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हिंदी साहित्य का इतिहास/आदिकाल- प्रकरण २ अपभ्रंश-काल (नाथ)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास  (1941) 
द्वारा रामचंद्र शुक्ल

[ १३ ] गोरखनाथ के नाथपंथ की मूल भी बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरखनाथ ( गोरक्षपा ) भी गिन लिए गए है । पर यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मार्ग अलग कर लिया । योगियों की इस हिंदूशाखा ने वज्रयानियों के अश्लील और बीभत्स विधान से अपने को अलग रखा, यद्यपि शिव-शक्ति की भावना के कारण कुछ शृंगारमयी वाणी भी नाथपंथ के किसी किसी ग्रंथ ( जैसे, शक्तिसंगम तंत्र ) में मिलती है । गोरख ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर-प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया । वज्रयानी सिद्धों का लीला-क्षेत्र भारत का पूरबी भाग था । गोरख ने अपने पंथ का प्रचार देश के पश्चिमी भागो मे--–राजपुताने और पंजाब में----किया । पंजाब में नमक के पहाड़ों के बीच बालनाथ योगी का स्थान बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा । जायसी की पद्मावत में "बालनाथ का टीला" आया है ।

गोरखनाथ के समय का ठीक पता नहीं । राहुल सांकृत्यायनजी ने वज्रयानी सिद्धो की परंपरा के बीच उनका जो स्थान रखा है, उसके अनुसार उनका समय विक्रम की दसवीं शताब्दी आता है । उनका आधार वज्रयानी सिद्धों की एक पुस्तक "रत्नाकर जोपम कथा" है, जिसके अनुसार मीननाथ के पुत्र मत्स्येद्रनाथ कामरूप के मछवाहे थे और चर्पटीपा के शिष्य होकर सिद्ध हुए थे । पर सिद्धो की अपनी सूची में सांकृत्यायनजी ने ही मत्स्येंद्र को जलंधर का शिष्य लिखा है, जो परंपरा से प्रसिद्ध चला आता है । गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ ( मछंदरनाथ ) थे, यह तो प्रसिद्ध ही है । सांकृत्यायनजी ने मीननाथ या मीनपा [ १४ ]को पालवंशी राजा देवपाल के समय में अर्थात् संवत् ९०० के आसपास माना है । यह समय उन्होले किस आधार पर स्थिर किया, पता नहीं । यदि सिद्धों की उक्त पुस्तक में मीनपा के राजा देवपाल के समय में होने का उल्लेख होता तो वे उस ओर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते । चौरासी सिद्धो के नामों में हेर-फेर होना बहुत संभव हैं । हो सकता है कि गोरक्षपा और चौरंगीपा के नाम पीछे से जुड़ गए हो और मीनपा से मत्स्येद्र का नाम-साम्य के अतिरिक्त, कोई संबंध न हो। ब्रह्मानंद ने दोनों को बिल्कुल अलग माना भी है ( सरस्वती भवन स्टडीज )। संदेह यह देखकर और भी होता है कि सिद्धों की नामावली में और रस सिद्ध की जाति और देश का उल्लेख है, पर गोरक्ष और चौरंगी का कोई विवरण नहीं। अतः गोरखनाथ का समय निश्चित रूप से विक्रम की १० वी शताब्दी मानते नहीं बनता ।

महाराष्ट्र संत ज्ञानदेव ने, जो अलाउद्दीन के समय ( सवत् १३५८ ) में थे, अपने को गोरखनाथ की शिष्य-परम्परा में कहा है। उन्होंने यह परंपरा इस क्रम में बताई है -

आदिनाथ, मत्येंद्रनाथ, गोरक्षनाथ, गैनोनाथ, निवृत्तिनाथ और ज्ञानेश्वर ।

इस महाराष्ट्र-परंपरा के अनुसार गोरखनाथ का समय महाराज पृथ्वीराज के पीछे आता है। नाथ-परंपरा में मत्स्येद्रनाथ के गुरु जलंधरनाथ माने जाते हैं। भोट के ग्रंथों में भी सिद्ध जलंधर आदिनाथ कहे गए हैं। सब बातों का विचार करने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जलंधर ने ही सिद्धों से अपनी परम्परा अलग की और पंजाब की ओर चले गए। वहाँ काँगड़े की पहाडियों तथा और स्थानों में रमते रहे। पंजाब का जलंधर शहर उन्हीं का स्मारक जान पड़ता है। नाथ संप्रदाय के किसी ग्रंथ में जलंधर को बालनाथ भी कहा है । नमक के पहाड़ों के बीच ‘बालनाथ का टीला' बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। मत्स्येन्द्र जलंधर के शिष्य थे, नाथपंथियों की यह धारणा ठीक जान पड़ती है। मीनपा के गुरु चर्पटीनाथ हो सकते हैं, पर मत्स्येंद्र के गुरु जलंधर ही थे । सांकृत्यायन जी ने गोरख का जो समय स्थिर किया है, वह मीनपा का राजा देवपाल का समसामयिक और मत्स्येंद्र का पिता मानकर । मत्स्येंद्र का मीनपा से कोई संबंध न रहने पर उक्त समय मानने का कोई आधार नहीं रह जाता और पृथ्वी[ १५ ]राज के समय के आसपास ही- विशेषतः कुछ पीछे-गोरखनाथ के होने का अनुमान दृढ़ होता है।

