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मई की निर्वाचित पुस्तक
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सप्ताह की पुस्तक
सप्ताह की पुस्तक

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गोदान प्रेमचंद रचित उपन्यास है जिसका प्रकाशन १९३६ ई॰ में किया गया था।

"होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा—गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूँ। ज़रा मेरी लाठी दे दे।

धनिया के दोनों हाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली—अरे, कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या है?

होरी ने अपने झुरिर्यों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर कहा—तुझे रस-पानी की पड़ी है, मुझे यह चिन्ता है कि अबेर हो गयी तो मालिक से भेंट न होगी। असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घंटों बैठे बीत जायगा।..."(पूरा पढ़ें)


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पूर्ण पुस्तक
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चोखे चौपदे अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के खड़ी बोली के हजार चौपदों का संग्रह है। इसका प्रकाशन "खड़गविलास प्रेस", (पटना) द्वारा १९२४ ई॰ में किया गया था।

जो किसी के भी नहीं बाँधे बँधे ।
प्रेमबंधन से गये वे ही कसे॥
तीन लोकों में नही जो बस सके।
प्यारवाली आँख में वे ही बसे ॥

पत्तियों तक को भला कैसे न तब।
कर बहुत ही प्यार चाहत चूमती ॥
साँवली सूरत तुम्हारी ​साँवले।
जब हमारी आँख में है घूमती॥

...(पूरा पढ़ें)


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सहकार्य

इस माह प्रमाणित करने के लिए चुनी गई पुस्तक:
  1. हिंदी रस गंगाधर.djvu ‎[४२८ पृष्ठ]
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रचनाकार
रचनाकार

जॉन स्टुअर्ट मिल
जे॰ एस॰ मिल

जॉन स्टुअर्ट मिल (२० मई १८०६–८ मई १८७३) प्रसिद्ध सामाजिक, राजनैतिक तथा दार्शनिक चिन्तक थे। विकिस्रोत पर उपलब्ध उनकी रचनाएँ :

  1. स्त्रियों की पराधीनता - १९१७, THE SUBJECTION OF WOMEN का हिंदी अनुवाद।
  2. उपयोगितावाद - १९२४, Utilitarianism का हिन्दी अनुवाद
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
रबीन्द्रनाथ ठाकुर

रबीन्द्रनाथ ठाकुर या रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) नोबल पुरस्कार विजेता बाँग्ला कवि, उपन्यासकार, निबंधकार, दार्शनिक और संगीतकार हैं। विकिस्रोत पर उपलब्ध इनकी रचनाएँ :

  1. स्वदेश – १९१४, निबंध संग्रह
  2. राजा और प्रजा – १९१९, निबंध संग्रह
  3. विचित्र-प्रबन्ध – १९२४, निबंध संग्रह
  4. दो बहनें' (१९५२), हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा अनूदित उपन्यास।


विकिस्रोत पर उपलब्ध सभी लेखकों के लिए देखें- समस्त रचनाकार अकारादि क्रम से।


आज का पाठ

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न्याय प्रेमचंद द्वारा रचित मानसरोवर २ का एक अध्याय है जिसका प्रकाशन १९४६ ई॰ में सरस्वती प्रेस "बनारस" द्वारा किया गया था।

"हजरत मुहम्मद को इलहाम हुए थोड़े ही दिन हुए थे। दस-पांच पड़ोसियों तथा निकट-सम्बन्धियों के सिवा और कोई उनके दीन पर ईमान न लाया था, यहाँ तक कि उनकी लड़की ज़ैनब और दामाद अबुलआस भी, जिनका विवाह इलहाम से पहले ही हो चुका था, अभी तक दीक्षित न हुए थे। ज़ैनब कई बार अपने मैके गई थी और अपने पूज्य पिता की ज्ञानमय वाणी सुन चुकी थी।..."(पूरा पढ़ें)

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