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नव-निधि/ममता

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नव-निधि  (1948) 
द्वारा प्रेमचंद

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बाबू रामरक्षादास दिल्ली के ऐश्वर्यशाली खत्री थे, बहुत ही ठाट-बाट से रहनेवाले। बड़े बड़े अमीर उनके यहाँ नित्य आते थे। वे आये हुओं का आदर-सत्कार ऐसे अच्छे ढंग से करते थे कि इस बात की धूम सारे महल्ले में थी। नित्य उनके दरवाजे पर किसी न किसी बहाने से इष्ट-मित्र इकट्ठा हो जाते, टेनिस खेलते, ताश उड़ता, हारमोनियम के मधुर स्वरो से जी बहलाते, चाय-पानी से हृदय प्रफुल्लित करते और अपने उदार मित्र के व्यवहार की प्रशंसा करते। बाबू साहब दिन भर में इतने रंग बदलते थे कि उन पर 'पेरिस' की परियों को भी ईयां हो सकती थी। कई बैंकों में उनके हिस्से थे। कई दुकाने थीं। किन्तु बाबू साहम को इतना अवकाश न था कि उनकी कुछ देखभाल करते ! अतिथि सत्कार एक पवित्र धर्म है। वे सच्ची देश-हितैषिता की उमंग में कहा करते थे ~ अतिथि-सत्कार आदि काल से भारतवर्ष के निवासियों का एक प्रधान और सराहनीय गुण है। अभ्यागतों का आदर-सम्मान करने में हम अद्वि- तीय हैं। हम इसीसे संसार में मनुष्य कहलाने योग्य हैं। हम सब कुछ खो बैठे है, किन्तु जिस दिन हममें यह गुण शेष न रहेगा, वह दिन हिन्दू-जाति के लिए लज्जा, अपमान और मृत्यु का दिन होगा।

मिस्टर रामरक्षा जातीय आवश्यकताओं में भी बेपरवाह न थे। वे सामा-जिक और राजनीतिक कार्यों में पूर्णरूप से योग देते थे। यहाँ तक कि प्रतिवर्ष दो;बल्कि कभी-कभी तीन वक्तृताएँ अवश्य तैयार कर लेते। भाषणों की भाषा अत्यन्त उपयुक्त, प्रोजस्विनी और सर्वांग-सुन्दर होती थी। उपस्थित जन और इष्टमित्र उनके एक-एक शब्द पर प्रशंसा सूचक शब्दों की ध्वनि प्रकट करते, तालियाँ बजाते, यहाँ तक कि बाबू साहब को व्याख्यान का क्रम स्थिर रखना कठिन हो जाता। ब्याख्यान समाप्त होने पर उनके मित्र उन्हें गोद में उठा लेते और आश्चर्य चकित होकर कहते-तेरी भाषा में जादू है। इससे अधिक और
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क्या चाहिए ? जाति की ऐसी अमूल्य सेवा कोई छोटी बात नहीं है। नीचो नातियों के सुधार के लिए दिल्ली में एक सोसायटी थी। बाबू साहब उसके सेक्रेटरी थे, और इस कार्य को असाधारण उत्साह से पूर्ण करते थे। जब उनका बूढ़ा कहार बीमार हुआ और क्रिश्चियन मिशन के डाक्टरों ने उसकी सश्रूषा को,तथा जब उसकी विधवा स्त्री ने निर्वाह को कोई आशा न देखकर क्रिश्चियन- समाज का आश्रय लिया, तब इन दोनों अवसरों पर बाबू साहब ने शोक केरेजोल्यूशन पास किये। संसार जानता है कि सेक्रेटरी का काम सभाएँ करना और रेजोल्यूशन बनाना है। इससे अधिक वह कुछ नहीं कर सकत।

मिस्टर रामरक्षा का जातीय उत्साह यहीं तक सीमाबद्ध न था। वे सामा-जिक कुप्रथाओं तथा अन्ध-विश्वास के प्रबल शत्र थे। होली के दिनों में जबकि मुहल्ले के चमार और कहार शराब से मतवाले होकर फाग गाते और डफ बजाते हुए निकलते, तो उन्हें बड़ा शोक होता। जाति की इस मूर्खता पर उनकी आँखों में आँसू भर पाते और वे प्रायः इस कुरीति का निवारण अपने हण्टर से किया करते। उनके हण्टर में जाति-हितषिता की उमंग उनकी वक्तृता से भी अधिक थी। उन्हीं के प्रशंसनीय प्रयत्न थे, जिन्होंने मुख्य होली के दिन। दिल्ली में हलचल मचा दी, फाग गाने के अपराध में हजारों आदमी पुलिस के पंजे में आ गये। सैकड़ों घरों में मुख्य होली के दिन मुहर्रम का-सा शोक फैल गया। उधर उनके दरवाजे पर हज़ारो पुरुष और स्त्रियाँ अपना दुखड़ा रो रही थीं। उधर बाबू साहब के हितैषी मित्रगण उनकी इस उच्च और निःस्पृह समाज-सेवा पर हार्दिक धन्यवाद दे रहे थे। सारांश यह कि बाबू साहब का यह जातीय प्रेम और उद्योग केवल बनावटी, सहृदयताशून्य तथा शि-नेबिल था। हाँ, यदि उन्होंने किसी सदुपयोग में भाग लिया था, तो वह सम्मि-लित कुटुम्ब का विरोध था। अपने पिता के देहान्त के पश्चात् वे अपनी विधवा मा से अलग हो गये थे। इस जातीय सेवा में उनकी स्त्री विशेष सहायक थी।विधवा मा अपने बेटे और बहू के साथ नहीं रह सकती। इससे बहू की स्वाधीनता में विघ्न पड़ता है और स्वाधीनता में विघ्न पड़ने से मन दुर्बल और मस्तिष्क शक्तिहीन हो जाता है। बहू को जलाना और कुढ़ाना सास की आदत है। इसलिए बाबू रामरक्षा अपनी मा से अलग हो गये इसमें सन्देह नहीं कि
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उन्होंने मातृऋण का विचार करके दस हजार रुपये अपनी मा के नाम जमा कर दिये कि उसके ब्याज से उसका निर्वाह होता रहे ;किन्तु बेटे के इस उत्तम आचरण पर मा का दिल ऐसा टूटा कि वह दिल्ली छोड़कर अयोध्या जा रही तबसे वहीं रहती है। बाबू साहब कभी-कभी मिसेज रामरक्षा से छिपकर उससे मिलने अयोध्या जाया करते थे, किन्तु वह दिल्ली पाने का कभी नाम न लेती।हाँ, यदि कुशल-क्षेम की चिट्ठी पहुँचने में कुछ देर हो जाती, तो विवश होकर समाचार पूछ लेती थी।

