सप्तसरोज/पंच परमेश्वर

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सप्तसरोज  (१९३८) 
द्वारा प्रेमचंद
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पंच परमेश्वर

जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझेमें खेती होती थी। कुछ लेन-देनमें भी साझा था। एकको दूसरेपर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गये थे तब अपना घर अलगू को सौंप गये थे और अलगू जब कभी बाहर जाते, तब जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खान-पान का व्यवहार था, न धर्मका नाता, केवल विचार मिलते थे। मित्रताका मूलमन्त्र भी यही है।

इस मित्रताका जन्म उसी समय हुआ जब दोनों मित्र बालक ही थे और जुम्मन के पूज्य पिता जुमराती उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे। अलगूने गुरुजीकी बहुत सेवा की—खूब रिकाबियाँ माँजी, खूब प्याले धोये। उनका हुक्का एक क्षण के लिये भी विश्राम न लेने पाता था, क्योंकि प्रत्येक चिलम अलगूको आध घण्टे तक किताबों से मुक्त कर देती थी। अलगू के पिता पुराने विचारोंके मनुष्य थे। शिक्षा की अपेक्षा उन्हें गुरुकी सेवा-शुश्रूषापर अधिक विश्वास था। कहते थे कि विद्या पढ़नेसे नहीं आती, जो कुछ होता है गुरुके आशीर्वाद से होता है। बस, गुरुजीकी कृपा दृष्टि चाहिये। अतएव यदि अलगूपर जुमराती शेख के आशीर्वाद अथवा सत्संग
[ ४४ ] का कुछ फल न हुआ तो वह यह मानकर सन्तोषकर लेगा कि विद्योपार्जनमें मैंने यथाशक्ति कोई बात उठा नहीं रखी, विद्या उसके भाग्य हीमे न थी तो कैमे आती?

मगर जुमराती शेख स्वयं आशीर्वादके लायक न थे। उन्हें अपने सोटेपर अधिक भरोसा था और इसी सोटेके प्रतापसे, आज आसपासके गावोंमें जुम्मनकी पूजा होती थी। उनके लिखे हुए रिहननामे या बैनामेपर कचहरीका मुहर्रिर भी कलम न उठा सकता था। हल्केका डाकिया, कांस्टेबिल और तहसीलका चपरासी-सब उनकी कृपाकी आकांक्षा करते थे। अतएव अलगूका मान उनके धनके कारण था तो जुम्मन शेख अपनी अमोल विद्यासे ही सबके आदर-पात्र बने थे।

जुम्मन शेखकी एक बूढ़ी खाला (मौसी) थी। उनके पास कुछ थोडी-सी मिलकियत थी। परन्तु उसके निकट सम्बन्धियों में कोई न था। जुम्मन ने लम्बे-चौड़े वादे करके वह मिलकियत अपने नाम चढ़वा ली थी। जबतक दान-पत्र की रजिस्टरी न हुई थी तबतक खाला जानका खूब आदर-सत्कार किया गया, उन्हें स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गये। हलुवे पुलाव की वर्षा सी की गई, पर रजिस्टरीकी मुहर ने इन खातिरदारियोंपर भी मानो मुहर लगा दी। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों से कुछ तेज तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मम शेख भी निष्ठुर हो गये। अब बेचारी खाला-जानको प्रायः नित्य ही ऐसी बात सुननी पड़ती थी। [ ४५ ]
बुढ़िया न जाने कबतक जियेगी। दो तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया है मानो मोल ले लिया है। बघारी दालके बिना रोटियाँ नहीं उतरतीं। जितना रुपया इसके पेट मे झोंक चुके उतनेसे तो अबतक एक गांव मोल ले लेते।

कुछ दिन खाला-जानने सुना और सहा, पर जब न सहा गया तब जुम्मनसे शिकायत की। जुम्मनने स्थानीय कर्मचारी——गृह-स्वामिनी के प्रबन्ध में दखल देना उचित न समझा। कुछ दिन तक और योही रो-धोकर काम चलता रहा। अन्तमें एक दिन खालाने जुम्मनसे कहा, बेटा। तुम्हारे साथ मेरा निर्वाह न होगा। तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना अलग पका-खा लूँगी।

जुम्मनने धृष्टताके साथ उत्तर दिया, रुपये क्या यहां फलते हैं? खालाने नम्रतासे कहा, मुझे कुछ रूखा-सूखा चाहिये भी कि नहीं? जुम्मनने गम्भीर स्वरसे जवाब दिया, तो कोई यह थोड़े समझता है कि मौतमे लड़कर आई हो?

