हिंदी साहित्य का इतिहास/भक्तिकाल- प्रकरण ६ फुटकल कवि (रहीम)

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हिन्दी साहित्य का इतिहास  (1941) 
द्वारा रामचंद्र शुक्ल

[ २१६ ] (१५) रहीम (अब्दुर्रहीम खानखानाँ)—ये अकबर बादशाह के अभिभावक प्रसिद्ध मोगल सरदार बैरमखाँ खानखानाँ के पुत्र थे। इनका जन्म संवत् १६१० मे हुआ। ये संस्कृत, अरबी और फारसी के पूर्ण विद्वान् और हिंदी काव्य के पूर्ण मर्मज्ञ कवि थे। ये दानी और परोपकारी ऐसे थे कि अपने समय के कर्ण माने जाते थे। इनकी दानशीलता हृदय की सच्ची प्रेरणा के रूप में थी, कीर्ति की कामना से उसका कोई संपर्क न था। इनकी सभा विद्वानों और कवियों से सदा भरी रहती थी। गंग कवि को इन्होंने एक बार छत्तीस लाख रुपए दे डाले थे। अकबर के समय में ये प्रधान सेना-नायक और मंत्री थे और अनेक बड़े बड़े युद्धो में भेजे गए थे।

ये जहाँगीर के समय तक वर्तमान रहे। लड़ाई में धोखा देने के अपराध में एक बार जहाँगीर के समय में इनकी सारी जागीर जब्त हो गई और ये कैद कर लिए गए। कैद से छूटने पर इनकी आर्थिक अवस्था कुछ दिनों तक बड़ी हीन रही। पर जिस मनुष्य ने करोड़ों रुपए दान कर दिए, जिसके यहाँ से कोई विमुख न लौटा उसका पीछा याचको से कैसे छूट सकता था, अपनी दरिद्रता का दुःख वास्तव में इन्हें उसी समय होता था जिस समय इनके पास कोई याचक जा पहुँचता और ये उसकी यथेष्ट सहायता नहीं कर सकते थे। अपनी अवस्था के अनुभव की व्यंजना इन्होंने इस दोहे में की है-

तबहीं लौं जीबो भलो दैबौ होय न धीम।
जग में रहिबो कुंचित गति उचित न होय रहीम॥

संपत्ति के समय में जो लोग सदा घेरे रहते हैं विपद आने पर उनमें से अधिकांश किनारा खींचते हैं, इस बात का द्योतक यह दोहा है-

ये रहीम दर दर फिरैं, माँगि मधुकरी खाहिँ।
यारों यारी छाँड़िए, अब रहीम वे नाहिँ॥

[ २१७ ]कहते हैं कि इसी दीन दशा में इन्हें एक याचक ने आ घेरा। इन्होंने यह दोहा लिखकर उसे रीवाँ-नरेश के पास भेजा-

चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध-नरेस।
जापर विपदा परति है सो आवत यहि दैस॥

रीवाँ-नरेश ने उस याचक को एक लाख रुपए दिए।

गो॰ तुलसीदासजी से भी इनका बड़ा स्नेह था। ऐसी जनश्रुति है कि एक बार एक ब्राहाण अपनी कन्या के विवाह के लिये धन न होने से घबराया हुआ गोस्वामीजी के पास आया। गोस्वामीजी ने उसे रहीम के पास भेजा और दोहे की यह पंक्ति लिखकर दे दी-

सुरतिय नरतिय नागतिय यह चाहत सब कोय।

रहीम ने उस ब्राह्मण को बहुत सा द्रव्य देकर विदा किया और दोहे की दूसरी पंक्ति इस प्रकार पूरी करके दे दी-

