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विचित्र-प्रबन्ध/४–रङ्गमञ्च

विकिस्रोत से
विचित्र-प्रबन्ध  (1924) 
द्वारा रवीन्द्रनाथ ठाकुर

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रङ्गमञ्च

भरत के नाट्यशास्त्र में नाट्यमञ्च का वर्णन देखा जाता है। किन्तु उसमें दृश्यपट (पर्दे) का कोई उल्लेख नहीं पाया जाता। उसका उल्लेख न होने से, मेरी समझ में, कोई हानि भी नहीं।

जहाँ कला-विद्या का एकाधिपत्य है वहीं उसका पूर्ण गौरव भी है। सौत के साथ रहने से स्त्री को छोटा बनना ही पड़ेगा:–– ख़ासकर अगर सौत ज़बरदस्त हो। यदि रामायण को सुर से पढ़ें तो बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक सुर को एक ही ढंग में रहना पड़ेगा। राग-रागिनी के हिसाब से उस बेचारे सुर की कभी उन्नति नहीं हो सकती। जो काव्य ऊँची श्रेणी के हैँ [ १९ ] उनका सङ्गीत भी ख़ास अपने ही नियम का होता है। बाहरी सङ्गीत की सहायता की वे अवज्ञा के साथ उपेक्षा करते हैं। सङ्गीत भी, जो ऊँची श्रेणी के हैं वे, अपने ही नियम से अपनी बात कहते हैं। वे बातों के लिए कालिदास या मिल्टन के मुँह की ओर नहीं ताकते। वे बहुत ही तुच्छ "तूम-ताना-नाना" को लेकर ही अपना काम बड़े मज़े में पूरा कर लेते हैं। चित्र, सङ्गीत और बातचीत मिला कर ललितकला का एक स्वाँग किया जा सकता है। किन्तु वह एक तरह का खेल––बाज़ार की चीज़––होगा। उसे राजकीय उत्सव का उच्च आसन नहीं दिया जा सकता।

किन्तु श्रव्यकाव्य की अपेक्षा दृश्यकाव्य स्वभाव से ही कुछ कुछ पराधीन हुआ करता है। बाहर की सहायता से ही अपने को सार्थक करने के लिए विशेष रूप से उनकी सृष्टि हुई है। यह बात उसे स्वीकार ही करनी पड़ती है कि दृश्यकाव्य को अभिनय की अपेक्षा है।

पर हम इस बात को नहीं स्वीकार करते। जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री अपने पति को छोड़कर और किसी को नहीं चाहती, उसी प्रकार अच्छा काव्य भावुक (सहृदय) के सिवा और किसी की अपेक्षा नहीं रखता। सभी साहित्य के पढ़नेवाले मन ही मन अभिनय करते हैं। उस अभिनय में जिस काव्य की सुन्दरता प्रकाशित नहीं होती वह काव्य किसी कवि को यशस्वी नहीं बनाता।

बल्कि यह बात कह सकते हो कि अभिनय-विद्या बिलकुल पराधीन है। वह अनाथ है, इस कारण नाटक की प्रतीक्षा में बैठी [ २० ]रहती है। नाटक के गौरव के सहारे ही वह अपना गौरव दिखा सकती है।

जिस प्रकार लोक में स्त्री-भक्त पति की हँसी होती है उसी प्रकार नाटक भी यदि अभिनय की अपेक्षा करके अपने को छोटा बनावे तो निःसन्देह वह भी वैसे ही उपहास के योग्य हो उठता है। नाटक का भाव इस प्रकार का होना चाहिए––हमारा अभिनय होता हो तो हो और यदि न हो तो अभिनय का ही भाग्य फूटा समझना चाहिए। इससे हमारी कोई हानि नहीं है!

