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कलम, तलवार और त्याग/१३-सर सैयद अहमद खाँ

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कलम, तलवार और त्याग  (1939) 
द्वारा प्रेमचंद

[ १६८ ]‘क्या राजनीतिज्ञ रूप में, क्यों सहित्य-सेवी रूप मैं, क्या मौलिक नेता तथा सुधारक रूप में और क्या जातिसेवक रूप में, सर सैयद अहमद को जो अमरकीर्ति प्राप्त है, वह भारत की इसलामी दुनिया में शायद ही किसी अन्य पुरुष को प्राप्त हो। हममें से हर एक का कर्तव्य है कि इस श्रद्धेय पुरुष के जीवन-वृत्तान्त का ध्यानपूर्वक अध्ययन करे और इसकी खोज करे कि उनमें वह कौन से गुण थे, जिनकी बदौलत वह इतनी मान-प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके और जाति की इतनी सेवा कर सके। इनकी अंग्रेजी की योग्यता बहुत मामूली थी, वह घर के मालदार न थे, जाति में भी उनके समर्थकों की संख्या उनके विरोधियों से अधिक न थी। पर इन बाधाओं के होते हुए भी साहित्य-संसार और कर्म-क्षेत्र दोनों में वह अपना नाम अमर कर गये। यह केवल जाति-सेवा का उत्साह था, जिसने सारी कठिना- इयों पर विजय प्राप्त की थी।

सैयद अहमद खाँ ७ अक्टूबर, सन् १८९७ ई० को दिल्ली में पैदा हुए। इनकी शारीरिक शक्ति लड़कपन मैं भी असाधारण थी, और बौद्धिक दृष्टि से उनकी गणना साधारण विद्यार्थियों में ही थी। उस समय कौन यह निश्चय रूप से कह सकता था कि एक समय आयेगा जब यह बालक अपने देश और जाति के लिए गर्व का कारण होगा। उनकी पढ़ाई भी साधारण मुसलमान बच्चों की तरह कुरान शरीफ़ से शुरू हुई। उनकी उस्तानी एक भले घर की परदानशीन महिला थीं। इससे प्रकट होता है कि उस जमाने में भी शरीफ़ घरानों मैं बर्थों की शिक्षा नियों ही को सौंपी जाती थी। आज यूरोप से आरंम्भिक [ १६९ ]
कक्षाओं में प्रायः स्त्रियाँ ही अध्यापन-कार्य करती हैं। अपनी सहज कोमलता, धैर्य, सहनशीलता और वात्सल्य आदि गुण के कारण वह स्वभवतः बच्चों की शिक्षा के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं।

कुरान समाप्त करके सैयद अहमद खाँ ने फारसी और अरबी की पढ़ाई पारम्भ की। १८-१९ बरस की उम्र में उन्होंने पढ़ना छोड़ दिया। पर किताबें पढ़ने का शौक उन्हें आजीवन रहा। दिल्ली का साम्राज्य उस समय केवक एक मिटा हुआ निशान रह गया था। बादशाह लाल किले मैं किसी तकियादार फकीर की तरह रहती थी और अंग्रेज सरकार की पेंशन पर जर कर रहा था। बाबर और अकबर की सन्तति अब एक प्रकार से दिल्ली में कैद थी। सैयद अहमद के पिता शाही दरबार में नौकर थे, पर उनकी मृत्यु के बाद तनख्वाह बन्द हो गई और सैयद अहमद खाँ को जीविका की चिन्ता उत्पन्न हुई। उन्होंने अंग्रेज सरकार की नौकरी स्वीकार कर ली और १८३५ ई० में अगर कमिश्नरी के नायब मुंशीं नियुक्त हुए। यहाँ उन्होंने इतनी तत्परता से काम किया किं दो ही साल में मुनसिक बना दिये गये और मैनपुरी में तैनात कर दिये गये इसी समय उन्होने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक “असारुल सनादी” लिखी, जिसमें दिल्ली की पुरानी शाही इमारतों का वर्णन बड़ी खोज और विस्तार के साथ दिया गया है। इस ग्रन्थ की गणना उर्दू भाषा के 'क्लासिक'-उत्कृष्ट स्थायी साहित्य में की जाती है।

