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हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास/२/३ हिन्दी साहित्य का माध्यमिककाल/नानक

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हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास
द्वारा अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

[ १८९ ] इसी शताब्दी में पंजाब प्रान्त में गुरु नानक देव का आविर्भाव हुआ। आप बेदी खत्री और अपने समय के प्रसिद्ध धर्म-प्रचारक थे। कुछ लोगों ने इनको कबीर साहब से प्रभावित बतलाया है। किसी किसीने तो उनको इनका शिष्यतक लिख दिया है। किन्तु यह सत्य नहीं है। इस विषय में बहुत वाद-विवाद हो चुका है। मैं उनको यहाँ लिखना वाहुल्य-मात्र समझता हूं. किन्तु यह निश्चित बात है कि कबीर साहब का गुरु नानकदेव पर कुछ प्रभाव नहीं था। प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि कबीर साहब पीर थे और गुरु नानकदेव गुरु। वे एक नवीन धर्म का प्रचार करना चाहते थे और ये हिन्दू धर्म के संरक्षण के लिये यत्नवान थे। इस बात को प्रकट करने के लिये ही उन्होंने महात्मा गोरखनाथ के उद्भावित गुरु नाम का अपने नाम के साथ संयोजन किया था। उनके उपरान्त उनकी गद्दी पर दस महापुरुष बैठे वे दसो गुरु कहलाये । पाँच गद्दीके बाद तो इन गुरुओं ने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिये तलवार भी ग्रहण की। इन गुरुओं मे से कईने हिन्दुधर्म बलिबेदी पर अपने को उत्सर्ग भी किया। जब कबीर साहब ने हिंदु धर्म याजका और पंडितों की बुत्मा करने ही में अपना गौरव समझा उस समय गुरुनानकदेव पंडितों को इन शब्दों में स्मरण करते थे:

स्वामी पंडिता तुमदुमती, केहि विधि मिलिये प्रानपती। गुरु नानकदेव की रचनाओं में वेद शास्त्र की उतनी ही मर्यादा दृष्टिगत होती है जितनी एक हिन्दु की कृति में होनी चाहिये। उसके [ १९० ]( १९० ) विरुद्ध कबीर साहब उनको उन शब्दों में स्मरण करते हैं जो भद्रता की सोमा को भी उल्लंघन कर जाते हैं। अतएव यह समझना कि गुरु नानकदेव उसी पथ के पथिक थे जिस पथके पथिक कबीर साहब थे बहुत बड़ी भ्रान्ति है। गुरु नानकदेव का आविर्भाव यदि उस समय पंजाब प्रान्त में न होता तो उस प्रान्त से हिन्दू धर्मका विलोप-साधन पोरों के लिये बहुत आसान हो जाता। गुरु नानकदेव की अधिकांश रचनायें पंजाबी में हो हैं । परन्तु प्रायः सब हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने गुरु नानकदेव को हिन्दी का कवि माना है। कारण इसका यह है कि उनके बाद उनकी गद्दी पर नौ गुरु और बैठे। इनमें से पांच गुरुओं ने जितनी रचनायें की हैं उन सब लोगों ने भी अपनी पदावली में नानक नाम ही दिया है। इस लिये भ्रान्ति से अन्य गुरुओं की रचनाओं को भी गुरु नानक की रचना मान ली गयी है । गुरु तेगबहादुर नवें गुरु थे वे सत्रहवीं ई० शताब्दी में हुये हैं। उनकी रचनायें उस समय की हिन्दो में हुई हैं । वेही अधिक प्रचलित भी हैं। इसी लिये उनकी रचनाओं को गुरु नानकदेव की( १९० ) विरुद्ध कबीर साहब उनको उन शब्दों में स्मरण करते हैं जो भद्रता की सोमा को भी उल्लंघन कर जाते हैं। अतएव यह समझना कि गुरु नानकदेव उसी पथ के पथिक थे जिस पथके पथिक कबीर साहब थे बहुत बड़ी भ्रान्ति है। गुरु नानकदेव का आविर्भाव यदि उस समय पंजाब प्रान्त में न होता तो उस प्रान्त से हिन्दू धर्मका विलोप-साधन पोरों के लिये बहुत आसान हो जाता। गुरु नानकदेव की अधिकांश रचनायें पंजाबी में हो हैं । परन्तु प्रायः सब हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने गुरु नानकदेव को हिन्दी का कवि माना है। कारण इसका यह है कि उनके बाद उनकी गद्दी पर नौ गुरु और बेटे। इनमें से पांच गुरुओं ने जितनी रचनायें की हैं उन सब लोगों ने भी अपनी पदावली में नानक नाम ही दिया है। इस लिये भ्रान्ति से अन्य गुरुओं की रचनाओं को भी गुरु नानक की रचना मान ली गयी है । गुरु तेगबहादुर नवें गुरु थे वे सत्रहवीं ई० शताब्दी में हुये हैं। उनकी रचनायें उस समय की हिन्दो में हुई हैं । वेही अधिक प्रचलित भी हैं। इसी लिये उनकी रचनाओं को गुरु नानकदेव की रचना मान ली गयी है. और इसी से उस भ्रान्ति की उत्पत्ति हुई है जो उनको हिन्दी भाषा का कवि बनाती है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। मैं यह स्वीकार करूंगा कि गुरु नानकदेव के कुछ पद्य अवश्य ऐसी भोपा में लिखे गये हैं जो पन्द्रहवीं शताब्दी की हिन्दी से सादृश्य रखते हैं। परन्तु उनकी संख्या बहुत थोड़ी है, और उनमें भी पंजाबीपन का रंग कुछ न कुछ पाया जाता है। मैं बिषय को स्पष्ट करने के लिये उनका एक पद्य पंजाबी भाषा का और दूसरा हिन्दी भाषा का नीचे लिखता हूं:१-पवणु गुरुपाणी पिता माता धरति महत्तु । दिवस रात दुइदाई दाया खेलै सकल जगत्तु । चगियाइयां बुरियाइयां वाचै धरमु हदूरि । करनी आपो आपणी के नेड़े के दूरि । जिन्नी नाम धेयाइया गये मसक्कति घालि । नानक ते मुख उजले केती छुट्टी नालि ।