उसी महल्ले में एक सेठ गिरधारीलाल रहते थे। उनका लाखों का लेना देन था। वे हीरे और रत्नों का व्यापार करते थे। बाबू रामरक्षा के दूर के नाते में साढू होते थे। पुराने ढंग के आदमी थे-प्रातः काल यमुना-स्नान करनेवाले,गाय को अपने हाथों से झाड़ने-पोछनेवाले, उनसे मिस्टर रामरक्षा का स्वभाव न मिलता था ; परन्तु जब कभी रुपयों की आवश्यकता होती, तो वे सेठ गिरधारीलाल के यहाँ से बे खटके मँगा लिया करते। आपस का मामला था, केवल चार अँगुल के पत्र पर रुपया मिल जाता था, न कोई दस्तावेज़, न स्टाम्प, न साक्षियों की आवश्यकता। मोटरकार के लिए दस हज़ार की आवश्यकता हुई, वह वहाँ से आया। घुड़दौड़ के लिए एक आस्ट्रलियन घोड़ा डेढ़ हजार में लिया, उनके लिए भी रुपया सेठजी के यहाँ से आया। धीरे-धीरे कोई बीस हज़ार का मामला हो गया। सेठजी सरल हृदय के आदमी थे। सपझते थे कि उनके पास दूकानें हैं। बैंकों में रुपया है। जब जी चाहेगा, रुपया वसूल कर लेंगे, किन्तु जब दो-तीन वर्ष व्यतीत हो गये और सेठजी के तकाजों की अपेक्षा मिस्टर रामरक्षा की माँग ही का आधिक्य रहा, तो गिरधारीलाल को सन्देह हुआ। वह एक दिन रामरक्षा के मकान पर आये और सभ्य-भाव से बोले-भाई साहब, मुझे एक हुण्डी का रुपया देना है, यदि आप मेरा हिसाब कर दें तो बहुत अच्छा हो। यह कहकर हिसाब के काग़ज़ात और उनके पत्र दिखलाये। मिस्टर रामरक्षा किसी गार्डनपार्टी में सम्मिलित होने के लिए तैयार थे। बोशे-इस समय दमा कीजिए। फिर देख लूंगा, जल्दी क्या है ? [ १०६ ]

गिरधारीलाल को बाबू साहब की रुखाई पर क्रोध आ गया। वे रुष्ट होकर बोले-आपको जल्दी नहीं है, मुझे तो है ? दो सौ रुपये मासिक की मेरी हानि हो रही है। मिस्टर रामरक्षा ने असन्तोष प्रकट करते हुए घड़ी देखी। पार्टी का समय बहुत करीब था। वे बहुत विनीत भाव से बोले-भाई साहब, मैं बड़ी जल्दी में हूँ। इस समय मेरे ऊपर कृपा कीजिए, मैं कल स्वयं उपस्थित हूँगा।

सेठ जी एक माननीय और धन-सम्पन्न आदमी थे। वे रामरक्षा के इस कुरुचिपूर्ण व्यवहार पर जल गये। में इनका महानन, इनसे धन में, मान में, ऐश्वर्य में बढ़ा हुआ. चाहूँ तो ऐसों को नौकर रख लूँ, इनके दरवाजे पर पाऊँ और आदर-सत्कार की जगह उलटे ऐसा रूखा बर्ताव ? वह हाय बाँधे मेरे सामने न खड़ा रहे, किन्तु क्या मैं पान-इलायची इत्र आदि से भी सम्मान करने के योग्य नहीं ? वे तिनककर बोले-अच्छा, तो कल हिसाब साफ़ हो जाय।

