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सम्पूर्ण गांधी वाङ्‍मय खंड १/लन्दन-दैनन्दिनी (१२-११-१८८८)

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४. लन्दन-दैनन्दिनी[]

लन्दन
१२ नवम्बर, १८८८

इंग्लैंड आनेका इरादा करनेके क्या कारण थे? बात अप्रैलके लगभग अन्तमें शुरू हुई। अध्ययनके लिए लंदन आनेके इरादेने जब प्रत्यक्ष रूप ग्रहण किया उसके पहले ही मेरे मन में यहाँ आने और आखिर लंदन है क्या, अपनी यह जिज्ञासा तृप्त करनेका मंसूबा दबा पड़ा था। जब मैं भावनगर कालेजमें पढ़ रहा था, जयशंकर बूचसे मेरी मामूली बातें हुई थीं। बातोंके दौरानमें उन्होंने मुझे सलाह दी थी कि तुम तो सोरठके निवासी हो, इसलिए जूनागढ़ राज्यको लंदन जानेके लिए छात्रवृत्तिकी अर्जी दो। उस दिन मैंने उन्हें क्या जवाब दिया था, यह अब अच्छी तरह याद नहीं आता। ऐसा लगता है कि मैंने छात्रवृत्ति पाना असम्भव समझा होगा। उस [समय] से मेरे मनमें इस अंचलकी यात्रा करनेका इरादा जम गया था। मैं इस ध्येयको पूर्ण करनेके साधन खोजता रहा।

तेरह अप्रैल, १८८८ को मैं भावनगरसे छुट्टियाँ मनानेके लिए राजकोट गया। पन्द्रह दिनकी छुट्टियोंके बाद मेरे बड़े भाई और मैं पटवारीसे मिलने गये। लौटने पर मेरे भाईने कहा : "चलो, मावजी जोशीसे[] मिल आयें।" इसलिए हम उनके यहाँ गये। मावजी जोशीने साधारण कुशल-प्रश्न करनेके बाद भावनगर में मेरी पढ़ाईकी बाबत कुछ पूछताछ की। मैंने उन्हें साफ-साफ बताया कि मेरा पहले वर्षमें परीक्षा पास हो जाना मुश्किल ही है। मैंने यह भी कहा कि मुझे पाठ्यक्रम बहुत कठिन मालूम होता है। यह सुनकर उन्होंने मेरे भाईको सलाह दी कि वे, जैसे भी सम्भव हो, मुझे बैरिस्टरी पढ़नेके लिए लंदन भेज दें। उन्होंने बताया कि खर्च सिर्फ ५,००० रुपये आयेगा। "यह अपने साथ थोड़ी उड़दकी दाल ले जाये। वहाँ अपने लिए खुद कुछ खाना बना लिया करेगा। इससे कोई धार्मिक आपत्ति न होगी। यह बात किसीको बताओ मत। कोई छात्रवृत्ति पानेका प्रयत्न करो। जूनागढ़ और पोरबन्दर दोनों राज्योंको अर्जी भेज दो। मेरे लड़के केवलरामसे[] मिल लो और अगर तुम्हें आर्थिक सहायता पानेमें सफलता न मिले, और तुम्हारे पास भी रुपया न हो, तो अपना साज-सामान बेच डालो। परन्तु किसी भी तरह मोहनदासको लंदन तो भेज ही दो। मैं समझता हूँ कि तुम्हारे स्वर्गवासी पिताकी प्रतिष्ठा बनाये रखनेका एकमात्र उपाय यही है।" मावजी जोशी जो-कुछ भी कहते हैं उसपर हमारे परिवारके सभी लोगोंको बड़ा भरोसा रहता है। और मेरे भाई तो स्वभावसे ही बड़े भोले हैं। उन्होंने मावजी जोशीसे मुझे लंदन भेजनेका वादा कर दिया। अब मेरे प्रयत्नोंकी बारी आई।

मेरे भाईने बातको गुप्त रखनेका जो वचन दिया था उसके बावजूद उसी दिन खुशालभाईसे[] सब-कुछ कह दिया। बेशक, खुशालभाईने बात पसन्द की। शर्त इतनी ही थी कि मैं अपने धर्मका पालन कर सकूँ। उसी दिन मेघजीभाईको[] भी बता दिया गया। वे प्रस्तावसे बिलकुल सहमत हो गये और उन्होंने मुझे ५,००० रुपये देनेकी तैयारी भी दिखाई। मुझे उनकी बातपर कुछ भरोसा हो गया था; परन्तु जब बात मेरी प्यारी माँके सामने प्रकट की गई तो उन्होंने मेरे इतने भोलेपनपर मुझे फटकार सुनाते हुए कहा कि समय आनेपर तुम्हें उनसे कुछ भी रुपया न मिलेगा। उनका खयाल तो यह था कि जानेका अवसर ही कभी नहीं आयेगा।

उस दिन मुझे केवलरामभाईके पास [जाना] था। मैं उनसे मिला। वहाँ मेरी बातचीत सन्तोषजनक नहीं रहीं। उन्होंने मेरे लक्ष्यको तो पसंद किया परन्तु कहा यह कि "तुम्हें वहाँ कमसे-कम दस हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे।" मेरे लिए तो यही एक बड़ा धक्का था, परन्तु उन्होंने आगे यह भी कहा—"अगर तुम्हारे मनमें कोई धार्मिक आग्रह हों तो उनको तुम्हें छोड़ देना होगा। तुम्हें मांस खाना पड़ेगा, शराब पिये बिना भी काम न चलेगा। उसके बिना वहाँ तुम जी नहीं सकते। जितना ज्यादा खर्च करोगे उतने ही ज्यादा होशियार बनोगे। यह बात बहुत महत्त्वकी है। मैं तुमसे साफ-साफ कहता हूँ। बुरा न मानना। पर देखो, तुम अभी बहुत छोटे हो। लंदनमें प्रलोभन बहुत हैं। तुम उनके फंदे में फँस जाओगे।" मेरे मन में इस बातचीतसे कुछ खिन्नता उत्पन्न हुई। परन्तु मैं एक बार इरादा कर लेनेपर उसे सरलतासे छोड़ देनेवाला आदमी नहीं हूँ। उन्होंने अपनी बात कहते हुए श्री गुलाम मुहम्मद मुंशीका उदाहरण दिया। मैंने उनसे पूछा कि क्या आप मुझे छात्रवृत्ति पाने में कोई सहायता पहुँचा सकते हैं? उन्होंने नकारात्मक जवाब दिया और कहा—इसके अलावा और सब-कुछ बहुत खुशीसे करूँगा। मैंने अपने भाईको सब बातें बता दीं।  

अब मुझे अपनी प्यारी माँकी अनुमति प्राप्त करनेका काम सौंपा गया। मैं मानता था कि यह मेरे लिए कोई बहुत कठिन काम नहीं है। एक-दो दिन बाद मैं और मेरे भाई श्री केवलरामसे मिलने गये। उस समय वे बहुत कार्य-व्यस्त थे, फिर भी हमसे मिले। एक-दो दिन पहले मेरी उनके साथ जैसी बातें हुई थीं, वैसी ही बातें फिर हुईं। उन्होंने मेरे भाईको सलाह दी कि मुझे पोरबन्दर भेजें। प्रस्ताव मान लिया गया। फिर हम लौट आये। मैंने हँसी-हँसीमें अपनी माँके सामने बात छेड़ी। हँसीमें कही बात तत्काल ही गंभीरतासे स्वीकार कर ली गई और फिर मेरे पोरबन्दर जानेके लिए दिन तय किया गया।

