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नव-निधि/पछतावा

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नव-निधि  (१९४८) 
द्वारा प्रेमचंद

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पण्डित दुर्गानाथ जब कालेज से निकले तो उन्हें जीवन-निर्वाह की चिन्ता उपस्थित हुई। वे दयालु और धार्मिक थे। इच्छा थी कि ऐसा काम करना चाहिए जिससे अपना जीवन भी साधारणतः सुखपूर्वक व्यतीत हो और दूसरों के साथ भलाई और सदाचरण का भी अवसर मिले। वे सोचने लगे- यदि किसी कार्यालय में क्लर्क बन जाऊँ तो अपना निर्वाह हो सकता है, किन्तु सर्वसाधारण से कुछ भी सम्बन्ध न रहेगा। वकालत में प्रविष्ट हो जाऊँ तो दोनों बातें सम्भव है, किन्तु अनेकानेक यत्न करने पर भी अपने को पवित्र रखना कठिन होगा। पुलिस-विभाग में दीन-पालन और परोपकार के लिए बहुत से अवसर मिलते रहते हैं; किन्तु एक स्वतंत्र और सद्विचार-प्रिय मनुष्य के लिए वहाँ की हवा हानिप्रद है। शासन-विभाग में नियम और नीतियों की भरमार रहती है। कितना ही चाहो पर वहाँ कड़ाई और डाँट-डपट से बचे रहना असम्भव है। इसी प्रकार बहुत सोच-विचार के पश्चात् उन्होंने निश्चय किया कि किसी ज़मींदार के यहाँ'मुख्तार आम' बन जाना चाहिए। वेतन तो अवश्य कम मिलेगा ; किन्तु दीनखेतिहरों से रात-दिन संबन्ध रहेगा, उनके साथ सद्व्यहार का अवसर मिलेगा। साधारण जीवन-निर्वाह होगा और विचार दृढ़ होंगे।


कुँअर विशालसिंहजी एक सम्पत्तिशाली ज़मींदार थे। पं० दुर्गानाथ ने उनके पास जाकर प्रार्थना की कि मुझे भी अपनी सेवा में रखकर कृतार्थ कीजिए। कुँअर साहब ने इन्हें सिर से पैर तक देखा और कहा-पण्डितजी, आपको अपने यहाँ रखने में मुझे बड़ी प्रसन्नता होती, किन्तु आपके योग्य मेरे यहाँ कोई स्थान नहीं देख पड़ता।


दुर्गानाथ ने कहा-मेरे लिए किसी विशेष स्थान की प्रावश्यकता नहीं है। मैं हर एक काम कर सकता हूँ। वेतन आप जो कुछ प्रसन्नतापूर्वक देंगे, मैं स्वीकार करूँगा। मैंने तो यह संकल्प कर लिया है कि सिवा किसी रईस के और
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किसी की नौकरी न करूँगा। कुँवर विशालसिंह ने अभिमान से कहा-रईस की नौकरी नौकरी नहीं, राज्य है। मैं अपने चपरासियों को दो रुपया माहवार देता हूँ और वे तंज़ेब के अँगरखे पहनकर निकलते हैं। उनके दरवाजों पर घोड़े बँधे हुए हैं। मेरे क़ारिन्दे पाँच रुपये से अधिक नहीं पाते, किन्तु शादी-विवाह वकीलों के यहाँ करते हैं। न जाने उनकी कमाई में क्या बरकत होती है। बरसों तनख्वाह का हिसाब नहीं करते। कितने ऐसे हैं जो बिना तनख्वाह के कारिन्दगी या चपगमगीरी को तैयार बैठे है। परन्तु अपना यह नियम नहीं। समझ लीजिए, मुख्तार आम अपने इलाके में एक बड़े जमींदार से अधिक रोब रखता है। उसका ठाट-बाट और उसकी हुकूमत छोटे छोटे राजाओं से कम नहीं। जिसे इस नौकरी का चसका लग गया है, उसके सामने तहसीलदारी झूठी है।

पण्डित दुर्गानाथ ने कुँवर साहब की बातों का समर्थन किया, जैसा कि करना उनको सभ्यतानुसार उचित था। वे दुनियादारी में अभी कच्चे थे, बोले-मुझे अब तक किसी रईस की नौकरी का चसका नहीं लगा है। मैं तो अभी कालेज से निकला आता हूँ। और न मैं इन कारणों से नौकरी करना चाहता हूँ जिनका कि आपने वर्णन किया। किन्तु इतने कम वेतन में मेरा निर्वाह न होगा। आपके और नौकर असामियों का गला दबाते होंगे। मुझसे मरते समय तक ऐसे कार्य न होंगे। यदि सच्चे नौकर का सम्मान होना निश्चय है, तो मुझे विश्वास है कि बहुत शीघ्र आप मुझसे प्रसन्न हो जायँगे।