जो हो, अभिनय को काव्य की अधीनता माननी ही पड़ेगी। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि अभिनय को सब कला विद्याओं की गुलामी करनी पड़ेगी! यदि वह अपने गौरव की रक्षा करना चाहे तो उसे उचित है कि जितनी अधीनता न मानने से उसका स्वरूप प्रकाशित न हो सकता हो उतनी ही अधीनता वह स्वीकार करे। उससे अधिक कुछ भी सहायता उसे नहीं लेनी चाहिए। यदि वह उससे अधिक सहायता ले तो यह उनके लिए अपमान है।

यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं कि नाटक की बातें अभिनय करनेवाले के लिए विशेष आवश्यक हैं। कवि ने हँसी की जो बातें रक्खी हैं उन्हीं से उसे हँसना पड़ता है, कवि उसे जहाँ रोने का मौक़ा देता है वहीं रोकर उसे दर्शकों की आँखों में आँसू लाने पड़ते हैं। किन्तु चित्र की क्या आवश्यकता है? वह तो पर्दे में अभिनय करनेवाले के पीछे लटका रहता है। अभिनेता उसकी सृष्टि नहीं करता; वह केवल पट में अंकित रहता है। मेरी समझ में उसके द्वारा अभिनेता की अयोग्यता और [ २१ ]कापुरुषता ही प्रकाशित होती है। इस प्रकार जिस उपाय के द्वारा वह दर्शकों के मन में विभ्रम उत्पन्न करके अपने काम को सहज बना लेता है वह उपाय चित्रकार से भीख माँग कर लाया हुआ है।

इसके अलावा जो दर्शक अभिनय देखने आया है उसके पास क्या अपनी पूँजी कुछ भी नहीं है? उसमें अपनी शक्ति क्या कुछ भी नहीं है? वह क्या निरा बच्चा है? विश्वास-पूर्वक क्या उस पर कोई भी बात छोड़ी नहीं जा सकती? यदि यह सत्य हो तो दूना दाम देने पर भी वैसे लोगों के हाथ अभिनय देखने का टिकट नहीं बेचना चाहिए।

यह तो अदालत में गवाही देना नहीं है जो प्रत्येक बात को शपथ-पूर्वक प्रमाणित करना पड़ेगा? जो विश्वास करने के लिए, आनन्द करने के लिए, आये हैं उनको ठगने के लिए इतनी बड़ी तैयारी की आवश्यकता ही क्या है? वे (दर्शक) अपनी कल्पनाशक्ति को घर पर ताले में बन्द करके नहीं आते। कुछ तुम समझाओ और कुछ वे स्वयं समझें। अभिनेता और दर्शकों में ऐसे ही समझौते का सम्बन्ध है।

वृक्ष की ओट में खड़े होकर दुष्यन्त सखियों के साथ शकुन्तला की बातचीत सुन रहे हैं। अच्छी बात है। वह बातचीत, कवि के शब्दों में, रस का रङ्ग खूब जमाकर कहते जाओ। उस समय मेरे सामने समूचे वृक्ष उपस्थित न रहने पर भी मैं उस बातचीत से वृक्षों का अनुमान कर ले सकता हूँ। इतनी सृजन-शक्ति––कल्पना-शक्ति––मुझमेँ है। दुष्यन्त-शकुन्तला और अनसूया-प्रियंवदा के चरित्र के अनुरूप हर एक हाव-भाव तथा उनके कण्ठस्वर के ढङ्ग आदि का [ २२ ]प्रत्यक्ष की तरह स्वयं अनुमान कर लेना कठिन है। अतएव उनको जब हम प्रत्यक्ष वर्त्तमान देख पाते हैं तभी उस रस का हृदय में उदय होता है। पर दो वृक्षों, एक घर अथवा एक नदी, की कल्पना कर लेना कुछ कठिन नहीं है। इतना समझ जाने का काम भी हमारे हाथ में न रख कर चित्र-द्वारा उक्त दृश्यों को प्रत्यक्ष दिखाना हम पर घोर अविश्वास करना है।