खाला बिगड़ गई। उन्होंने पंचायत करनेकी धमकी दी। जुम्मन हँसे, जिस तरह कोई शिकारी हिरनको जालकी तरफ जाते देखकर मन ही-मन हँसता है। वे बोले, हाँ जरूर पंचायत करो। फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात दिनकी खटपट पसन्द नहीं।

पंचायतमें किसकी जीत होगी, इस विषयमें जुम्मनको कुछ भी सन्देह न था। आस-पासके गांव में ऐसा कौन था जो उनके अनुग्रहों का ऋणी न हो? ऐसा कौन था जो उनको शत्रु बनाने का साहस कर सके? किसमें इतना बल था जो उनका
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का कुछ फल न हुआ तो वह यह मानकर सन्तोषकर लेगा कि विद्योपार्जन में मैंने यथाशक्ति कोई बात उठा नहीं रखी, विद्या उसके भाग्य ही में न थी तो कैसे आती?

मगर जुमराती शेख स्वंय आशीर्वादके लायक न थे। उन्हें अपने सोटेपर अधिक भरोसा था और इसी सोटेके प्रतापसे आज आसपास के गावों में जुम्मनकी पूजा होती थी। उनके लिखे हुए रिहननामे या बैनामेपर कचहरीका मुहर्रिर भी कलम उठा सकता था। हल्केका डाकिया, कांस्टेबिल और तहसीलका, चपरासी——सब उनकी कृपाकी आकांक्षा करते थे। अतएव अलगूका मान उनके धनके कारण था तो जुम्मन शेख अपनी अमोल विद्यासे ही सबके आदर-पात्र बने थे।

जुम्मन शेखको एक बूढ़ी खाला (मौसी) थी। उनके पास कुछ थोड़ी-सी मिलकियत थी। परन्तु उसके निकट सम्बन्धियों में कोई न था। जुम्मनने लम्बे-चौड़े वादे करके वह मिलकियत अपने नाम चढ़वा ली थी। जबतक दान-पत्र की रजिस्टरी न हुई थी तबतक खाला जानका खूब आदरसत्कार किया गया, उन्हें खूब स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गये। हलुवे पुलावकी वर्षा सी की गई, पर रजिस्टरीकी मुहरने इन खातिरदारियों पर भी मानो मुहर लगा दी। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कडवी बातों से कुछ तेज तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मम शेख भी निठुर हो गये। अब बेचारी खाला-जानको प्रायः नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं। [ ४७ ]बुढ़िया न जाने कबतक जियेगी। दो तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया है मानो मोल ले लिया है। बघारी दालके बिना रोटियां नहीं उतरतीं। जितना रुपया इसके पेट में झोक चुके उतनेसे तो अबतक एक गांव मोल ले लेते।

कुछ दिन खाला-जानने सुना और सहा, पर जब न सहा गया तब जुम्मनसे शिकायत की। जुम्मनने स्थानीय कर्मचारी——गृह स्वामिनीके प्रबन्धमें दखल देना उचित न समझा। कुछ दिन तक और योंही रो-धोकर काम चलता रहा। अन्तमें एक दिन खालाने जुम्मनसे कहा, बेटा! तुम्हारे साथ मेरा निर्वाह न होगा। तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना अलग पका-खा लूगी।

जुम्मनने धृष्टताके साथ उत्तर दिया, रुपये क्या यहाँ फलते हैं? खालाने नम्रतासे कहा, मुझे कुछ रूपा-सूखा चाहिये भी कि नहीं? जुम्मनने गम्भीर स्वरसे जवाब दिया, तो कोई यह थोड़े समझता है कि मौतसे लड़कर आई हो?

खाला विगड़ गई। उन्होंने पंचायत करनेकी धमकी दी। जुम्मन हंसे, जिस तरह कोई शिकारी हिरनको जालकी तरफ जाते देखकर मन-ही-मन हंसता है। वे बोले, हां जरूर पंचायत करो। फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात दिनकी खटपट पसन्द नहीं।

पंचायतमें किसकी जीत होगी, इस विषय में जुम्मनको कुछ भी सन्देह न था। आस-पासके गांवमें ऐसा कौन था जो उनके अनुग्रहोंका ऋणी न हो? ऐसा कौन था जो उनको शत्रु बनानेका साहस कर सके? किसमें इतना बल था जो उनका
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सामना कर सके? आसमान के फरिश्ते तो पंचायत करने आवेंगे ही नहीं।

