुशीला थी। इसका वय:क्रम विंशति वत्सर था, [ १५ ] और उसको दो पुत्र सन्तान भी हुये थे। गोविन्द की माता नाम मात्र को गृहिणी (घर की स्वामिनी) थी, घर का काम काज सब वडी वह केहो हाथ में था। गंगाधर की पत्नी और बिरजा की एकही अवस्था थी। अर्थात् गंगाधर की पत्नी की वयस दस वर्ष मात्र थी नाम नवीनमणि था।

इस वयस में वालिका स्वामी के घर नहीं जाती हैं किन्तु नवीन के माता पिता दोनों की संक्रामिक ज्वर में मृत्यु होने से उसको यहां ले आये थे।

बिरजा इस घर में आय कर रहने लगी, वह अपने स्वभाव गुण से सब की प्रियपात्र बन गई. विशेषतः छोटी वह नवीन के संग उस्की अत्यन्त प्रीति बढ़ गई, वह दोनों एक संग स्नान करती थी, एक संग खेला करती थीं।

एक दिन गृहिणी आहारान्त में खाट बिछाकर आँगन में सो रही है, बिरजा से माथा देखने को कहा वह सिरहाँने बैठी माथा देख रही है इस समय गृहिणी ने बिरजा से नौका डूबने का वृत्तान्त वर्णन करने का अनुरोध किया।

बिरजा वालक थी, नवीन के संग खेल में मत्त रहा करती थी, सुतराम् वह सब विषय एक प्रकार भूल गई थी अब वह सब बातें उसे स्मरण हो आई, उसकी आंखों से जल गिरने लगा। गृहिणी ने काहा 'अब क्या भय है? [ १६ ] अब कहे क्यों ना? बिना कहे कैसे तुझे तेरे बाप के घर भेजूंगी विरजा ने कहा "मेरे मां बाप कोई नहीं हैं, मैं कहां जाऊँगी"।

गृहिणी "तो रह क्यों न? कौन निकालता है तब और कोई है?" बालिका ने रोते रोते कहा "मेरे कोई नहीं है"।

वृध्दा ने जिस रात्रि में बिरजा को पाया था उस रात्रि में उसके सोमन्त में सिंदूर का टीका देखा था वह बात वृध्दा के मन में थी इस हेतु उसने फिर पूछा कि तेरा विवाह हुआ है? किस ग्राम में?"।

वि०— मैं उस ग्राम का नाम नहीं जानती।

वृ॰—तेरे बाप का घर किस ग्राम में हैं?

वि०—मैं नहीं जानती

वृ॰—तेरे मामा का घर कहां है ?

वि०—यह भी मैं नहीं जानती।

वृद्धा ने फिर किसी बात का उत्यापन न करके निद्रा मनस्य की, नवीन पास आय कर बिरजा को हाथ पकड़ कर उठा ले गई, जाते जाते उसकी आंखों का जल पोंछ दिया।

इसके एक वत्सर पीछे एक दिन बिरजा ने नवीन से आत्मविवरण कहा, यह यह है कि "अति छोटी अबला [ १७ ] में मेरे पिता की मृत्यु हुई उसके पीछे मेरी माता मुझे लेकर शान्तिपुर के एक गोस्वामी के घर में रही। माता उनके घर में पाचिका का काम करती थी ।मेरी जब सात वर्ष की अवस्था थी तब माता की मृत्यु हुई माता के मरण में मैं बहुत रोई थी उस काल में मैं उन्हीं के घर रहने लगी, दस वर्ष की अवस्था में मेरे विवाह की बातचीत हुई, कलकत्ते के बाबू के संग मेरा विवाह हुआ विवाह के आठ दिन पीछे वह बाबू मुझे कलकत्ते लिये जाते थे, उसी दिन झड़ दृष्टि होने से नौका डूब गई, मैं बहुत तैरना जानती धी। यहां तक कि लोग मुझे जलजन्तु कहते थे मैं तैरती २ नदी के तौर पर प्रकाश देखकर वहां उतर आई। इसके पीछे यह लोग मुझे देखकर यहां ले जाये।