गोद लिए हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय॥

रहीम ने बड़ी-बड़ी चढाइयाँ की थीं और मोगल-साम्राज्य के लिये न जाने कितने प्रदेश जीते थे। इन्हें जागीर में बहुत बड़े बड़े सूबे और गढ़ मिले थे। संसार का इन्हें बड़ा गहरा अनुभव था। ऐसे अनुभवों के मार्मिक पक्ष को ग्रहण करने की भावुकता इनमें अद्वितीय थी। अपने उदार और ऊँचे हृदय को संसार के वास्तविक व्यवहारों के बीच रखकर जो संवेदना इन्होंने प्राप्त की है। उसी की व्यंजना अपने दोहे में की है। तुलसी के वचनों के समान रहीम के वचन भी हिंदी-भाषी भूभाग में सर्वसाधारण के मुँह पर रहते हैं। इसका कारण है जीवन की सच्ची परिस्थतियों का मार्मिक अनुभव। रहीम के दोहे वृंद और गिरधर के पद्यों के समान कोरी नीति के पद्य नहीं हैं। उनमें मार्मिकता है, उनके भीतर से एक सच्चा हृदय झाँक रहा है। जीवन की सच्ची परिस्थतियों के मार्मिक रूप को ग्रहण करने की क्षमता जिस कवि में होगी वही जनता का प्यारा कवि होगा। रहीम का हृदय, द्रवीभूत होने के लिये, कल्पना की उड़ान की अपेक्षा नहीं रखता था। वह संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों में ही अपने द्रवीभूत होने लिये पर्य्याप्त स्वरूप पा जाता था। 'बरवै नायिका-भेद' [ २१८ ] में भी जो मनोहर और छलकाते हुए चित्र हैं वे भी सच्चे हैं-कल्पना के झूठे खेल नहीं है। उनमें भारतीय प्रेम-जीवन की सच्ची झलक है।

भाषा पर तुलसी का सा ही अधिकार हम रहीम का भी पाते हैं। ये ब्रज और अवधी-पच्छिमी और पूरबी–दोनों काव्य-भाषाओं में समान कुशल थे। 'बरवै नायिका भेद' बड़ी सुंदर अवधी भाषा में हैं। इनकी उक्तियाँ ऐसी लुभावनी हुई कि बिहारी आदि परवर्ती कवि भी बहुत का अपहरण करने का लोभ न रोक सके। यद्यपि रहिम सर्वसाधारण में अपने दोहों के लिये ही प्रसिद्ध है पर इन्होंने बरवै, कवित्त, सवैया, सोरठा, पद-सब में थोड़ी-बहुत रचना की है।

रहीम का देहावसान संवत् १६८३ में हुआ। अब तक इनके निम्नलिखित ग्रंथ ही सुने जाते थे-रहीम दोहावली या सतसई, बरवै नायिका-भेद, शृंगार सोरठ, मदनाष्टक, रासपंचाध्यायी। पर भरतपुर के श्रीयुत पंडित मयाशंकरजी याज्ञिक ने इनकी और भी रचनाओं का पता लगाया है-जैसे नगर-शोभा, फुटकले बरवै, फुटकल कवित्त सवैये-और रहीमम का एक पूरा संग्रह 'रहीम-रत्नावली' के नाम से निकाला है।

कहा जा चुका है कि ये कई भाषाओं और विद्याओं में पारंगत थे। इन्होंने फारसी का एक दीवान भी बनाया था और "वाक्आत-बाबरी" का तुर्की से फारसी में अनुवाद किया था। कुछ मिश्रित रचना भी इन्होंने की है-'रहीम-काव्य' हिंदी-संस्कृत की खिचड़ी है। और 'खेट कौतुम्' नामक ज्योतिष का ग्रंथ संस्कृत और फारसी की खिचड़ी है। कुछ संस्कृत श्लोकों की रचना भी ये कर गए हैं। इनकी रचना के कुछ नमूने दिए जाते है-

(सतसई या, दोहावली से)

दुरदिन परे रहीम कह, भूलत सब पहिचानि।
सोच नहीं हित-हानि को, जौ न होय हित-हानि॥
कोउ रहीम जनि काहु के द्वार गए पछिताय।
संपति के सत्र जात हैं, बिपति सबै लै जाय॥

[ २१९ ]

ज्यों रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगै, बड़े अँधेरो होय॥
सर सूखे पंछी उड़ैं, औरे सरन समाहिं।
दीन मीन बिन पंख के कहु रहीम कहँ जाहिं॥
माँगत मुकरि न को गयो, केहि न त्यागियो साथ?
माँगत आगे सुख लह्यौ ते रहीम रघुनाथ॥
रहिमन वे नर मरि चुके जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए जिन मुख निकसत "नाहिं"॥
रहिमन रहिला की भली, जो परसै चित लाय।
परसत मन मैलो करै, सो मैदा जरि जाय॥


(बरबै नायिका-भेद से)