रामरक्षा ने अकड़कर उत्तर दिया-हो जायगा।

रामरक्षा के गौरवशाली हृदय पर सेठजी के इस बर्ताव का प्रभाव कुछ कम खेदजनक न हुआ। इस काठ के कुन्दे ने आज मेरी प्रतिष्ठा धूल में मिला दी। वह मेग अपमान कर गया। अच्छा, तुम भी इसी दिल्ली में रहते हो और हम भी यहीं हैं। निदान दोनों में गाँठ पड़ गई। गबू साहब की तबीयत ऐसी गिरी और हृदय में ऐसी चिन्ता उत्पन्न हुई की पार्टी में जाने का ध्यान जाता रहा। वे देर तक इसी उलझन में पड़े रहे। फिर सूट उतार दिया और सेवक से बोले-जा, मुनीमजी को बुला ला। मुनीमजी आये। उनका हिसाब देखा गया, फिर बैंकों का एकाउण्ट देखा। किन्तु ज्यों-ज्यों इस घाटी में उतरते गये, त्यों-त्यों अंधेरा बढ़ता गया। बहुत कुछ टटोला, कुछ हाथ न आया। अन्त में निराश होकर वे आगम-कुर्मी पर पड़ गये और उन्होंने एक ठण्डी साँस ले ली। दूकानों का माल बिका, किन्तु रुपया बकाया में पड़ा हुआ था। कई ग्राहकों की दुकानें टूट गई है और उन पर जो नकद रुपया बकाया था, वह डूब गया। कलकत्ते के अढ़तियों से जो माल मँगाया था, रुपये चुकाने की तिथि सिर पर आ पहुंची और यहाँ रुपया वसूल न हुआ। दूकानों का यह हाल, बैंकों का इससे भी बुरा। रातभर वे इन्हीं चिन्तामों में करवटें बदलते रहे। अब क्या करना चाहिए। गिरधारीलाल सज्जन पुरुष है। यदि सारा कच्चा हाल उसे सुना दूं तो अवश्य
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मान बायगा। किन्तु यह कष्टप्रद कार्य होगा कैसे ! ज्यों-ज्यो प्रातःकाल समीप आता था, त्यों-त्यों उनका दिल बैठा जाता था। कच्चे विद्यार्थी की मो दशा परीक्षा के सन्निकट आने पर होती है, वही हाल इस समय रामरक्षा का था। वे पलँग से न उठे। मुँह-हाथ भी न बोया, खाने को कौन कहे। इतना जानते थे कि दुःख पड़ने पर कोई किसी का साथी नहीं होता, इसलिए एक आपत्ति से बचने के लिए कहीं कई आपत्तियों का बोझा न उठाना पड़े। मित्रों को इन मामलों की ख़बर तक न दी। मब दोपहर हो गया और उनकी दशा ज्यों-की-त्यों रही तो उनका छोटा लड़का बुलाने पाया। उसने बाप का हाथ पकड़कर कहा- सालाजी, आज काने क्यों नहीं तलते ?

रामरक्षा- भूख नहीं है।

क्या काया है?

मन की मिठाई।

और क्या काया है।

मार।

किसने मारा।

गिरधारीलाल ने।

बड़का रोता हुआ घर में गया और इस मार की चोट से देर तक रोता रहा। अन्त में तश्तरी में रखी हुई दूध की मलाई ने उसकी इस चोट पर मरहम का काम किया।

रोगी को जब जीने की प्राण नहीं रहती तो औषधि छोड़ देता है। मिस्टर रामरक्षा जब इस गुत्थी को न सुलझा सके, तो चादर तान ली और मुँह लपेट-कर सो रहे। शाम को एकाएक उठकर सेठजी के यहाँ जा पहुंचे और कुछ असावधानी से बोले-महाशय, मैं आपका हिसाब नहीं कर सकता।

सेठजी घबराकर बोले-क्यों ?

रामरक्षा-इसलिए कि मैं इस समय दरिद्र हूँ। मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है। आप अपना रुपया जैसे चाहे, वसूल कर ले। [ १०८ ]

सेठ-यह आप कैसी बातें कहते हैं ?

रामरक्षा-बहुत सच्ची।

सेठ-दूकानें नहीं हैं ?

रामरक्षा-दुकाने आप मुफ्त ले जाइए।

सेठ-बैंक के हिस्से ?

रामरक्षा-वह करके उड़ गये।

सेठ-जब यह हाल था, तो आपको उचित नहीं था कि मेरे गले पर कुरी फेरते ?

रामरक्षा-(अभिमान से ) मैं आपके यहाँ उपदेश सुनने के लिए नहीं आया हूँ।

यह कहकर मिस्टर रामरक्षा वहाँ से चल दिये। सेठजी ने तुरन्त नालिश कर दी। बीस हजार मूल, पाँच हजार व्याज। डिगरी हो गई। मकान नीलाम पर चढ़ा। पन्द्रह हजार की जायदाद पाँच हजार में निकल गई। दस हजार की मोटर चार हजार में बिकी। सारी सम्पत्ति उड जाने पर कुल मिलाकर सोलह हजार से अधिक रकम न खड़ी हो सकी। सारी गृहस्थी नष्ट हो गई, तब भी दस हजार के ऋणी रह गये। मान-बड़ाई, धन-दौलत, सब मिट्टी में मिल गये। बहुत तेज दौड़नेवाला मनुष्य प्रायः मुँह के बल गिर पड़ता है।

इस घटना के कुछ दिनों पश्चात् दिल्ली म्युनिसिपैलिटी के मेम्बरों का चुनाव प्रारम्भ हुआ। इस पद के अभिलाषी वोटरों की पूजाएँ करने लगे। दलालों के भाग्य उदय हुए। सम्मतियाँ मोतियों के तौल बिकने लगी। उम्मेदवार मेम्बरों के सहायक अपने-अपने मुवक्किल के गुणगान करने लगे। चारों ओर चहल-पहल मच गई। एक वकील महाशय ने भरी सभा में अपने मुवक्किल साहब के विषय में कहा-