इसी कारण मुझे अपने देश की 'यात्रा' (रामलीला, रहस की लीला के ऐसे स्वाँग) अधिक अच्छी मालूम होती है! 'यात्रा' के अभिनय में अभिनेता तथा दर्शकों के बीच विशेष अन्तर नहीं रहता। यहाँ परम्पर के विश्वास और अनुकूलता पर भरोसा रखने के कारण सभी काम बड़ी उत्तमता से किये जाते हैं। यहाँ नाटक का सार पदार्थ––काव्यरस––अभिनय के द्वारा, फुहारे की तरह दर्शकों के आनन्दित हृदय पर पड़ता है। जब कम फूलोंवाले बाग से फूल ढूँढ़ने में मालिन विलम्ब कर देती है तब उसे प्रमाणित करने के लिए इसकी क्या आवश्यकता है कि पाठकों के आगे समूचे समूचे पेड़ ला कर खड़े कर दिये जायँ? समूचे बाग का पता तो वह अकेली मालिन ही दे देती है। यदि ऐसा न हो तो उस मालिन में ही क्या गुण ठहरा, और वे दर्शक भी काठ के पुतले की तरह क्या करने बैठे हैं?

शकुन्तला के कवि को यदि रङ्गमञ्च पर दृश्यपट (सीनरी) की बात सोचनी पड़ती तो वह शुरू में ही मृग के पीछे रथ दौड़ाना बन्द कर देते। यह ठीक है कि वह महाकवि थे, रथ के रुकने पर भी उनकी क़लम न रुकती; किन्तु मेरा कहना यह है कि जो तुच्छ [ २३ ]है उसके लिए, जो बड़ा है वह, अपने किसी अंश को क्योँ हीन होने देगा? भावुक दर्शक के हृदय में रङ्गमञ्च है और उसमें स्थान की कमी नहीं है। वहाँ किसी जादूगर के हाथ से दृश्य-पटों की रचना अपने आप हुआ करती है। उसी मञ्च, उसी दृश्यपट, से नाटककार को काम है। कोई कृत्रिम मञ्च या कृत्रिम पर्दा कवि की कल्पना के योग्य नहीं हो सकता।

इसी कारण दुष्यन्त और सारथि जिस समय एक ही जगह स्थिर भाव से खड़े होकर वर्णन और अभिनय के द्वारा रथ के वेग की आलोचना करते हैं, उस समय अनायास ही दर्शक समझ लेते हैं कि रङ्गमञ्च छोटा है, परन्तु कवित्व छोटा नहीं है। इसी से वे रङ्गमञ्च की इस अनिवार्य त्रुटि को ख़ुशी से माफ़ कर देते हैं और अपने चित्त को ही उस छोटे घेरेवाले रङ्गमञ्च में फैला कर मञ्च को महान बना देते हैं। परन्तु रङ्गमञ्च के लिए यदि काव्य को हीन बनना पड़ता तो इन कई एक लकड़ी के टुकड़ों को कौन माफ़ कर देता? वह त्रुटि किसे न खटकती?

शकुन्तला नाटक को बाहरी चित्रपटों की कोई आवश्यकता न थी। इसी से उसने अपने लिए आप चित्रों की सृष्टि करली है। उसका कण्व का आश्रम, उसका स्वर्ग के मार्ग का मेघ-जगत्, उसका कश्यप का तपोवन अनूठा है। इन चित्रों के लिए वह परमुखापेक्षी नहीँ बना। उसने आप ही अपने को पूर्ण कर लिया है। चरित्र की सृष्टि करने अथवा स्वभाव का चित्र खींचने में उसे अपनी ही कवित्व-सम्पत्ति पर भरोसा है।