कुँवर साहब ने बड़ी दृढ़ता से कहा-हाँ, यह तो निश्चय है कि सत्यवादी मनुष्य का आदर सब कही होता है, किन्तु मेरे यहाँ तनख्वाह अधिक नहीं दी जाती।

जमीदार के इस प्रतिष्ठा-शून्य उत्तर को सुनकर पण्डितजी कुछ खिन्न हृदय से बोले तो फिर मज़बूरी है। मेरे द्वारा इस समय कुछ कष्ट आपको पहुँचा हो तो क्षमा कीजिएगा। किन्तु मैं आपसे कह सकता हूँ कि ईमानदार आदमी आपको इतना सस्ता न मिलेगा।

कुँवर साहब ने मन में सोचा कि मेरे यहाँ सदा अदालत-कचहरी लगी ही रहती है, सैकड़ों रुपये तो डिगरी और तजवीजों तथा और और अँगरेजी कागजों के अनुवाद में लग पाते हैं । एक अँगरेजी का पूर्ण पण्डित सहज ही में मिल
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रहा है। सो भी अधिक तनख्वाह नही देनी पड़ेगी। इसे रख लेना ही उचित है। लेकिन पण्डितजी की बात का उत्तर देना आवश्यक था, अतः कहा- महाशय, सत्यवादी मनुष्य को कितना ही कम वेतन दिया जाये, वह सत्य को न छोड़ेगा और अधिक वेतन पाने से बेहमान सच्चा नहीं बन सकता है। सच्चाई का रुपये से कुछ सम्बन्ध नहीं। मैंने ईमानदार कुली देखे हैं और बेहमान बड़े-बड़े धनाढ्य पुरुष। परन्तु अच्छा, आप एक सज्जन पुरुष हैं। आप मेरे यहाँ प्रसन्नतापूर्वक रहिए। मैं आपको एक इलाके का अधिकारी बना दूँगा और आपका काम देखकर तरक्की भी कर दूँगा।

दुर्गानाथजी ने २०) मासिक पर रहना स्वीकार कर लिया। यहाँ से कोई ढाई मील पर कई गाँवों का एक इलाका चाँदपार के नाम से विख्यात था। पण्डितजी इसी इलाके के कारिन्दे नियत हुए।

पण्डित दुर्गानाथ ने चाँदपार के इलाके में पहुँचकर अपने निवासस्थान को देखा तो उन्होनें कुँवर साहब के कथन को बिलकुल सत्य पाया। यथार्थ में रियासत की नौकरी सुख-सम्पत्ति का घर है। रहने के लिए सुन्दर बँगला है, जिसमें बहुमूल्य बिछौना बिछा हुआ था, सैकड़ों बीघे की सौर, कई नौकर-चाकर कितने ही चपरासी, सवारी के लिए एक सुन्दर टाँगन, सुख और ठाट बाट के सारे सामान उपस्थित। किन्तु इस प्रकार की सजावट और विलास की सामग्री देखकर उन्हें उतनी प्रसन्नता न हुई। क्योंकि इसी सजे हुए बँगले के चारों ओर किसानों के झोपड़े थे। फूस के घरों में मिट्टी के बर्तनों के सिवा और सामान ही क्या था ! वहाँ के लोगों में वह बँगला कोट के नाम से विख्यात था। लड़के उसे भय की दृष्टि से देखते। उसके चबूतरे पर पैर रखने का उन्हें साहस न पड़ता। इस दीनता के बीच में इतना बड़ा ऐश्वर्ययुक्त पृश्य उनके लिए अत्यन्त हृदय-विदार-कया। किसानों को यह दशा थी कि सामने आते हुए थरथर काँपते थे। चपरासी लोग उनसे ऐसा वर्ताव करते थे कि पशुओं के साथ भी वैसा नहीं होता।

पहले ही दिन कई सौ किसानों ने पण्डितजी को अनेक प्रकार के पदार्थ भेंट के रूप में उपस्थित किये, किन्तु अब वे सब लौटा दिये गये तो उन्हें बहत हो आश्चर्य हुआ। किसान प्रसन्न हुए, किन्नु चपरासियों का रक्त उबलने लगा। [ १२१ ]
नाई और कहार ख़िदमत को आये, किन्तु लौटा दिये गये। अहीरों के घरों से दूध से भरा हुआ एक मटका आया, वह भी वापस हुआ। तमोली एक ढोली पान लाया, किन्तु वह भी स्वीकार न हुआ। आसामी आपस में कहने लगे कि कोई धर्मात्मा पुरुष आये हैं। परन्तु चपरासियों को तो ये नई बातें असह्य हो गई। उन्होंने कहा- हुजर, अगर आपको ये चीजें पसन्द न हो तो न लें, मगर रस्म को तो न मिटायें। अगर कोई दूसरा आदमी यहाँ आयेगा तो उसे नये सिरे से यह रस्म बाँधने में कितनी दिक्कत होगी ? यह सब सुनकर पण्डितजी ने केवल यही उत्तर दिया-जिसके सिर पर पड़ेगा वह भुगत लेगा। मुझे इसकी चिन्ता करने की क्या आवश्यकता ? एक चपरासी ने साहस बाँधकर कहा-इन असामियों को आप जितना गरीब समझते हैं उतने गरीब ये नहीं हैं। इनका ढंग ही ऐसा है। भेष बनाये रहते हैं। देखने में ऐसे सीधे सादे मानो बेसिंग की गाय हैं, लेकिन सच मानिए, इनमें का एक-एक श्रादमी ह ईकोरट का वकील है।