हम बिरजा के वृत्तान्त का अवशिष्टांश लिखते हैं। बिरजा गोस्वामी की पालिता कन्या थी, इस कारण उसके विवाह के विषय बड़ा कष्ट हुआ था। बिरजा के निज का कोई दोष न था, वह सर्वाङ्ग सुन्दरी थी। किन्तु वह किस की कन्या है, इसका कोई निश्चय प्रमाण नहीं था। सुतराम् कौन भलामानस विवाह करता शान्तिपुर का एक युवक कलकत्ते में रहकर पढ़ा करता था, उसने यह सम्वाद अपने एक मित्र को दिया। वह सुनकर शान्तिपुर में एक दिन बिरजा को देखने गया देखकर वह उससे विवाह [ १८ ] करने का अभिलाषी हुआ वह विदेशी था, इस हेतु पिता माता मे न कहकर गुप्त रूप से उसने विरजा से विवाह किया। उसकी इच्छा थी कि विरजा को कलकत्ते में ले जाय कर किसी विद्यालय में शिक्षा के लिये रख लेंगे, पर मार्ग में नौका डूब गई पाठकों ने वह आप देखा है। इस के आगे का वृत्तान्त बिरजा ने आपही कह दिया है।

चतुर्थाध्याय।

गोविन्द की पत्नी भवतारिणी का पितालय कोननगर में था। यह लिखना पढ़ना जानती थी और अवकाशानुसार बिरजा या नवीनमणि को शिक्षा भी दिया करती थी। चार पांच वत्सर में उन दोनों ने एक प्रकार का लिखना पढ़ना सीख लिया, परन्तु बिरजा कुछ अधिक सीख गई थी। वह गृहिणी के पास बैठकर रामायण या महाभारत का पाठ किया करती थी और ग्राम को अनेक प्राचीना आय कर सुना करती थी।

बिरजा को अवस्था इस समय पञ्चदश वर्ष अतिक्रम कर गई थी और नवीन को भी यही वयम हो गई थी। बिरजा गौरांगी थी, नवीन श्यामांगी थी। गौरांगी होने से ही कोई रूपवती नहीं होती, और श्यामांगी होने सेही कोई कुत्सिता नहीं होती, परन्तु यह दोनों ही रूपवती थीं। तथापि बिरजा का रूप लावण्य चमत्कार वा, नवीन [ १९ ] का रूप लावण्य साधारण था। बिरजा दीर्घकाया थी नवीन खर्वकाया थी। बिरजा की नासिका ने भू युगल को मध्यस्थल में जितना स्थान चाहिये उतना स्थान अधिकार कर लिया था, और उतनी ही उच्च थी, किन्तु नवीन की नासिका कुछ अधिक उच्च थी। बिरजा के दोनों नेत्र वृहद दीर्घाकार थे, नवीन के दोनों नेत्र और भी बड़े थे, किन्तु कलकत्ते की काली प्रतिमा की चक्षु की न्याय प्रायः कर्ण पर्यन्त विस्तृत थे। यदि इन्हीं को कवि लोग आकर्णवि चान्त चक्षु कहते हों, तो हम इसमें कुछ सौन्दर्य नहीं देखते। बिरजा का कपाल समतल था, किन्तु नवीन का उच्च था। बिरजा का ग्रीवादेश दीर्घ था, जिसे हंसग्रीवा कहते हैं, किन्तु नवीन का ग्रीवादेश हस्व था। अन्यान्य विषयों में दोनों का रूप समानही था। दोनों के केशदाम नितम्बचुम्बित, दोनों की बाँह मृणाल सनिभ, दोनों की अँगुली सुकोमल पद्मकलिका सदृशी, और दोनोंही की देह में नवयौवन का संपूर्ण आविर्भाव था, किन्तु स्वभाव के विषय वैलक्षण्य था। दोनों एकत्र वास करती थीं, अ- कृत्रिम प्रणय था, पर स्वभाव दोनों का एकसा नहीं था। बिरजा मिष्टभाषिणी थी, नवीन भी मिष्टभाषिणी थी किन्तु जिस स्थल पर उचित बात कहने से दूसरे के मन में कष्ट होता हो बिरजा उस स्थान पर कोई बात नहीं कहती थी [ २० ] चुप रहती थी, परन्तु नवीन से यह नहीं हो सका था। दूसरे के मन में चाहे कष्ट हों, वा न हो, वह सब समय में उचित बातही कहती थी। यद्यपि सत्य और उचित बात कहने में कुछ क्षति नहीं है परन्तु कहने से यदि दूसरे के मन में कष्ट होता हो तो उसकी अपेक्षा मौनावलम्बन करनाही अच्छा है। नवीन चाहे यह न जानती हो, चाहे न समझती हो। गंगाधर के संग नवीन के सुप्रणय न होने का यही एक प्रधान कारण था। गंगाधर समस्त दिन ताम्र पीटता, घर में आतेही एकान्त पाय कर नवीन उसक भर्त्सना करती, अकपट चित्त से उसके दोष की वार्ता उल्लेख करती। गङ्गाधर के मङ्गस्त साधनोद्देश्य से ही नवीन ऐसा करती थी किन्तु गङ्गाधर यह नहीं समझता था, वह मन में जानता था कि स्त्री स्वामी के अधीन होती है इसे स्वामी के दोष उल्लेख करने में उसका अधिकार नहीं है।