'मैं जिस बुजुरुग का पैरोकार हूँ वह कोई मामूली आदमी नहीं है। यह वह शख्स है जिसने अपने फ़रजन्द अकबर की शादी में पचीस हजार रुपया सिर्फ रक्स व सरूर में सर्फ कर दिया था।' [ १०९ ]

उपस्थित जनों में प्रशंशा की उच्च ध्वनि हुई।

एक दूसरे महाशय ने अपने मुहाल के वोटरों के सम्मुख अपने मुवक्किल की प्रशंसा यों की-

'मैं यह नहीं कहता कि आप सेठ गिरधारीलाल को अपना मेम्बर बनाइए। आप अपना भला-बुरा स्वयं समझते हैं, और यह भी नहीं है कि सेठजी मेरे द्वारा अपनी प्रशंसा के भूखे हों। मेरा निवेदन केवल यही है कि आप जिसे मेम्बर बनायें, पहले उसके गुणदोषों का भली भाँति परिचय ले लें। दिल्ली में केवल एक आदमी है कि जिसने पानी पहुँचाने और स्वच्छता के प्रबन्धों में हार्दिक धर्म-भाव से सहायता दी है। केवल एक पुरुष है बिसको श्रीमान् वायसराय के दरबार में कुर्सी पर बैठने का अधिकार प्राप्त है और आप सब महाशय उसे जानते हैं।

उपस्थित जनों ने तालियाँ बजाई।

सेठ गिरधारीलाल के महल्ले में उनके एक प्रतिवादी थे। नाम था मुंशी फैजुल-रहमान खाँ। बड़े जमींदार और प्रसिद्ध वकील थे। बाबू रामरक्षा ने अपनी दृढ़ता, साहस, बुद्धिमत्ता और मृदु भाषण से मुंशी साहब की सेवा करनी प्रारम्भ की। सेठजी को परास्त करने का यह अपूर्व अवसर हाथ आया। वे रात और दिन इसी धुन में लगे रहते। उनकी मीठी और रोचक बातों का प्रभाव उपस्थित जनों पर बहुत ही अच्छा पड़ता। एक बार आपने असाधारण श्रद्धा की उमंग में आकर कहा-मैं डंके की चोट कहता हूँ कि मुंशी फैजुलरहमान से अधिक योग्य आदमी आपको दिल्ली में न मिल सकेगा। यह वह आदमी है जिसकी गजलों पर कविमनों में वाह-वाह मच जाती है। ऐसे श्रेष्ठ आदमी की सहायता करना मैं अपना जातीय और सामानिक धर्म समझता हूँ। अत्यन्त शोक का विषय है कि बहुत-से लोग इस भातीय और पवित्र काम को व्यक्तिगत लाभ का साधन बना लेते हैं। धन और वस्तु है, श्रीमान् वायसराय के दरबार में प्रतिष्ठित होना और वस्तु। किन्तु सामाजिक सेवा, भातीय चाकरी और ही चीज है। और वह मनुष्य जिसका जीवन ब्याज-प्राप्ति, बेईमानी, कठोरता तथा निर्दयता और सुख-विलास में व्यतीत होता हो, वह इस सेवा के योग्य कदापि नहीं है। [ ११० ]

सेठ गिरधारीलाल इस अन्योक्ति-पूर्ण भाषण का हाल सुनकर क्रोध से आग हो गये। मैं बेईमान हूँ ! ब्याज का धन खानेवाला हूँ ! विषयी हूँ ! कुशल हुई, जो तुमने मेरा नाम नहीं लिया। किन्तु अब भी तुम मेरे हाथ में हो, मैं अब भी तुम्हें जिस तरह चाहूँ, नचा सकता हूँ। खुशामदियों ने आग पर तेल डाला। इधर रामरक्षा अपने काम में तत्पर रहे। यहाँ तक कि 'वोटिंग डे' या पहुँचा। मिस्टर रामरक्षा को अपने उद्योग में बहुत कुछ सफलता प्राप्त हुई थी। श्राज उसको जान पड़ेगा कि धन संसार के सब पदार्थों को इकट्ठा नहीं कर सकता। जिस समय फैजुलरहमान के वोट अधिक निकलेंगे और मैं तालियाँ बजाऊँगा, उस समय गिरधारीलाल का चेहरा देखने योग्य होगा। मुंह का रंग बदल जायगा, हवाइयाँ उड़ने लगेंगी, आँखें न मिला सकेगा-शायद फिर मुझे मुंह न दिखा सके। इन्हीं विचारों में मग्न रामरक्षा शाम को टाउन- हाल में पहुँचे। उपस्थित सभ्यों ने बड़ी उमंग के साथ उनका स्वागत किया। थोड़ी देर बाद वोटिङ्ग' प्रारम्भ हुआ। मेम्बरी मिलने की आशा रखनेवाले महानुभाव अपने-अपने भाग्य का अन्तिम फल सुनने के लिए आतुर हो रहे थे। छः बजे चेयरमैन ने फैसला सुनाया। सेठजी की हार हो गई। फैजुल- रहमान ने मैदान मार लिया। रामरक्षा ने हर्ष के आवेग में टोपी हवा में उछाल दी और वे स्वयं भी कई बार उछल पड़े। महल्लेवालों को अचम्भा हुआ। चाँदनी-चौक से सेठजी को हटाना मेरु को स्थान से उखाड़ना था। सेठजी के चेहरे से रामरक्षा को जितनी आशाएँ थीं, वे सब पूरी हो गई। उनका रंग फीका पड़ गया था। वे खेद और लज्जा की मूर्ति बने हुए थे।