जिस प्रकार सिद्धों की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है, उसी प्रकार नाथो की संख्या नौ। अब भी लोग 'नवनाथ' और 'चौरासी सिद्ध' कहते सुने जाते हैं। ‘गोरक्ष सिद्धांतसंग्रह' में मार्ग प्रवर्तको के ये नाम गिनाए गए हैं:-

नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चंद्र, सत्यनाथ, भीमनाथ, गोरक्षनाथ, चर्पट, जलंधर और मलयार्जुन ।

इन नामों में नागार्जुन, चर्पट और जलंधर सिद्धो की परंपरा में भी है । नागार्जुन (सं० ७०२) प्रसिद्ध रसायनी भी थे । नाथपंथ में रसायन की सिद्धि है । नाथपंथ सिद्धों की परंपरा से ही छटकर निकला है, इसमें कोई संदेह नहीं।

इतिहास से इस बात का पता लगता है कि महमूद गजनवी के भी कुछ पहले सिंध और मुलतान में कुछ मुसलमान बस गए थे जिनमें कुछ सूफी भी थे । बहुत से सूफियों ने भारतीय योगियों से प्राणायाम आदि की क्रियाएँ सीखीं, इसका उल्लेख मिलता है । अतः गोरखनाथ चाहे विक्रम की १०वीं शताब्दी में हुए हों चाहे १३वीं में, उनका मुसलमानों से परिचित होना अच्छी तरह मानी जा सकती है; क्योंकि जैसा कहा जा चुका है, उन्होने अपने पंथ का प्रचार पंजाब और राजपूताने की ओर किया ।

इतिहास और जनश्रुति से इस बात का पता लगता है कि सूफी फकीरों और पीरो के द्वारा इसलाम को जनप्रिय बनाने का उद्योग भारत में बहुत दिनो तक चलता रहा । पृथ्वीराज के पिता के समय में ख्वाजा मुईनुद्दीन के अजमेर आने और अपनी सिद्धि का प्रभाव दिखाने के गीत मुसलमानों में अब तक गाए जाते हैं । चमत्कारों पर विश्वास करनेवाली भोली-भाली जनता के बीच अपना प्रभाव फैलाने में इन पीरो और फकीरो को सिद्धों और योगियों से मुकाबला करना पड़ा जिनका प्रभाव पहले से जमा चला आ रहा था । भारतीय मुसलमानों के बीच, विशेषतः सूफियों की परम्परा में, ऐसी अनेक कहानियाँ चली जिनमें किसी पीर ने किसी सिद्ध या योगी को करामात में पछाड़ दिया । कई योगियों के साथ ख्वाजा मुईनुद्दीन का भी ऐसा ही करामाती दंगल कहा जाता है । [ १६ ]उपर कहा जा चुका है कि गोरखनाथ की हठयोग-साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी अतः उसमें मुसलमानों के लिये भी आकर्षण था । ईश्वर से मिलाने वाला योग हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिये एक सामान्य साधना के रूप में आगे रखा जा सकता है, यह बात गोरखनाथ को दिखाई पड़ी थी। उसमें मुसलमानों को अप्रिय मूर्तिपूजा और बहुदेवोपासना की आवश्यकता न थी । अतः उन्होंने दोनों के विद्वेश-भाव को दूर करके साधना का एक सामान्य मार्ग निकालने की संभावना समझी थी और वे उसका संस्कार अपनी शिष्य-परंपरा में छोड गए थे । नाथसंप्रदाय के सिद्धांत-ग्रंथो में ईश्वरोपासना के बाह्य विधान के प्रति उपेक्षा प्रकट की गई है, घट के भीतर ही ईश्वर को प्राप्त करने पर जोर दिया गया है, वेद शास्त्र का अध्ययन व्यर्थ ठहराकर विद्वानों के प्रति अश्रद्धा प्रकट की गई है, तीर्थाटन आदि निष्फल कहे गए हैं।