दो या तीन बार मैंने जानेकी तैयारी की, परन्तु कुछ-न-कुछ कठिनाई मार्गमें आती गई। एक बार मैं झवेरचन्दके साथ जानेवाला था, परन्तु रवाना होनेके एक घंटे पहले एक गम्भीर आकस्मिक दुर्घटना हो गई। मैं हमेशा अपने मित्र शेख महताबसे[] झगड़ता रहता था। रवाना होनेके दिन मैं झगड़े-सम्बन्धी विचारोंमें बिलकुल डूबा हुआ था। रातको भजन-संगीतका कार्यक्रम था। मुझे उसमें बहुत मजा नहीं आया। रातको लगभग साढ़े दस बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ और हम सब मेघजीभाई और रामीसे मिलने गये। रास्तेमें चलता-चलता एक ओर तो मैं लंदनकी धुनमें डूबा हुआ था, दूसरी ओर शेख महताबके खयालोंमें। इस धुनमें मैं अनजाने एक गाड़ीसे टकरा गया। मुझे चोट आई। फिर भी, चलनेमें मैंने किसीका सहारा नहीं लिया। मुझे लगता है, मेरा सिर चकरा रहा था और आँखोंके सामने बिलकुल अँधेरा छाया हुआ था। फिर हम मेघजीभाईके घरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ फिरसे मैं एक पत्थरसे ठोकर खा गया और मुझे चोट आई। मैं बिलकुल बेहोश हो गया था। उसके बाद क्या-क्या हुआ, इसका पता मुझे नहीं चला। उन्होंने मुझे बताया कि उसके बाद कुछ कदम चलनेपर मैं जमीनपर गिर पड़ा था। पाँच मिनटतक मुझे कोई होश नहीं था। उन्होंने समझा कि मैं मर गया। परन्तु भाग्यवश जहाँपर मैं गिरा था वहाँकी जमीन बिलकुल सपाट थी। आखिर मुझे होश आया और सबको खुशी हुई। माँको खबर दी गई। वे मुझे इस हालतमें देखकर बहुत दुःखी हुईं। मैंने कहा कि मैं बिलकुल अच्छा हूँ, फिर भी यह चोट मेरे लिए देरीका कारण बन गई। कोई मुझे जाने देनेको तैयार न हुआ। बादमें मालूम हुआ कि मेरी साहसी और अत्यन्त प्यारी माँ तो मुझे चले जाने देती, परन्तु उसे लोगोंके कहने-सुननेका डर हुआ। अन्तमें बड़ी कठिनाईसे कुछ दिनों बाद मुझे राजकोटसे पोरबन्दर जानेकी इजाजत मिली। रास्ते में भी मुझे कुछ कठिनाइयोंका सामना करना पड़ा।

आखिर मैं पोरबन्दर पहुँच गया, और सबको बहुत खुशी हुई। लालभाई[] और करसनदास[] मुझे घर ले जानेके लिए खाड़ी-पुलपर आये थे। अब, पोरबन्दरमें पहले तो मुझे अपने चाचाकी अनुमति प्राप्त करनी थी; दूसरे, श्री लेलीको[] कुछ आर्थिक सहायता पानेकी अर्जी देनी थी; और अन्तमें, अगर राज्यसे छात्रवृत्ति न मिले तो, परमानन्दभाईसे[१०] कहना था कि वे मुझे कुछ रुपया दें। सबसे पहले मैंने चाचासे भेंटकी और उनसे पूछा कि उन्हें मेरा लंदन जाना पसन्द है या नहीं। जैसी कि मैंने अपेक्षा भी की ही थी, चाचाने स्वाभाविक रूपसे मुझसे लंदन जानेके फायदे गिनानेको कहा। मैंने अपनी शक्तिके अनुसार फायदे गिना दिये। तब उन्होंने कहा—"बेशक, इस पीढ़ीके लोग इसे बहुत पसन्द करेंगे, परन्तु जहाँतक मेरी बात है, मैं पसन्द नहीं करता। फिर भी, हम बादमें विचार करेंगे।" इस प्रकारके उत्तरसे मुझे निराशा नहीं हुई। कमसे-कम मुझे इतना तो सन्तोष हुआ कि कुछ भी हो, दिलसे वे बातको पसन्द करते हैं। और बादमें उनके कामसे सिद्ध हो गया कि मैंने जो सोचा था वह ठीक था।

दुर्भाग्यसे श्री लेली पोरबन्दरमें नहीं थे। सच ही है 'छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति।' श्री लेली जिलेके दौरेपर गये थे और वहाँसे लौटनेपर वे तुरन्त छुट्टीपर चले जानेवाले थे। मेरे चाचाने मुझे अगले रविवारतक उनकी प्रतीक्षा करनेकी सलाह दी। उन्होंने कहा, अगर वे तबतक न लौटे तो जहाँ-कहीं भी होंगे, वहाँ उनके पास तुम्हें भेज दूँगा। परन्तु मेरे सौभाग्यसे वे रविवारको जिलेके दौरेसे लौट आये। फिर तय हुआ कि मैं उनसे सोमवारको मिलूँ और तदनुसार मैं उनसे मिला। जीवनमें किसी अंग्रेज सज्जनसे मुलाकातका यह मेरा पहला ही अवसर था। इसके पहले मैंने अंग्रेजोंके सामने जानेका साहस कभी नहीं किया था। परन्तु लंदन जानेकी धुनने मुझे बेधड़क कर दिया था। मैंने गुजरातीमें उनके साथ थोड़ी-सी बातें कीं। वे बहुत जल्दीमें थे। वे मुझसे अपने बँगलेके ऊपरी खंडके जीनेपर चढ़ते-चढ़ते मिले। उन्होंने कहा कि पोरबन्दर रियासत बहुत गरीब है, इसलिए वह तुम्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं दे सकती। फिर भी, उन्होंने कहा : पहले तुम भारतमें स्नातक बन जाओ; फिर मैं सोचूँगा कि तुम्हें कोई आर्थिक सहायता दी जा सकती है या नहीं। उनके ऐसे उत्तरसे मैं सचमुच बिलकुल निराश हो गया। मैंने उनसे ऐसे जवाबकी अपेक्षा नहीं की थी।

अब परमानन्दभाईसे पाँच हजार रुपये माँगनेकी बात रही। उन्होंने कहा, अगर तुम्हारे चाचा तुम्हारा लन्दन जाना पसन्द करें तो मैं खुशीसे रुपये दे दूँगा। मैंने इसे जरा कठिन ही समझा। परन्तु मैं चाचाकी अनुमति पा लेनेपर तुला हुआ था। मैं जब उनसे मिला उस समय वे किसी काममें व्यस्त थे। मैंने उनसे कहा—"चाचाजी, अब बताइए, आप मेरे लन्दन जानेके बारेमें सचमुच क्या सोचते हैं? मेरा यहाँ आनेका मुख्य उद्देश्य आपकी अनुमति हासिल करना ही है।" उन्होंने उत्तर दिया—"मैं अनुमति नहीं दे सकता। क्या तुम्हें मालूम नहीं कि मैं तीर्थ-यात्रा पर जा रहा हूँ? फिर अगर मैं कहूँ कि मुझे लोगोंका लन्दन जाना पसन्द है, तो क्या यह मेरे लिए शर्मकी बात न होगी? तो भी, तुम्हारी माता और भाईको पसन्द है तो मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है।" मैंने कहा—"परन्तु आप नहीं जानते कि अगर आप मुझे लंदन जानेकी इजाजत नहीं देते तो परमानन्दभाई मुझे आर्थिक सहायता नहीं देंगे।" मैंने ये शब्द कहे ही थे कि उन्होंने गुस्सेसे भरी आवाजमें कहा—"ऐसी बात है? छोकरे, तू क्या जाने, उन्होंने ऐसा क्यों कहा है। वे जानते हैं कि मैं तुझे जानेकी अनुमति कभी नहीं दूँगा। इसीलिए उन्होंने यह बहाना बनाया है। सच बात यह है कि वे कभी तुझे पैसेकी मदद नहीं करेंगे। मैं उन्हें मदद करनेसे नहीं रोकता।" इस प्रकार हमारी बात समाप्त हो गई। फिर मैं खुश होकर परमानन्दभाईके पास दौड़ा गया और मैंने उन्हें अपने और चाचाके बीच जो बात हुई थी वह शब्दशः कह सुनाई। उसे सुनकर वे भी बहुत नाराज हुए। लेकिन साथ-साथ उन्होंने मुझे ५,००० रुपये देनेका वादा भी किया। जब उन्होंने यह वादा किया तो मैं खुशीसे फूला नहीं समाया। मुझे इस बातसे और भी ज्यादा खुशी हुई कि उन्होंने अपने बेटेकी शपथ खाकर यह वादा किया। अब, उस दिनसे मैं सोचने लगा कि मेरा लंदन जाना पक्का है। थोड़े दिन पोरबन्दर में ठहरा। मैं जितना ज्यादा ठहरा, मेरे जानेकी बात उतनी ही ज्यादा पक्की होती गई।