रचना मान ली गयी है, और इसी से उस भ्रान्ति

की उत्पत्ति हुई है जो उनको हिन्दी भाषा का कवि बनाती है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। मैं यह स्वीकार करूंगा कि गुरु नानकदेव के कुछ पद्य अवश्य ऐसी भोपा में लिखे गये हैं जो पन्द्रहवीं शताब्दी की हिन्दी से सादृश्य रखते हैं। परन्तु उनकी संख्या बहुत थोड़ी है, और उनमें भी पंजाबीपन का रंग कुछ न कुछ पाया जाता है। मैं बिषय को स्पष्ट करने के लिये उनका एक पद्य पंजाबी भाषा का और दूसरा हिन्दी भाषा का नीचे लिखता हूं:- १-पवणु गुरुपाणी पिता माता धरति महत्तु । दिवस रात दुइदाई दाया खेलै सकल जगत्तु । चगियाइयां बुरियाइयां वाचै धरमु हदूरि । करनी आपो आपणी के नेड़े के दूरि । जिन्नी नाम धेयाइया गये मसक्कति घालि । नानक ते मुख उजले केती छुट्टी नालि । [ १९१ ]( १९१ ) मीठे को कडुआ २-गुरु परसादी बूझिले तउ होइ निबेरा । घर घर नाम निरंजना सो ठाकुर मेरा । यिनु गुरु सबद न छूटिये देखहु बीचारा । जे लख करम कमावहीं विनु गुरु अँधियारा । अंधे अकलो बाहरे क्या तिन सों कहिये। बिनु गुरु पंथ न सूझई किस विध निरयहिये । आक्त को जाता कहे जाते को आया । परकी को अपनी कहैं अपनो नहिं भाया । कहैं को मीठा । कडए राते की निन्दा करहिं ऐसा कलि महिं दीठा । चेरी की सेवा करहिं ठाकुरु नहिं दसै । पोखर नीरु बिरोलिये माखनु नहिं रीसै । इसु पद जो अरथाइ ले सो गुरू हमारा । नानक चीने आप को सो अपर अपारा । गुरु नानकदेव की मातृभाषा पंजाबी थी। इसके अतिरिक्त मुख्यतः पंजाब प्रान्त की हिन्दू जनता की जाति के लिये हो उनको धर्म क्षेत्र में उतरना पड़ा था। इस लिये पंजाबी भाषा में उनकी अधिकांश रचनाओं का होना स्वाभाविक था। परन्तु जिस समय उनका आविर्भाव हुआ था उसकी यह विशेषता देखी जाती है कि उस समय प्रत्येक प्रान्त के हिन्दू धर्म प्रचारक ओर सुकवि हिन्दी भाषा को ओर आकर्पित हो रहे थे । यदि बंगाल प्रान्त के चण्डीदास और बिहार प्रान्त के विद्यापति हिन्दी भाषा को अपनी रचनाओं में स्थान देने के लिये आकर्षित हुये तो महाराष्ट्र प्रान्त में नामदेव जी को भी तत्कालिक हिन्दी भाषा में उत्तमोत्तम धार्मिक रचनायें करते देखा जाता है। ऐसी अवस्था में गुरु नानक देव जी का भी हिन्दी भाषा की ओर आकृष्ट होना आश्चर्यजनक नहीं । उनके इसो [ १९२ ](१९२ ) भाव का घोतक उनका हिन्दी भाषा का पद्य है, पहले पद्य में भी, जा पंजाबी भाषा का है. हिन्दी शब्दों का प्रयोग देखा जाता है। और उनकी यह प्रणाली उनके हिन्दू भाषा के अनुराग की स्पष्ट सूचक है। उनके बाद उनके जितने उत्तराधिकारी हुये उनमें यह प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़नी