इसके बाद कई दिन तक बूढ़ी खाला हाथ में एक लकड़ी लिये आस-पास के गाँवों में दौड़ती रहीं। कमर झुक कर कमान हो गयी थी। एक-एक पग चलना दूभर था। मगर बात आ पड़ी थी। उसका निर्णय कराना जरूरी था।

बिरला ही कोई भला आदमी होगा, जिसके सामने बुढ़िया ने दुःख के आँसू न बहाये हो। किसी ने तो यों ही ऊपरी मन से हूँ-हाँ करके टाल दिया, और किसी ने इस अन्याय पर जमाने को गालियाँ दीं! कहा-कब्र में पाँव लटके हुए हैं, आज मरे कल दूसरा दिन हो, पर हवस नहीं मानती। अब तुम्हें क्या चाहिए? रोटी खाओ और अल्लाह का नाम लो। तुम्हें अब खेती-बारी से क्या काम है? कुछ ऐसे सज्जन भी थे, जिन्हें हास्य-रस के रसास्वादन का अच्छा अवसर मिला। झुकी हुई कमर, पोपला मुँह, सन के-से बाल-इतनी सामग्री एकत्र हों, तब हँसी क्यों न आवे? ऐसे न्याय-प्रिय, दयालु, दीन-वत्सल पुरुष बहुत कम थे, जिन्होंने उस अबला के दुखड़े को गौर से सुना हो और उसको सांत्वना दी हो। चारों ओर से घूम-घामकर बेचारी अलगू चौधरी के पास आयी। लाठी पटक दी और दम ले कर बोली-बेटा, तुम भी दम भर के लिए मेरी पञ्चायत में चले आना।

अलगू——मुझे बुला कर क्या करोगी? कई गाँव के आदमी तो आवेंगे ही। [ ४९ ]खाला—अपनी विपद तो सबके आगे रो आई हूँ आने न आने का अख्तियार उनको है।

अलगू—यों आने को मैं आ जाऊगा, मगर पचायतमे मुंह न खोलूँगा।

खाला—क्यों बेटा?

अलगू—अब इसका क्या जवाब दूं? अपनी खुशी जुम्मन मेरे पुराने मित्र है। उनसे बिगाड नहीं कर सकता।

खाला—बेटा, क्या बिगाढके डर से ईमानकी बात न कहोगे?

हमारे सोये हुए धर्म-ज्ञानकी सारी सम्पत्ति लुट जाय तो उसे खबर नहीं होता, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है। फिर उसे कोई जीत नहीं सकता। अलगू इस सवालका कोई उत्तर न दे सके। पर उनके हृदय मे यह शब्द गूंंज रहे थे।

'क्या बिगाड़ के भय से ईमान की बात न कहोगे?'

सन्ध्या समय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले ही से फर्श बिछा रक्खा था। उन्होंने पान, इलायची, हुक्के, तम्बाकू आदिका प्रबन्ध भी किया था। हां, वे स्वयं अलवत्ता अलगू चौधरी के साथ जग दूर बैठे हुए थे। जब कोई पंचायतमें आ जाता था तब दवे हुए सलामसे उसका शुभागमन करते थे। जब सूर्य अस्त हो गया और चिड़ियोंकी कलरव युक्त पंचायत पेड़ो पर बैठी तब यहां भी पंचायत आरम्भ हुई। फर्शकी एक-एक अंगुल जमीन भर गई, पर अधिकांश दर्शक ही थे। निमन्त्रित महाशयों में से केवल वही लोग पधारे थे जिन्हें जुम्मन से अपनी
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कुछ कसर निकालनी थी। एक कोनेमें आग सुलग रही थी।नाई ताबड़तोड़ चिलम भर रहा था। यह निर्णय करना असम्भव था कि सुलगते हुए उपलोंसे अधिक धूआं निकलता था या चिलम के दमोंसे। लडके इधर-उधर दौड़ रहे थे। कोई आपस मे गाली-गलौज करते और कोई रोते थे। चारों तरफ कोलाहल मच रहा था। गांवके कुत्ते इस जमाव को भोज समझकर झुण्ड-के-झुण्ड जमा हो गये थे।

पच लोग बैठ गये तो बूढ़ी खाला ने उनसे विनती की।

"पंचो! आज तीन साल हुए मैंने अपनी सारी जायदाद अपने भानजे के नाम लिख दी थी। इसे आप लोग जानते ही होंगे। जुम्मनने मुझे हीनहयात रोटी-कपडा देना कबूल किया था। सालभर तो मैंने इसके साथ रो-धोकर काटे, पर अब रात दिन का रोना नहीं सहा जाता। मुझे न पेटभर रोटी मिलती है और न तनका कपडा। वेकस बेवा हूँ। कचहरी-दरबार कर नही सकती। तुम्हारे सिवाय और किसे अपना दुख सुनाऊँ। तुम लोग जो राह निकाल दो उसी राहपर चलूँ। अगर मुझमें कोई ऐब देखो, मेरे मुँह पर थप्पड़ मारो। जुम्मनमें बुराई देखो तो उसे समझाओ। क्यों एक वेकस की आह लेता है। पंचो का हुक्म सर-माथेपर चढ़ाऊंगी।