एक वकील साहब ने उनसे सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा-सेठजी, मुझे आपकी हार का बहुत बड़ा शोक है। मैं जानता कि यहाँ खुशी के बदले रंज होगा तो कभी यहाँ न पाता। मैं तो केवल आपके ख्याल से यहाँ पाया था। सेठजी ने बहुत रोकना चाहा; परन्तु आँखों में आँसू डबडबा ही अये। वे निःस्पृह बनने का व्यर्थ प्रयत्न करके बोले, "वकील साहब, इसकी मुझे कुछ चिन्ता नहीं। कौन रियासत निकल गई ? व्यर्थ उलझन, चिन्ता तथा झंझट हती थी। चलो, अच्छा हुश्रा, गला छूटा। अपने काम में हर्ज होता था। [ १११ ]
सत्य कहता हूँ, मुझे तो हृदय से प्रसन्नता ही हुई। यह काम तो बेलामवालों के लिए है, घर न बैठे रहे यहीं वेगार की। मेरी मूर्खता थी कि मैं इतने दिनों तक आँखें बन्द किये बैठा रहा।" परन्तु सेठजी की मुखाकृति ने इन विचारों का प्रमाण न दिया। मुखमण्डल हृदय का दर्पण है, इसका निश्चय अलबत्ता हो गया।

किन्तु बाबू रामरक्षा बहुत देर तक इस आनन्द का मजा न लूटने पाये और न सेठजी को बदला लेने के लिए बहुत देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ी । सभा विसर्जित होते ही जब बाबू रामरक्षा सफलता के उमंग में ऐंठते, मोछ पर ताव देते और चारों ओर गर्व की दृष्टि डालते हुए बाहर आये, तो दीवानी के तीन सिपाहियों ने आगे बढ़कर उन्हें गिरफ्तारी का वारण्ट दिखा दिया। अबकी बाबू रामरक्षा के चेहरे का रंग उतर जाने की और सेठजी के इस मनोवांछित दृश्य से आनन्द उठाने की बारी थी। गिरधारीलाल ने आनन्द की उमंग में तालियाँ तो न बजाई, परन्तु मुसकुराकर मुँह फेर लिया। रङ्ग में भङ्ग पड़ गया।

आज इस विजय के उपलक्ष्य में मुंशी फैजुलरहमान ने पहले से एक बड़े समारोह के साथ गार्डनपार्टी की तैयारियाँ की थी। मिस्टर रामरक्षा इसके प्रबन्धकर्ता थे। अाज की 'आफ्टर डिनर स्पीच' उन्होंने बड़े परिश्रम से तैयार की थी, किन्तु इस वारट ने सारी कामनाओं का सत्यानाश कर दिया। यो तो बाबू साहब के मित्रों में ऐसा कोई भी न था नो दस हज़ार रुपये की जमानत दे देता, अदा कर देने का तो विक्र ही क्या, किन्तु कदाचित् ऐसा होता भी तो सेठजी अग्ने को भाग्यहीन समझते। दस हजार रुपया और म्युनिसिपैलिटी की प्रतिष्ठित मेम्बरी खोकर उन्हें इस समय यह हर्ष प्राप्त हुआ था।

मिस्टर रामरक्षा के घर पर ज्यों ही यह खबर पहुँची, कुहराम मच गया। उनकी स्त्री पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। जब कुछ होश में आई तो रोने लगी, और रोने से छुट्टी मिली तो उसने गिरधारीलाल को कोसना प्रारम्भ किया। देवी-देवता मनाने लगी। उन्हें रिशवतें देने पर तैयार हुई कि वे गिर-धारीलाल को किसी प्रकार निगल जायँ । इस बड़े भारी काम में वह गंगा और यमुना से सहायता मांग रही थी, प्लेग और विसूचिका की खुशामदें कर रही थी
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कि ये दोनों मिलकर इस गिरधारीलाल को हड़पते बायँ। किन्तु गिरधारीलाल का कोई दोष नहीं। दोष तुम्हारा है। बहुत अच्छा हुआ। तुम इसी पूजा के देवता थे।। क्या अब दावते न खिलाओगे ? मैंने तुम्हें कितना समझाया, रोई, रूठी, विगडी किन्तु तुमने एक न सुनी। गिरधारीलाल ने बहुत अच्छा किया। तुम्हें शिक्षा तो मिल गई‌। किन्तु तुम्हारा भी दोष नहीं, यह सब बाग मैंने लगाई है। मखमनी स्लीपरों के बिना मेरे पाँव नहीं उठते थे। विना जड़ाऊ कड़ों के मुझे नींद न पाती थी। सेजगाड़ी मेरे ही लिए मैंगवाई गई। अँगरेजी पढ़ाने के लिए मेम साहब को मैंने ही रखा। ये सब काँटे मैंने ही बोये हैं।