दृष्टिगत होता है। दूसरी तीसरी और चौथी गदियों के गुमओं को रचनायें अधिकांश हिन्दी शब्दों से गर्भित हैं। पांचवी गद्दी के अधिकारी गुरु अर्जुन जो की रचनायें तो सामयिक हिन्दी भाषा का ही उदाहरण हैं। नवों गद्दी के अधिकारी गुरु तेगबहादुर के भजन तो बिल्कुल हिन्दी भापा में ही लिखे गये हैं। उनके पुत्र दसवीं गद्दी के अधिकारी गुरु गोविन्द सिंह ने हिन्दी भाषा में एक विशाल ग्रन्थ ही लिख डाला जो आदिग्रन्थ साहब केही बरावर है और दशम ग्रन्थ कहलाता है। यथा स्थान इस विषय का वर्णन विशेषरूप से आपको आगे मिलेगा। इस समय में कुछ पा मारी गही में लेकर पाँचवीं गद्दी और नवों गद के अधिकारियों के नीचे लिखता हूं। आप देखें उनमें किस प्रकार उत्तगेत्तर हिन्दी भाषा को अधिक स्थान मिटता गया है। जासुख तामहु रागियों दुख भा संभाले ओइ । नानक कहै सियाणिये घों कन्त मिलावा होइ ॥ गुरु अंगद । तृ आपे आप सभु करता कोई दजाहोयसु औरो कहिये। हरि आये बोले आपि बुलावे हरि आपे जलि अलि रवि रहिये । हरि आपे मारे हरि आपे छोड़े मनहरि सरणी पड़ि रहिये । हरि बिनु कोई मारि जीवालि न सक मन है निचिंद निस्चलु होइ रहिये। उठंदिया वहंदिया सुतिया सदा हरि नाम ध्याइये । जन नानक गुरु मुख हरि लहिये । गुरु अमरदास [ १९३ ]( १९३ ) · हौं क्या सालाहीकिरम जन्तु बड्डी तेरी बडियाई । तू अगम दयालु अगम्मु है आपि लेहि मिलाई । मैं तुझ बिन बेला को नहीं, तू अंति सखाई। जो तेरी सरणागती तिन लेहि छुड़ाई । नानक बे परवाह है किसु तिल न तमाई । संगति संत मिलाये । हरि सरि निरमलि नाये। निरमलि जलि नाये मैलु गंवाये भये पवित्र सरीरा । दुर मति मैल गई भ्रम भागा हौं मैं विनठी पीरा। नदरि प्रभू सत संगति पाई निज घर होआ बासा । हरि मंगल रसि रसन रसाये नानक नाम प्रगासा। गुरु रामदासजो गावहु राम के गुण गीत। नाम जपत परम सुख पाइये आवागवणु मिटै मेरे मीत गुण गावत होवत परगास, चरण कमल महँ होय निवास। सत संगति महँ होइ उधार, नानक भव जल उतरसि पार। गुरु अर्जुन जो प्रानी नारायन सुधि लेह ।। छिनु छिनु औधि घटै निसि बासरु बृथा जात है देह । तरुनापो बिखियन स्यों खोयो बालापन अज्ञाना । बिरध भयो अजहूँ नहिं समझै कौन कुमति उरझाना। मानुस जन्म दियो जेहि ठाकुर सो त क्यों विसरायो। मुकति होति नर जाके सुमिरे निमख न ताको गायो। माया को मदु कहा करतु है संग न काहू जाई । नानक कहत चेतु चिन्तामणि होइ है अन्त सहाई । गुरु तेग बहादुर [ १९४ ]इसी स्थान पर मैं यह भी प्रकट कर देना चाहता हूं कि इस पन्द्रहवीं शताब्दी में जिस निर्गुणवादधारा की अधिक चर्चा की जाती है, वास्तव में वह धारा उस काल से प्रारम्भ होती है जिस समय स्वामी शंकराचार्य ने वेदान्तवाद का