रामधन मिश्र, जिनके कई असामियों को जुम्मन ने गांवमें बना लिया था,बोले, जुम्मन मियाँ किसे पंच बढते हो? अभी से इसका निपटारा कर लो। फिर जो कुछ पच कहेंगें वही मानना पड़ेगा। [ ५१ ]जुम्मनको इस समय सदस्यों में विशेषकर वही लोग दीख पड़े जिनसे किसी न किसी कारण उनका वैमनस्य था। जुम्मन बोले, पञ्चका हुक्म अल्लाह का हुक्म है। खालाजान जिसे चाहे बदें, मुझे कोई उज्र नहीं।

खालाने चिल्लाकर कहा, अरे अल्लाह के बन्दे। पञ्चोके नाम क्यों नहीं बता देता? कुछ मुझे भी तो मालूम हो।

जुम्मनने क्रोध से कहा, अब इस वक्त मेरा मुह न खुलावाओ। तुम्हारी बन पडी है, जिसे चाहो पञ्च बदो।

खालाजान जुम्मनके आक्षेप को समझ गई। वह बोली, बेटा! खुदासे डरो। पञ्च न किसीके दोस्त होते है न किसी के दुश्मन। कैसी बात कहते हो? और तुम्हारा किसी पर विश्वास न हो तो जाने दो,अलगू चौधरी को तो मानते हो? लो, मै उन्हींको सरपंञ्च बदती हूँ।

जुम्मन शेख आनन्दसे फूल उठे,परन्तु भावों को छिपाकर वोले अलगू चौधरी ही सही। मेरे लिये जैसे रामधन मिश्र वैसे अलगू।

अलगू इस झमेले मे फँसना नहीं चाहते थे। वे कन्नी काटने लगे। बोले, खाला। तुम जानती हो कि मेरी जुम्मन से गाढ़ी दोस्ती हैं।

खालाने गम्भीर स्वर मे कहा, बेटा! दोस्ती के लिये कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पञ्चके दिल में खुदा बसता है। पञ्चों के मुहमे जो बात निकलती है वह खुदा की तरफसे निकलती है। अलगू चौधरी सरपंच हुए। रामधन मिश्र और जुम्मन के दूसरे विरोधियों ने बुढिया को मन में बहुत कोसा। [ ५२ ]
अलगू चौधरी बोले, शेख जुम्मन। हम और तुम पुराने दोस्त हैं। जब काम पड़ा, तुमने हमारी मदद की है और हम भी जो कुछ बन पडा, तुम्हारी सेवा करते रहे हैं। मगर इस समय तुम और बूढी खाला दोनों हमारी निगाह में बराबर हो। तुमको पांचो से जो कुछ अर्ज करना हो, करो।

जुम्मन को पूरा विश्वास था कि अब बाजी मेरी है। अलगू यह सब दिखावे की बाते कर रहा है, अतएव शांत-चित्त होकर, बोले, पंचो! तीन साल हुए खालाजान ने अपनी जायदाद में नाम हिब्बा कर दी थी। मैंने उन्हें हीनहयात, खाना-कपडा देना। कबूल किया था। खुदा गवाह है कि आजतक कोई तकलीफ नहीं दी। मैं उन्हे अपनी मां के समान, समझता हूँ उनकी खिदमत करना मेरा फर्ज है, मगर औरतों में जरा अन-बन रहती है। इसमें मेरा क्या वश है? खालाजान मुझसे माहवार खर्च अलग मांगती हैं। जायदाद जितनी है वह पंचों में छिपी नहीं है। उसमें इतना मुनाफा नहीं होता कि मैं माहवार इसके अलावा हिब्बानामेमें माहवार खर्च का कोई जिक्र नही, नहीं तो मैं भूलकर भी इस झमेले में न पड़ता। बस, मुझे यहा कहना है। आइन्द पंचों को अख्तियार है जो फैसल चाहे करें।

अलगू चौधरी को हमेशा कचहरी से काम पडता था, अतएव पूरा कानूनी आदमी था। उसने जुम्मन से जिरह करनी आरम्भ की। एक-एक प्रश्न जुम्मनके हृदय पर हथौडी की चोट की तरह था। रामधन मिश्र इन प्रश्नों पर मुग्ध हुए जाते थे। जुम्मन चकित,थे कि अलगूको क्या हो गया है? अभी यह मेरे साथ बैठा हुआ
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कैसी कैसी बातें कर रहा था। इतनी ही देर में ऐसी काया-पलट हो गई कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है। न मालुम कब की कसर यह निकाल रहा है? क्या इतने दिनों की दोस्ती कुछ भी काम न आयेगी?