चपरासियों के इस वाद-विवाद का प्रभाव पण्डितजी पर कुछ न हुआ उन्होंने प्रत्येक गृहस्थ से दयालुता और भाईचारे का आचरण करना प्रारम्भ किया। सबेरे से आठ बजे तक तो गरीबों को बिना दाम औषधियाँ देते, फिर हिसाब-किताब का काम देखते । उनके सदाचरण ने असामियों को मोह लिया। मालगुजारी का रुपया, जिसके लिए प्रतिवर्ष कुरकी तथा नीलाम की आवश्यकता होती थी,इस वर्ष एक इशारे पर वसूल हो गया। किसानों ने अपने भाग सराहे और वे मनाने लगे कि हमारे सरकार की दिनोदिन बढ़ती हो।

कुँवर विशालसिंह अपनी प्रजा के पालन-पोषण पर बहुत ध्यान रखते थे। वे बीज के लिए अनाज देते और मजूरी और बैलों के लिए रुपये। फसल कटने पर एक का डेढ़ वसूल कर लेते चाँदपार के कितने ही असामी इनके ऋणी थे। चैत का महीना था फ़सल कट-फटकर खलियानों में आ रही थी। खलियान में से कुछ नाज घर में आने लगा था। इसी अवसर पर कुँवरसाहब ने चाँदपारवालों को बुलाया और कहा-हमारा नाज और रुपया बेगक़ कर दो।यह चैत का महीना है। जब तक कड़ाई न की आय, तुम लोग डकार नहीं लेते। इस तरह काम नहीं चलेगा। बूढ़े मलूका ने कहा-सरकार, भला असामी
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कभी अपने मालिक से बेबाक़ हो सकता है। कुछ अभी ले लिया जाय, कुछ फिर दे देंगे। हमारी गर्दन तो सरकार की मुट्ठी में है।

कुँवर साहब-आज कौड़ी कौड़ी चुकाकर यहाँ से उठने पाओगे। तुम लोग हमेशा इसी तरह हीला हवाला किया करते हो।

मलका-(विनय के साथ)-हमारा पेट है, सरकार की रोटियाँ है, हमको और क्या चाहिए जो कुछ उपज है वह सब सरकार ही की है।

कुँवर साहब से मलूका की यह वाचालता सही न गई। उन्हें इसपर क्रोष आ गया ; राजा-रईस ठहरे। उन्होंने बहुत कुछ खरी-खोटी सुनाई और कहा-कोई है ? जरा इस बुड्ढे का कान तो गरम करो, यह बहुत बढ़-चढ़कर बातें करता है। उन्होनें तो कदाचित् धमकाने की इच्छा से कहा, किन्तु चपरासी कादिर ख़ाँ ने लपककर बूढ़े की गर्दन पकड़ी और ऐसा धक्का दिया कि वेचारा जमीन पर जा गिरा। मलूका के दो जवान बेटे वहाँ चुपचाप खड़े थे। बाप की ऐसी दशा देखकर उनका रक्त गर्म हो उठा। वे दोनों झपटे और कादिर खाँ पर टूट पड़े। धमाधम शब्द सुनाई पड़ने लगा। ख़ाँ साहब का पानी उतर गया, साफ़ा अलग आ गिरा। अचकन के टुकड़े-टुकड़े हो गये। किन्तु जबान चलती रही।

मलूका ने देखा, बात बिगड़ गई। वह उठा और कादिर ख़ाँ को छुड़ाकर अपने लड़कों को गालियाँ देने लगा। जब लड़कों ने उसी को डाँटा तब दौड-कर कुँवर साहब के चरणों पर गिर पड़ा। पर बात यथार्थ में बिगड़ गई थी। बूढ़े के इस विनीत भाव का कुछ प्रभाव न हुआ। कुँवर साहब की आँखों से मानों आग के अंगारे निकल रहे थे। वे बोले-बेईमान आँखों, के सामने से दूर हो जा। नहीं तो तेरा खून पी जाऊँगा।।