मिसेज़ रामरक्षा बहुत देर तक इन्ही विचारों में डूबी रही। पब रात भर करवटें बदलने के बाद सबेरे उठी, तो उसके विचार चारों ओर से ठोकरें खाकर केवल एक केन्द्र पर जमगयेथे-गिरधारीलाल बड़ा बदमाश है और घमंडी है। मेरा सब कुछ लेकर भी उसे सन्तोष नहीं हुआ। इतना भी उस निर्दय कसाई से न देखा गया। भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों ने मिलकर एक रूप धारण किया और क्रोधाग्नि को दहकाकर प्रबल कर दिया। ज्वालामुखी शीशे में जब सूर्य की किरणें एकत्र होती हैं तब अग्नि प्रकट हो जाती है। इस स्त्री के हृदय में रह-रहकर क्रोध की एक असाधारण लहर उत्पन्न होती थी। बच्चे ने मिठाई के लिए हठ किया, उसपर बरस पड़ी। महरी ने चौका-बरतन करके चूल्हे में आग लगा दी, उसके पीछे पड़ गई-मैं तो अपने दुःखों को रो रही हूँ, इस चुडैल को रोटियों की धुन सवार है। निदान ६ बजे उससे न रहा गया। उसने यह पत्र लिखकर अपने हृदय की ज्वाला ठंढी की-

"सेठबी, तुम्हें अब अपने धन के घमंड ने अन्धा कर दिया है, किन्तु किसी का घमण्ड इसी तरह सदा नहीं रह सकता। कभी-न-कभी सिर अवश्य नीचा होता है। अफसोस कि कल शाम को जब तुमने मेरे प्यारे पति को पकड़वाया है, मैं वहाँ मौजूद न थी, नहीं तो अपना और तुम्हारा रक्त एक कर देती। तुम धन के मद में भूले हुए हो। मैं उसी दम तुम्हारा नशा उतार देती। स्त्री के हाथों अपमानित होकर तुम फिर किसी को मुँह दिखाने लायक न रहते। अच्छा, इसका बदला तुम्हें किसी-न-किसी तरह जरूर मिल जायगा। मेरा कलेजा उस दिन ठण्ढा होगा जब तुम निर्देश हो जाओगे और तुम्हारे कुल का नाम मिट जायगा।" [ ११३ ]

सेटजीने यह फटकार पढ़ी तो वे क्रोध से आग हो गये। यद्यपि क्षुद्र-हृदय के मनुष्य न थे; परन्तु क्रोध के आवेग में सौमन्य का चिन्ह भी शेष नहीं रहता। यह ध्यान न रहा कि यह एक दु:खिनी अबला की क्रन्दन-ध्वनि है, एक सताई हुई स्त्री का मानसिक विकार है। उसकी धन-हीनता और विवशता पर उन्हें तनिक भी दया न आई। वे मरे हुए को मारने का उपाय सोचने लगे।

इसके तीसरे दिन सेठ गिरधारीलाल पूजा के आसन पर बैठे हुए थे कि महरा ने आकर कहा- सरकार, कोई स्त्री आपसे मिलने आई है। सेठजी ने पूछा-कौन स्त्री है ? महरा ने कहा-सरकार, मुझे क्या मालूम, लेकिन हैं कोई भले-मानुस। रेशमी साड़ी पहने हुए हैं। हाथ में सोने के कड़े हैं। पैरों में टाट के स्लीपर हैं। बड़े घर की स्त्री जान पड़ती हैं।

यो साधारणतः सेठमी पूजा के समय किसी से नहीं मिलते थे। चाहे कैसा ही आवश्यक काम क्यों न हो, ईश्वरोपासना में सामयिक बाधाओं को घुसने नहीं देते थे। किन्तु ऐसी दशा में जब कि बड़े घर की स्त्री मिलने के लिए आए, तो थोड़ी देर के लिए पूजा में विलम्ब करना निन्दनीय नहीं कहा जा सकता। ऐसा विचार करके वे नौकर से बोले-उन्हें बुला लायो।

जब वह स्त्री आई तो सेठजी स्वागत के लिए उठकर खड़े हो गये। तत्प-श्चात् अत्यन्त कोमल वचनों से कारुणिक शब्दों में बोले, 'माता, कहाँ से आना-हुआ। और जब यह उत्तर मिला कि वह अयोध्या से आई हैं, तो आपने उसे फिर से दण्डवत् की, और चीनी तथा मिश्री से भी अधिक मधुर और नव-नीत से भी अधिक चिकने शब्दों में कहा, 'अच्छा, आप श्री अयोध्याजी से आ रही हैं ? उस नगरी का क्या कहना, देवताओं की पुरी है, बड़े भाग्य थे कि आपके दर्शन हुए। यहाँ आपका आगमन कैसे हुआ ?' स्त्री ने उत्तर दिया,'घर तो मेरा यहीं है। सेठजी का मुख पुनः मधुरता का चित्र बना। वे बोले, 'अच्छा, तो मकान आपका इसी शहर में है ? तो आपने माया-जंजाल को त्याग दिया? यह तो मैं पहले ही समझ गया था। ऐसी पवित्र आत्माएँ संसार में बहुत थोड़ी हैं। ऐसी देवियों के दर्शन दुर्लभ होते हैं। आपने मुझे दर्शन दिये, बड़ी कृपा की। मैं इस योग्य नहीं, जो आप-जैसी विदुषियों को कुछ सेवा
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कर सकूँ। किन्तु जो काम मेरे योग्य हो, जो कुछ मेरे किये हो सकता हो, उसके करने के लिए मैं सब भाँति से तैयार हूँ। यहाँ सेठ-साहूकारों ने मुझे बहुत बदनाम कर रखा है। मैं सबकी आँखों में खटकता हूँ। उसका कारण सिवा इसके और कुछ नहीं कि जहाँ वे लोग लाभ पर ध्यान रखते हैं ; वहाँ मैं भलाई पर ध्यान रखता हूँ। यदि कोई बड़ी अवस्था का वृद्ध मनुष्य मुझसे कुछ कहने-सुनने के लिए आता है तो विश्वास मानो, मुझसे उसका वचन टाला नहीं जाता। कुछ तो बुढ़ापे का विचार, कुछ उसके दिल टूट जाने का डर, कुछ यह ख्याल कि कहीं यह विश्वासघातियों के फन्दे में न फँस जाय, उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विवश कर देता है। मेरा यह सिद्धान्त है कि अच्छी जायदाद और कम ब्याज। किन्तु इस प्रकार की बातें आपके सामने करना व्यर्थ है। आपसे तो घर का मामला है। मेरे योग्य जो कुछ कार्य हो उसके लिए सिर ऑखों से तैयार हूँ।