जुम्मन शेख इसी सङ्कल्प विकल्प में पडे हुए ये कि इतने में अलगू ने फैसला सुनाया,—

जुम्मन शेख! पञ्चों ने इस मामले पर विचार दिया। उन्हें यह नीति-संगत मालूम होता है कि खालाजान को माहवार खर्च दिया जाय। हमारा विचार है कि खाला की जायदाद से इतना मुनाफा अवश्य होता है कि माहवार खर्च दिया जा सके। बस, यही हमारा फैसला है। अगर जुम्मन को खर्च देना मंजूर न हो तो हिब्बानामा रद्द समझा जाय।

यह फैसला सुनते ही जुम्मन सन्नाटे मे आ गये। जो अपना मित्र हो वह शत्रुका सा व्यवहार करे और गले पर छुरी फेरे। इसे समय के हेर फेर के सिवाय और क्या कहे? जिसपर पूरा भरोसा था उसने समय पड़ने पर धोखा दिया। ऐसे ही अवसरो पर झूठे-सच्चे मित्रों की परीक्षा हो जाती है। यही कलियुग की दोस्ती है। अगर लोग ऐसे कपटी, धोखेबाज न होते तो देश में आपत्तियों का प्रकोप क्यों होता? यह हैजा, प्लेग आदि व्याधिया दुष्कर्मो के दण्ड हें।

मगर रामधन मिश्र और अन्य पञ्च अलगू चौधरीकी इस नीति परायणता को प्रशंसा जी खोलकर कर रहे थे। वे कहते थे,
[ ५४ ]इसी का नाम पंचायत है। दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। दोस्ती दोस्ती की जगह है, किन्तु धर्म का पालन करना। मुख्य है। ऐसे ही सत्यवादियों के बल पृथ्वी ठहरी है, नहीं तो वह कब की रसातल को चली जाती।

इस फैसले ने अलगू और जुम्मन की दोस्ती की जड़ हिला दी। अब वे साथ साथ बाते करते नहीं दिखाई देते। इतना पुराना मित्रतारूपी वृक्ष सत्य का एक हल्का झोंका भी न सह सका। सचमुच वह बालूही की जमीन पर खडा था।

उनमे अब शिष्टाचार का अधिक व्यवहार होने लगा। एक दूसरे की आव-भगत ज्यादा करने लगे। वे मिलते-जुलते थे, मगर उसी तरह जैसे तलवार से ढाल मिलती है।

जुम्मन के चित्त में मित्र की कुटिलता आठों पहर खटका करती थी। उसे हर घडी यह चिन्ता रहती थी कि किसी तरह बदला लेने का अवसर मिले।

अच्छे कामों की सिद्धि में बड़ी देर लगती है, पर बुरे कामों की सिद्धि में यह बात नहीं। जुम्मन को भी बदला लेने का अवसर जल्दी मिल गया। पिछले साल अलगू चौधरी बटेसर से बैलों की एक बहुत अच्छी जोड़ी मोल लाये थे। बैल पछांही जाति के सुन्दर बढी-बढी सींगों वाले। महीनो तक आस पास के गावों के लोग उनके दर्शन करते रहे। दैवयोग मे जुम्मन की पंचायत के एक महीने बाद इस जोनी का एक बैल मर गया। जुम्मन ने दोस्तों से कहा, यह दगाबाजी की सजा है। इन्सान मन्त्र भले ही कर जाय, पर खुदा [ ५५ ]
नेक बद सब देखता है। अलगू को सन्देह हुआ कि जुम्मन ने बैल को विष दिला दिया है। चौधराइन ने भी जुम्मन पर ही इस दुर्घटना का दोषारोपण किया। उसने कहा, जुम्मन ने कुछ कर दिया है। चौधराइन और करीमन मे इम विषय पर एक दिन खुब ही वाद विवाद हुआ। दोनों देवियों ने शब्द बाहुल्य की नदी बहा दी। व्यङ्ग, वक्रोक्ति, अन्योक्ति और उपमा आदि अलङ्कारो में जुम्मनने किसी तरह शान्ति स्थापित की। उसने अपनी पत्नी को डाँट डपटकर समझा दिया। वे उसे उस रणभूमि से हटा भी ले गये। उधर अलगू चौधरीने समझाने बुझाने का काम अपने तर्कपूर्ण सोटे से लिया ।