बूढ़े के शरीर में रक्त तो अब वैसा न रहा था, किन्तु कुछ गर्मी अवश्य थी। समझता था कि ये कुछ न्याय करेंगे, परन्तु यह फटकार सुनकर बोला-सरकार, बुढ़ापे में आपके दरवाजे पर पानी उतर गया और तिसपर सरकार हमी को डाँटते हैं। कुँवर साहब ने कहा-तुम्हारी इज्ज़त अभी क्या उतरी है,अब उतरेगी।

दोनों लड़के सरोष बोले-सरकार अपना रुपया लेंगे कि किसी की इज्जत लेंगे? [ १२३ ]कुँवर साहब (ऐंठकर )- रुपया पीछे लेंगे, पहले देखेंगे, कि तुम्हारी इज्ज़त कितनी है।

चाँदपार के किसान अपने गाँव पर पहुंँचकर पण्डित दुर्गानाथ से अपनी रामकहानी कह ही रहे थे कि कुँबर साहब का दुत पहुँचा और ख़बर दी कि सरकार ने आपको अभी-अभी बुलाया है।

दुर्गानाथ ने असामियों को परितोष दिया और आप घोड़े पर सवार होकर दरबार में हाज़िर हुए।

कुँवर साहब की आँखें लाल थीं। मुख की प्राकृति भयंकर हो रही थी। कई मुख्तार और चपरासी बैठे हुए आग पर तेल डाल रहे थे। पण्डितजी को देखते ही कुँवर साहब बोले-चाँदपारवालों की हरकत आपने देखी ?

पण्डितबी ने नम्र भाव से कहा-जी हाँ, सुनकर बहुत शोक हुआ। ये तो ऐसे सरकश न थे।

कुँवर साहब-यह सब आप ही के आगमन का फल है। आप अभी स्कूल के लड़के हैं। आप क्या जानें कि संसार में कैसे रहना होता है। यदि आपका बर्ताव असामियों के साथ ऐसा ही रहा तो फिर मैं ज़मींदारी कर चुका। यह सब आपकी करनी है। मैंने इसी दरवाज़े पर असामियों को बाँध बाँधकर उलटे लटका दिया है और किसी ने चूँ तक न की। श्राज उनका यह साहस कि मेरे ही श्रादमी पर हाथ चलायें !

दुर्गानाथ (कुछ दबते हुए)-महाशय, इसमें मेरा क्या अपराध ? मैंने तो जबसे सुना है तभी से स्वयं सोच में पड़ा हूँ।

कुँवर साहब-आपका अपराध नहीं तो किसका है? आप ही ने तो इनको सर चढ़ाया। बेगार बंद कर दी, आप ही उनके साथ भाईचारे का बर्ताव करते है, उनके साथ हँसी-मज़ाक करते हैं। ये छोटे आदमी इस बर्ताव की कदर क्या जानें, किताबी बातें स्कूलों ही के लिए हैं। दुनिया के व्यवहार का कानून दुसरा‌ है। अच्छा, जो हुआ सो हुआ। अब मैं चाहता हूँ कि इन बदमाशों को इस सरकशी का मज़ा चखाया जाय। असामियों को आपने मालगुजारी की रसीदें तो नहीं दी हैं ? [ १२४ ]

दुर्गानाथ ( कुछ डरते हुए)-जी नहीं, रसीदें तैयार है, केवल आपके हस्ताक्षरों की देर है ?

कुँवर साहब ( कुछ संतुष्ट होकर)-यह बहुत अच्छा हुआ। शकुन अच्छे हैं। अब आप इन रसीदों को चिराग़अली के सिपुर्द कीजिए। इन लोगों पर बकाया लगान की नालिश की जायगी, फ़सल नीलाम करा लूँगा। जब भूखे मरेंगे तब सूझेगी। जो रुपया अब तक वसूल हो चुका है, वह बीज और ऋण के खाते में चढ़ा लीजिए। आपको केवल यह गवाही देनी होगी कि यह रूपया मालगुजारी के मद में नहीं, कर्ज के मद में वसूल हुआ है। बस!

दुर्गानाथ चिन्तित हो गये। सोचने लगे कि क्या यहाँ भी उसी आपत्ति का सामना करना पड़ेगा जिससे बचने के लिए इतने सोच-विचार के बाद, इस शान्ति-कुटीर को ग्रहण किया था ? क्या जान-बूझकर इन गरीबों की गर्दन पर छुरी फेरूँ, इसलिए कि मेरी नौकरी बनी रहे ? नहीं, यह मुझसे न होगा। बोले-क्या मेरी शहादत बिना काम न चलेगा ?