भोरहिं बोलि कोइलिया बढेवति ताप। घरी एक भरि अलिया! रहु चुपचाप॥
बाहर लैकै दियवा बारन जाइ। सासु ननद घर पहुँचत देति बुझाइ॥
पिय आवत अँगनैया उठिकै लीन। विहँसत चतुर तिरियवा बैठक दीन॥
लै कै सुघर खुरपिया पिय के साथ। छडबै एक छतरिया बरसत पाथ॥
पीतम एक सुमरिनियाँ मोहिं देइ जाहु। जेहि जपि तोर बिरहवा करब निबाहु॥


(मदनाष्टक से)

कलित ललित माल वा जवाहिर जडा था। चपल-चखन-वाला चांदनी में खड़ा था॥
कटितट बिच मेला पीत सेला नवेला। अलि, बन अलबेला यार मेरा अकेला॥


(नगर-शोभा से)

उत्तम जाति है बाम्हनी, देखत चित्त लुभाय।
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय॥
रूपरंग रतिराज में, छतरानी इतरान।
मानौ रची बिरंचि पचि, कुसुम-कनक में सान॥

[ २२० ]

बनियाइनि बनि आरकै, बैठि रुप की हाट।
पेम पेक तन हेरिकै, गरुवै टारति बाट॥
गरब तराजू करति चख, भौंह मोरि मुसकाति।
डाँडी मारति बिरह की, चित चिंता घटि जाति॥


(फुटकल कवित्त आदि से)

बड़न सो जान पहचान कै रहीम कहा,
जो पै करतार ही न सुख देनहार हैं।
सीतहर सूरज सों नेह कियो याहि हेत,
ताहू पै कमल जारि ढारत तुषार है॥
छीरनिधि माहिं धँस्यो संकर के सीस बस्यो,
तऊ ना कलंक नस्यों, ससि में सदा रहें।
बड़ो रिझवार या चकोर दरबार है, पै,
कलानिधि-यार तऊ चाखत अँगार है॥


जाति हुती सखि गोहन में मनमोहन को लखि हीं ललचानो।
नागरि नारि नई ब्रज की उनहूँ नंदलाल की रीझिबो जानो॥
जाति भई फिरि कै चितई, तब भाव रहीम यहै उर आनो।
ज्यों कमनैत दमानक में फिरि तीर सों मारि लै जात निसानो॥


कमलदल नैनन की उनमानि।
बिसरति नाहिं, सखी! मो मन तें मंद मंद मुसकानि।
बसुधा की बस करी मधुरता, सुधापगी बतरानि॥
मढी रहै चित उर बिसाल की मुकुतामल यहरानि।
नृत्य समय पीताँबर हू की फहर फहर फहरानि॥
अनुदिन श्रीवृंदावन ब्रज तें आवत आवन जानि।
अब रहीम चित ते न टरति है सकल स्याम की बानि॥

[ २२१ ](१६) कादिर––कादिरबख्श पिहानी जिला हरदोई के रहनेवाले और सैयद इब्राहीम के शिष्य थे। इनका जन्म सं० १६३५ में माना जाता है अतः इनका कविता काल सं० १६६० के आसपास समझा जा सकता है। इनकी कोई पुस्तक तो नहीं मिलती पर फुटकल कवित्त पाए जाते हैं। कविता ये चलती भाषा में अच्छी करते थे। इनका यह कवित्त लोगों के मुँह से बहुत सुनने में आता है––

गुन को न पूछै कोऊ, औगुन की बात पूछै,
कहा भयो दई! कलिकाल यों खरानो है।
पोथी औ पुरान-ज्ञान ठट्टन में डारि देत,
चुगुल चबाइन को मान ठहरानो है॥
कादिर कहत यासों कछु कहिबे को नाहिं,
जगत की रीत देखि चुप मन मानो है।
खोलि देखौ हियौ सब ओरन सो भाँति भाँति,
गुन ना हिरानो, गुनगाहक हिरानो है॥

(१७) मुबारक––सैयद मुबारक अली बिलग्रामी का जन्म सं० १६४० में हुआ था, अतः इनका कविताकाल सं० १६७० के पीछे मानना चाहिए।

