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रहीम-कवितावली/नगर-शोभा-वर्णन

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रहीम-कवितावली  (१९२६) 
द्वारा रहीम, संपादक सुरेन्द्रनाथ तिवारी

 

नगर-शोभा वर्णन।[]

आदि रूप की परम द्युति, घट-घट रही समाइ।
लघु मति ते मो मन रसन, अस्तुति कही न जाइ॥
 
उत्तम जाति बराह्मनी, देखत चित्त लुभाइ।
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाँइ॥
परजापति परमेस्वरी, गंगा रूप समान।
जाके अंग-तरंग में, करत नैन असनान॥
 
रूप रंग रतिराज में, खतरानी इतरानि।
मानो रची विरांच पचि, कुसुम कनक में सानि॥
पारस पाहन की मनो, घरे पूतरी अंग।
क्यों न होइ कंचन बहू, जो बिलसै तिहि संग॥
 
कबहुँ दिखावै जौहरनि, हँसि-हँसि मानिकलाल।
कबहूँ चख ते च्वै परे, टूटि मुक्त की माल॥
जद्यपि नैननि ओट है, बिरह चोट बिन घाइ।
पिय-उर पीरा ना करै, हीरा-सी गड़ि जाइ॥
 
कैथिनि कथन न पारई, प्रेम-कथा मुख बैन।
छाती ही पाती मनो, लिखे मैन के सैन॥
बरुनि-बार लेखनि करै, मसि काजर भरि लेय।
प्रेमाखर लिखि नैन ते, पिय बाँचन को देय॥

बनिआइन बनि आइ कै, बैठि रूप की हाट।
प्रेम पैक तन हेरि कै, गरुवे तारत बाट॥
गरब तराजू करत चख, भौंह मोरि मुसक्यात।
डाँड़ी मारत बिरह की, चित-चिंता घटि जात॥
 
भाँटा बरन सु काजरी, बेचै सोवा साग।
निलज भई खेलत सदा, गारी दै-दै फाग॥
हरी-भरी डलिया निरखि, जो कोई नियरात।
झूठे हू गारी सुनत, साँचे हू ललचात॥
 
करै न काहू की सका, सक्किनि जोबन रूप।
सदा सरम जल ते भरी, रहै चिबुक के कूप॥
सजल नैन वाके निरखि, चलत प्रेम-सर फूट।
लोक-लाज उर धाक ते, जात मसक-सी छूट॥
 
धुनिआइन धुनि रैनि-दिन, धरै सुरति की भाँत।
वाको राग न बूरही, कहा बजावै ताँत॥
काम पराक्रम जब करै, छुवत नरम ह्वै जाय।
रोम-रोम पिय के बदन, रूई-सी लिपटाय॥
 
निसि-दिन रहै ठठेरनी, राजे माँजे गात।
मुकता वाके रूप को, थारी पै ठहरात॥
आभूषण बसतर पहिरि, चितवत नपिय-मुख-ओर।
मानो गढ़े नितंब कुच, गड़ुवा डार कठोर॥

 

  1. अपूर्ण। देखो भूमिका-भाग ।