प्रचार किया। उनकी निर्गुण धारा का रूप वास्तविकता को दृष्टि से सबेत्तिम है किन्तु वह इतनी उच्च है कि सर्व साधारण की बोधगम्य नहीं। मैक्समूलर ने एक स्थान पर लिखा है कि ईश्वरी विद्या के विषय में स्वामी शंकराचार्य जितना ऊंचा उठे उससे ऊंचा नहीं उठा जा सकता। गुरु गोरखनाथ जी ने इस निर्गुवाद को जटिलताओं को बहुत कुछ सरलता का रूप दिया और भगवान शिव की उपासना का प्रचार कर के अव्यक्त बिषयों को व्यक्त रूप देने को प्रशंशनीय चेष्टा की। उसका विकास ज्ञानदेव और नामदेव की रचनाओं में अधिकतर बोधगम्य रूप में देखा जाता है। पन्द्रहवीं सदीके सन्तमनके प्रचारकों में विशेष कर कबीर साहब की उक्तियों में वह निगुणवाद कुछ और स्पष्ट हुआ, किन्तु वह पौराणिक भावों से ओत प्रोत है। पौराणिक धर्म का उत्थान गुप्त सम्नाटों के समय में अर्थात् तीसरी और चौथो ईस्वी शताब्दी में हुआ और उत्तरोत्तर वृद्धि पाकर ईस्वी दसवीं शताब्दी में वह प्रबल बन गया था। यही कारण है कि पन्द्रहवीं शताब्दी में जितने धार्मिक प्रचार हुये वे सब पौराणिक धर्म पर अवलंबित हैं। कबीर साहब के निगुणवाद पर भो उसकी छाप लगी हुई है अन्तर केवल इतना ही है कि उनके निगुणवाद पर सूफियों के ईश्वग्वाद की भी छाया पड़ी है। वैष्णव धर्म में जैसा निगुणवाद है और इसके साथ जंसा सगुणवाद सम्मिलित है कबीर साहब का निगुण ब्रह्म-सम्बन्धी सिद्धान्त भी लगभग वैसा ही है। कारण इसका यह है कि उनकी अधिकांश शिक्षायें वैष्णव धर्म से प्रभावित हैं और ऐसा होना इस लिये अनिवार्य था कि स्वामी रामानन्द का उनपर बहुत बड़ा प्रभाव था। कबीर साहब का निर्गुण ब्रह्म अनिर्वचनीय ही नहीं है वह भत्त वत्सल है और पतित पावन भी है। प्रमातिरेक में वे उसके दास बनते हैं और वह उनका स्वामी; वे उसके पुत्र बनते हैं और वह [ १९५ ]( १९५ ) उनका पिता; वे उसकी प्रेमिका बनते और वह उनका प्रेमी। वे नरक और आवा गमन से भीत हो कर उसकी शरण में जाते हैं और वह उद्धारक बन कर उनका उद्धार करता है। वे कहते हैं कि वह बिपत्ति में त्राण देता है. भवसागर से पार करता है और अशरण का शरण बनता है और इन बातों को पौराणिक आख्यानों और उदाहरणों-द्वारा प्रमाणित करते हैं। जब वे और ऊँचा उठते हैं तो उसको सर्व जगत में व्याप्त पाते हैं और विश्व की विभूतियों में नाना रूपों में उसे विकसित देख कर अलौकिक आनन्द का अनुभव करते हैं। कभी जब आत्म- विश्वास का उदय होता है तब वह आत्मज्ञान अथवा आत्मा ही में परमात्मा के देखने का उद्योग करते हैं और कभी समाधि में बैठ कर योग के अनेक साधनों द्वारा ब्रह्मानन्द-सुख-भोगी बनते हैं। कभी मुक्ति की कामना करते हैं कभी मुक्ति को तुच्छ गिन कर भगवद्भक्ति