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मार्च की निर्वाचित पुस्तक
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सप्ताह की पुस्तक
सप्ताह की पुस्तक

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चंद्रकांता संतति, भाग-४ देवकीनन्दन खत्री द्वारा रचित तिलिस्मी उपन्यास है जिसका प्रकाशन दिल्ली के भारती भाषा प्रकाशन द्वारा किया गया था।


"हम लिख आये हैं कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी किताब को पढ़कर समझने का भेद आनन्दसिंह को बताया और इतने ही में मन्दिर के पीछे की तरफ से चिल्लाने की आवाज आई। दोनों भाइयों का ध्यान एकदम उस तरफ चला गया और फिर यह आवाज सुनाई पड़ी, "अच्छा-अच्छा, तू मेरा सिर काट ले, मैं भी यही चाहती हूँ कि अपनी जिन्दगी में इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को दुःखी न देखूँ। हाय इन्द्रजीतसिंह, अफसोस, इस समय तुम्हें मेरी खबर कुछ भी न होगी!" इस आवाज को सुनकर इन्द्रजीतसिंह बेचैन और बेताब हो गये और आनन्दसिंह से यह कहते हुए कि 'कमलिनी की आवाज मालूम पड़ती है' मन्दिर के पीछे की तरफ लपके। आनन्दसिंह भी उनके पीछे-पीछे चले गये।..."(पूरा पढ़ें)


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पूर्ण पुस्तक
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धर्म के नाम पर आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित पुस्तक है। इसका प्रकाशन इन्द्रप्रस्थ पुस्तक भण्डार, देहली द्वारा सम्वत् १९९० वि॰ में किया गया था।

"धर्म ने हज़ारों वर्ष से मनुष्य जाति को नाको चने चबाऐ हैं। करोड़ों नर नाहरों का गर्म रक्त इसने पिया है, हज़ारों कुल बालाओं को इसने जिन्दा भस्म किया है, असंख्य पुरुषों को इसने ज़िन्दा से मुर्दा बना दिया है। यह धर्म पृथ्वी की मानव जाति का नाश करेगा कि उद्धार—आज इस बात पर विचारने का समय आगया है।
धर्म के कारण ही धर्म के पुत्र युधिष्ठिर ने जुआ खेला, राज्य हारा, भाइयों और स्त्री को दाव पर लगा कर गुलाम बनाया, धर्म ही के कारण द्रौपदी को पांच आदमियों की पत्नी बनना पड़ा। धर्म ही के कारण अर्जुन और भीम के सामने द्रौपदी पर अत्याचार किये गये और वे योद्धा मुर्दे की भांति बैठे देखते रहे। धर्म ही के कारण भीष्मपितामह और गुरुद्रोण ने पांडवों के साथ कौरवों के पक्ष में युद्ध किया, धर्म ही के कारण अर्जुन ने भाइयों और सम्बन्धियों के खून से धरती को रङ्गा, धर्म ही के कारण भीष्म आजन्म कुंवारे रहे, धर्म ही के कारण कुरुओं की पत्नियो ने पति से भिन्न पुरुषों से सहवास करके सन्तान उत्पन्न कीं।"...(पूरा पढ़ें)


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सहकार्य

रचनाकार
रचनाकार

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (15 अप्रैल 1865 — 16 मार्च 1947) हिंदी भाषा के कवि, निबंधकार तथा संपादक थे। विकिस्रोत पर उपलब्ध उनकी रचनाएँ:

  1. प्रियप्रवास (1914), खड़ी बोली हिंदी का पहला महाकाव्य जो कृष्ण के गोकुल से मथुरा प्रवास की घटना पर आधारित
  2. चोखे चौपदे (1924), हरिऔध हजारा नाम से भी प्रसिद्ध इस पुस्तक में एक हजार चौपदे हैं
  3. वेनिस का बाँका (1928), अंग्रेजी नाटक मर्चेंट ऑफ वेनिस का अनुवाद
  4. रसकलस (1931), मुक्तकों का संग्रह
  5. रस साहित्य और समीक्षायें (१९५६), आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह
  6. हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास

आज का पाठ

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प्रेम-विषयक गल्पों से अरुचि प्रेमचंद द्वारा रचित साहित्य का उद्देश्य का एक अंश है जिसका प्रकाशन जुलाई १९५४ ई॰ में इलाहाबाद के हंस प्रकाशन द्वारा किया गया था।

"जनता की साहित्यिक रुचि के विषय में बुकसेलरों से अच्छी जानकारी शायद ही किसी को होती हो। और लोग अक़लीगद्दा लगाते हैं, बुकसेलर को इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। अभी थोड़े दिन हुए एक समाचार पत्र ने कई बडे-बड़े बुकसेलरों से पूछा था कि आजकल आप लोगों के यहाँ किस विषय की पुस्तकों की ज्यादा माँग है। इसका बुकसेलरों ने जो उत्तर दिया, उसका साराश यों है:
'जहाँ तक पुस्तकों की बिक्री का सम्बन्ध है, कल्पना साहित्य बड़ी आसानी से प्रथम स्थान ले लेता है। कहानियों के संग्रह, उपन्यास, नाटक और कई विख्यात लेखकों के निबन्ध-यह सब इसी श्रेणी में आ जाते हैं। लेकिन प्रेम-विषयक और शृङ्गारपूर्ण रचनाओं की अब उतनी खपत नहीं रही, जितनी कई साल पहले थी।..."(पूरा पढ़ें)


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