सन् ५७ के ग़दर में सैयद अहमद खाँ बिजनौर में मुन्सिफ थे। यह वह आपत्काल था जब अंग्रेज अफ़सर और उनके बीबी-बच्चे बाशियों के डर से आश्रय ढुँढ़ते फिरते थे। बाग़ी जिस अंग्रेज को पा जाते, हद दरजे की बेदर्दी से क़तल कर डालते थे। उस समय बारियों की मरज़ी के खिलाफ कोई काम करना खुद अपनी जान खतरे में डालना था। पर सैयद अहमद खाँ ने इस कठिन काल में भी न्याय का पक्ष लेने में संकोच न किया और विपदुग्नस्तों की सहायता में डट गये जो मनुष्य का नैतिक कर्तव्य है। उनकी कोशिश से कितने ही अंग्रेजों की जान बच गई। बारियों को इन पर संदेह हुआ। [ १७० ]
उन्होंने आपके मकान को घेर लिया, उन्हें तरह तरह की धमकियाँ दीं। यहाँ तक कि उनका मकान उनसे जबर्दस्ती खाली करा लिया और उनका माल-असबाब भी लूट लिया। सैयद अहमद खाँ ने धैर्य और दृढ़ता के साथ यह सारी मुसीबतें झेल ली, पर जिन्हे शरण दी थी, उन्हें बारियों के हवाले न किया। जब विप्लव शान्त हो गया और अंग्रेज सरकार की सत्ता देश पर फिर से स्थापित हुई तो बागियों के अपराधों की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई गई और सैयद अहमद उसके सदस्य बनाये गये। उस समय इस बात का बड़ा डर था कि अपराधियों के साथ निरपराध भी न पिस जायँ ? आक्रमण करनेवालों के साथ आत्मरक्षा में तलवार उठानेवाले भी सरकार को कोप-भाजन न हो जायँ। सैयद अहमद इसी नेक इरादे से कमेटी में सम्मिलित हुए कि यथासम्भव निरपराधों की रक्षा करे। किसी निजी लाभ या पद-पुरस्कार की उन्हें कदापि कामना न थी। यहाँ तक कि अब एक बागी मुसलमान रईस की बहुस बड़ी जायदाद जब्त कर ली गई और सरकार ने उसे आपकी सेवाओं के पुरस्काररूप में उन्हें प्रदान करना चाहा तो उन्होंने उसे धन्यवाद के साथ लौटा दियो। एक विपद्ग्रस्त भाई की त्राही से लाभ उठाना उनके आनदार इसलासी स्वभाव ने स्वीकार न किया।

दो साल बाद सैयद अहमद खाँ ने "असबाबे बग़ावते हिन्द" नाम की पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने तथ्यों और तर्को' से सिद्ध किया कि यह ग़दर न राष्ट्रविप्लव था, न आजादी की लड़ाई और न किसी तरह की साजिश, किंतु केवल सरकारी सिपाहियों ने अपने अफसरों की अवज्ञा की और वह भी अज्ञान और अंधविश्वासवश। चूंकि सरकार का यह खयाल था कि इस रादर को उभारनेवाले मुसलमान हैं, इसलिए इस पुस्तक का उद्देश्य यह भी था कि मुसलमानों के सिर से यह इलज़ाम दूर कर दिया जाय, और इसमें संदेह नहीं कि सैयद अहमद ख़ाँ को इसमें सफलता मिली। उन्होने इस पुस्तक को भारत सरकार और पार्लमेण्ट में भेज़ा और चूॅकि सरकार [ १७१ ]
को उनकी राज-भक्ति और शुभचिन्तना पर पूरा भरोसा था, इसलिए उसने उनके दिखाये हुए कारण और दलीलों पर ठंडे दिल से विचार किया और जो शिकायते' उसे ठीक मालूम हुई उनको दूर करने का वचन भी दिया। सैयद अहमद खाँ के इस नैतिक साहस की किन शब्दों में बड़ाई की जाय। जिस समय सरकार का रुख सख्ती करने का था और किसी की जुबान खोलने की हिम्मत न होती थी कि कहीं उस पर भी बगावत का संदेह न किया जाने लगे , उस समय सरकार के रुख की आलोचना करना और उसकी भूलों का भंडाफोड़ करना देश और जाति की बहुमुल्य सेवा थी।

