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कलम, तलवार और त्याग/१४-मौ. अब्दुलहलीम 'शरर'

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कलम, तलवार और त्याग  (1939) 
द्वारा प्रेमचंद

[ १७८ ]मौलाना अब्दुलहलीम शरर' के पिता हकीम तफ़ज्जुल हुसैन साहब साधुप्रकृति, धर्मनिष्ठ मुसलान थे। हनफी सम्प्रदाय के अनुयायी, सूफी सिद्धान्तों के माननेवाले, लखनऊ के झँवाई टोले में रहते थे। इसी मकान में ग़दर के दो साल बाद १७ जमादी उस्सानी सन् १२७५ हिज्री को दो बजे सुबह मौलाना शरर ने जन्म लिया।

हकीम तफ़ज्जु़ल हुसैन मध्यम श्रेणी के व्यक्ति थे और शाही मुंशियों मैं नौकर थे। फिर भी लड़के को पढ़ाने-लिखाने की पूरी कोशिश की। ६ साल की उम्र में मौलाना की पढ़ाई का सिलसिला शुरू हुआ। साल भर तक माता के पास पढ़ते रहे और कुरान का एक पारा भी समाप्त न हुआ। बचपन में वह बड़े ही नटखट थे। माता ने एक बार किसी बात पर क्रुद्ध होकर मारा तो इन्होंने गुस्से में उनकी उँगली चबा ली। मौलाना आठ बरस के हुए तो उनके पिता कलकत्ते में मुंशी उस्सुलतान के दफ्तर में नौकर होकर वहाँ जाने लगे और इन्हें भी साथ लेते गये। वही उनकी पढ़ाई होने लगी। पहले हाफिज़ इलाहीबख्श से साल भर में कुरान समाप्त किया। फिर दो बरस में 'मैयते-आमिल गुलिस्ताँ और बोस्ताॅ पढ़ी। मुल्ला बाक़र से ‘हिदायतुलनहो', काफिया' और ‘मुल्लाजामी' का अध्ययन किया। मुंशी अब्दुललतीफ से शरह बक़ाया' और खुश-नवीसी (लिपि-कला) सीखी। मौलाना तबातबाई से भी कुछ अरबी की किताबें निकाली। हकीम मशीह से हकीमी पढ़ी और १५ साल की उम्र में शाही मुंशिये में अपने पिता की जगह पर नौकर हो गये। उनके पिता लखनऊ चले आये। [ १७९ ]
उस समय मौलाना का उठना-बैठना शाही खानदान के युवकों के साथ था और सुहबत के असर ने कुछ रंग बदला तो उनके पिता ने उनको लखनऊ बुलवा लिया। यहाँ आकर मौलाना अब्दुलहई के शागिर्द मौलवी अब्दुल बारी से दर्शन की पुस्तकें पढ़ीं और मौलाना अब्दुलहई से भी कुछ अध्ययन किया। लखनऊ से देहली गये और मौलाना नज़ीद हुसेन साहब से हदीस की पुस्तके पढ़ी- तथा अब्दुलवहाब नज्दी की 'तौहीद' नामक पुस्तिका का उलथा किया। देहली से खासे तर्कवादी बनकर लखनऊ आ गये। यहाँ आपके पिता ने हकीम सादुद्दीन की बेटी से ब्याह तै कर रखा था, सो लखनऊ आते ही शादी हो गई। अब मौलाना अवध अखबार” में ३०) मासिक पर नौकर हो गये। कुछ अंग्रेजी भी सीख ली थी। शायरी का शौक़ पैदा हुआ। उस जमाने में मुंशी अमीर अहमद मीनाई की शायरी की बड़ी धूम थी, उन्हीं के शागिर्द हुए और 'शरर' (चिनगारी) उपनाम रखा।

