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रहीम-कवितावली/खेट-कौतुक

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खेट-कौतुकम्[]
श्लोक

यत्पादपङ्कजरेणोः प्रसादमासाद्य सर्वभुवनेषु।
प्रणमामीष्टसुमूर्तिं तामहममराः प्रभुत्वतां यान्ति॥१॥

जिनके चरण कमल-धूलि के प्रसाद से देवता सम्पूर्ण लोकों में बड़ाई पाते हैं, उन अपने इष्टदेव कृष्णचन्द्र को मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥

कमर्विलाधशालए नरोहि बामुरौवतः।
सदाबली च साबिरः सुकर्मकृद्यदा भवेत्॥२॥

जिसकी कुण्डली के तीसरे स्थान में चन्द्रमा हो वह मनुष्य सन्तोषी, शीलवान्, बली और अच्छे कामों का करनेवाला होता है॥२॥

मुश्तरी यदि भवेद् ज़रखाने,
बुज़रुगः परमपुण्यमतिः स्यात्।
कामिल: कनकसूनुयुतश्च,
ख़ूबरोहि मनुजो ज़रदारः॥३॥

जिसके दूसरे घर में बृहस्पति हों वह बड़ा पुण्यात्मा और श्रेष्ठ पुरुष होता है तथा पुत्र, सोना और धन-धान्य से युक्त होता है॥३॥

आयुख़ाने चश्मख़ोरा मालख़ाने मुश्तरी।
राहु जो पैदावखाने शाह होवे मुल्क का॥४॥

जिसके आठवें शुक्र, दूसरे बृहस्पति हों और राहु लग्न में हो वह राजा होता है॥४॥

रबी शत्रुखाने पड़ै उच्च का।
करै खाक दौलत फिरै जाबजा॥५॥

सूर्य्य यदि मेष-राशि का होकर कुंडली के छठे घर में पड़ जाय तो धन को नाश करके मनुष्य को मारा-मारा फिराता है॥५॥

 

  1. इस पुस्तक के पाँच श्लोक नमूने के तौर पर दिए गए हैं। यह प्राप्त है और प्रकाशित भी हो चुकी है।