सैयद अहमद खाँ को जो काम सौंपा जाता था, उसे वह दिलोजान से पूरा करते थे। उनका सिद्धान्त था कि जो काम करना हो, उसे दिल से करना चाहिए। बेदिली से या बेगार समझकर वह कोई काम न करते थे। वह मुरादाबाद में थे अब अवर्षण से फसल मारी गई और देश में भयानक दुर्भिक्ष उपस्थित हो गया। सरकार ने वहाँ एक खैरात खाना खोला और उसका प्रबन्ध सैयद अहमद खाँ को सौंपा। उस समय उन्होंने जितनी मुस्तैदी से अकाल-पीड़ितों की सहायता की, पर्दानशीन महिलाओं और भूखों मरते सफेदपोशों को जिस हमदर्दी के साथ मदद पहुँचाई उसकी यथोचित प्रशंसा नहीं की जा सकती। चाहे जिस धर्म या संप्रदाय का भी हो, सबके साथ उनकी एक-सी सहानुभूति थी।

आजकल तो धार्मिक वाद-विवादों का जोर कुछ कम हो गया है, पर इस जमाने में ईसाई पादरी-ईसाई मत के प्रचार के जोश में हिन्दू और मुसलमान मजहबों पर खुलेआम आक्षेप किया करते थे। और चूँकि उस समय आलिमों और पंडितों में यह योग्यता न थी कि वह शास्त्र वचनों और धार्मिक परम्पराओं की युक्ति-संगत व्याख्या कर सकें। और शब्दों में पर्दे मैं छिपे हुए अर्थ को स्पष्ट कर सकें। इस कारण ईसाई प्रचारकों के सामने वह निरुत्तर हो जाते थे और इसका जनसाधारण पर बहुत बुरा असर पड़ता था। सैयद अहमद खाँ ने पाद[ १७२ ]
रियों के इस हमले से इसलाम को बचाने के लिए यह आवश्यक समझा कि उनके आक्षेपों की मुँहतोड़ जवाब दिया जाय और कुरान और बाइबिल की तुलना करके दिखाया जाय कि दोनों धर्म-ग्रन्थों में कितनी समानता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने बाइबिल की टीका लिखना आरंभ किया, पर वह पूरी न हो सकी। परन्तु नौकरी से पेंशन लेने के बाद जब उन्हें अवकाश और इतमीनान प्राप्त हुआ तो उन्होने इस विचार को अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'तफ़सील कुरान' के द्वारा पूरा किया। इसलाम के सिद्धान्तों और शिक्षाओं पर दार्शनिक दृष्टि से किये जानेवाले क्षेत्रों का बड़ी खोज और विवेचना के साथ जवाब दिय।

हिन्दू-मुसलमान दोनों ही अशिक्षा और अज्ञान के कारण शास्त्र- वचनों और धर्म के साधारण विधि-निषेधो को आँख मूंदकर मानते आते थे। उन वचनों की युक्ति-संगत व्याख्या तो वह क्या करते, उनके मन में कोई शंका ही न उठती थी; क्योकि शंका तो शिक्षा और जिज्ञासा का सुफल है। वह लोग अपने पुरखों के पदानुसरण करने में ही सन्तुष्ट थे। धर्म एक रूढ़ि मात्र बन गया था, मानो प्राण निकल गया हो, देह पड़ी हो। इसी कारण हिन्दू-मुसलमानों की आस्था अपने धर्म से हटने लगी थी। अंग्रेज़ी शिक्षा के आरंभिक युग में कितने ही शिक्षित हिन्दू ईसाई हो गये। अन्त को राजा राम मोहन राय को एक ऐसे सम्प्रदाय की स्थापना आवश्यक जान पड़ी जो पूर्णतया दार्शनिक सिद्धान्तों पर प्रतिष्ठित हो, और उसमें वह सब सुविधाएँ और स्वाधीनताएँ प्राप्त हैं, जो लोगे को ईसाई धर्म की ओर आकृष्ट किया करती थीं और इस नये सम्प्रदाय का नाम ब्रह्मसमाज रखा गया। इस सम्प्रदाय से जात-पाँत, छूत-छात, मूर्ति पूजा, तीर्थस्नान, श्राद्ध और वह सब विधि-विधान निकाल दिये गये जिन पर ईसाइयों के आक्षेप हुआ करते थे। यहाँ तक कि उपासनाविधि भी बदल दी गई। इसमें सन्देह नहीं कि इस सम्प्रदाय ने हिन्दुओं में ईसाइयत की बाढ़ को बहुत कुछ रोक दिया। इसके बहुत दिन [ १७३ ]
बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्यसमाज की नीव डाली जिसने पश्चिम भारत में वही काम किया जो पूर्व में ब्राह्मसमाज ने किया था। 'तफसीरुलकुरान' भी इसी उद्देश्य से लिखी गई कि नवयुवक मुसलमानों के मन में अपने धर्म के विषय में जो शंकाएँ उठें, उनका समाधान कर दिया जाय। पर मुसलमान इस पुस्तक के प्रकाशित होते ही सैयद अहमद खाँ पर कुफ्र का फ़तवा लेकर दौड़े। उन पर नास्तिक, अनेकेश्वरवादी और प्रकृतिपूजक होने का दोष लगाया। देश में एक सिरे से दूसरे तक आग लग गई और जवाबी किताबों का सिलसिला शुरू हुआ। लेखक पर तरह-तरह के अनुचित और असंगत आरोप किये जाने लगे। कोई-कोई तो यह भी सोचने लगे कि सैयद अहमद खाँ विलायत जाकर ईसाई हो आये हैं और इसलाम को नष्ट करने के उद्देश्य से यह पुस्तक लिखी है। बहुत दिनों के बाद यह कोलाहल शान्त हुआ और आज तफसीरुल कुरान तत्त्व-जिज्ञासुओं के लिए पथप्रदीप का काम कर रही है।