अब, मेरी गैरहाजिरीमें राजकोटमें जो कुछ हुआ, वह इस प्रकार है। मेरा दोस्त शेख महताब, सचमुच बड़ा करिश्मेबाज है। उसने मेघजीभाईको उनके वादे की याद दिलाई और मेरे दस्तखतसे एक जाली पत्र तैयार किया, जिसमें उसने लिखा कि मुझे ५,००० रुपयोंकी आवश्यकता है, आदि। वह पत्र उन्हें दिखलाया गया और वह मेरा ही लिखा हुआ मान लिया गया। यह पत्र पाकर उनका स्वाभिमान जाग उठा और उन्होंने मुझे ५,००० रुपये देनेका गम्भीरताके साथ वादा किया। मुझे इसकी कोई सूचना राजकोट पहुँचनेतक नहीं दी गई।

अब फिर पोरबन्दरकी बात। आखिर मेरी वापसी के लिए एक दिन निश्चित किया गया और मैं कुटुम्बके लोगोंसे विदा लेकर अपने भाई करसनदास और मेघजी के पिता के साथ—जो, सचमुच, कृपणताके अवतार ही थे—राजकोटके लिए रवाना हुआ। राजकोट जानेके पहले मैं मेज-कुर्सी आदि साज-सज्जा बेच देने और घरके किरायेका सिलसिला तोड़ देनेके लिए भावनगर गया। मैंने यह सब सिर्फ एक दिनमें कर लिया। अपने पड़ोसके मित्रों और दयालु घर-मालकिनसे मैं जुदा हुआ तो उनकी आँखोंसे आँसू टपकने लगे। मैं उनकी, अनूपरामकी और दूसरे लोगोंकी आत्मीयता कभी भूल नहीं सकता। यह सब करके मैं राजकोट पहुँचा।

परन्तु तीन वर्षके लिए बाहर जानेके पहले मुझे कर्नल वाट्सनसे[११] तो मिलना ही था। वे १९ जून, १८८८ को राजकोट आनेवाले थे। मेरे लिए तो यह समय बहुत ज्यादा था, क्योंकि मैं मईके आरम्भमें राजकोट पहुँच गया था। परन्तु लाचारी थी। मेरे भाईको कर्नल वाट्सनसे बहुत बड़ी आशा थी। सचमुच ये दिन बड़े कठिन गुजरे। रात को मुझे अच्छी तरह नींद तक नहीं आ पाती थी। रात-भर स्वप्न आते रहते थे। कुछ लोग मुझे लंदन न जानेके लिए समझाते, कुछ जानेकी सलाह देते। कभी-कभी मेरी माँ भी न जानेको कहतीं। और बड़ी अजीब बात तो यह थी कि मेरे भाई भी अकसर अपना इरादा बदलते रहते थे। इसलिए मैं त्रिशंकुकी स्थितिमें था। परन्तु सब लोग जानते थे कि एक बार किसी चीजको शुरू करके मैं छोड़ूँगा नहीं। इसलिए वे सब शान्त रहे। इसी बीच मेरे भाईने मेघजीभाईके वादेके बारेमें उनका मन टटोलनेकी बात मुझसे कही। परिणाम अवश्य ही बिलकुल निराशाजनक हुआ और उस समयसे वे सदा शत्रुवत् व्यवहार करते रहे। वे हर किसीके सामने मेरी बुराई करते थे। परन्तु मैं उनके तानोंकी पूरी तरह उपेक्षा करता रहा। मेरी अत्यन्त प्यारी माँ को इसके लिए उनपर बहुत क्रोध आया और कभी-कभी वे बेचैन भी हो उठती थीं। परन्तु मैं सरलतासे उनको धैर्य बँधानेमें सफल हो जाता। और मुझे यह महसूस करके सन्तोष है कि मैं अकसर उनको शान्त कर पाता था। और जब-जब वे, मेरे लिए आँसू बहातीं, अकसर मैं उन्हें भरपूर हँसा तक पाता था। आखिर कर्नल वाट्सन आये। मैं उनसे मिला। उन्होंने कहा—"मैं इस बारेमें सोचूँगा।" मगर मुझे उनसे कभी कोई मदद नहीं मिली। यह कहते हुए मुझे अफसोस होता है कि उनके पाससे परिचयकी एक चिट्ठी पाना भी मेरे लिए कठिन हुआ। उन्होंने बड़े दर्प-भरे स्वरमें कहा था कि वह एक लाख रुपयेकी चीज है। अब तो सचमुच उसे याद करके मुझे हँसी आती है।

फिर, मेरी विदाईका एक दिन निश्चित हुआ। पहले यह तिथि चार अगस्त निश्चित की गई थी। अब सारा मामला नाजुक स्थितिमें पहुँच गया। मैं इंग्लैंड जाने-वाला हूँ, यह समाचार अखबारोंमें छप गया था। कुछ लोग मेरे भाईसे मेरे जानेके बारेमें हमेशा पूछा करते थे। आखिरमें इस समय भाईने मुझसे जानेका इरादा छोड़ देनेके लिए कहा। मगर मैं तो माननेवाला नहीं था। तब वे राजकोटके ठाकुरसाहबसे[१२] मिले और उन्होंने उनसे कुछ आर्थिक सहायता देनेका अनुरोध किया। परन्तु उनसे कोई सहायता नहीं मिली। फिर मैंने ठाकुरसाहब और कर्नल वाट्सनसे आखिरी बार मुलाकात की। पहलेसे एक फोटो प्राप्त हुई, दूसरेसे परिचयकी एक चिट्ठी। यहाँ इतना तो लिखना ही पड़ेगा कि इस समय मुझे जो जबरदस्त खुशामद करनी पड़ी उससे मेरे मनमें गुस्सा भर गया था। अगर मुझे अपने भोले-भाले भाईका खयाल न होता तो मैं ऐसी घोर खुशामदका आश्रय कदापि न लेता। आखिर १० अगस्त का दिन आया और मेरे भाई, शेख महताब, श्री नाथूभाई, खुशालभाई और मैं रवाना हुए।