१. योगशास्त्र पठेन्नित्यं किमन्यैः शास्त्र-विस्तरैः ।
२. न वेदो वेद इत्याहुर्वेदा वेदो निगद्यते ।
परमात्मा विद्यते येन स वेदो वेद उच्यते ।
न संध्या संधिरित्याहुः संध्या संधिर्निगद्यते ।
सुषुम्णा संधिमः प्राणः सा संध्या सधिरुच्यते ।।}}

अंतस्साधना के वर्णन में हृदय दर्पण कहा गया है जिसमें आत्मा के स्वरूप का प्रतिबिंब पड़ता है-

३. हृदयं दर्पणं यस्य मनस्तत्र विलोकयेत् ।
दृश्यते प्रतिबिंबेन आत्मरूपं सुनिश्चितम् ।।

परमात्मा की अनिर्वचनीयता इस ढंग से बताई गई है-

शिवं न जानामि कथं वदामि । शिव च जानामि कथं वदामि ॥

इसके संबंध में सिद्ध लुहिपा भी कह गए हैं---

भाव न होइ, अभाव न होइ । अइस संबोहे को पतिआइ ?

'नाद' और 'बिंदु' संज्ञाएँ वज्रयान सिद्धों में बराबर चलती रही । गोरखसिद्धांत में उनकी व्याख्या इस प्रकार की गई है--[ १७ ]नाथाशो नादो, नादाशः प्राणः शक्त्यशो बिंदु, विन्दोराश: शरीरम् ।  

--गोरक्षसिद्भातसंग्रह

(गोपीनाथकविराज संपादित)

'नाद’ और ‘बिंदु' के योग से जगत् की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोगी दोनो मानते थे।

तीर्थाटन के संबंध में जो भाव सिद्धो का था वहीं हठयोगियों का भी रहा। ‘चित्तशोधन प्रकरण' में वज्रयानी सिद्ध आर्यदेव ( कर्णरीपा ) का वचन है-

प्रतरन्नपि गंगायां नैव श्वा शुद्धिमर्हति।

तस्माद्धर्मधिया पुंसां तीर्थस्नानं तु निष्फलम्॥
धर्मो यदि भवेत् स्नानात् कैवचनां कृतार्थता।
नक्तं दिवं प्रविष्टाना मत्स्यादीनां तु का कथा॥

जनता के बीच इस प्रकार के भाव क्रमशः ऐसे गीतो के रूप में निर्गुणपंथी संतों द्वारा आगे भी बराबर फैलते रहे, जैसे-

गंगा के नहाए कहो को नर तरिगे, मछरी न तरी, जाको पानी में घर है॥

यहाँ पर यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि ८४ सिद्धों में बहुत से मछुए, चमार, धोवी, डोम, कहार, लकड़हारे, दरजी तथा और बहुत से शूद्र कहे जाने वाले लोग थे । अतः जाति-पाँति के खंडन तो वे आप ही थे । नाथसंप्रदाय भी जब फैला तब उसमे भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों के बहुत से लोग आए जो शास्त्रज्ञान-संपन्न न थे, जिनकी बुद्धि का विकास बहुत सामान्य कोटि का था[१]। पर अपने को रहस्यदर्शी 'प्रदर्शित करने के लिये शास्त्रज्ञ पंडितो' और विद्वानो को फटकारना भी'वे'जरूरी समझते थे ।' सद्गुरु का माहात्म्य सिद्धों में भी और उनमें भी बहुत अधिक थीं।" ।

नाथ-पंथ के जोगी कान की लौ में बड़े बड़े छेद करके स्फटिक के भारी भारी कुंडल पहनते हैं, इससे कनफटे कहालते हैं। जैसा पहले कहा जा चुका [ १८ ]है। इस पंथ का प्रचार राजपूताने तथा पंजाब की ओर ही अधिक रहा। अतः जब मत के प्रचार के लिये इस पंथ में भाषा के भी ग्रंथ लिखे गए तब उधर की ही प्रचलित भाषा का व्यवहार किया गया। उन्हें मुसलमानों को भी अपनी बानी सुनानी रहती थी जिनकी बोली अधिकतर दिल्ली के आसपास की खड़ी बोली थी। इससे उसका मेल भी उनकी बानियों में अधिकतर रहता था। इस प्रकार नाथ-पंथ के इन जोगियों ने परंपरागत साहित्य की भाषा या काव्यभाषा से, जिसका ढाँचा नागर-अपभ्रंश या ब्रज का था, अलग एक सधुक्कड़ी भाषा का सहारा लिया जिसका ढाँचा कुछ खड़ी बोली लिए राजस्थानी था। देशभाषा की इन पुस्तकों में पूजा, तीर्थाटन आदि के साथ साथ हज, नमाज आदि का भी उल्लेख पाया जाता है। इस प्रकार की एक पुस्तक का नाम है। 'काफिरबोध'।[२]

