भ्रमरगीत-सार/३६०-गोपालहि लै आवहू मनाय
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राग मलार
गोपालहि लै आवहू मनाय।
अब की बेर कैसेहु करि, ऊधो! करि छल बल गहि पाय॥
दीजौ उनहिं सुसारि उरहनो संधि संधि समुझाय।
जिनहिं छाँड़ि बढ़िया[१] महँ आए ते विकल भए जदुराय॥
तुम सों कहा कहौं हो मधुकर! बातैं बहुत बनाय।
बहियाँ पकरि सूर के प्रभु की, नंद की सौंह दिवाय॥३६०॥