मैं राजकोटसे बम्बईके लिए रवाना हुआ। वह शुक्रवारकी रात थी। मुझे मेरे स्कूलके साथियोंने एक मानपत्र दिया था। जब मानपत्रका उत्तर[१३] देने खड़ा हुआ उस समय मैं बहुत उद्विग्न था। मुझे जो-कुछ बोलना था उसे आधा बोलनेके बाद मैं काँपने लगा। आशा है कि भारत लौटनेके बाद फिर वैसा न होगा। मुझे चाहिए कि भाषण देनेके पहले उसे लिख लिया करूँ। उस रातको मुझे विदा करनेके लिए बहुत-से लोग आये थे। सर्वश्री केवल राम, छगनलाल (पटवारी), ब्रजलाल, हरिशंकर, अमूलख, मानेकचन्द, लतीब, पोपट, भानजी, खीमजी, रामजी, दामोदर, मेघजी, रामजी कालिदास, नारणजी, रणछोड़दास, मणिलाल उन लोगोंमें शामिल थे। जटाशंकर, विश्वनाथ आदिको भी उनमें शामिल किया जा सकता है। पहला स्टेशन था—गोंडल। वहाँ डाक्टर भाऊसे भेंट हुई और हमने कपूरभाईको अपने साथ ले लिया। नाथूभाई जेतपुर तक आये। ढोलामें हमें उस्मानभाई मिले और वे वढ़वान तक आये। वहाँ सर्वश्री नारणदास, प्राणशंकर, नरभेराम, आनन्दराय और ब्रजलाल विदाई देने आये थे।

मुझे २१ तारीखको बम्बईसे रवाना होना था। परन्तु बम्बई में जो कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं वे अवर्णनीय हैं। मेरी जातिके लोगोंने मुझे आगे जानेसे रोकनेकी भरसक कोशिश की। लगभग सभी जानेके विरोधमें थे। और अन्तमें तो मेरे भाई खुशालभाई और स्वयं पटवारीने भी मुझे न जानेकी सलाह दी। परन्तु मैं उनकी सलाह माननेको तैयार नहीं था। फिर समुद्री मौसमका बहाना आड़े आया। और उससे मेरे जानेमें देरी हुई। इसके बाद मेरे भाई और दूसरे लोग मेरे पाससे चले गये। परन्तु मैं अकस्मात् ४ सितम्बर, १८८८ को बम्बईसे रवाना हो गया। इस समय सर्वश्री जगमोहनदास, दामोदरदास और बेचरदासने मेरी बड़ी मदद की। शामलजी का भी निस्सन्देह मैं बहुत आभारी हूँ और रणछोड़लालका[१४] जो ऋण मुझपर है, मैं नहीं जानता उसके विषय में क्या कहूँ; वह कोरे आभार से तो बड़ी बात है। सर्वश्री जगमोहनदास, मानशंकर, बेचरदास, नारायणदास पटवारी, द्वारकादास, पोपटलाल, काशीदास रणछोड़लाल, मोदी, ठाकुर, रविशंकर, फीरोजशाह, रतनशाह, शामलजी और कुछ अन्य लोग मुझे विदाई देने के लिए 'क्लाइड' जहाजके अन्दर आये। इनमें से पटवारीने मुझे पाँच रुपये, शामलजीने भी उतने ही, मोदीने दो, काशीदासने एक, नारणदासने दो रुपये दिये। कुछ और लोगोंने भी दिये, परन्तु उनकी मुझे याद नहीं आती। श्री मानशंकरने मुझे चाँदीकी एक जंजीर दी और फिर वे सब तीन वर्षके लिए विदाई देकर चले गये। इस प्रसंगको समाप्त करनेके पहले मुझे इतना तो लिखना ही चाहिए कि जिस स्थितिमें मैं था, उसमें अगर कोई दूसरा आदमी होता तो उसे इंग्लैंड देख सकना नसीब न होता। जिन कठिनाइयोंका सामना मुझे करना पड़ा उनसे इंग्लैंड मेरे लिए साधारण स्थितिमें जैसा लगता उससे अधिक प्यारा लगने लगा है।

४ सितम्बर, १८८८

समुद्र-यात्रा। लगभग ५ बजे शामको जहाजका लंगर उठा। यात्राको लेकर मैं बहुत शंकित था, परन्तु सौभाग्यसे वह मेरे अनुकूल पड़ी। सारी यात्रामें मुझे प्रवास-जन्य कष्ट नहीं हुआ और न उलटियाँ हुईं। मेरे जीवनमें यह पहली जहाजकी यात्रा थी। मुझे यात्रामें बड़ा मजा आया। लगभग ६ बजे ब्यालूकी घंटी बजी। परिचारकने मुझे मेजपर जानेकी सूचना दी। परन्तु मैं गया नहीं। अपने साथ जो-कुछ लाया था वही मैंने खा लिया। श्री मजमूदारने पहली ही रातको जिस खुलेपनसे मेरे साथ बरताव किया उससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मेरे साथ ऐसे ढंगसे बातें कीं, मानो हमारी पहचान बहुत पुरानी हो। उनके पास काला कोट नहीं था इसलिए ब्यालूके लिए मैंने उन्हें अपना कोट दे दिया। वे मेजपर गये। उस रातसे मैं उन्हें बहुत चाहने लगा। उन्होंने अपनी चाबियाँ मुझे सौंप दीं और मैंने उसी रातसे उन्हें अपने बड़े भाईके समान मानना शुरू कर दिया। अदनतक हमारे साथ एक मराठा डाक्टर था। कुल मिलाकर वह एक अच्छा आदमी मालूम होता था। सो, दो दिनतक मैं उन फलों और मिठाइयोंपर रहा जो मेरे पास जहाजमें थीं। बादमें श्री मजमूदारने जहाजके कुछ लड़कोंके साथ यह प्रबन्ध कर लिया कि वे हमारे लिए भोजन बना दिया करें। मैं तो कभी भी ऐसा प्रबन्ध न कर पाया होता। एक अब्दुल मजीद थे, जो पहले दर्जेमें यात्रा कर रहे थे। हम सलून-यात्री थे। छोकरेका बनाया हुआ शाम का भोजन हम खूब स्वादसे खाते थे।

अब थोड़ा-सा जहाज के बारेमें। मुझे जहाज की व्यवस्था बहुत पसन्द आई। जब हम कोठरियों या सलूनोंमें बैठते हैं तो हमें यह भान नहीं रहता कि ये कोठरियाँ और सलून जहाजके हिस्से हैं। कभी-कभी हमें जहाजका चलना महसूस ही नहीं होता। मजदूरों और खलासियोंका कौशल तो सराहनीय है। जहाजमें बाजे थे। पियानो बजाया करता था। ताश, शतरंज और ड्राफ्टकी जोड़ियाँ भी थीं। यूरोपीय यात्री रात को हमेशा ही कोई खेल खेला करते थे। छत यात्रियों के लिए बड़ी राहतकी चीज होती है। कोठरियोंमें बैठे-बैठे अकसर मन ऊब उठता है। छतपर खुली हवा मिलती है। अगर आप निःसंकोची हों और जरूरी लियाकत रखते हों तो साथी यात्रियोंसे मिलजुल सकते हैं और उनसे बातचीत कर सकते हैं। जब आसमान साफ होता है तब दृश्य बड़ा सुहावना होता है। एक रातको, जब चाँदनी छिटकी हुई थी, मैं समुद्रका अवलोकन कर रहा था। चन्द्रका प्रतिबिम्ब पानीपर पड़ रहा था। लहरोंके कारण चन्द्रमा ऐसा दिखलाई पड़ता था मानो वह इधर-उधर डोलता हो। एक अँधेरी रातको, जब आसमान साफ था, तारोंके प्रतिबिम्ब पानीपर दिखलाई पड़े। उस समय हमारे चारों ओरका दृश्य बड़ा सुन्दर था। पहले-पहल तो मैं अनुमान ही नहीं कर सका कि यह सब क्या है। ऐसा लगता था मानो इतने-सारे हीरे बिखरे हुए हों। परन्तु यह तो मैं जानता ही था कि हीरे तैर नहीं सकते। फिर मैंने सोचा कि ये कोई कीड़े होंगे, जो रातको ही दीख पड़ते हैं। इन्हीं विचारोंमें डूबे हुए मैंने आसमानकी ओर देखा और फिर मैं समझा कि ये तो और कुछ नहीं, तारोंके प्रतिबिम्ब हैं। मैं अपनी भूलपर हँस पड़ा। तारोंकी ये परछाइयाँ आतिशबाजीकी कल्पना कराती हैं। जरा कल्पना कीजिए कि आप किसी बँगलेकी छतपर खड़े हुए हैं और अपने सामने छूटनेवाली आतिशबाजियाँ देख रहे हैं। मैं अकसर इस दृश्यका आनन्द लिया करता था।