नाथपंथ के उपदेशों का प्रभाव हिंदुओं के अतिरिक्त मुसलमानों पर भी प्रारंभकाल में ही पड़ा। बहुत से मुसलमान, निम्न श्रेणी के ही सही, नाथ-पंथ में आए। अब भी इस प्रदेश में बहुत से मुसलमान जोगी गेरुआ वस्त्र पहने गुदड़ी की लंबी झोली लटकाए, सारंगी बजा बजाकर 'कलि में अमर राजा भरथरी' के गीत गाते फिरते हैं और पूछने पर गोरखनाथ को अपना आदिगुरु बताते हैं। ये राजा गोपीचंद के भी गीत गाते हैं जो बंगाल में चटिगाँव के राजा थे और जिनकी माता मैनावती कहीं गोरख की शिष्या और कहीं जलंधर की शिष्या कही गईं हैं।

देशभाषा में लिखी गोरखपंथ की पुस्तकें गद्य और पद्य दोनों में हैं और विक्रम संवत् १४०० के आसपास की रचनाएँ हैं। इनमें सांप्रदायिक शिक्षा है। जो पुस्तकें पाई गई हैं उनके नाम ये हैं-गोरख-बोध, गोष्ठी, महादेव-गोरख संवाद, गोरखनाथ जी की सत्रह कला, गोरखबोध, दत्त-गोरख-संवाद, योगेश्वरी साखी, नरवइ बोध, विराट पुराण, गोरखसार, गोरखनाथ की बानी। ये सब ग्रंथ गोरख के नहीं, उनके अनुयायी शिष्यो के रचे हैं। गोरख के समय में जो [ १९ ]भाषा लिखने-पढ़ने में व्यवहृत होती थी उसमें प्राकृत या अपभ्रंश शब्दों का थोड़ा या बहुत मेल अवश्य रहता था | उपयुक्त पुस्तकों में नरवइ बोध' के नाम (नरवइ = नरपति ) में ही अपभ्रंश का आभास है । इन पुस्तकों में अधिकतर संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद हैं। यह बात उनकी भाषा के ढंग से ही प्रकट होती है । ‘विराट् पुराण’ संस्कृत के 'वैराट पुराण' का अनुवाद है। गोरखपथ के ये संस्कृत ग्रंथ पाए जाते हैं-

सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति, विवेक-मार्तड, शक्ति-संगम तंत्र, निरंजन पुराण, वैराट पुराण'।

हिंदी भाषा में लिखी पुस्तके अधिकतर इन्हीं के अनुवाद या सार हैं। हाँ, 'साखी’ और ‘बानी' में शायद कुछ रचना गोरख की हो । पद को एक नमूना देखिए-

स्वामी तुम्हई गुर गोसाईं । अम्हे जो सिव सबद एक बुझिवा ।।

निरारंवे चेला कृण विधि रहै। सतगुरु होइ स पुछया कहै ।।

अबधू रहिया हाटे बाटै रूप विरष की छाया ।

तजिवा काम क्रोध लोभ मोह संसार की माया ।।

सिद्व और योगियों का इतना वर्णन करके इस बात की ओर, ध्यान दिलाना हम आवश्यक समझते है कि उनकी रचनाएँ तात्रिक विधान, योगसाधना, आत्मनिग्रह, श्वास-निरोध, भीतरी चक्रो और नाड़ियों की स्थिति, अंतर्मुख साधना के महत्व इत्यादि की साप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, जीवन की स्वाभाविक अनुभूतियों और दशाओं से उनका कोई संबंध नहीं । अतः वे शद्ध साहित्य के अंतर्गत नही आतीं । उनको उसी रूप में ग्रहण करना चाहिए जिस रूप में ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ग्रंथ । उनका वर्णन यह केवल दो-बातों के विचार से किया गया है ।