जो लोग स्त्री को घर की सामिग्री विशेष जानते हैं वे अवश्य गंगाधर के संग एक मत होंगे, और स्त्री के मुख से अपना दोषोल्लेख सुनकर विरक्त होंगे, परन्तु हम ऐसे महात्मा लोगों को बतलाये देते हैं कि स्त्री लोग अपने स्वामी को गृह की वस्तु विशेष नहीं समझती है। वह अपने को स्वामी के सुख में सुखी, दुख में दुखी, स्वामी को बन्धु, स्वामी को सुपरामर्शदाता मन्त्री, अधिक क्या [ २१ ] वह अपने को संसाररूप तरणी की बल्ली जानती हैं। किन्तु नवीन जिस प्रकार दोषी स्वामी के प्रति आरक्त नयन से सदा दृष्टि करती थी, हम उस प्रकार करने का किसी सुन्दरी को परामर्श नहीं देते। वरञ्च मिष्ट वाक्य और सप्रेम व्यवहार से स्वामी को सन्तुष्ट करें, और पीछे स्वामी के असद व्यवहार से आप दुःखित होकर दुःख के सहित कोमल नयन युगल वाष्पवारिपरिपूर्ण करके स्वामी को भर्त्सना करें, तब देखें कि स्वामी सुपथ में आता है वया नहीं?

इसी कारण से गङ्गाधर नवीन को दर्शन नहीं देता था, इससे नवीन का और भी अनिष्ट होने लगा। गंगाधर विरजा पर आशत हुआ। बिरजा का सहास्य वदन, बिरजा के मधुर वाक्य, बिरजा के अनुराग का भाव, वह सदाही ध्यान किया करता था। बिरजा प्रथम यह नहीं जान सकी अन्त में गंगाधर का भावर्वलक्षण्य पाया। पर नवीन से नहीं कहा। कहने से कदाचित् नवीन के संग विच्छेद होता यही समझकर नहीं कहा। नवीन का बिरजा पर अविचलित विश्वास और प्रेम था इसलिये उसको भी उसका सन्देह नहीं हुआ। बिरजा ने और भी विचारा कि यदि यह बात नवीन से कहूँगी तो वह गंगाधर के प्रति हतप्रभ हो जायगी। बिरजा ने नवीन को स्वामी