कुछ दिनोंतक मैंने साथी-यात्रियोंसे बिलकुल बातचीत नहीं की। मैं हमेशा सुबह आठ बजे सोकर उठता था और दाँत साफकर, शौच आदिसे निबट कर स्नान करता था। विलायती पाखानोंकी व्यवस्था भारतीय यात्रियोंको ताज्जुबमें डालनेवाली थी। वहाँ पानी नहीं होता, कागजके टुकड़ोंसे काम चलाना पड़ता है।

लगभग पाँच दिनतक समुद्र-यात्रा का आनन्द लेनेके बाद हम अदन पहुँचे। इस बीच हमें कहीं भूमिका एक टुकड़ा या पहाड़की कोई रेखा भी दिखाई नहीं दी। हम सब समुद्र-यात्राके विरस एक-सुरेपनसे ऊब गये थे और जमीन देखनेको आतुर थे। आखिर छठवें दिन सवेरे हमें भूमि दिखलाई पड़ी। सब आनन्दित और प्रफुल्ल दीखने लगे। सुबहके लगभग ग्यारह बजे जहाजने अदनमें लंगर डाला। कुछ लड़के छोटी-छोटी नावें लेकर आ गये। वे बड़े अच्छे तैराक थे। कुछ यूरोपीयोंने पानीमें पैसे फेंक दिये। इन लड़कोंने गहरी डुबकियाँ लगाकर उन पैसोंको निकाल लिया। काश, मैं भी इस तरह तैर सकता! वह दृश्य बड़ा सुहावना था। लगभग आधे घंटेतक उसका आनन्द लेनेके बाद हम अदन देखने गये। मैं कह देना चाहता हूँ कि हमने उन लड़कोंको पैसे निकालते हुए सिर्फ देखा; खुद हमने एक पाई भी नहीं फेंकी। इस दिनसे हमें इंग्लैंडके खर्च की कल्पना होने लगी। हम तीन व्यक्ति थे, और नावका भाड़ा दो रुपये देना पड़ा। किनारा तो मुश्किलसे एक मील रहा होगा। हम १५ मिनटमें किनारे पर पहुँच गये। बादमें हमने एक गाड़ी की। हम अदनकी एक-मात्र देखने लायक चीज पानीघर देखने जाना चाहते थे; परन्तु दुर्भाग्यसे समय हो गया और हम जा नहीं सके। हमने अदनका कैम्प देखा। अच्छा था। इमारतें अच्छी थीं। आम तौर पर दुकानें ही थीं। इमारतों की बनावट सम्भवतः वही थी जो राजकोटके बँगलोंकी और खास तौर पर पोलिटिकल एजेंटके नये बँगलेकी है। मैंने कोई कुआँ या ताजे पानीका कोई दूसरा स्थान नहीं देखा। शायद वहाँ ताजा पानी सिर्फ तालाबोंसे आता है। धूप बड़ी तेज थी। मैं पसीनेमें डूबा हुआ था। इसका कारण यह था कि हम लाल सागर से बहुत दूर नहीं थे। मैंने एक भी पेड़ या हरा पौधा नहीं देखा और इससे मुझे और भी आश्चर्य हुआ। लोग खच्चरों या गधोंपर सवारी करते थे। अगर हम चाहते तो खच्चर किरायेपर ले सकते थे। कैम्प पहाड़पर है। जब हम लौटे तो नाववालोंने बताया कि जिन लड़कोंके बारेमें मैंने ऊपर लिखा है वे कभी-कभी घायल हो जाते हैं। समुद्रके जानवर कभी किसीके पैर और कभी किसीके हाथ काट लेते हैं। परन्तु फिर भी, वे लड़के इतने गरीब हैं कि अपनी छोटी-छोटी नावोंपर बैठ कर आ ही जाते हैं। हम तो उन नावोंपर बैठनेका साहस ही नहीं कर सकते। हममेंसे हरएकको एक-एक रुपया गाड़ी-भाड़ा देना पड़ा। लंगर १२ बजे दुपहरको उठा और हम अदनसे रवाना हो गये। परन्तु उस दिन से हमें रोज ही धरतीका कोई-न-कोई हिस्सा दिखलाई देता रहा।

