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सम्पूर्ण गांधी वाङ्‍मय खंड १/भारतीय अन्नाहारी—६ (१४-३-१८९१ )

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ग्वाले के रहन-सहन में एक ही दोष पाया जाता है, और वह है स्नान की कमी- का। गरम आबहवा में स्नान बहुत गुणकारी होता है। फिर भी जब कि ब्राह्मण दिनमें दो बार और वैश्य दिन में एक बार स्नान करता है, ग्वाला सप्ताह में सिर्फ एक बार नहाता है। भारतीय किस तरह स्नान करते हैं, यह बताने के लिए मैं यहाँ फिर थोड़ा विषयान्तर करूँगा। आमतौर पर भारतीय अपने गाँव के पासको नदी में स्नान करते हैं। मगर यदि कोई इतना आलसी हो कि नदीतक जाये ही नहीं, या उसे डूब जाने का डर मालूम होता हो, या अगर उसके गांव के पास कोई नदी न हो, तो वह घर में स्नान करता है। नहाने के लिए कोई ऐसा स्नान-कुंड या नहानेकी ऐसी गंगाल नहीं होती, जिसमें डूबकर स्नान किया जा सके। भारतीयों का विश्वास होता है कि जैसे ही कोई बन्द पानी में कूदा वैसे ही वह पानी अशुद्ध हो जाता है और आगे के लिए उपयोगी नहीं रहता। इसलिए वे किसी बड़े बर्तन में पानी भरकर अपने पास रख लेते हैं और लोटे में ले-लेकर अपने शरीरपर डालते हैं। इसी कारण वे चिलमची में हाथ भी नहीं धोते, बल्कि किसी दूसरे से हाथों पर पानी डलवा लेते हैं, या दोनों हाथों की कलाइयों के सहारे लोटे को पकड़ कर खुद ही डाल लेते हैं।

परन्तु हम मुख्य विषयपर लौटें। ऐसा मालूम होता है कि स्नानकी कमीसे ग्वालेके स्वास्थ्यपर कोई खास बुरा असर नहीं पड़ता। दूसरी ओर यह भी साफ है कि यदि कोई ब्राह्मण एक दिन भी स्नान किये बिना रह जाये तो उसे बड़ी बेचैनी मालूम होगी, और यदि वह थोड़े ज्यादा समयतक स्नान करता बन्द रखे तो वह बहुत जल्दी बीमार पड़ जायेगा।

मैं मान लेता हूँ कि यह उन अनेक बातों का एक उदाहरण है, जिनका अन्यथा स्पष्टीकरण नहीं किया जा सकता और इसीलिए जिनको आदतका परिणाम बताया जा सकता है। इसी तरह, जब कि एक भंगी अपना धंधा करता हुआ अपना स्वास्थ्य अच्छा रखता है, तब यदि कोई साधारण आदमी वैसा ही करनेका प्रयत्न करे तो उसे मौतका खतरा झेलना पड़ेगा। यदि कोई सुकुमार प्रकृति का लार्ड, लन्दन के ईस्ट एंड क्षेत्रके मजदूरों की नकल करनेका प्रयत्न करे तो मौत शीघ्र ही उसका दरवाजा खटखटाने लगेगी।

मैं यहाँ एक कहानी लिख देने का लोभ संवरण नहीं कर सकता। वह इस विषय में बिलकुल ठीक बैठती है। एक राजा एक दतौन बेचनेवाली स्त्री के प्रेममें पड़ गया। वह स्त्री सुन्दरता में मानो साक्षात् मोहिनी ही थी। फिर क्या था, आदेश दे दिया गया कि उसे राजा के महल में रख दिया जाये। इससे सचमुच तो वह प्रत्यक्ष वैभव की गोदमें पहुँच गई। उसे उत्तम भोजन, उत्तम वस्त्र और, संक्षेप में, सब उत्तम वस्तुएँ प्राप्त हो गईं। परन्तु आश्चर्य ! जितना ही वैभव, उतना ही उसका स्वास्थ्य गिरता गया। बीसियों वैद्यों ने उपचार किया, औषधियाँ अत्यन्त नियमपूर्वक दी गईं, परन्तु लाभ कुछ न हुआ। इस बीच एक चतुर वैद्यने बीमारीका असली कारण ताड़ लिया। उसने कहा कि इसे भूत-प्रेतोंकी बाधा है। अतएव भूत-प्रेतोंको तुष्ट करनेके लिए उसने उस स्त्रीके सब कमरोंमें बासी रोटियोंके टुकड़े और फल रखवा दिये। उसने कहाकि जितने कमरे हैं उतने ही दिनोंमें भूत-प्रेत भाग जायेंगे और उनके जानेके साथ ही बीमारी भी दूर हो जायेगी। और यही हुआ। अलबत्ता, रोटियाँ तो उस बेचारी रानीने ही खाई थीं।

इस कहानीसे मालूम होता है कि आदत मनुष्योंपर कैसा अधिकार कर लेती है। मैं समझता हूँ कि इसी कारण स्नानकी कमी ग्वालेको बहुत हानि नहीं पहुँचाती।

इस प्रकारके रहन-सहनका परिणाम हम आंशिक रूपसे पिछले लेखमें देख चुके हैं। वह परिणाम यह है कि अन्नाहारी ग्वालेका शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है। वह दीर्घजीवी भी होता है। मैं एक ग्वालिनको जानता हूँ, जो १८८८ में सौ वर्षसे अधिककी थी। पिछली बार जब मैंने उसे देखा था तब उसकी नजर बहुत अच्छी थी। स्मरणशक्ति भी ताजी थी। उसे अपने बचपनमें देखी हुई चीजोंकी याद बनी थी। वह एक लाठीके सहारे चल सकती थी। मुझे आशा है कि वह अब भी जीवित होगी।

इस सबके अलावा, ग्वालेका शरीर सुडौल होता है। उसके शरीरमें कोई ऐब शायद ही मिलता है। वह शेरके समान भयावना न होता हुआ भी ताकतवर और बहादुर होता है। और सीधा भी इतना ही होता है, जैसे कि मेमना। उसका कद आतंक पैदा करनेवाला न होता हुआ भी प्रभावोत्पादक होता है। समग्रतः भारतका ग्वाला अन्नाहारियोंका एक श्रेष्ठ उदाहरण है। और जहाँतक शारीरिक बलका सम्बन्ध है, वह किसी भी मांसाहारीकी तुलनामें बहुत अच्छा ठहर सकता है।

[अंग्रेजीसे]
वेजिटेरियन, १४-३-१८९१