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मार्च की निर्वाचित पुस्तक
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सप्ताह की पुस्तक
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कटोरा भर खून बाबू देवकीनन्दन खत्री द्वारा रचित उपन्यास है जिसका प्रकाशन नई दिल्ली में शारदा प्रकाशन द्वारा सन् १९८४ ई॰ में किया गया था।


""लोग कहते हैं कि 'नेकी का बदला नेक और बदी का बदला बद से मिलता है' मगर नहीं, देखो, आज मैं किसी नेक और पतिव्रता स्त्री के साथ बदी किया चाहता हूँ। अगर मैं अपना काम पूरा कर सका तो कल ही राजा का दीवान हो जाऊँगा। फिर कौन कह सकेगा कि बदी करने वाला सुख नहीं भोग सकता या अच्छे आदमियों को दुःख नहीं मिलता? बस मुझे अपना कलेजा मजबूत करके रखना चाहिये, कहीं ऐसा न हो कि उसकी खूबसूरती और मीठी-मीठी बातें मेरी हिम्मत···(रुक कर) देखो, कोई आता है!"..."(पूरा पढ़ें)


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हिन्दी भाषा की उत्पत्ति महावीर प्रसाद द्विवेदी रचित हिंदी भाषा संबंधी हिंदी की पहली पुस्तक है जिसका प्रकाशन १९२५ ई॰ में प्रयाग के इंडियन प्रेस, लिमिटेड द्वारा किया गया था।


"हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का पता लगाने और उसका थोड़ा भी इतिहास लिखने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं; क्योंकि इसके लिए पतेवार सामग्री कहीं नहीं मिलती। अधिकतर अनुमान ही के आधार पर इमारत खड़ी करनी पड़ती है, और यह सबका काम नहीं। इस विषय के विवेचन में पाश्चात्य पण्डितों ने बड़ा परिश्रम किया है। उनकी खोज की बदौलत अब इतनी सामग्री इकट्ठी हो गई है कि उसकी सहायता से हिन्दी की उत्पत्ति और विकास आदि का थोड़ा-बहुत पता लग सकता है। हिन्दी की माता कौन है? मातामही कौन है? प्रमातामही कौन है? कौन कब पैदा हुई? कौन कितने दिन तक रही? हिन्दी का कुटुम्ब कितना बड़ा है? उसकी इस समय हालत क्या है? इन सब बातों का पता लगाना-और फिर ऐतिहासिक पता, ऐसा वैसा नहीं—बहुत कठिन काम है। मैक्समूलर, काल्डवेल, बीम्स और हार्नली आदि विद्वानों ने इन विषयों पर बहुत कुछ लिखा है और बहुत-सी अज्ञात बातें जानी हैं, पर खोज, विचार और अध्ययन से भाषाशास्त्र-विषयक नित नई बातें मालूम होती जाती हैं। इससे पुराने सिद्धान्तों में परिवर्तन दरकार होता है! कोई-कोई सिद्धान्त तो बिलकुल ही असत्य साबित हो जाते हैं। अतएव भाषाशास्त्र की इमारत हमेशा ही गिरती रहती है और हमेशा ही उसकी मरम्मत हुआ करती है।..."(पूरा पढ़ें)


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रचनाकार
रचनाकार

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (15 अप्रैल 1865 — 16 मार्च 1947) हिंदी भाषा के कवि, निबंधकार तथा संपादक थे। विकिस्रोत पर उपलब्ध उनकी रचनाएँ:

  1. प्रियप्रवास (1914), खड़ी बोली हिंदी का पहला महाकाव्य जो कृष्ण के गोकुल से मथुरा प्रवास की घटना पर आधारित
  2. चोखे चौपदे (1924), हरिऔध हजारा नाम से भी प्रसिद्ध इस पुस्तक में एक हजार चौपदे हैं
  3. वेनिस का बाँका (1928), अंग्रेजी नाटक मर्चेंट ऑफ वेनिस का अनुवाद
  4. रसकलस (1931), मुक्तकों का संग्रह
  5. रस साहित्य और समीक्षायें (१९५६), आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह
  6. हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास

आज का पाठ

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यलोरा के गुफा-मन्दिर महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन चिह्न का एक अंश है जिसका प्रकाशन १९२९ ई॰ में प्रयाग के इंडियन प्रेस द्वारा किया गया था।

"ये गुफा-मन्दिर पर्वत काटकर उसी की पार्वतीय चट्टानों में, भीतर ही भीतर, गढे गये हैं। इनको बनाने मे बाहर से ईट, पत्थर लाकर नहीं लगाया गया। पहाड़ों में से एक छोटी सी पटिया काटकर निकालने मे कितना भगीरथ प्रयत्न करना पड़ता है; फिर उसको काटकर उसके भीतर मन्दिर खड़ा कर देना कितने कौशल, कितने यत्न और कितने श्रम का काम है, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
१ से लेकर ९ नम्बर तक के वौद्ध मन्दिरों मे अनेक मनोहर-मनोहर मूर्तियाँ हैं। कही अवलोकितेश्वर बुद्ध की प्रतिमा है, कही पद्मपाणि की, कही अक्षोभ्य की, और कहीं अमिताभ की। तारा, सरस्वती और मञ्जु श्री आदि शक्तियों की मूर्तियाँ भी ठौर-ठौर पर हैं, उनकी सेवा विद्याधर कर रहे हैं। इन मूर्तियों की बनावट इतनी अच्छी और इतनी निर्दोष है कि किसी-किसी को, इस समय भी, इन्हें देखकर इनके सजीव होने की शङ्का होती है। एक हाथ में माला, दूसरे मे कमल- पुष्प, कन्धे में मृग-चर्म लिये हुए अभय और धर्म-चक्र-मुद्रा में ध्यानस्थ बुद्ध की मूर्तियों को देखकर मन मे अपूर्व श्रद्धा और भक्ति का उन्मेष होता है। ..."([[प्राचीन चिह्न/यलोरा के गुफा-मन्दिर |पूरा पढ़ें]])


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