शाम को हम लाल सागरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ गर्मी महसूस होने लगी। मगर वह मेरी समझमें, बम्बईमें कुछ लोग जैसी बताते थे, वैसी भून देनेवाली गर्मी नहीं थी। बेशक कोठरियों में वह असह्य थी। आप धूपमें रह नहीं सकते, कोठरीमें कुछ मिनट भी रहना पसन्द नहीं करेंगे; मगर छतपर हों तो आपको ताजी हवाके सुखद झकोरे मिलते ही रहेंगे। कमसे-कम मुझे तो मिले। करीब-करीब सभी यात्री छतपर सोते थे, और मैं भी ऐसा ही करता था। प्रभात-सूर्यकी गर्मी भी आप नहीं सह सकते। छतपर आप हमेशा सुरक्षित रहते हैं। यह गर्मी लगभग तीन दिन तक रही। बाद में, चौथी रातको हम स्वेज नहरमें दाखिल हुए। स्वेजके दीप बहुत दूरसे दिखाई पड़ने लगे थे। लाल सागर कहीं तो बहुत चौड़ा था, कहीं बहुत सँकरा—इतना सँकरा कि हम दोनों ओरकी भूमि देख पाते थे। स्वेज नहरमें दाखिल होनेके पहले हम 'हेल्स गेट' से गुजरे। 'हेल्स गेट' बहुत सँकरा एक जल भाग है। यह दोनों ओर पहाड़ोंसे बँधा हुआ है। उसे 'हेल्स गेट' इसलिए कहा जाता है कि बहुत-से जहाज वहाँ टकरा कर नष्ट हो जाते हैं। हमने लाल सागरमें एक नष्ट हुआ जहाज देखा था। स्वेजमें हम लगभग आधा घंटा ठहरे। अब लोगोंसे सुना कि हमें ठंड झेलनी होगी। कुछ लोगोंने कहा था कि अदनसे रवाना होनेके बाद तुम्हें शराबकी जरूरत पड़ेगी। मगर यह बात गलत निकली। अबतक मैं सह-यात्रियों से थोड़ी-थोड़ी बातचीत करने लगा था। कुछने कहा था कि अदनके आगे मांसकी जरूरत पड़ेगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। अपने जीवनमें पहली बार मैंने अपने जहाजके आगे बिजलीकी रोशनी देखी। वह चाँदनी जैसी दिखाई पड़ती थी। उससे जहाजका सामनेका हिस्सा बड़ा सुन्दर लगता था। मुझे लगता है कि जो आदमी इसे किसी दूसरी जगहसे देखता होगा उसे यह और भी सुन्दर दिखलाई पड़ती होगी। यह बात ठीक वैसी ही है जैसे कि हम अपने शरीरके सौन्दर्यका इतना आनन्द नहीं ले सकते, जितना कि दूसरे ले सकते हैं; अर्थात्, हम उसे सराहनाकी दृष्टिसे देख नहीं सकते। स्वेज नहरकी रचना मेरी समझमें नहीं आई। सचमुच वह अद्‌भुत है। जिस आदमीने इसका निर्माण किया है उसकी प्रतिभाकी कल्पना मैं नहीं कर सकता। पता नहीं कैसे उसने यह किया होगा। यह कहना कि उसने प्रकृतिसे होड़ की है, बिलकुल ठीक ही है। दो समुद्रोंको जोड़ देना कोई सरल काम नहीं है। नहरसे एक समय में सिर्फ एक जहाज निकल सकता है। इसके लिए कुशल मार्ग-दर्शन की आवश्यकता होती है। जहाज बहुत धीमी गतिसे चलता है। हमें उसके चलनेका कोई भान नहीं होता। नहर का पानी बिलकुल गँदला है। मुझे उसकी गहराई नहीं मालूम। चौड़ी वह उतनी ही है जितनी रामनाथ के पास आजी[१५] नदी है। दोनों ओर आप आदमियोंको चलते-फिरते देख सकते हैं। नहरके पासकी जमीन ऊसर है। नहर फ्रांसीसियोंकी है। जहाज को मार्ग दिखाने के लिए इस्माइलियासे दूसरा मार्गदर्शक (पाइलट) आता है। फ्रांसीसी लोग नहरसे गुजरने वाले हर जहाजसे कुछ रुपया वसूल करते हैं। यह आमदनी बहुत बड़ी होती होगी। जहाजके बिजलीके दीपकके अलावा लगभग २० फुटकी दूरीपर दोनों ओर और भी चिराग दिखाई देते हैं। ये चिराग अलग-अलग रंगोंके हैं। जहाज चिरागोंकी इन कतारोंको पार करके निकलता है। नहर पार करनेमें लगभग २४ घंटे लगते हैं। इस दृश्य की खूबसूरतीका बखान करना मेरी ताकत के बाहर है। उसे देखे बिना आप उसका आनन्द नहीं पा सकते। पोर्ट सईद इस नहरके अन्तिम सिरेका बन्दरगाह है। पोर्ट सईदका अस्तित्व ही स्वेज नहरके कारण है। हमारा जहाज शामको वहाँ रुका। वह एक घंटा ही वहाँ रुकनेवाला था, मगर इतना समय उस बन्दरगाहको देखनेके लिए बिलकुल काफी था। वहाँ ब्रिटिश सिक्कोंका प्रचलन था। भारतीय सिक्के बिलकुल बेकार हो गये। नावका भाड़ा ६ पेंस फी-सवारी था। एक पेंस एक आने के बराबर होता है। पोर्ट सईदकी इमारतोंकी रचना फ्रांसीसी है। वहाँ फ्रांसीसी जीवनकी झलक मिल जाती है। हमने कुछ काफी-घर देखे। एकको देखकर पहले-पहल तो मैंने सोचा कि कोई नाटक-घर है, मगर वह तो काफी-घर निकला। उसमें एक ओर काफी, सोडा, चाय या अन्य पेय-पदार्थ मिलते हैं, दूसरी ओर गाना-बजाना होता है। कुछ स्त्रियाँ चिकारोंका[१६] वृन्द-वादनकर रही थीं। बम्बईमें लेमनेडकी जो बोतल एक आनेसे भी कममें मिलती है उसकी कीमत इन काफी-घरोंमें—जिन्हें 'काफे' कहा जाता है—१२ पेंस होती है। कहा जाता है कि ग्राहकोंको गाना-बजाना मुफ्तमें सुननेको मिलता है। मगर सचमुच बात यह नहीं है। जैसे ही गाना-बजाना खत्म हुआ कि एक स्त्री रूमालसे ढँकी हुई एक तश्तरी लेकर हरएक ग्राहकके पास जाती है। मतलब यह होता है कि उसे कुछ दिया जाये और हम कुछ देनेके लिए बाध्य हो जाते हैं। हम 'काफे' में गये और उस स्त्रीको हमने ६ पेंस दिये। पोर्ट सईद विलासके केन्द्र के अलावा कुछ नहीं है। वहाँके स्त्री और पुरुष बड़े चालाक है। दुभाषिये आपको रास्ता दिखानेके लिए पीछे लग जायेंगे। मगर आप उनसे साफ-साफ कह दें कि हमें आपकी जरूरत नहीं है। पोर्ट सईद मुश्किलसे राजकोटके 'परा'[१७] के बराबर होगा। हम सात बजे शामको पोर्ट सईद से रवाना हुए।

हमारे सहयात्रियोंमें से एक श्री जेफरीज़ मुझपर बड़े मेहरबान थे। वे हमेशा मुझसे मेजपर जाकर खानेको कहा करते थे। मगर मैं नहीं जाता था। उन्होंने कहा था कि ब्रिंडिसी पहुँचने के बाद तुम्हें ठंड मालूम पड़ेगी। परन्तु ऐसा हुआ नहीं। तीन दिन बाद हम रातको ब्रिंडिसी पहुँचे। ब्रिंडिसीका बन्दरगाह बड़ा सुन्दर है। जहाज किनारे तक गया और हम लोग एक सीढ़ी से—जो इसीलिए लगा दी गई थी—किनारे पर उतर गये। [अँधेरा] होने के कारण मैं ब्रिंडिसीमें ज्यादा-कुछ नहीं देख सका। वहाँ सब लोग इतालवी भाषा बोलते है। सड़कें पत्थरोंसे पटी हुई हैं। गलियाँ उतार-चढ़ाववाली हैं। और उनपर भी पत्थरोंकी फर्शी है। दीपकोंके लिए गैसका उपयोग किया जाता है। हमने ब्रिंडिसीका स्टेशन देखा। वह उतना सुन्दर नहीं था, जितने सुन्दर बम्बई-बड़ौदा और सेंट्रल इंडिया रेलवेके स्टेशन हैं। परन्तु रेलके डिब्बे हमारे डिब्बों-से बहुत बड़े थे। यातायात वहाँ अच्छा है। अगर आप काले आदमी हैं तो जैसे ही ब्रिंडिसीमें उतरेंगे, कोई आदमी आपके पास आयेगा और कहेगा : "साहब, साथ आइए। एक बड़ी खूबसूरत लड़की है, साहब,—१४ बरसकी। मैं आपको उसके पास ले चलूँगा। भाव बहुत महँगा नहीं है, साहब!" आप एकदम चकरा जायेंगे। लेकिन शान्तिसे काम लीजिए और दृढ़ताके साथ उसको जवाब दे दीजिए कि हमें उस लड़कीकी जरूरत नहीं है। और उस आदमीसे चले जानेको कह दीजिए, आप सकुशल रहेंगे। अगर वह व्यक्ति आपको किसी तरह परेशान करे तो फौरन पासमें पुलिसका जो आदमी हो उससे कहिए। या, तुरन्त किसी बड़ी इमारतमें, जो आपको दिखलाई देगी ही, घुस जाइए। हाँ, घुसनेके पहले इमारतपर लिखा हुआ नाम पढ़ लीजिए और यह निश्चय कर लीजिए कि वह सबके लिए खुली हुई है। यह आप तुरन्त समझ सकेंगे। वहाँके अरदलीको बताइए कि आप कठिनाई में हैं। वह तुरन्त आप को उससे निकलनेका रास्ता बतायेगा। अगर आपमें काफी हिम्मत हो तो अरदलीसे कहिए कि वह आपको मुख्य अधिकारीके पास ले जाये और आप उसको सब बात बता दीजिए। बड़ी इमारतसे मेरा मतलब टामस कुक, हेनरी किंग या ऐसे ही किन्हीं दूसरे एजेंटों-की इमारत से है। वे आपकी हिफाजत करेंगे। उस समय कंजूसी न करें। अरदलीको कुछ दे दें। परन्तु इस जरियेका सहारा तभी लेना चाहिए जब आप अपने-आपको खतरेमें समझें। मगर ये इमारतें आपको सिर्फ समुद्र-तटपर ही मिलेंगी। अगर आप तटसे बहुत दूर हों तो पुलिसके आदमीको खोजिए। अगर वह न मिले तो फिर आपकी अन्तरात्मा ही आपकी सबसे अच्छी मार्ग-दर्शक होगी। हम तड़के ब्रिंडिसीसे रवाना हुए।