अवध अखबार में 'शरर' के लेखों ने एक हलचल डाल दी। लोग उन्हें बड़े चाव से पढ़ते थे। इस नौकरी के सिलसिले में कई बार हैदराबाद जाने का संयोग हुआ और नवाब वक़ारुल उमरा तक पहुँच हो गई। मौलाना के पिता भी उस समय हैदराबाद में ही नौकर थे और बुढ़ौती में पेंशन ले ली थी। मौलाना यद्यपि 'अवध अखबार मे नौकर थे और लेख लिखा करते थे, फिर भी आपको मित्र-मण्डली में बैठने और गपशप का समय मिल जाता था। उनके एक दोस्त मौलवी अब्दुलबासित कुरसी के रहनेवाले बड़े बात के धनी, आत्मसम्मानी वीर और लकड़ी की कला में उस्ताद थे। उनके नाम से 'महशर' नामक मासिक पत्र निकाला जिसकी दफ्तर चौक बज़ाज़ा में क़ायम किया। वहीं मौलवी साहब की भी बैठक जमने लगी। मौलवी हिदायत रसूल उनके महल्ले के रहनेवाले और दोस्त थे, अकसर वह भी साथ रहते थे। लाला रोशनलाल खत्री थे जो, मुसलमान हो गये थे, वह भी उसी गुड्डे के यार थे। मौलवी मासूम[ १८० ]
अली भी उसी मण्डली के थे, पर अपनी सभ्यता और मौलवीपन के अभिमान के कारण गोष्ठी में निस्संकोच सम्मिलित न होते थे। 'महशर' की अच्छी ख्याति हुई पर मौलाना के मनमौजीपन के कारण वह भी बन्द हो गया।

ब्याह के दो बरस बाद मौलाना को चिन्ता हुई कि जीविका का कोई स्थायी उपाय निकाले', अतः ‘अवध अख़बार से अलग होकर ‘दिल गुदाज़' नाम से अपनी मासिक पत्र निकाला। उसको आधा भाग काल्पनिक लेख होते थे, दूसरा उपन्यास। आपका पहला उपन्यास 'दिलचस्प है। उस जमाने में उर्दू में एक उपन्यास लेखक मौलवी साहब थे, दूसरे पण्डित रतननाथ सरशार कश्मीरी। 'सरशार' ने मस्ताना रंग अख्तियार किया। उनका मतलब यह था कि मेरा उपन्यास आप लोगो में दिलचस्पी से देखा जाय। इसलिए उन्होंने दास्ताने अमीर हमजा का अनुसरण करके नायक “आज्जाद को वीर, मनमौजी, स्वच्छन्द, आशिकमिजाज, चालाक ठहराया और बदीउज्जमाँ अफिमची को बख्तक का रूप दिया और उस पर निर्लज्जत का अन्त कर दिया। यह रंग ऐसा जमा कि उस समय के समाज ने हाथों-हाथ लिया।

मौलाना ने देखा कि इस रंग के समाने कोई नया रंग जमाना कठिन है। अतः उन्होंने रिन्दाना या मस्ताना रंग सरशार के लिए छोड़ दिया और अपने लिए एक नया रास्ता निकाला। इसलाम और अरब की ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर मुसलमानों की सभ्यता, संस्कृति, साहस, धर्मनिष्ठता, उदारता, साहित्यसेवा, वज़ेदारी आदि को अंग्रेजों के ढंग पर लिखना आरंभ किया।

दिलचस्प के आकर्षक रंग-रूप दिया! मलिकुल अज़ज़ उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि आम और खास रिंन्दु और भी श्री सबने उसको पढ़ा और गहरी दिलचस्पी से देखा। मंसूर मोहना” को लोगों ने आँखों पर जगह दी। दुर्गेशनन्दिनी, हसन अजीलना बहुत लोकप्रिय हुए। हिन्दुस्तान का कोई शिक्षित मुसलमान ऐसा न था, जिसने [ १८१ ]
मौलाना के उपन्यास न पढ़े हों। यहाँ तक कि कुछ ऐसे आलिम भी, जिन्हें नाविल के नाम से चिढ़ थी, मौलाना की रचनाओं को पढ़ना पुण्य-जनक कार्य समझते थे। इसके अतिरिक्त उनकी भाषा और भाव मैं इतनी सभ्यता और गंभीरता था कि सारे हिन्दू-मुसलमान समाज में उनकी शैली लोकप्रिय हुई। सब सुसंस्कृत लोगों ने उनकी पुस्तको को अपने पुस्तकालयों में सादर स्थान दिया और उनके अवतरण पाठ्य पुस्तकों में दिये जाने लगे।