(१) पहली बात है भाषा । सिद्धो की उद्धृत रचनाओं की भाषा देशभाषा मिश्रित अपभ्रश अर्थात् पुरानी हिंदी की काव्य-भाषा है, यह तो स्पष्ट है । उन्होंने भरसक उसी सर्वमान्य व्यापक काव्य-भाषा में लिखा है जो उस समय गुजरात, राजपूताने और ब्रजमंडल से लेकर बिहार तक लिखने [ २० ]पढ़ने की शिष्ट भाषा थी। पर साध में रहने के कारण सिद्धों की भाषा में कुछ पूरबी प्रयोग भी ( जैसे, भइले, बूड़िलि ) मिले हुए है । पुरानी हिंदी की व्यापक काव्य-भाषा का ढॉचा शौरसेनी-प्रसूत अपन्नश अर्थात् ब्रज और खड़ी बोली ( पच्छिमी हिंदी ) का था। वहीं ढाँचा हम उद्धृत, रचनाओं के-

जो, सो, मारिआ, पइठो, जाअ, किंजई, करंत, जावे ( जब तक ), ताब ( तव तक ) भइअ, कोइ, इत्यादि प्रयोग से पाते है । ये प्रयोग मागधी-प्रसूत पुरानी बँगला के नहीं; शौरसेनी-प्रसूत पुरानी पच्छिमी हिंदी के है । सिद्ध कण्हपा की रचनाओं को यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो एक बात साफ झलकती है । वह यह कि उनकी उपदेश की भाषा तो पुरानी टकसाली हिंदी ( काव्य-भाषा ) है, पर गीतो की भाषा पुरानी बिहारी या पूरबी बोली मिली है । यही भेद हम आगे चलकर कबीर की ‘साखी और मैनी’ ( गीत ) की भाषा में पीते है । ‘साखी की भाषा तो खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य “सधुक्कड़ी' भाषा है, पर रमैनी के पदों की भाषा मे काव्य की ब्रजभाषा और कंही कहीं पूरबी बोली भी है।

सिद्धों में 'सरह' सबसे पुराने अर्थात् वि० सं० ६६० के है । अतः हिंदी काव्य-भाषा के पुराने रूप को पता हमे विक्रम की सातवी शताब्दी के अंतिम चरण-से लगता है।

(२) दूसरी बात है सांप्रदायिक प्रवृति और उसके संस्कार की परम्परा । वज्रयानी सिद्धों ने निम्न श्रेणी की प्रायः अशिक्षित जनता के बीच किस प्रकार के भावों के लिये जगह निकाली, यह दिखाया जा चुका है उन्होने बाह्य पूजा, जाति-पाति, तिर्थांटन इत्यादि के प्रति उपेक्षा-बुद्धि का प्रचार किया; रहस्यदर्शी बनकर शास्त्रज्ञ विद्वानों का तिरस्कार करने और मनमाने रूपको के द्वारा अटपटी बानी में पहेलियाँ बुझाने का रास्ता दिखाया, घट के भीतर चक्र, नाड़ियों, शून्य देश आदि मानकर साधना करने की बात फैलाई और नाद, बिंदु, सुरति, निरति’ ऐसे शब्दो की उद्धरणी करना सिखाया। यही परंपरा अपने ढंग पर नाथपंथियो ने भी जारी रखी। आगे चलकर भक्तिकाल में निगुण संत संप्रदाय किस प्रकार वेदांत के ज्ञानवाद, सूफियों के प्रेमवाद तथा [ २१ ]वैष्णवों के अहिंसावाद और प्रपत्तिवाद को मिलाकर सिद्धों और योगियों द्वारा बनाए हुए इस रास्ते पर चल पड़ा, यह आगे दिखाया जायगा। कबीर आदि संतों को नाथपंथियों से जिस प्रकार 'साखी' और 'बानी' शब्द मिले, उसी प्रकार ‘साखी’ और ‘बानी' के लिये बहुत कुछ सामग्री और 'सधुक्कड़ी' की  भाषा भी।

ये ही दो बातें दिखाने के लिये इस इतिहास में सिद्धों और योगियों का विवरण दिया गया है। उनकी रचनाओं को जीवन की स्वाभाविक सरणियों, अनुभूतियों और दशाओं से कोई संबंध नहीं। वे सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, अतः शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकतीं। उन रचनाओं की परंपरा को हम काव्य या साहित्य की कोई धारा नहीं कह सकते। अतः धर्म संबंधी रचनाओं की चर्चा छोड़, अब हम सामान्य साहित्य की जो कुछ सामग्री मिलती है, उसका उल्लेख उनके संग्रहकर्त्ताओं और रचयिताओं के क्रम से करते हैं।

  1. The system of mystic culture introduced by Gorakhnath does not seem to have spread widely through the educated classes.
  2. -यह, तथा इसी प्रकार की और कुछ पुस्तकें, मेरे प्रिय शिष्य डाक्टर पीतांबरदत्त बड़थ्वाल के पास हैं।