कुँवर साहब ( क्रोध से)-क्या इतना कहने में भी आपको कोई उज्र है ? दुर्गानाथ (द्विविधा में पड़े हुए )-जी, यों तो मैंने आपका नमक खाया है। आपको प्रत्येक आज्ञा का पालन करना मुझे उचित है, किन्तु न्यायालय में मैंने गवाही नहीं दी है। संभव है कि यह कार्य मुझसे न हो सके अतः मुझे तो क्षमा ही कर दिया जाय।

कँवर साहब (शासन के ढंग से)-यह काम आपको करना पड़ेगा, इसमें 'हाँ-नहीं की कोई आवश्यकता नहीं। आग अपने लगाई है, बुझा- येगा कौन?

दुर्गानाथ ( दृढ़ता के साथ)-मैं झूठ कदापि नहीं बोल सकता, और न इस प्रकार शहादत दे सकता हूँ।

कुँवर साहब ( कोमल शब्दों में )-कृपानिधान, यह झूठ नहीं है। मैंने झूठ का व्यापार नहीं किया है। मैं यह नहीं कहता कि आप रुपये का वसूल होना अस्वीकार कर दीजिए। जब असामी मेरे ऋणी हैं, तो मुझे अधिकार है कि चाहे रुपया ऋण की मद में वसूल करूँ या मालगुजारी की मद में। यदि इतनी-सी बात को आप झूठ समझते हैं तो आपकी ज़बरदस्ती है। अभी आपने
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संसार देखा नहीं। ऐसी सच्चाई के लिए संसार में स्थान नहीं। आप मेरे यहाँ नौकरी कर रहे हैं। इस सेवक-धर्म पर विचार कीजिए। आप शिक्षित और होनहार पुरुष है। अभी आपको संसार में बहुत दिन तक रहना है और बहुत काम करना है। अभी से आप यह धर्म और सत्यता धारण करेंगे तो अपने जीवन में आपको आपत्ति और निराशा के सिवा और कुछ प्राप्त न होगा। सत्यप्रियता अवश्य उत्तम वस्तु है, किन्तु उसकी भी सीमा है, 'अति सर्वत्र वर्जयेत्। अब अधिक सोच विचार की आवश्यकता नहीं। यह अवसर ऐसा ही है।

कुँवर साहब पुराने खुर्राट थे। इस फैंकनैत से युवक खिलाड़ी हार गया।

इस घटना के तीसरे दिन चाँदपार के असामियों पर बकाया लगान की नालिश हुई। समन आये। घर-घर उदासी छा गई। समन क्या थे, यम के दूत थे। देवी-देवताओं की मिन्नतें होने लगी। स्त्रियाँ अपने घरवालों को कोसने लगी, और पुरुष अपने भाग्य को। नियत तारीख के दिन गाँव के गँवार कन्धे पर लोटा-डोर रखे और अंगोछे में चबेना बाँधे कचहरी को चले। सैकड़ों स्त्रियाँ और बालक रोते हुए उनके पीछे-पीछे जाते थे। मानो अब वे फिर उनसे न मिलेंगे।

पण्डित दुर्गानाथ के लिए ये तीन दिन कठिन परीक्षा के थे। एक ओर कुँवर साहब की प्रभावशालिनी बातें, दूसरी ओर किसानों की हाय-हाय। परन्तु विचार-सागर में तीन दिन निमग्न रहने के पश्चात् उन्हें धरती का सहारा मिल गया। उनकी श्रात्मा ने कहा-यह पहली परीक्षा है। यदि इसमें अनुत्तीर्ण रहे तो फिर अात्मिक दुर्बलता ही हाथ रह जायगी। निदान निश्चय हो गया कि मैं अपने लाभ के लिए इतने गरीबों को हानि न पहँचाऊँगा।

दस बजे दिन का समय था। न्यायालय के सामने मेला-सा लगा हुआ था। जहाँ-तहाँ श्यामबस्त्राच्छादित देवताओं की पूजा हो रही थी। चाँदपार के किसान झुण्ड के झुण्ड एक पेड़ के नीचे आकर बैठे। उनसे कुछ दूर पर कुँवर साहब के मुख्तार आम सिपाहियों और गवाहों की भीड़ थी। ये लोग अत्यन्त विनोद में थे। जिस प्रकार मछलियाँ पानी में पहुँचकर कलोलें करती हैं, उसी भाँति ये लोग भी आनन्द में चूर थे। कोई पान खा रहा था। कोई हलवाई की
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दुकान से पूरियों की पत्तल लिये चला आता था। उधर बेचारे किसान पेड़ के नीचे चुपचाप उदास बैठे थे कि बाज न जाने क्या होगा, कौन आफ़त आयेगी! भगवान का भरोसा है। मुकदमें की पेशी हुई। कुँवर साहब की ओर के गवाह गवाही देने लगे कि असामी बड़े सरकश हैं। जब लगान माँगा जाता है तो लड़ाई-झगड़े पर तैयार हो जाते हैं। अबकी इन्होंने एक कौड़ी भी नहीं दी।