अब अकेला बैल किस काम का? उसका जोड़ा बहुत ढुँढा गया, पर न मिला। निदान यह सलाह ठहरी कि इसे बेच डालना चाहिये। गाँव में एक समझू साहु थे, वे इक्का-गाड़ी हाकते थे। गांव से गुड, घी लादकर वे मण्डी ले जाते, मण्डी से तेल, नमक भर लाते और गांव में बेचते। इस बैल पर उनका मन लहराया। उन्होंने सोचा, यह बैल हाथ लगे तो दिन भर मे बेखट के तीन खेपे हो। आजकल तो एक ही खेप के लाले पड़े रहते हैं। बैल देखा, गाडी में दौडाया, बाल-भौरी की पहचान कराई, मोल-तोल किया और उसे लाकर द्वार पर बांध ही दिया। एक महीने में दाम चुकाने का वादा ठहरा। चौधरी को भी गरज थी ही, घाटे की परवाह न की।

समझू साहु ने नया बैल चल पाया तो लगे रगेदने। वे दिन में तीन तीन, चार चार खेपे करने लगे। न चारे की फिक्र थी,न पानी की। बस, खेपों से काम था। मंडी ले गये,वहा कुछ सूखा भूसा सामने
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डाल दिया। बेचारा जानवर अभी दम भी न लेने पाया था कि फिर जोत दिया। अलगू चौधरीके घर थे तो चैनकी वंशी बजती थी। छठे छमासे कभी बहलीमें जोते जाते, तब खूब उछलते कूदते और कोसोंतक दौड़ते जाते थे। वहा बैलराजको रातिब, साफ पानी, दली हुई अरहरकी दाल और भूसेके साथ खली और यही नहीं,कभी-कभी घीका स्वाद भी चखने को मिल जाता था। शाम-सवेरे एक आदमी खरहरे करता, पोंछता और सुहलाता था। कहाँ वह सुख-चैन, कहा यह आठों पहर की खपन महीने भरमें ही वह पिस-सा गया। इक्केका जुवा देखते ही उसका लोहू सूख जाता था। एक-एक पग चलना दूभर था। हड्डियां निकल आई थीं, पर था वह पानीदार, मारकी सहन न थी।

एक दिन चौथे खेप मे साहुजीने दूना बोझ लादा। दिन भरका थका जानवर, पैर न उठते थे। उसपर साहुजी कोड़े फटकारने लगे। बस, फिर क्या था, बैल कलेजा तोड़कर चला। वह कुछ दूर दौड़ा और चाहा कि जरा दम ले लू पर साहुजीको जल्द घर पहुँचने की फिक्र थी। अतएव उन्होंने कई कोड़े बडी निर्दयतासे फटकारे। बैलने एक बार फिर जोर लगाया। पर अबकी बार शक्तिने जवाब दिया। वह धरतीपर गिर पडा और ऐसा गिरा कि फिर न उठा। साहुजीने बहत पीटा, टांग पकड़ कर खींचा, नथुनोमें लकड़ी ठुँस दी। पर कहीं मृतक भी उठ सकता है? तब साहुजीको कुछ शङ्का हुई। उन्होंने बैलको गौरसे देखा, खोलकर अलग किया और सोचने लगे कि गाडी कैसे घर पहुँचे। वे बहुत चीखे-चिल्लाये, पर देहातका रास्ता
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बच्चों की आंखोंकी तरह सांझ होते ही बन्द हो जाता है,कोई नजर न आया। आस पास कोई गांव भी न था। मारे क्रोधके उन्होंने मरे हुए बैलपर और तरें लगाये और कोसने लगे, अभागे तुम्हे मरना ही था तो घर पहुँचकर मरता। ससुरा बीच रास्ते में ही मर रहा अब गाडी कौन खींचे? इस तरह साहुजी खूब जले-भुने। कई बोरे गुड़ और कई पीपे घी उन्होंने बेचे थे, दो ढाई सौ रुपये कमरमें बंधे थे। इसके सिवाय गाड़ीपर कई बोरे नमक के थे। अतएव छोडकर जा भी न सकते थे। लाचार बेचारे गाडी पर ही लेट गये। वहीं रतजगा करनेकी ठान ली। चिलम पी, गाया, फिर हुक्का पिया । इस तरह साहुजी आधी राततक नींदको बहलाते रहे, अपनी जान में तो वे जागते ही रहे। पर पौ फटते ही जो नींद टूटी और कमरपर हाथ रक्खा तो थैली गायब। घबराकर इधर-उधर देखा तो कई कनस्तर तेल भी नदारद। अफसोसमें बेचारा सिर पीटने लगा और पछाड़ खाने लगा, प्रात काल रोते-बिलखते घर पहुँचा। सहुआइन ने जब यह बुरी सुनावनी सुनीं तब पहले रोई, फिर अलगू चौधरीको गालियां देने लगी, निगोडे ने ऐसा कुलच्छना बैल दिया कि जन्मभर की कमाई लुट गयी।

