"अमर बेलि बिन मूल की, प्रति-पालत है ताहि।
रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि॥१॥
अधम बचन तैं को फल्यो, बैठि तार की छाहिं।
रहिमन काम न आवहीं, जे नीरस जग माहिं॥२॥
अनुचित-उचित रहीम लघु, करहिं बड़ेन के जोर।
ज्यों ससि के संयोग[१] तैं, पचवत[२] आगि चकोर॥३॥
अनुचित बचन न मानिए, यदपि गुराइस[३] गाढ़ि।
है रहीम रघुनाथ तैं, सुजस भरत को बाढ़ि॥४॥
अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम।
साँचे तैं तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम॥५॥
अमी[४] पियावत मान बिन, रहिमन मोहिं न सुहाइ।
प्रेम सहित मरिबो भलो, जो बिष देइ बुलाइ॥६॥[५]..."
कुँवर उदयभान चरितइन्शा अल्ला खां द्वारा रचित सामाजिक उपन्यास है जिसका प्रकाशन १९०५ ई॰ में लखनऊ के एंग्लो-ओरियंटल प्रैस द्वारा किया गया था।
"सिर झुकाकर नाक रगड़ता हूं उस अपने बनानेवाळे के साम्हने जिस ने हम सबको बनाया और बातकी बातमें वह सब कर दिखाया जिसका भेद किसीने न पाया। आतियां जातियां जो सांसें हैं। उसके बिन ध्यान सब यह फांसें हैं॥ यह कलका पुतला जो अपने उस खिलाड़ी की सुध रक्खे तो खटाईमें क्यों पड़े और कडुवा कसैला क्यों हो। उस फलकी मिठाई चक्खै जो बड़ोंसे बड़े अगलोंने चक्खी है। देखनेको आखैं दीं और सुन्नेको यह कान दिये नाक भी ऊंची सबमें करदी मूरतोंको जी दान दिये मिट्टीके बासनको इतनी सकत कहां जो अपने कुन्हारके करतब कुछ बतासके। सच है जो बनाया हुवा हो सो अपने बनानेवालेको क्या सराहे और क्या कहे यों जिसका जी चाहे पड़ा बके।..."(पूरा पढ़ें)
स्वदेशरवीन्द्रनाथ टैगोर के चुने हुए निबन्धों का हिन्दी अनुवाद है। इसका प्रकाशन हिन्दी-ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय, (बम्बई) द्वारा १९१४ ई॰ में किया गया था।
हम पुराने भारतवर्ष के लोग हैं; बहुत ही प्राचीन और बहुत ही थके हुए हैं। मैं बहुधा अपने में ही अपनी इस जातीय भारी प्राचीनता का अनुभव किया करता हूँ। मन लगाकर जब अपने भीतर नजर डालता हूँ तब देखता हूँ कि वहाँ केवल चिन्ता, विश्राम और वैराग्य है। मानों हमारी भीतरी और बाहरी शक्तियों ने एक लम्बी छुट्टी ले रक्खी है। मानों जगत् के प्रातःकाल ही में हम लोग दफ्तर का कामकाज कर आये हैं, इसीसे इस दोपहर की कड़ी धूप में, जब कि और सब लोग कामकाज में लगे हुए हैं हम दर्वाजा बंद करके निश्चिन्त हो विश्राम या आराम कर रहे हैं; हमने अपनी पूरी तलब चुका ली है और पेंशन पा गये हैं। बस, अब उसी पेंशन पर गुजारा कर रहे हैं। मजे में हैं।...(पूरा पढ़ें)
"इस उत्थान का आरंभ हम संवत् १९५० से मान सकते हैं। इसमें हम कुछ ऐसी चिंताओं और आकांक्षाओं का आभास पाते हैं, जिनका समय भारतेंदु के सामने नहीं आया था। भारतेंदु-मंडल मनोरंजक साहित्य-निर्माण द्वारा हिंदी-गद्य-साहित्य की स्वतंत्र सत्ता का भाव ही प्रतिष्ठित करने में अधिकतर लगा रहा। अब यह भाव पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो गया था। और शिक्षित समाज को अपने इस नए गद्य-साहित्य का बहुत कुछ परिचय भी हो गया था। प्रथम उत्थान के भीतर बहुत बड़ी शिकायत यह रहा करती थी कि अँगरेजी की ऊँची शिक्षा पाए हुए बड़े बड़े डिग्रीधारी लोग हिंदी-साहित्य के नूतन निर्माण में योग नहीं देते और अपनी मातृभाषा से उदासीन रहते हैं। द्वितीय उत्थान में यह शिकायत बहुत कुछ कम हुई।..."(पूरा पढ़ें)
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