लगभग तीन दिन बाद हम माल्टा पहुँचे। जहाज ने कोई दो बजे दुपहरको लंगर डाला। वहाँ वह लगभग चार घंटे ठहरनेवाला था। श्री अब्दुल मजीद हमारे साथ बाहर जानेवाले थे। परन्तु किसी तरह उन्हें बहुत देरी हो गई। मैं जानेको बिलकुल अधीर था। श्री मजमूदारने कहा, "क्या श्री मजीद की राह न देखें, हम अकेले चले चलें?" मैंने जवाब दिया "जैसा आप ठीक समझें। मुझे कोई आपत्ति नहीं है।" फिर हम दोनों ही चले गये। हमारे लौटनेपर अब्दुल मजीदने कहा, "मुझे बहुत अफसोस है कि आप लोग चले गये।" इस पर श्री मजमूदारने जवाब दिया, "ये गांधी अधीर हो गये थे। इन्होंने ही मुझसे कहा था कि आपके लिए न ठहरें।" मुझे श्री मजमूदारके इस तरहके बरतावसे सचमुच बहुत चोट लगी। मैंने उस आरोपको धो डालनेकी कोई कोशिश नहीं की, बल्कि चुपचाप उसे मंजूर कर लिया। लेकिन मैं जानता हूँ कि यह सारा आरोप अब्दुल मजीदसे सिर्फ इतना इशारा करके सरलता से धोया जा सकता था कि अगर श्री मजमूदार सचमुच ही आपके लिए ठहरना चाहते थे तो बेहतर होता कि वे मेरे कहनेके अनुसार न करते। और मैं समझता हूँ कि श्री अब्दुल मजीदको विश्वास दिला देनेके लिए कि इस काममें मेरा हाथ नहीं था, इतना ही काफी होता। यद्यपि उस समय मेरा ऐसा कुछ इरादा नहीं था। फिर भी, उस दिनसे श्री मजमूदार मेरी निगाहमें बहुत गिर गये और उनके लिए मेरे दिलमें कोई सच्चा आदर नहीं रहा। इसके अलावा भी दो-तीन बातें हुईं, जिनसे मजमूदार दिन प्रतिदिन मुझे कम भाने लगे।

माल्टा एक दिलचस्प जगह है। वहाँ देखने लायक बहुत-सी चीजें हैं। मगर हमारे पास समय काफी नहीं था। जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, श्री मजमूदार और मैं तटपर गये थे। वहाँ एक बड़ा ठग हमें मिला। हमें बहुत हानि उठानी पड़ी। हमने नावका नम्बर ले लिया और शहर देखनेके लिए एक गाड़ी की। ठग हमारे साथ था। लगभग आधा घंटा चलनेके बाद हम सेंट जॉन गिरजेमें पहुँचे। गिरजाघर बड़ा सुन्दर बना था। वहाँ हमने कुछ प्रतिष्ठित लोगों के अस्थिपंजर देखे। वे बहुत पुराने थे। जिस साथीने हमें गिरजाघर दिखाया था उसको हमने एक शिलिंग दिया। गिरजेके ठीक सामने सेंट जॉनकी प्रतिमा थी। वहाँसे हम शहरको चले। सड़कें फर्शदार थीं और उनके दोनों ओर लोगोंके पैदल चलने के लिए फर्शदार पटरियाँ बनी थीं। टापू बहुत सुन्दर है। उसमें बहुत-सी शानदार इमारतें हैं। हम शस्त्रास्त्र-भवन देखने गये। यह भवन बड़ी सुन्दरतासे सजा हुआ था। वहाँ हमने बहुत पुराने चित्र देखे। उनमें सिर्फ रंग ही भरे हुए नहीं थे, बल्कि कशीदाकारी भी की गई थी। परन्तु कोई अनजान आदमी किसीके बताये बिना जान नहीं सकता कि उनमें कशीदाकारी भी है। वहाँ पुराने योद्धाओंके शस्त्रास्त्र रखे हुए थे। उनमें सभी देखने लायक हैं। मैंने तफसील लिख नहीं रखी, इसलिए उन सबके नाम याद नहीं है। परन्तु एक फौजी टोप था, उसका वजन तीस पौंड था। नेपोलियन बोनापार्टकी गाड़ी बड़ी सुन्दर थी। जिस आदमीने हमें भवन दिखाया उसे ६ पेंस इनाम देकर हम लौट पड़े। गिरजाघर और शस्त्रास्त्र-भवन देखते समय आदर-प्रदर्शनके लिए हमें अपने टोप उतार लेने पड़े थे। फिर हम उस ठगकी दूकानपर गये। उसने जबरन कुछ चीजें हमारे मत्थे मढ़ देने का प्रयत्न किया। मगर हम कोई चीज खरीदने को तैयार नहीं थे। आखिर श्री मजमूदार ने २ शिलिंग ६ पेंसके माल्टाके चित्र खरीद लिये। यहाँ ठगने एक दुभाषियेको हमारे साथ कर दिया और वह खुद नहीं आया। दुभाषिया बहुत अच्छा आदमी था। वह हमें संतरा-बाग में ले गया। हमने बाग देखा। मुझे वह बिलकुल पसन्द नहीं आया। मुझे राजकोटका अपना सार्वजनिक पार्क उससे ज्यादा अच्छा लगता है। अगर मुझ कुछ देखने लायक मालूम हुआ तो वह था एक छोटे-से कुंडमें सुनहली और लाल मछलियाँ। वहाँसे हम शहर लौटे और एक होटलमें गये। श्री मजमूदारने कुछ आलू खाये और चाय पी। रास्तेमें हमारी भेंट एक भारतीयसे हुई। श्री मजमूदार बड़े बेधड़क आदमी थे, इसलिए उन्होंने उस भारतीयसे बातें कीं। ज्यादा बातें करनेपर मालूम हुआ कि वह माल्टाके एक दुकानदारका भाई है। हम फौरन उस दूकानमें गये। श्री मजमूदारने दूकानदारसे खूब बातें की। हमने वहाँ कुछ चीजें खरीदी और दो घंटे उस दूकानमें बिता दिये। इससे हम माल्टाका बहुत-सा भाग देख नहीं पाये। हमने एक और गिरजाघर देखा। वह भी बहुत सुन्दर और देखने लायक था। हमें संगीत-नाटक-घर देखना था, पर उसके लिए समय नहीं बचा। उन सज्जनने श्री मजमूदारको अपने लंदनवासी भाईके नाम अपना कार्ड दिया और हम उनसे विदा लेकर वापस लौटे। लौटते समय वह ठग हमें फिर मिला और ६ बजे शाम को हमारे साथ हो लिया। तटपर पहुँचनेपर हमने उसे, उस अच्छे दुभाषियेको और गाड़ीवानको पैसा दे दिया। नाववालेसे भाड़ेके बारेमें हमारी कुछ कहा-सुनी हो गई। नतीजा अलबत्ता उसके ही पक्षमें रहा। यहाँ हम खूब ठगे गये।