कादिर ख़ाँ ने रोकर अपने सिर की चोट दिखाई। सबके पीछे पण्डित दुर्गा-नाथ की पुकार हुई। उन्हीं के बयान पर निपटारा होना था। वकील साहब ने उन्हें खूब तोते की भाँति पढ़ा रखा था,किन्तु उनके मुख से पहला वाक्य निकला ही था कि मैजिस्ट्रेट ने उनकी ओर तीव्र दृष्टि से देखा। वकील साहब बगलें झाँकने लगे। मुख्तार-आम ने उनकी ओर घूरकर देखा। अहलमद पेश-कार आदि सब-के सब उनकी ओर आश्चर्य की दृष्टि से देखने लगे।

न्यायाधीश ने तीव्र स्वर में कहा-तुम जानते हो कि मैजिस्ट्रेट के सामने खड़े हो ?

दुर्गानाथ (दृढ़तापूर्वक)-जी हाँ, भली भाँति जानता हूँ।

न्याया०-तुम्हारे ऊपर असत्य भाषण का अभियोग लगाया जा सकता है।

दुर्गानाथ-अवश्य, यदि मेरा कथन झूठा हो।

वकील ने कहा-जान पड़ता है, किसानों के दूध, घी और भेंट प्रादि ने यह काया-पलट कर दी है और न्यायाधीश की ओर सार्थक दृष्टि से देखा।

दुर्गानाथ-आपको इन वस्तुओं का अधिक तजुर्बा होगा। मुझे तो अपनी रूखी रोटियाँ ही अधिक प्यारी है।

न्यायाधीश-तो इन असामियों ने सब रुपया बेवाक कर दिया है ?

दुर्गानाथ-जी हाँ, इनके जिम्मे लगान की एक कौड़ी भी बाकी नहीं है।

न्यायाधीश-रसीदें क्यों नहीं दी ?

दुर्गानाथ-मेरे मालिक की आज्ञा।

मैजिस्ट्रेट ने नालिशें डिसमिस कर दी। कुँवर साहब को ज्यों ही इस पराजय की खबर मिली, उनके कोप की मात्रा सीमा से बाहर हो गई। उन्होंने पण्डित दुर्गानाथ को सैकड़ों कुवाक्य कहे-नमकहराम, विश्वासघाती, दुष्ट। [ १२७ ]
मैंने उसका कितना आदर किया, किन्तु कुत्ते की पूँछ कहीं सीधी हो सकती है। अन्त में विश्वासघात कर ही गया। यह अच्छा हुआ कि पं० दुर्गानाथ मैजिस्ट्रेट का फैसला सुनते ही मुख्तार आम को कुंजियाँ और कागग़पत्र सुपुर्द कर चलते हुए। नहीं तो उन्हें इस कार्य के फल में कुछ दिन हल्दी और गुड़ पीने की आवश्यकता पड़ती।

कुँवर साहब का लेन-देन विशेष अधिक था। चाँदपार बहुत बड़ा इलाका था। वहाँ के असामियों पर कई सौ रुपये बाक़ी थे। उन्हें विश्वास हो गया कि अब रुपया डूब जायगा। वसूल होने की कोई आशा नहीं। इस पण्डित ने असामियों को बिलकुल बिगाड़ दिया। अब उन्हें मेरा क्या डर ? अपने कारिन्दों और मंत्रियों से सम्मति ली। उन्होंने भी यही कहा-अब वसूल होने की कोई सूरत नहीं। कागज़ात न्यायालय में पेश किये जायँ तो इनका टैक्स लग जायगा। किन्तु रुपया वसूल होना कठिन है। उज़रदारियाँ होंगी। कहीं हिसाब में कोई भूल निकल आई तो रही-सही साख भी जाती रहेगी और दूसरे इलाकों का रुपया भी मारा जायगा।

दूसरे दिन कुँवर साहब पूजा-पाठ से निश्चिन्त हो अपने चौपाल में बैठे, तो क्या देखते हैं कि चाँदपार के असामी झुण्ड के झुण्ड चले आ रहे हैं। उन्हें यह देखकर भय हुआ कि कहीं ये सब कुछ उपद्रव तो न करेंगे, किन्तु किसी के हाथ में एक छड़ी तक न थी। मलूका आगे-आगे आता था। उसने दूर ही से झुककर बन्दना की। ठाकुर साहब को ऐसा आश्चर्य हुआ, मानो वे कोई स्वप्न देख रहे हों।

मलूका ने सामने आकर विनयपूर्वक कहा—सरकार, हम लोगों से जो कुछ भूल-चूक हुई उसे क्षमा किया जाय। हम लोग सब हजूर के चाकर हैं; सरकार ने हमको पाला-पोसा है। अब भी हमारे ऊपर यही निगाह रहे।

