रहीम-कवितावली/मदनाष्टक
मदनाष्टक
[१]
मनसि मम नितान्तम् आयकैं बासु कीया।
तन धन सब मेरा मान तैं छीन लीया॥
अति चतुर मृगाक्षी देखतैं मौन भागी।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी॥
[२]
बहत मरुति मन्दम् मैं उठी राति जागी।
शशिकर-कर लागें सेल ते पैन बागी[१]॥
अहह विगत स्वामी क्या करौं मैं अभागी।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी॥
[३]
हर नयन हुताशम् ज्वालया जो जलाया।
रति-नयन जलौघै खाख बाकी बहाया॥
तदपि दहति चित्तम् मामकम् क्या करौंगी।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी॥
[४]
विगत घन निशीथे चाँद की रोशनाई।
सघन वन निकुंजे कान्ह बंसी बजाई॥
सुत पति गतनिद्रा स्वामियाँ छोड़ भागीं।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी॥
[५]
हिम ऋतु रतिधामा सेज लोटौं अकेली।
उठत बिरह ज्वाला क्यों सहौं री सहेली॥
चकित नयन बाला तत्र निद्रा नलागी।
मदन शिरसि भूयः क्या बलाआन लागी॥
[६]
कमल मुकुल मध्ये राति को ऐ सयानी।
लखि मधुकर बंधम् तू भई री दिवानी॥
तदुपरि मधुकाले कोकिला देखि भागी।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी॥
[७]
तव बदन मयंकी ब्रह्म की चोप बाढ़ी।
मुख कवँ लखि भूपै चाँद ते कांति गाढ़ी॥
मदन-मथित रंभा देखतै मोहि भागी।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी॥
[८]
नभासि घन घनान्ते है घनी कैसि छाया।
पथिक जन बधूनाम् जन्म केता गँवाया॥
इति बदति पठानी मन्मथांगी विरागी।
मदन शिरसि भूयः क्या बला आन लागी॥
- ↑ "शशि-कर कर लागे सेजको छोड़ भागी।"