हमने एक दूसरे प्रबन्ध में यह बात कही है कि यूरोप के [ २४ ]नाटकोँ में वास्तविक सत्य के बिना काम नहीं चल सकता। कल्पना केवल उनका मनोरंजन नहीं करती, काल्पनिक को बिल्कुल वास्तविक बनाकर बालकोँ की तरह उनको बहलाना भी पड़ता है। वहाँ काव्य-रस में प्राणसंचार करनेवाली केवल विशल्यकरणी ओषधि (अर्थात् कल्पना) से काम नहीं चल सकता, उस विशल्यकरणी के साथ ही साथ समस्त गन्ध-मादन पर्वत (अर्थात् सत्य की नक़ली सामग्री) तक चाहिए। इस समय कलियुग है, अतएव गन्धमादन को उठा लाने के लिए इंजीनियरी की आवश्यकता है, और उसके लिए ख़र्च भी कम नहीं करना पड़ता। विलायत के स्टेज (रङ्गमञ्च) पर यही अभिनय दिखाने के लिए जितना व्यर्थ ख़र्च होता है उतने में भारत के कितने ही भारी दुर्भिक्ष दूर हो सकते हैं।

पूर्वी देशों के काम-काज, खेल-तमाशे सभी सीधे और सहज हैं। केले के पत्ते या पत्तल में हम भोजन कर सकते हैं, इसीसे भोज का सच्चा आनन्द––सबको बे रोक टोक अपने घर पर निमन्त्रित कर लाना––प्राप्त होता है। यदि बाहरी सामग्रियों की अधिकता होती, यदि अधिक दिखाऊ आयोजन किये जाते, तो निःसन्देह उनमें भोज का असली आनन्द कुचल कर मर जाता।

विलायत का अनुकरण करके जो थियेटर आजकल हमारे देश मेँ किया जारहा है, वह बाहरी पदार्थों से दबा हुआ एक फूला हुआ पदार्थ है। उसको हिलाना कठिन है––अपने अनुकूल करना कठिन है और धनी-ग़रीब आदि सबके सामने उसे उपस्थित करना भी असाध्य है। इन थियेटरों मेँ लक्ष्मी के वाहन उल्लू ने सरस्वती [ २५ ]के आसन-कमल को ढँक रक्खा है। इनमें कवि और गुणी की प्रतिभा की अपेक्षा धनी की पूँजी ही अधिक चाहिए। यदि दर्शक पर विलायती लड़कपन का प्रभाव न पड़ा हो और अभिनेता को काव्य पर और अपने ऊपर यथार्थ विश्वास हो, तो अपने यहाँ के अभिनय के चारों ओर से उसके बहुमूल्य व्यर्थ सामान के झंझट को झाड़ू से हटा कर, उसकी विशेषता को छुटकारा दिलाकर, गौरवान्वित करना ही सहृदय हिन्दू-सन्तान का कर्त्तव्य होना चाहिए। बाग़ के दृश्य को बिलकुल बाग़ लगा कर ही दिखावेंगे––स्त्री-चरित्र का अभिनय किसी स्त्री ही के द्वारा करावेंगे––इस प्रकार के विलायती ख़यालों के उजड्डपन को छोड़ देने का समय अब आ गया है।

साधारणतः यह कहा जा सकता है कि कठिनता अयोग्यता का चिह्न है। यदि शिल्प में वास्तविकता कीड़े की तरह घुस जाती है तो उसके भीतर के सब रस को चूस लेती है, और जहाँ अजीर्णवश रस की भूख़ नहीं है वहाँ बहुमूल्य बाहरी अधिकता धीरे धीरे भयानक रूप से बढ़ने लगती है। अन्त को यही होता है कि अन्न तो छिप जाता है, और चटनी का ढेर लग जाता है।


मयूरध्वनि

(एक दिन अकस्मात् घर के पालतू मोर की ध्वनि सुन कर मेरे मित्र बोल उठे––मैं यह मोर का कर्कश शब्द नहीं सुन सकता। मालूम नहीं, मोर के शब्द को कवियों ने अपने काव्यों में क्योँ स्थान दिया।)