कुँवर साहब का उत्साह बढ़ा। समझे कि पण्डित के चले जाने से इन सबों के होश ठिकाने हुए हैं। अब किसका सहारा लेंगे। उसी खुर्राट ने इन सबों को बहका दिया था। कड़ककर बोले-वे तुम्हारे सहायक पण्डित कहाँ गये? वे आ जाते तो जरा उनकी ख़बर ली जाती। [ १२८ ]

यह सुनकर मलूका की आँखों में आँसू भर आये। वह बोला- सरकार, उनको कुछ न कहें। वे आदमी नहीं, देवता थे। जवानी की सौगन्ध है, जो उन्होंने आपकी कोई निन्दा की हो। वे बेचारे तो हम लोगों को बार-बार समझाते थे कि देखो, मालिक से बिगाड़ करना अच्छी बात नहीं। हमसे कभी एक लोटा पानी के रवादार नहीं हुए। चलते-चलते हमसे कह गये कि मालिक का जो कुछ तुम्हारे जिम्मे निकले, चुका देना। आप हमारे मालिक हैं। हमने आपका बहुत खाया-पिया है। अब हमारी यही विनती सरकार से है कि हमारा हिसाब-किताब देखकर जो कुछ हमारे ऊपर निकले, बताया जाय। हम एक-एक कौड़ी चुका देंगे, तब पानी पीयेंगे।

कुँवर साहब सन्न हो गये। इन्हीं रुपयों के लिए कई बार खेत कटवाने पड़े थे। कितनी बार घरों में आग लगवाई। अनेक बार मार-पीट की। कैसे कैसे दंड दिये। और आज ये सब आप-से-आप सारा हिसाब-किताब साफ़ करने आये हैं। यह क्या जादू है!

मुख्ताराम साहब ने काग़ज़ात खोले और असामियों ने अपनी-अपनी पोटलियाँ। जिसके जिम्मे जितना निकला, वे-कान-पूँ छ हिलाये उतना द्रव्य सामने रख दिया। देखते देखते सामने रुपयों का ढेर लग गया। छः सौ रुपया बात की बात में वसूल हो गया। किसी के जिम्मे कुछ बाकी न रहा। यह सत्यता और न्याय की विजय थी। कठोरता और निर्दयता से जो काम कभी न हुआ‌ वह धर्म और न्याय ने पूरा कर दिखाया।

जबसे ये लोग मुकदमा जीतकर आये तभी से उनको रुपया चुकाने की धुन सवार थी। पण्डितजी को वे यथार्थ में देवता समझते थे। रुपया चुका देने के लिए उनकी विशेष आज्ञा थी। किसी ने बैल, किसी ने गहने बन्धक रखे। यह सब कुछ सहन किया, परन्तु पण्डितजी की बात न टाली। कुँवर साहब के मन में पण्डितजी के प्रति जो बुरे विचार थे वे सब मिट गये। उन्होंने सदा से कठोरता से काम लेना सीखा था। उन्हीं नियमों पर वे चलते थे। न्याय तथा सत्यता पर उनका विश्वास न था। किन्तु आज उन्हें प्रत्यक्ष देख पड़ा कि सत्यता और कोमलता में बहुत बड़ी शक्ति है।

ये असामी मेरे हाथ से निकल गये थे। मैं इनका क्या बिगाड़ सकता था ? [ १२९ ]
अवश्य वह पण्डित सच्चा और धर्मात्मा पुरुष था। उसमें दूरदर्शिता न हो, काल-शान न हो, किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि वह निःस्पृह और सच्चा पुरुष था।

कैसी ही अच्छी वस्तु क्यों न हो, जब तक हमको उसकी आवश्यकता नहीं होती तब तक हमारी दृष्टि में उसका गौरव नहीं होता। हरी दूध भी किसी समय अशफि अशर्फियों के मोल बिक जाती है। कुँवर साहब का काम एक निःस्पृह मनुष्य के बिना रुक नहीं सकता था। अतएव पण्डितजी के इस सर्वोत्तम कार्य की प्रशंसा किसी कवि की कविता से अधिक न हुई। चाँदपार के असामियों ने तो अपने मालिक को कभी किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचाया, किन्तु अन्य इलाकोंवाले असामी उसी पुराने ढंग से चलते थे। उन इलाकों में रगड़-झगड़ सदैव मची रहती थी।अदालत,मार-पीट, डाँट-डपट सदा लगी रहती थी। किन्तु ये सब तो जमींदार के शृगार है। बिना इन सब बातों के ज़मींदारी कैसी? क्या दिन- भर बैठे-बैठे वे मक्खियाँ मारें ?