'दिलगुद़ाजा' अभी पूरे दो बरस भी न निकलने पाया था कि नवाब वकारुलमुल्क ने मौलाना को बुलाकर अपने लड़की के साथ इंगलैण्ड भेज दिया। डेढ़ बरस के बाद मौलाना इस यात्रा से लौटे तो कुछ ही दिनों के बाद नवाब वकारुमुल्क पदच्युत हो गये और महाराज किशुनप्रसाद वजीर हुए। लाचार मौलाना, फिर लखनऊ लौट आये और 'दिलगुद़ाज' फिर जारी हुआ। इसके सिवा भी मौलाना ने कुछ उपन्यास लिखकर ‘पयामेंयार' के संपादक को उचित पुरस्कार लेकर दिये।

लोग कहते हैं कि आरंभ में मौलाना ने अनेक पत्रों में पारिश्रमिक लेकर काम किया और एक दैनिक पन्ने मैं जो अनवर मुहम्मदी प्रेस से मुंशी मुहम्मद तेग़बहादुर के प्रबन्ध से निकला था, कई लेख लिखे। सहीफ़एनामी' नामक पत्र में भी, जो नामी प्रेस लखनऊ से निकलता था, कुछ काम किया।

पहली स्त्री से मौलाना के दो लड़के और दो लड़कियाँ थीं। बड़े लड़के मुहम्मद सिद्दीक़ हसन की पढ़ाई एंट्रेंस तक हुई। छोटे लड़के मुहम्मद फारूक उच्च-शिक्षा प्राप्त कर रहे थे और मौलाना के दफ्तर का काम अच्छी तरह सँभाल लिया था, पर १८ बरस की उम्र में बीमार होकर चल बसे। इसका मौलाना के हृदय पर कुछ ऐसा आघात पहुँचा कि बहुत दिनों तक काम बन्द रही। इसके बाद एक लड़की की भी मृत्यु हो गई।

५० वर्ष की अवस्था में, मौलाना ने दूसरा ब्याह किया, जिसके [ १८२ ]
बाद वे फिर हैदराबाद गये और वहाँ शिक्षा-विभाग के उपाध्यक्ष नियुक्त हुए। वहीं से ‘दिलगुद़ाज' निकालने लगे और तारीखेसिंध लिखा जिस पर निज़ाम की सरकार से ५ हजार रुपया इनाम मिला। कुछ दिन बाद हैदराबाद से संबन्ध-विच्छेद कर लौट आये और 'हमदद' के दफ्तर में अच्छी तनख्वाह पर नौकरी करके देहली तशरीफ ले गये, पर वहाँ का समाज इन्हें न रुचा और साल भर के अन्दर ही वहाँ से चले आये। हैदराबाद से फिर बुलावा आया। १००) माहवार तो वहाँ से पेंशन मिलती थी। ४००) मासिक पर इसलाम का इतिहास लिखने पर नियुक्त हुए। मगर इस बार मौलाना हैदराबाद में न टिके, निज़ाम की इजाजत लेकर रखनऊ लौट आये और ५ बरस तक इस काम में लगे रहे। निज़ाम सरकार ने इस इतिहास को बहुत पसन्द किया। इस बीच ‘दिलगुदाज़' ने बड़ी उन्नति की और हर साल एक नया उपन्यास भी पाठकों को मुफ्त मिलने लगा।