वृद्ध स्त्री -- मेरा कार्य आप ही से हो सकता है।

सेठजी -- (प्रसन्न होकर) बहुत अच्छा, आज्ञा दो।

स्त्री -- मैं आपके सामने भिखारिनी बनकर आई हूँ। आपको छोड़कर कोई मेरा सवाल पूरा नहीं कर सकता।

सेठजी -- कहिए, कहिए।

स्त्री -- आप रामरक्षा को छोड़ दीजिए।

सेठजी के मुख का रंग उतर गया। सारे हवाई किले जो अभी-अभी तैयार हुए थे, गिर पड़े। वे बोले -- उसने मेरी बहुत हानि की है। उसका घमंड तोड़ डालूँगा तब छोडूँगा।

स्त्री -- तो क्या मेरे बुढ़ापे का, मेरे हाथ फैलाने का और कुछ अपनी बड़ाई का विचार न करोगे ? बेटा, ममता बुरी होती है। संसार से नाता टूट जाय, धन जाय, धर्म जाय, किन्तु लड़के का स्नेह हृदय से नहीं जाता। संयोग सब कुछ कर सकता है, किन्तु बेटे का, स्नेह हृदय से नहीं निकल सकता। इस पर हाकिम का, राजा का यहाँ तक कि ईश्वर का भी बस नहीं है। तुम मुझ पर तरस खाओ। मेरे लड़के की जान छोड़ दो, तुम्हें बड़ा यश मिलेगा। मैं जब तक जीऊँगी तुम्हें आशीर्वाद देती रहूँगी। [ ११५ ]

सेठजी का हृदय कुछ पसीजा। पत्थर की तह में पानी रहता है। किंतु तत्काल ही उन्हें मिसेज़ रामरक्षा के उस पत्र का ध्यान आ गया। वे बोले-- तो मैं न बोलता। आपके कहने से मैं अब भी उनका अपराध क्षमा कर सकता हूँ। परंतु उनकी बीवी साहबा ने जो पत्र मेरे पास भेजा है, उसे देखकर शरीर में आग लग जाती है। दिखाऊँ आपको ?

रामरक्षा की माँ ने पत्र लेकर पढ़ा तो उनकी आँखों में आँसू भर आये। वे बोलीं-बेटा, उस स्त्री ने मुझे बहुत दुःख दिया है। उसने मुझे देश से निकाल दिया। उसका मिजाज और ज़बान उसके वश में नहीं। किन्तु इस समय उसने जो गर्व दिखाया है. उसका तुम्हें ख्याल नहीं करना चाहिए। तुम इसे भुला दो। तुम्हारा देश-देश में नाम है। यह नेकी तुम्हारे नाम को और भी फैला देगी। मैं तुमसे प्रण करती हूँ कि सारा समाचार रामरक्षा से लिखवाकर किसी अच्छे समाचार-पत्र में छपवा दूंँगी। रामरक्षा मेरा कहना नहीं टालेगा। तुम्हारे इस उपकार को वह कभी न भूलेगा। जिस समय ये समाचार संवादपत्रों में छपेंगे उस समय हजारों मनुष्यों को तुम्हारे दर्शन की अभिलाषा होगी। सरकार में तुम्हारी बड़ाई होगी और मैं सच्चे हृदय से कहती हूँ कि शीघ्र ही तुम्हें कोई न कोई पदवी मिल जायगी। रामरक्षा की अँगरेजों से बहुत मित्रता है, वे उसकी बात कभी न टालेंगे।