कुँवर साहब इसी प्रकार पुराने ढंग से अपना प्रबन्ध सँभालते जाते थे। कई वर्ष व्यतीत हो गये। कुँवर साइब का कारोबार दिनों दिन चमकता ही गया, यद्यपि उन्होंने पाँच लड़कियों के विवाह बड़ी धूमधाम के साथ किये, परन्तु तिस पर भी उनकी बढ़ती में किसी प्रकार की कमी न हुई। हाँ, शारीरिक शक्तियाँ अवश्य कुछ-कुछ ढीली पड़ती गई। बड़ी भारी चिन्ता यही थी कि इस बड़ी सम्पत्ति और ऐश्वर्य का भोगनेवाला कोई उत्पन्न न हुआ। भानजे, भतीजे, और नवासे इस रियासत पर दाँत लगाये हुए थे।

कुँवर साहब का मन अब इन सांसारिक झगड़ों से फिरता जाता था। आख़िर यह रोना धोना किसके लिए ? अब उनके जीवन नियम में एक परिवर्तन हुआ। द्वार पर कभी-कभी साधु-सन्त धूनी रमाये हुए देख पड़ते। स्वयं भगवद्-गीता और विष्णुपुराण पढ़ते। पारलौकिक चिन्ता अब नित्य रहने लगी। परमात्मा की कृपा और साधु-सन्तों के आशीर्वाद से बुढ़ापे में उनको एक लड़का पैदा हुआ। जीवन की आशाएँ सफल हुईं, पर दुर्भाग्यवश पुत्र के जन्म ही से कुँवर साहब शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त रहने लगे। सदा वैद्यों और डाक्टरों का
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तांता लगा रहता था। लेकिन दवाओं का उलटा प्रभाव पड़ता ज्यों-त्यों करके उन्होंने ढाई वर्ष बिताये। अन्त में उनकी शक्तियों ने जवाब दे दिया। उन्हें मालूम हो गया कि अब संसार से नाता टूट जायगा। अब चिन्ता ने और धर दबाया---यह सारा हाल असबाब, इतनी बड़ी सम्पत्ति किसपर छोड़ जाऊँ ? मन की इच्छाएँ मन ही में रह गई। लड़के का विवाह भी न देख सका। उसकी तोतली बातें सुनने का भी सौभाग्य न हुआ। हाय, अब इस कलेजे के टुकड़े को किसे सौंपूँ जो इसे अपना पुत्र समझें। लड़के की मां स्त्री जाति, न कुछ जाने न समझे। उससे कारबार सँभलना कठिन है। मुख्तारआम, गुमाश्ते, कारिन्दे कितने है, परन्तु सबके सब स्वार्थी-विश्वासघाती। एक भी ऐसा पुरुष नहीं जिस पर मेरा विश्वास जमे। कोर्ट ऑफ वाडस के सुपुर्द करूँ तो वहाँ भी ये ही सब आपत्तियाँ। कोई इधर दबायेगा कोई उधर। अनाथ बालक को कौन पूछेगा? हाय, मैंने आदमी नहीं पहिचाना! मुझे हीरा मिल गया था, मैंने उसे ठीकरा समझा ! कैसा सच्चा, कैसा वीर, दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष था। यदि वह कहीं मिल जाये तो इस अनाथ बालक के दिन फिर जायँ। उसके हृदय में करुणा हे, दया है। वह अनाथ बालक पर तरस खायगा। हा ! क्या मुझे उसके दर्शन मिलेंगे ? मैं उस देवता के चरण धोकर माथे पर चढ़ाता। आँसुओं से उसके चरण धोता। वही यदि हाथ लगाये तो यह मेरी डूबती नाव पार लगे।

ठाकुर साहब की दशा दिन पर दिन बिगड़ती गई। अब अन्तकाल जा पहुँचा। उन्हें पंडित दुर्गानाथ की रट लगी हुई थी। बच्चे का मुँह देखते और कलेजे से एक आह निकल जाती। बार-बार पछताते और हाथ मलते। हाय ! उस देवता को कहाँ पाऊँ ? जो कोई उसके दर्शन करा दे, आधी जायदाद उसके न्योछावर कर दूंँ।---प्यारे पण्डित ! मेरे अपराध क्षमा करो। मैं अन्धा था, अज्ञान था। अब मेरी बाँह पकड़ो। मुझे डूबने से बचायो। इस अनाथ बालक पर तरस खाओ।

हितार्थी और संबन्धियों का समूह सामने खड़ा था। कुँवर साहब ने उनकी ओर अधखुली आँखों से देखा। सच्चा हितैषी कहीं देख न पड़ा। सबके चेहरे पर स्वार्थ की झलक थी । निराशा से आँखें मूंँद लीं। उनकी स्त्री फूट-फूटकर रो
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रही थी। निदान उसे लज्जा त्यागनी पड़ी। वह रोती हुई पास जाकर बोली---प्राणनाथ, मुझे और इस असहाय बालक को किस पर छोडे जाते हो।

कुँवर साहब ने धीरे से कहा---पण्डित दुर्गानाथ पर। वे जल्द आयेंगे। उनसे कह देना कि मैंने सब कुछ उनके भेंट कर दिया। यह अन्तिम वसीयत है।