दूसरे महल से मौलाना के दो लड़के और दो लड़कियाँ हैं, जिनमें सबसे छोटी एक लड़की हैं। मौलाना जिस समय हैदराबाद में शिक्षा- विभाग के उपाध्यक्ष थे, वहाँ एक उपन्यास परदे की बुराइयों पर लिखा था। फिर लखनऊ में आकर ‘परदा असमतन’ निकाला जिसके सम्पादक हुसन शाह थे। इस बीच एक अप्रिय विवाद भी छिड़ गया। स्वर्गवासी पण्डित वर्जनारायण चकब्रस्त ने मसनवी गुलजारे नसीम का एक नया संस्करण निकाला। उसकी प्रस्तावना में नसीम' की बड़ाई और दूसरे कवियों की निन्दा का पहलू निकलता था। मौलाना ने उसकी समालोचना की और इसी सिलसिले में मसनवी के कुछ दोषों की भी चर्चा की। इसका जवाब ‘अवध पंच' ने अपने खास ढंग मैं दिया, जिसके बाद मौलाना ने ‘जरीफ' नाम का पत्र निकाला और यंच' के ही रंग मैं प्रत्युत्तर लिखा। जरीफ' के संपादक मुंशी निसार हुसैन थे। यह बहस आठ महीने तक जारी रही। दोनों पक्ष से बड़ा खण्डन-मुण्डन होता रहा। फिर मौलाना ने ‘अल्इरफत ' नाम की मासिक पत्र [ १८३ ]
निकाला जिसके संपादक हकीम सिराजुल हक़ थे। इसमें भी सब लेख मौलाना के ही होते थे, पर यह रिसाला बहुत ही कम दिन जिया।

मौलाना की सभी रचनाएँ लोकप्रिय हुईं और इतनी हुई कि सर्वाधिकार संरक्षित होने पर भी कितने ही छापाखानो ने 'शहीदे वफ़ा’, ‘मलिकुल अजीज वर्जना’, ‘मंसूर मोहना, दुर्गेशनन्दिनी', 'दिलचस्प’, दिलकश', 'फिरदौसे बरी, फ्लोरा फ्लोरडा' को बार-बार छापकर लाभ उठाया। उन्होंने इतने ही पर सन्तोष नहीं किया, हुत्न का डाकू और 'दरबारे हरामपूर' को बदलकर, बिगाड़कर, आकार और मूल्य घटाकर, घटिया काग़ज़ पर छापकर लोगों को धोखा दिया और नफा कमाया। यो तो मौलाना को सभी रचनाएँ लोकप्रिय हुई, पर आरभ के उपन्यासों में मलिकुल अज़ीज वर्जना, मंसूर मोहना, दुर्गेशनन्दिनी, और शहीदे वफा को सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई और अन्तिम रचनाओं में ‘हुस्न की डाकू', 'शौक़ीन मलका, 'जूयाए हक़' और 'दरबार हरामपूर बेहद पसंद किये गये।

मौलाना को साहित्यसेवा का इतना उत्साह था कि आज एक भी आदमी उनकी बराबरी करनेवाला नहीं दिखाई देता। ७० साल की उम्र हुई, ५५ बरस तक उर्दू भाषा की सेवा में संलग्न रहे। अवध अखबार 'सहीफए नाम' और 'हमदर्दी में कम किया, 'महशर', ‘मुहज्जब', 'दिलगुदाज', 'इत्तेहाद, परदए असमत, अलइरफान'--- इन सब मासिको में लेख लिखे। इनमें से “दिलगुदाज' को ४६ बरस तक चलाया। इसके बाद उनकी रचनाओं की ओर देखिए तो उनकी गिनती १०० पुस्तकों से ऊपर हैं। ‘दिलगुदाज' के कितने ही लेख इतिहास के कई अध्याय और उपन्यासों के कुछ परिच्छेद पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं। कुछ उपन्यासों का अनुवाद दूसरी भाषाओं में भी हुआ है।