सैयद अहमद खाँ के जीवन का सबसे बड़ा कार्य मदरसतुल उलूम अलीगढ़ कालिज है जो अब मुसलिम विश्वविद्यालय का रूप प्राप्त कर उनका अमर स्मारक बन रहा है। मुसलमानों में निर्धनता और बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही थी और इस बाढ़ को रोकने के लिए उनमें पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार होना अत्यावश्यक था। मदरसतुल उलूम ने इस अभाव की बहुत अच्छी तरह पूर्ति कर दी, पर उस समय लोग पश्चिम की शिक्षा दीक्षा से ऐसे भड़क रहे थे कि उन्हें डर था कि कहीं हमारा धर्म भी हमारे हाथ से न चला जाय और फिर हम कहीं के न रहें। पर सर सैयद अपने संकल में दृढ़ थे। उन्होंने इस विचार में इंग्लैंड की यात्रा की कि यहाँ के प्राचीन विश्वविद्यालयों के संघटन और व्यवस्था का अध्ययन करें और इसी नमूने पर हिन्दुस्तान में अपने कालिज की स्थापना करें। १ अप्रैल सन् १८६९ ई० को वह विलायत के लिए रवाना हो गये। लन्दन में जिस ठाट से उनका स्वागत किया गया [ १७४ ]
आर जितनी आवभगत हुई उसने उन्हें सदा के लिए अंग्रेजों के साथ प्रेमबंधन में बाँध दिया। करीब दो साल तक वहाँ के कालिजों के प्रबन्ध का बारीकी से अध्ययन करने बाद वह भारत लौटे और 'मदरसतुल उलूम के उद्घाटन की तैयारी करने लगे। इस उद्देश्य की सिद्धि और मुसलमानों में साहित्य और विद्या की सम्यक् रुचि उत्पन्न करने के विचार से उन्होंने तहज़ीबुल अख़लाक़” नामक मासिक पत्र निकाला। पर आलिमों की मंडली ने इस पत्र का विरोध आरम्भ किया और मुसलमान जनता को कालिज के उद्योग की ओर से भड़काने लगे। शायद कुछ लोगों ने सोचा हो कि यह इंगलैंड से अपना धर्म खोकर आये हैं। पर सर सैयद् ने हिम्मत न हारी और लगातार ५ साल के अथक उद्योग से १८७५ ई० में अलीगढ़ में मदरसतुल उलूम का उद्घाटध हुआ। इसमें संदेह नहीं कि इस संस्था की स्थापना से मुसलमाने का जितना अभ्युदय हुआ, और किसी तरह उतना न हो सकता था। आज मुसलिम विश्वविद्यालय मुसलमानों को जातीय स्मारक है और उसके विद्यार्थी हिन्दुस्तान के कोने-कोने में उसका झण्डा लिये घूम रहे हैं।