इस घटनाको हुए कई महीने बीत गये। अलगू जब अपने बैलके दाम मांगते तब साहु और सहुआइन दोनों ही झल्लाये हुए कुत्तोंकी तरह चढ़ बैठते और अड्ड बड्ड बकने लगते, वाह! यहा तो सारे जन्मकी कमाई लुट गई, सत्यानाश हो गया, इन्हें दामोंकी पड़ी है। मुर्दा बैल दिया था, उसपर दाम मांगने चले
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हैं। आखोंमे धूल झोंक दी, सत्यानाशी बैल गले बांध दिया, हमें निरा पोंगा ही समझ लिया। हम भी वनियेके बच्चे हैं, ऐसे बुद्धू कहीं और होंगे। पहले जाकर किसी गड़हेमें मुह धो आओ तब दाम लेना, जी न मानता हो तो हमारा बैल खोल ले जाओ। महीना भरके बदले दो महीना जोत लो। रुपया क्या लोगे?

चौधरी के अशुभचिन्तकों की कमी न थी। ऐसे अवसरों पर वे भी एकत्र हो जाते और साहुजीके बर्राने की पुष्टि करते। इस तरह फटकारे सुनकर बेचारे चौधरी अपना-सा मुँह लेकर लौट आते, परन्तु डेढ सौ रुपये से इस तरह हाथ धो लेना आसान न था। एक बार वे भी गरम पडे। साहुजी बिगडकर लाठी ढूंढने घर चले गये। अब सहुआइनजी ने मैदान लिया। प्रश्नोतर होते-होते हाथापाई की नौबत आ पहुँची। सहुआइन ने घरमें घुस-कर किवाड़ बन्द कर लिये। शोरगुल सुनकर गांवके भलेमानुस जमा हो गये। उन्होंने दोनोंको समझाया। साहुजीको दिलासा देकर घर से निकाला। वे परामर्श देने लगे कि इस तरह सिर फुडौलसे काम न चलेगा। पंचायत करा लो। कुछ तै हो जाय उसे स्वीकार कर लो। साहुजी राजी हो गये। अलगूने भी हामी भर ली।

पंचायत की तैयारियां होने लगी। दोनों पक्षोने अपने-अपने दल बनाने शुरू किये। इसके बाद तीसरे दिन उसी वृक्ष के नोचे- फिर पंचायत बैठी। वही सन्ध्या का समय था। खेतोंमें कौवे पंचायत कर रहे थे। विवादग्रस्त विषय यह था कि मटरकी
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फलियों पर उनका स्वत्व है या नहीं और जबतक यह प्रश्न हल न हो जाय तबतक वे रखवालेकी पुकारपर अपनी अप्रसन्नता प्रकट करना आवश्यक समझते थे। पेड़की डालियों पर बैठी शुकमंडली में यह प्रश्न छिड़ा हुआ था कि मनुष्य को उन्हें बेमुरौवतकहने का क्या अधिकार है, जब उसे स्वयं अपने मित्रों को दगा देने में भी संकोच नहीं होता।

पंचायत बैठ गई तो रामधन मिश्र ने कहा, अब देरी क्यों? पंचोंका चुनाव हो जाना चाहिये। बोलो चौधरी, किस किसको पंच बदते हो?

अलगू ने दीनभाव से कहा, समझू साहु ही चुन लें।

समझू खड़े हुए और कड़क कर बोले, मेरी ओर से जुम्मन शेख।

जुम्मन का नाम सुनते ही अलगू चौधरी का कलेजा धक धक करने लगा, मानो किसीने अचानक थप्पड़ मार दिया हो। रामधन अलगू के मित्र थे। वे बात को ताड़ गये। पूछा, क्यों चौधरी तुम्हें कोई उज्र तो नहीं?

चौधरी ने निराश होकर कहा, नहीं, मुझे क्या उज्र होगा?