सेठजी के हृदय में गुदगुदी पैदा हो गई। यदि इस व्यवहार से वह पवित्र और माननीय स्थान प्राप्त हो जाय, जिसके लिए हजारों खर्च किये, हजारों गालियाँ मिली, हजारों अनुनय-विनय की, हजारों खुशामदें की, खानसामों की झिड़कियाँ सही, बँगलों के चक्कर लगाये ! अहा, इस सफलता के लिए ऐसे कई हज़ार मैं खर्च कर सकता हूँ। निस्संदेह मुझे इस काम में रामरक्षा से बहुत कुछ सहायता मिल सकती है। किन्तु इन विचारों को प्रकट करने से क्या लाभ ? उन्होंने कहा, "माता, मुझे नाम-नमूद की बहुत चाह नहीं है। बड़ों ने कहा है. 'नेकी कर और दरिया में डाल।' मुझे तो आपकी बात का ख्याल है। पदवी मिले तो लेने से इन्कार नहीं, न मिले तो उसकी तृष्णा भी नहीं। परन्तु यह तो बताइए कि मेरे रुपयों का क्या प्रबन्ध होगा। आपको मालूम होगा कि मेरे दस हज़ार रुपये जाते हैं।" [ ११६ ]

रामरक्षा की माँ ने कहा-तुम्हारे रुपये की ज़मानत मैं करती हूँ। यह देखो, बंगाल-बंक की पास बुक है। उसमें मेरा दस हज़ार रुपया जमा है। उस रुपये से तुम रामरक्षा को कोई व्यवसाय करा दो। तुम उस दुकान के मालिक रहोगे, रामरक्षा को उसका मैनेजर बना देना। जब तक वह तुम्हारे कहे पर चते, तब तक निभाना। नहीं तो दुकान तुम्हारी है। मुझे उसमें से कुछ नहीं चाहिए। मेरी खोज-खबर लेनेवाला ईश्वर है। रामरक्षा अच्छी तरह रहे, इससे अधिक मुझे और कुछ न चाहिए, यह कहकर पासबुक सेठजी को दे दी। माँ के इस अथाह प्रेम ने सेठ जी को विह्वल कर दिया। पानी उबल पड़ा और पत्थर उसके नीचे ढक गया। जीवन में ऐसे पवित्र दृश्य देखने के कम अवसर मिलते हैं। सेठजी के हृदय में परोपकार की एक लहर-सी उठी। उनकी आँखें डबडबा आई। जिस प्रकार पानी के बहाव से कभी-कभी बाँध टूट जाता है, उसी प्रकार परोपकार की इस उमंग ने स्वार्थ और माया के बाँध को तोड़ दिया। वे पास बुक वृद्धा स्त्री को वापस देकर बोले-माता, यह अपनी किताबलो। मुझे अब अधिक न लज्जित करो। यह देखो, रामरक्षा का नाम बही से उड़ा देता हूँ ! मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैंने अपना सब कुछ पा लिया। आज तुम्हारा रामरक्षा तुमको मिल जायगा।

इस घटना के दो वर्ष उपरान्त टाउनहाल में फिर एक बड़ा जलसा हुआ। बैंड बज रहा था। झंडियाँ और ध्वजाएँ वायु-मण्डल में लहरा रही थीं। नगर के सभी माननीय पुरुष उपस्थित थ । लैंडो, फिटन और मोटरों से अहाता भरा हुआ था। एकाएक मुश्की घोड़ों की फिटन ने अहाते में प्रवेश किया। सेठ गिरधारीलाल बहुमूल्य वस्त्रों से सजे हुए उसमें से उतरे। उनके साथ एक फैसनेबुल नवयुवक अँगरेज़ी सूट पहने मुसकुराता हुआ उतरा। ये मिस्टर रामरक्षा थे। वे अब सेठजी की एक खास दूकान के मैनेजर है। केवल मैनेजर ही नहीं, किन्तु उन मैनेजिंग प्रोप्राइटर समझना चाहिए। दिल्ली-दरबार में सेठजी को रायबहादुर का पद भी मिला है। आज डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट नियमानुसार इसकी घोषणा करेंगे और नगर के माननीय पुरुषों की ओर से सेठजी को धन्यवाद देने के लिए यह बैठक हुई है। सेठजी की ओर से धन्यवाद का वक्तव्य मिस्टर रामरक्षा
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पेश करेंगे। जिन लोगों ने उनकी वक्तृताएँ सुनी है, वे बहुत उत्सुकता से इस अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

बैठक समाप्त होने पर जब सेठजी रामरक्षा के साथ अपने भवन पर पहुँचे तो मालूम हुआ कि आज वृद्धा स्त्री उनसे फिर मिलने आई है। सेठजी दौड़कर रामरक्षा की माँ के चरणों से लिपट गये। उनका हृदय इस समय नदी की भाँति उमड़ा हुआ था।

'रामरक्षा ऐण्ड फेंड्स' नामक चीनी बनाने का कारखाना बहुत उन्नति पर है। रामरक्षा अब भी उसी ठाट-बाट से जीवन व्यतीत कर रहे हैं। किन्तु पार्टियांँ कम देते हैं, और दिनभर में तीन से अधिक सूट नहीं बदलते। वे अब उस पत्र को जो उनकी स्त्री ने सेठजी को लिखा था, संसार की एक बहुत अमूल्य वस्तु समझते हैं और मिसेज रामरक्षा को भी अब सेठजी का नाम मिटाने की अधिक चाह नहीं है। क्योंकि अभी हाल में जब उनके लड़का पैदा हुआ था तो मिसेज रामरक्षाने अपना सुवर्ण-कंकण धाय को उपहार दिया था और मनों मिठाई बाँटी थी।

यह सब हो गया, किन्तु वह बात जो अनहोनी थी, वह न हुई । रामरक्षा की मा अब भी अयोध्या में रहती है और अपनी पुत्रवधू की सूरत नहीं देखना चाहतीं।

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