शेष वय में मौलाना का झुकाव अध्यात्म की ओर हुआ और उसका आरंभ पुराने इसलामी सन्तो की जीवनी से हुआ। सवानेह उम्री ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, सवानेह अबूबकर शिबली और इसी प्रकार [ १८४ ]
की अन्य पुस्तकें लिखीं। पक्के हनफी सूफी और रोजा नमाज के पाबंद हो गये। नमाज़ तो एक ही नियम से पढ़ते रहे। जो धर्मभीरुता अन्तिम काल में उत्पन्न हो गई थी उसका दरजा बहुत ऊँचा था! चालीस-पचास बरस की उम्र तक तुर्की टोपी पहनी और फ्रेंच दाढ़ी रखी, ख़िज़ाब भी लगाते रहे, पर इस समय उनका हुलिया और ही था। चौगिया (चौगोशिया) टोपी, लम्बी सफेद दाढ़ी, भरा हुआ बदन, मॅझोला क़द, गोला तेजयुक्त मुख-मण्डल, जबान पर इसलाम और इसलामी इतिहास की चर्चा थी। बातों-बातों में, खुदा और रसूल की चर्चा का पहलू निकाल लेते थे।

अन्तिम काल में उनका आना-जाना बस घर से झँवाईटोले तक रह गया था। पर यह असंभव था कि वह आवश्यकतावश हमारी ओर से निकले और हमसे न मिलें और अपने दो-चार मिनट खर्च न कर दें। साल भर का अरसा हुआ जब मौलाना कुछ बीमार हुए और स्वप्न में देखा कि उनके कुछ परलोकगत पूर्वपुरुष उनसे कह रहे हैं। कि अब तुम चले आओ। मौलाना ने यह सपना लोगों को सुनाया और कहा कि अब आशा नहीं कि हम इस बीमारी से उठेंगे। मित्रों ने कहा कि आप घबराएँ नहीं, हम दुआ करेंगे और आप अच्छे हो जायँगे। संयोग से ऐसा ही हुआ। मौलाना अच्छे हो गये और ऐसे अच्छे हुए कि अपना काम अच्छी तरह करने लगे।

मौलाना १० बजे से क़लम लेकर बैठते और दो बजे तक बराबर लिखा करते थे। दो से ४ बजे तक कमरे में जाकर सोते थे या आराम से लेटे रहते थे। शाम को मित्रों से मिलने-जुलने चले जाते थे और अकसर ८-९ बजे रात को घर आते थे। लेख-शैली जैसी पारदर्शिता- पूण थी, वक्तृत वैसी न होती थी। पर आरंभ करने के बाद धीरे-धीरे उसे भी रोचक बना लेते थे और उपसंहार बहुत ही मनोरंजक होता था।

काव्यरचना अपकी नाममात्र है। शुरू जवानी में कुछ ग़ज़लें कही थी और दो मसनवियाँ 'शबेग़म' और 'शबे बरल' लिखीं जो [ १८५ ]
लोकप्रिय हुई। परन्तु काव्यकला के पण्डित थे और उस पर अकसर भाषण किया करते थे।

अन्तिम उपन्यास 'नेकी का फल' लिखा था जो मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ। इस नाम से आपके महाप्रस्थान का सुन्दर अर्थ निकलता है।

विधि-विधान की विचित्रता को देखिए कि सन् १९२६ ई० को विदा करते हुए अपनी ही लेखनी से अपनी निधन-वार्ता ‘दिलगुदाजु, के पन्नो पर लिखते हैं, और यह नहीं सोचते कि मैं वर्ष का वर्णन नहीं किन्तु अपनी हालत लिख रहा हूँ, लिखते हैं-

“इतनी ही थोड़ी मुद्दत में उसने बचपन की नादानियाँ, जवानी की उमंगे और बुढ़ापे की पुख्ताकारियाँ सब देख लीं और अब पाँच-छः रोज का मेहमान है।

क्या मालूम था कि सचमुच यह लिखने के पाँच-छः रोज़ के बाद मौलाना बीमार हो जायँगे और एक सप्ताह भी रोग-शय्या पर रहना न बदा होगा।