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अपने उत्तरदायित्त्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधार होता है। जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ दर्शक बन जाता है।

पत्र-सम्पादक अपनी शान्ति कुटीर मे बैठा हुआ कितनी धृष्टता और स्वतन्त्रता के साथ अपनी प्रबल लेखनी से मन्त्रि-
[ ६० ]मण्डलपर आक्रमण करता है, परन्तु ऐसे अवसर भी आते हैं जब वह स्वय मन्त्रिमण्डलमे सम्मिलित होता है। मण्डल के भवनमें पग धरते ही उसकी लेखनी कितनी मर्मज्ञ, कितनी विचारशील, कितनी न्याय-परायण हो जाती है, इसका कारण उत्तरदायित्वका ज्ञान है। नवयुवक युवावस्थामें कितना उद्दण्ड रहता है। माता-पिता उसकी ओर से कितने चिन्तित रहते हैं। वे उसे कुल-कलङ्क समझते है,परन्तु थोडे ही समयमें परिवार का बोझ सिरपर पड़ते ही वही अव्यवस्थित-चित्त उन्मत्त युवक कितना धैर्यशील, कैसा शान्त-चित्त हो जाता है यह भी उत्तरदायित्वके ज्ञानका ही फल है।

जुम्मन शेखके मनमें भी सरपंच का उच्चस्थान ग्रहण करते ही अपनी जिम्मेदारी का भाव पैदा हुआ। उसने सोचा, मैं इस वक्त न्याय और धर्मके सर्वोच्च आसनपर बैठा हूँ। मेरे मुहसे इस समय जो कुछ निकलेगा वह देववाणीके सदृश है और देववाणी में मेरे मनोविकारोंका कदापि समावेश न होना चाहिये। मुझे सत्य से जौ भर टलना उचित नहीं।

पञ्चोंने दोनों पक्षों से सवाल-जवाव करने शुरू किये। बहुत देर तक दोनों दल अपने-अपने पक्षका समर्थन करते रहे। विषयमें तो सब सहमत थे कि समझूको बैलका मूल्य देना चाहिए,परन्तु दो महाशय इस कारण रियायत करना चाहते थे कि बैलके मर जाने से समझूको हानि हुई। इसके प्रतिकूल दो अन्य मूल्य के अतिरिक्त समझूको कुछ दण्ड भी देना चाहते थे, जिससे फिर किसी को पशुओंके साथ ऐसी निर्दयता करनेका [ ६१ ]साहस न हो। अन्त में जुम्मन ने फैसला सुनाया, अलगू चौधरी और समझू साहु। पञ्चोंने तुम्हारे मुआमलेपर अच्छी तरह विचार किया। समझू को उचित है कि बैलका पूरा दाम दे। जिस वक्त उन्होंने बैल लिया, उसे कोई बीमारी न थी। अगर उसी समय दाम दे दिया जाता तो आज समझू उसे फेर लेनेका आग्रह न करते। बैलकी मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे बड़ा कठिन परिश्रम कराया गया और उसके दाने-चारे का कोई अच्छा प्रबन्ध न किया गया।

रामधन मिश्र बोले, समझूने बैल को जान बूझकर मारा है। अतएव उन से दण्ड लेना चाहिये।

जुम्मन बोले, यह दूसरा सवाल है। हमको इससे कोई मतलब नहीं।

झगडू साहुने कहा, समझूके साथ कुछ रियायत होनी चाहिये।

जुम्मन बोले, यह अलगू चौधरीकी इच्छा पर है। वे रियायत करे तो उनकी भलमनसी है।

अलगू चौधरी फूले न समाये। उठ खडे हुए और जोरसे बोले, पंच परमेश्वरकी जय।

चारों ओर से प्रतिध्वनि हुई—पंच परमेश्वरकी जय।

प्रत्येक मनुष्य जुम्मनकी नीति को सराहता था—इसे कहते है न्याय। यह मनुष्य का काम नहीं, पंचमें परमेश्वर वास करते हैैं। यह उन्हींकी महिमा है। पंचके सामने खोटेको फोन खरा कर सकता है? [ ६२ ]थोडी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आये और उनके गले लिपटकर बोले, भैया जब से तुमने मेरी पंचायत की, तबसे में तुम्हारा प्राणघातक शत्रु बन गया था पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि ऊंचे पदपर बैठकर न कोई किसी का दोस्त होता है न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता! आज मुझे विश्वास हो गया कि पच की जबान से खुदा बोलता है।

अलगू रोने लगे। इस पानी से दोनों के दिलों की मैल धुल गई। मित्रता की मुरझाई लता फिर हरी हो गई।

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