को ही प्रधानता देते हैं। कभी संकेत और इंगितों द्वारा लोकातीत को अलौकिकता बतलाने में रत देखे जाते हैं. कभी अनिर्वचनीय की अनिर्वचनीयता देख मौनता-मंत्र ग्रहण करना ही समुचित समझते हैं। सारांश यह कि निगुण और सगुण के विषय में जो विचार-परम्परा पुराण- वादियों और वेदान्तियों की देखी जाती है. पद पद पर वे उसी का अनुसरण करते दृष्टि गत होते हैं। कोई पुगण ऐसा नहीं है जिसमें परमात्मा का वर्णन इसी रूप में न किया गया हो। पुराणों का सगुणवाद जैसा प्रबल है वैसा ही निगु णवाद भी। वे भी वेदान्त के भावों से प्रभावित हैं और वैष्णव पुराणों में उसका बड़ा हो हृदयग्राही विवेचन है। परन्तु वे जानते हैं कि निगुणवाद के तत्वों का समझना कतिपय तत्वज्ञों का ही काम है। इस लिये उनमें सगुणावाद का ही विस्तार है, क्योंकि वह बोध-सुलभ है। विना उपासना किये उपासक सिद्धि नहीं पाता। उपासना-सोपान पर चढ़ कर ही साधक उस प्रभु के सामीप्य- लाभ का अधिकारी बनता है जो ज्ञान-गिरा-गोतीत है। उपासना के लिये उपास्य को प्रयोजनीयता अविदित नहीं। यदि उपास्य अचिन्तनीय अव्यक्त, अथवा ज्ञान का विषय नहीं तो उसमें भावों का आरोप नहीं हो [ १९६ ] सकता। ऐसी अवस्था में भक्ति किसकी होगी ? प्रेम किस से किया जायगा और किसके गुणों का मनन चिन्तन कर के मनुष्य अपनी आत्मा को उन्नत बना सकेगा। इन्हीं बातों पर दृष्टि रखकर परमात्मा के सगुण स्वरूप की कल्पना है। जो यह समझता है कि बिना सगुणोपासना किये हम परमात्मा के निर्गुण स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लेंगे वह उसो जिज्ञासु के समान है जो विश्व-नियन्ता का परिचय प्राप्त करना चाहता है किन्तु यह जानता ही नहीं कि विश्व क्या है। पुराण सगुण-पथ का पथिक बना कर निर्गुण की प्राप्ति कराते हैं, किन्तु बड़ी बुद्धिमता और विवेक के साथ। यही कारण है कि मुख से निर्गुणबाद का गीत गानेवाले भो अन्तमें पुराण- शैली की परिधि के अन्तर्गत हो जाते हैं । चाहे कबीर साहेब हों, अथवा पन्द्रहवीं सदी के दूसरे निर्गुणवादी, उन सबके मार्गप्रदर्शक गुप्त या प्रकट रूप से पुराण ही हैं । हम देखते हैं कि निर्गुणबाद का नाद करनेवाले जब बिना किसी प्रतीक के अवलम्बित पथ पर चलने में असमर्थ होते हैं तो गुरुदेव ही को ईश्वर-स्वरूप मानकर उपासना में अग्रसर होते हैं यह क्या है ? सगुण की उपासना ही तो है। आजकलों निर्गुणवादियों में यह प्रवृत्ति अधिक प्रवल हो गई है। निर्गुणवादियो एक नवीन संप्र- दाय ने तो ईश्वर से मुंह मोड़कर खुल्लमखुल्ला गुरु को ही ईश्वर मान लिया है। चाहे जितना रूप बदला जाय. परन्तु यह भी पौराणिक सिद्धान्तों का हो अनुगमन है, क्योंकि वे कहते हैं:-