ये संस्कृत, फारसी और अरबी के अच्छे पंडित और हिंदी के सहृदय कवि थे। जान पड़ता है, ये केवल शृंगार की ही कविता करते थे। इन्होंने नायिका के अंगों का वर्णन बड़े विस्तार से किया है। कहा जाता है कि दस अंगों को लेकर इन्होंने एक एक अंग पर सौ सौ दोहे बनाए थे। इनका प्राप्त ग्रंथ "अलक-शतक और तिल-शतक" उन्हीं के अंतर्गत है। इन दोहो के अतिरिक्त इनके बहुत से कवित्त सवैये संग्रह-ग्रंथों में पाए जाते और लोगों के मुँह से सुने जाते हैं। इनकी उत्प्रेक्षा बहुत बढ़ी चढ़ी होती थी और वर्णन के उत्कर्ष के लिये कभी कभी ये बहुत दूर तक बढ़ जाते थे। कुछ नमूने देखिए––

(अलक-शतक और तिल-शतक से)

परी मुबारक तिय-बदन अलक ओट अति होय।
मनो चंद की गोद में रही निसा सी सोय॥

[ २२२ ]

चिबुक-कृप में मन परयो छवि-जल तृषा विचारि।
कढति मुबारक ताहि तिय अलक-टोरि सी ढारी॥
चिबुक कृप रसरी-अलक, तिल सु चरस, दृग बैल।
बारी बैस सिंगार को, सींचत मनमथ-छैल॥


(फुटकल से)

कनक-बरन वाल, नगन-लसत भाल,
मोतिन के माल उर सोहैं भली भाँति है।
चंदन चढाय चारु चंद्रमुखी मोहनी सी,
प्रात ही अन्हाय पग धारे मुसकाति है॥
चुनरी विचित्र स्याम सजि कै मुबारकजू,
ढाँकि नखसिख तें निपट सकुचानि है।
चंद्रमै लपेटि कै, समेटि कै नखत मानो,
दिन को प्रनाम किए राति चली जाति है॥

(१८) बनारसीदास––ये जौनपुर के रहने वाले एक जैन जौहरी थे जो आमेर में भी रहा करते थे। इनके पिता का नाम खड़गसेन था। ये संवत् १६४३ में उत्पन्न हुए थे। इन्होंने संवत् १६९८ तक का अपना जीवनवृत्त अर्द्धकथानक नामक ग्रंथ में दिया है। पुराने हिंदी-साहित्य में यही एक आत्म-चरित मिलता है, इससे इसका महत्त्व बहुत अधिक है। इस ग्रंथ से पता चलता है कि युवावस्था में इनका आचरण अच्छा न था और इन्हें कुष्ठ रोग भी हो गया था। पर पीछे ये सँभल गए। ये पहले शृंगाररस की कविता किया करते थे पर पीछे ज्ञान हो जाने पर इन्होंने वे सब कविताएँ गोमती नदी में फेंक दीं और ज्ञानोपदेशपूर्ण कविताएँ करने लगे। कुछ उपदेश इनके ब्रजभाषा-गद्य में भी हैं। इन्होंने जैनधर्म-संबंधी अनेक पुस्तको के सारांश हिंदी में कहे है। अब तक इनकी बनाई इतनी पुस्तकों का पता चला है––

बनारसी-बिलास (फुटकल कवित्तों का संग्रह), नाटक-समयसार (कुंद-कंदाचार्यकृत ग्रंथ का सार), नाममाला (कोश); अर्द्धकथानक, बनारसी–– [ २२३ ]पद्धति, मोक्षपदी, ध्रुववंदना, कल्याणमंदिर भाषा, वेदनिर्णय पंचाशिका, मारगन विद्या।

इनकी रचना शैली पुष्ट हैं और इनकी कविता दादूपंथी सुंदरदासजी की कविता से मिलती जुलती हैं। कुछ उदाहरण लीजिए––

भोदू! ते हिरदय की आँखें।
जे सरबैं अपनी सुख-संपति भ्रम की संपति भाखैं।
जिन आँखिन सों निरखि भेद गुंन ज्ञानी ज्ञान विचारैं॥
जिन आँखिनं सों लखि सरूप मुनि ध्यान धारना धारैं॥


काया सों विचार प्रीति, माया ही में हार जीति,
लिए हठ रीति जैसे हारिल की लकरी।
चंगुल के जोर जैसे गोह गहि रहे भूमि,
त्यौंही पायँ गाडैं पै न छाँडै टेक पकरी॥
मोह की मरोर सों मरम को न ठौर पावैं,
धावैं चहुँ ओर ज्यों बढ़ावैं जाल मकरी।
ऐसी दुरबुद्धि भूलि, भूठ के झरोखे भूलि,
फूली फिरै ममता जँजीरन सों जकरी॥