'क्लाइड' जहाज ७ बजे शामको रवाना हुआ। तीन दिनकी यात्राके बाद हम १२ बजे रातको जिब्राल्टर पहुँचे। जहाज सारी रात वहाँ रुका रहा। मेरी जिब्राल्टर देखने की बहुत इच्छा थी, इसलिए मैं सुबह जल्दी उठा और मैंने श्री मजमूदारको जगाकर उनसे पूछा कि वे मेरे साथ तटपर जायेंगे या नहीं। उन्होंने कहा कि जायेंगे। तब श्री मजीदके पास जाकर मैंने उन्हें जगाया। हम तीनों तटपर गये। हमारे पास सिर्फ डेढ़ घंटेका समय था। तड़का होनेके कारण सब दूकानें बन्द थीं। कहा जाता है कि जिब्राल्टर तट-करसे मुक्त बन्दरगाह है, इसलिए वहाँ सिगरेट आदि धूम्रपानकी वस्तुएँ बहुत सस्ती मिलती हैं। जिब्राल्टर एक पहाड़ीपर बना हुआ है। शिखरपर किला है। मगर हम उसे देख नहीं पाये, इसका बहुत अफसोस रहा। मकान कतारोंमें हैं। पहली कतारसे दूसरी कतारमें जानेके लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़ना जरूरी होता है। मुझे वह बहुत पसन्द आया। रचना बहुत ही सुन्दर है। सड़कें पटी हुई हैं। समय न होनेसे हम जल्दी लौटनेके लिए लाचार थे। जहाज साढ़े आठ बजे सुबह रवाना हो गया।

तीन दिन बाद हम ११ बजे रातको प्लीमथ पहुँच गये। अब ठीक सर्दीका समय आ गया था। हरएक यात्री कहता था कि तुम लोग मांस और शराब के बिना मर जाओगे। मगर ऐसा हुआ तो नहीं। ठंड तो सचमुच बहुत थी। हमें तूफानकी सूचना भी दी गई थी, मगर हमें वह देखनेको मिला नहीं। दरअसल मैं उसे देखनेको बहुत उत्सुक था, मगर वह अवसर नहीं आया। रात होनेके कारण हम प्लीमथमें कुछ भी देख नहीं सके। घना कुहरा था। आखिरकार जहाज लंदन के लिए रवाना हो गया। २४ घंटे में हम लंदन पहुँचे। जहाज छोड़कर हम टिलबरी रेलवे स्टेशन से २७ अक्तूबर[१], १८८८ के ४ बजे सायंकाल विक्टोरिया होटलमें पहुँच गये।

शनिवार, २७ अक्तूबर[२], १८८८ से शुक्रवार, २३ नवम्बर

श्री मजमूदार, श्री अब्दुल मजीद और मैं विक्टोरिया होटलमें पहुँचे। श्री अब्दुल मजीदने विक्टोरिया होटलके आदमीसे कुछ शान दिखाते हुआ कहा कि वह हमारे गाड़ी वालेको मुनासिब किराया दे दे। श्री अब्दुल मजीद अपने आपको बहुत बड़ा समझते थे, लेकिन मैं यहाँ लिख दूँ कि वे जो कपड़े पहने हुए थे वे शायद होटलके उस छोकरेके कपड़ोंसे भी खराब थे। उन्होंने सामानकी भी कोई परवाह नहीं की और, जैसे कि लंदन में बहुत दिनोंसे रह रहे हों, वे होटलके अन्दर चले गये। होटलके ठाट-बाट देखकर मैं चकरा गया। मैंने अपनी जिन्दगीमें इतनी शान-शौकत कभी नहीं देखी थी। मेरा काम चुपचाप अपने दोनों मित्रोंके पीछे-पीछे चलना भर था। सभी जगहोंमें बिजलीकी बत्तियाँ थीं। हमें एक कमरेमें ले जाया गया। श्री मजीद एकदम अन्दर चले गये। मैनेजरने उसी समय उनसे पूछा कि आपको दूसरा खंड पसन्द होगा या नहीं। श्री मजीदने रोजाना भाड़ेके बारेमें पूछताछ करना अपनी शानके खिलाफ समझकर कह दिया—हाँ। मैनेजरने फौरन प्रत्येक के नाम ६ शिलिंग रोजका बिल काटकर एक छोकरेको हमारे साथ भेज दिया। मैं सारे समय मन ही मन हँसता रहा। अब हमें एक 'लिफ्ट' के जरिये दूसरे खंडमें जाना था। मैं नहीं जानता था कि लिफ्ट क्या है। छोकरेने कोई चीज छुई जिसे मैंने दरवाजेका ताला समझा। परन्तु, जैसा कि मुझे बादमें मालूम हुआ, वह एक घंटी थी, जो उसने लिफ्टके छोकरेको यह जताने के लिए बजाई थी कि वह लिफ्ट ले आये। दरवाजा खोला गया और मैंने सोचा कि यह कोई कमरा है, जिसमें हमें कुछ देर ठहरना होगा। लेकिन हमें उससे दूसरे खंडमें ले जाया गया और इसपर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।[१८]

अंग्रेजी प्रति से।

 

 

पोरबन्दर का मकान जिसमें गांधीजी का जन्म हुआ था।

 

  1. जब गांधीजीके सम्बन्धी और साथी श्री छगनलाल गांधी १९०९ में पहली बार लंदन जा रहे थे, उस समय गांधीजीने उन्हें अपनी लंदनमें लिखी हुई दैनन्दिनी दे दी थी। दैनन्दिनी लगभग १२० पृष्ठोंकी थी। श्री छगनलालने १९२० में वह महादेव देसाईको दे दी थी। परन्तु देनेके पहले उन्होंने एक बहीमें मूल दैनन्दिनीके लगभग बीस पृष्ठोंकी नकल तैयार कर ली थी। शेष १०० पृष्ठोंमें इन बीस पृष्ठोंके समान सिलसिलेवार सामग्री नहीं थी, बल्कि १८८८ से १८९१ तक के लंदनवासमें दिन-प्रतिदिन जो घटनाएँ होती थीं उनका उल्लेख मात्र था। श्री छगनलालकी यह प्रति मामूली संपादकीय सुधारोंके बाद यहाँ उद्धृत की जा रही है। गांधीजीने दैनन्दिनी अंग्रेजीमें लिखी थी। उसे लिखनेके समय वे केवल १९ वर्ष के थे।
  2. गांधी-कुटुम्बके मित्र, पुरोहित और सलाहकार।
  3. काठियावाड़के प्रमुख वकील।
  4. गांधीजीके चचेरे भाई और दक्षिण आफ्रिका में गांधीजीके सहकर्मी श्री छगनलाल गांधी व श्री मगनलाल गांधी के पिता।
  5. गांधीजीके चचेरे भाई।
  6. गांधीजीका बचपनका मित्र, जिसे सुधारने का प्रयत्न उन्होंने वर्षोंतक किया, परन्तु सफल नहीं हुए।
  7. गांधीजीके चचेरे भाई।
  8. गांधीजीके बड़े भाई।
  9. ब्रिटिश एजेंट, जो राजकुमारकी नाबालिगीके समय पोरबन्दर राज्यका प्रबन्ध करता था।
  10. गांधीजीके चचेरे भाई।
  11. राजकोटमें नियुक्त काठियावाड़के पोलिटिकल एजेंट।
  12. राजकोटके राजा।
  13. देखिए पृष्ठ १।
  14. रणछोड़लाल पटवारीके साथ गांधीजीकी बड़ी घनिष्ठता थी। उनके साथ गांधीजीका पत्र-व्यवहार था और उनके पिताने गांधीजीको लंदन जानेके लिए आर्थिक सहायता दी थी।
  15. राजकोट के पास।
  16. फिडल्स।
  17. गुजराती में, उपनगर।
  18. शेष भाग उपलब्ध नहीं है।