सैयद अहमद खाँ का खयाल हिन्दुओं की ओर से महज इस बात पर खराब हो गया कि १८६७ ई० में संयुक्त-प्रान्त में हिन्दुओं की ओर से यह कोशिश हुई कि नागरी इस सूबे की अदालती भाषा बना दी जाय। सैयद अहमद खाँ ने इसे हिन्दुओं की ज्यादती समझा, यद्यपि यह उद्योग केवल जनसाधारण के सुभीते की दृष्टि से आरम्भ किया गया था। स्पष्ट है कि जिस सूबे में हिंदुओं की आबादी ८० प्रतिशत से भी अधिक हो और उसमें अधिकतर लोग देहात के रहनेवाले, उर्दू से अपरिचित हों, वहाँ उर्दू की अदालती भाषा होनी खुला अन्याय है। मुट्ठी भर उर्दूदाँ लोगों के लाभ या सुभीते के लिए जनता के बहुत बड़े भाग को असुविधा और खर्च उठाने को बाध्य करना किसी प्रकार उचित नहीं और इस आंदोलन का यह उद्देश्य था कि उर्दू एकबारगी मिटा दी जाय। पर सर [ १७५ ]
सैयद के मन में यह शङ्का बस गई कि हिंदू मुसलमानों को नीचा दिखाना चाहते हैं। सम्भव है, कुछ और भी कारण उपस्थित हो गये हों, जिनसे इस धारणा की पुष्टि हुई हो कि हिंदू-मुसलमान का मेल और एक अनहोनी बात है। दोनों जातियों में ऐतिहासिक और धर्मगत विभेद-बिलगाव पहले से ही मौजूद थे। मुग़ल साम्राज्य की समाप्ति और अंग्रेजी राज्य की स्थापना ने इन विरोधों को मिटान और पुराने घावों को भरना आरम्भ ही किया था कि यह नये झगड़े उठ खड़े हुए और संयुक्त राष्ट्रीयता का लक्ष्य सुदीर्घकाल के लिए हमारी आँखों से ओझल हो गया। धर्म-संप्रदायों के मत-भेदों का सक्रिय शत्रुता के रूप में परिवति हो जाना कितना आसान है, यह हम आये दिन आँखों से देख रहे हैं। आज जरा-जरा-सी बातों पर, जिन का सिद्धान्त की दृष्टि से कोई महत्व नहीं, आपस में मार काट मच जाती है और राष्ट्र की शक्ति का एक बड़ा भाग इस शृह-कलह के अग्नि-कुण्ड में स्वाह हो जाता है। ऐसा कोई साल नहीं जाता जब दो-चार स्थानों में लोमहर्षण साम्प्रदायिक दंगे न हो जाते हों। कितने दुःख की बात है कि उस समय उभय-पक्ष की अनुदारता और अदूरदर्शिता ने आपस के उस मेल मिलाप और सहिष्णुता के रास्ते में रोड़े अटका दिये, जिसकी नीव पर ही संयुक्त राष्ट्रीयता की इमारत उठाई जा सकती है। संभव है, सर सैयद ने इस विचार से कि मुसलमान पहले इस देश पर राज्य कर चुके हैं, उनके साथ कुछ विशेषता-प्रदर्शन की आवश्यकता समझी हो, पर हिन्दू समान पद से अधिक और किसी रिआयत के लिए तैयार न थे। सर सैयद ने उस समय उदारता से काम लिया होता तो हिन्दुस्तान की हालत कुछ और होती। पर उन्होने तात्कालिक और निकट भविष्य के लाभों को स्थायी और राष्ट्रीय हितों पर प्रधानता दी। शासित हिन्दुओं की अपेक्षा शासक अंग्रेजों से मेल रखना कहीं अधिक लाभजनक था। सरकार के हाथ में अधिकार थे, पद थे और उन्नति के अपरिमित साधन थे। हिन्दुओं की दोस्ती में परस्पर मिल[ १७६ ]
कर रोने के सिवा और क्या धरा था। सर सैयई का यह विचार- परिवर्तन उस समय और भी स्पष्ट हो गया, जब वह विलायत गये। वहाँ उन्होने जो कुछ देखा उसमे इस नतीजे पर पहुँचे कि मुसलमानों का हित अग्रेज़ों से मेल रखने में है, और इस प्रकार उस कार्य प्रणाली की नींव पड़ी जो दिन-दिन अधिकाधिक भयावह रूप ग्रहण करती जा रही है। यहाँ तक कि आज उसने आपस के मेल-मिलाप को ही असंभव नहीं बना दिया है। देश के वायु-मण्डल को भी विषाक्त कर दिया है। देश दो परस्परविरोधी भाग में विभक्त हो गया है और उसका घातक प्रभाव आपस की मार-काट के रूप में प्रकट होता है। दोनों पक्ष एक तीसरी शक्ति का अधिकारारूढ़ रहन अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अनिवार्य आवश्यक समझते हैं। सर सैयद जैसे प्रभावशाली और प्रगतिशील पुरुष ने सयुक्त राष्ट्रीयता का पक्ष ग्रहण किया होता तो आज हिन्दुस्तान कहीं से कहीं पहुँचा होता। गन्दे गढे़ के कीटाणु ऐसे सख्तजान होते हैं कि एक बार जहाँ पुष्ट हुए कि फिर उनका नाश असंभव हो जाता है। अतः उस समय से अब तक मेल और एका के जितने यत्न किये गये सब विफल हुए, एकता और मेल की मंजिलें आज भी उतनी ही दूर है।