गुरु र्ब्रह्मा, गुरु र्विष्णुः गुरुदेव महेश्वरः,
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।

पन्द्रहवीं शताब्दी में मुसलमानों का प्रभाव भारतवर्ष पर बहुत पड़ रहा था। उनकी गज्य-सत्ता उस समय तो प्रवल थी ही उनके धर्म- याजक अथवा पीर भी अपने वर्म के विस्तार में तन, मन से निरत थे। इसलिये हिन्दू जाति पर उनके विचारों और भावों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ रहा था ! मुसलमान धर्म अवतारवाद, मूर्ति-पूजा और देववाद का कट्टर विरोधी है, और अपने विचारानुसार एकेरवरवाद का [ १९७ ]प्रवल प्रचारक । यही कारण है कि उस समय के कवोर साहब जैसे कुछ धम प्रचारकों को निर्गुणबाद का राग अलापते देखा जाता है। क्योकि समय उनकी अनुकूलता करता था और वे समय को गति पहचान कर स्वधर्म प्रचार में सफलता लाभ करने के कामुक थे। परन्तु सगुण-वाद का विरोधी होने पर भी वे कभी सन्तों को ईश्वर का स्वरूप कहतेथे और कभी गुरु को। कबीर साहव स्वयं कहते हैं:-

निराकार की आरसी साधों ही की देह।
लखा जो चाहै अलख को इनही में लखि लेह।
कबिरा ते नर अंध हैं गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रुटे नहिँ ठौर।
तीन लोक नौ खंड में गुरु ते बड़ा न कोय।
करता करै न करि सकै गुरू करै सो होय॥

यह क्या है ? रूपान्तर से सगुणवाद का प्रतिपादन है और प्रच्छन्न रूप से उस उद्देश्य का प्रति पालन है जिसको जननो पौराणिकता है।

इस शताब्दी में कुछ और ऐसे कवि हुये हैं जो कबीर साहब के पुत्र या शिष्य हैं, जैसे कमाल, भग्गूदास, धरमदास और श्रुति गोपाल । इन लोगों की रचनायें लगभग वैसी ही हैं जैसी पन्द्रहवीं शताब्दी की हिन्दी रचनायें अबतक उपस्थित की गई हैं। विषय भो इन लोगों का धार्मिक ही है। इसलिये इन लोगों की रचनाओं को लेकर कुछ विवेचन करना वाहुल्य मात्र होगा। चरणदास, दयासागर, और जय सागर जैन भी इसी शताब्दी में हुये हैं। परन्तु उनकी रचनायें भी लगभग वैसी ही हैं और समय के प्रवाहानुसार धर्म-सम्बन्धी ही हैं। इसलिये उनको भो छोड़ता हूं। हाँ-इस शताब्दी का एक दामो नामक कवि ऐसा है जिसने सामयिक प्रवाह के प्रतिकूल 'पदमावती' नामक प्रेम कहानी की रचना की है। उसके ग्रंथ की कुछ पंक्तियाँ ये हैं: [ १९८ ]

सुणौ कथा रसलीन विलास।
योगी मरण (अउर) बनवास।
पदमावती बहुत दुख सहई।
मेलो करि कवि दामो कहई।

इस पद्यकी भाषा प्राञ्जल है और वैसी ही है जैसा स्वरूप पन्द्रहवीं शताब्दी में हिन्दी को प्राप्त हुआ था। केवल 'सुणौ' शब्द राजस्थानी का है जो प्रान्तिक रचना होने के कारण उसमें आ गया।