सर सैयद में आदमियों को पहचानने की स्वाभाविक शक्ति थी और जिस व्यक्ति के प्रति एक बार उनकी अच्छी धारणा हो गई, फिर उसके विरुद्ध कोई शिकायत न सुनते थे। मेहनत का यह हाल था कि अकेले जितना दिमागी काम कर सकते थे, उतना कई दिन मिलकर भी न कर सकते थे। बहुत ही हँसमुख, मुरौवतदार, उदारमना और सुवक्ता थे। उनकी वाणी में मोहिनी थी, सुनने वाले मंत्रमुग्ध- से हो जाते थे। उनका कहना था कि किसी महत्कार्य की सिद्धि के लिए विद्वत्ता की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी अनुभव और अवसर पहचानने की योग्यता की। विरोधी भी उनके सामने जाकर सहायक बन जाता। बुद्धि इतनी तीक्ष्ण थी कि उससे प्रभावित न होना असंभव था। [ १७७ ]सर सैयद ने उर्दू भाषा की जो सेवा की, उसकी सराहना किन शब्दों में की जाय। यों कहना चाहिए कि उर्दू उन्हीं के आश्रय में पाली पोसी गई। उस समय तक उर्दू में शायरी का बाजार गर्म था। साहित्य पद्यरचना और कवि-चर्चा तक सीमित था। उसमें न गहराई थी, न ऊँचाई। कठिन विषयों की चर्चा और गंभीर भावों को व्यक्त करने की उसमें योग्यता न थी। ऐतिहासिक, आलोचनात्मक और शास्त्रीय विषयों पर उसे अधिकार न था। सर सैयद ने इन विषयों पर तहजीबुल अखलाक़” मैं जो निबंध लिखे, वह उर्दू के 'क्लासिक' स्थायी साहित्य हैं। उनके शब्द-शब्द से गंभीर अध्ययन, मानव-प्रकृति का सुक्ष्म परिचय और शास्त्रीय विषयों की पाण्डित्यपूर्ण आलोचन टपक रहा है। कहने का ढंग इतना सीधा-सादा है कि साधारण विद्या-बुद्धि का मनुष्य भी अनायास समझ ले। न पेचदार पद-विन्यास, न उलझे हुए वाक्य, ने 'क्लिष्ट शब्दावली। क्लिष्ट से क्लिष्ट भावों को इतनी सरलता से व्यक्त कर जाते हैं कि देखकर दंग रह जाय। यद्यपि ये निबंध सब-के-साथ उनके दिमाग से नहीं निकले हैं, बेकन, एडिसन और कई अन्य साहित्यकारों के भावों की छाया ग्रहण की गई है। पर कहने का ढंग उनका अपना है, और उसने निबंधों में नयापन पैदा कर दिया है। उनकी साहित्य सेवा के पुरस्कार-स्वरूप सरकार ने उन्हे 'सर' की उपाधि प्रदान कर अपनी गुणज्ञता का परिचय दिया।

आयु के अन्तिम भाग में लगातार बीमारियों के कारण सर सैयद बहुत कमजोर हो गये थे। पर उस अवस्था में जाति पर मिटा हुआ यह महापुरुष उसी उत्साह से जाति-सेवा में जुटा हुआ था। अन्त की १८९८ ई० वीं ७ वीं मार्च को महाप्रस्थान का संदेश आ गया और उसने अपने जीवन के अनेक अमर स्मृति चिन्ह-छोड़ इस नश्वर जगत् से कूच किया।