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भारतेन्दु समग्र/अंधेर नगरी चौपट्ट राजा

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भारतेन्दु समग्र  (1987) 
द्वारा भारतेन्दु हरिश्चंद्र

[ ५७३ ]

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अंधेर नगरी
चौपट्ट राजा

यह प्रहसन भारतेन्दु ने बनारस में हिन्दी भाषी और कुछ बंगालियों की संस्था नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में सन् १८८१ में लिखा था और काशी के दशाश्वमेध घाट पर ही उसी दिन अभिनीत भी हुआ। भारतेन्दु जी इस संस्था के संरक्षक थे।

–– सं.

 

अंधेर नगरी चौपट राजा
टके सेर भाजी टके सेर खाजा

 

समर्पण

मान्य योग्य नहि होत कोऊ कोरो पद पाए।
मान्य योग्य नर ते, जे केवल परहित जाए॥
जे स्वारथ रत धूर्त हंस से काक-चरित-रत।
ते औरन हति बचि प्रभुहि नित होहि समुन्नत॥
जदपि लोक की रीति यही पै अन्त धर्म्म जय।
जौ नाही यह लोक तदपि छलियन अति जम भय॥
नरसरीर मे रत्न वही जो परदुख साथी।
खात पियत अरु स्वसत स्वान मुड़ुक अरु माथी॥
तासो अब लौ करो, करो सो, पै अब जागिय।
गो श्रुति भारत देस समुन्नति मै नित लागिय॥
साँच नाम निज करिय कपट तजि अन्त बनाइय।
नृप तारक हरि पद भजि साँच बढ़ाई पाइय॥

ग्रंथकार।

[ ५७४ ]

छेदश्चन्दनचूतचंपकवने रक्षा करीरद्रुमे
हिंसा हंसमयूरकोकिलकुले काकेषुलीलारतिः
मातंगेन खरक्रयः समतुला कर्पूरकार्पासियो: एषा
एषा यत्र विचारणा गुणिगणे देशाय तस्मै नमः

 

अंधेर नगरी
चौपट्ट राजा
टके सेर भाजी टके सेर खाजा।

प्रथम दृश्य
(वाह्य प्रान्त)
(महन्त जी दो चेलों के साथ गाते हुए आते हैं)

सब––

राम भजो राम भजो राम भजो भाई।
राम के भजो से गनिका तर गई,
राम के भजे से गीध गति पाई।
राम के नाम से काम बनै सब,
राम के भजन बिनु सबहि नसाई॥
राम के नाम से दोनों नयन बिनु,
सूरदास भए कबिकुलराई।
राम के नाम से घास जंगल की,
तुलसी दास भए भजि रघुराई॥

महन्त–– बच्चा नारायण दास! यह नगर तो दूर से बड़ा ही सुन्दर दिखलाई पड़ता है! देख, कुछ भिच्छा उच्छा मिलै तो ठाकुर जी को भोग लगै। और क्या।

ना. दा.–– गुरु जी महाराज! नगर तो नारायण के आसरे से बहुत ही सुन्दर है जो है सो, पर भिक्षा सुन्दर मिलै तो काड़ा आनन्द होय।

महन्त–– बच्चा गोबरधन दास! तू पश्चिम की ओर से जा और नारायण दास पूरब की ओर जाएगा। देख, जो कुछ सीधा सामग्री मिलै तो श्री शालग्राम जी का बालभोग सिद्ध हो।

गो. दा.–– गुरु जी! मैं बहुत सी भिच्छा लाता हूँ। यहाँ लोग तो बड़े मालवर दिखलाई पड़ते हैं। आप कुछ चिन्ता मत कीजिए।

महन्त–– बच्चा बहुत लोभ मत करणा। देखना, हाँ ––

लोभ पाप को मूल है, लोभ मिटावत मान।
लोभ कभी नहीं कीजिए, यामैं नरक निदान॥

(गाते हुए सब जाते हैं)

दूसरा दृश्य
(बाजार)

कबाबवाला–– कबाब गरमागरम मसालेदार –– चौरासी मसाला बहत्तर आँच का –– कबाब गरमागरम मासालेदार –– खाय सो होंठ चाटै, न खाय सो जीभ काटै। कबाब लो, कबाब का ढेर –– बेच टके सेर।

घासीराम–– चने जोर गरम ––

चने बनावैं घासीराम। निज की झोली में दूकान॥
चना चुरमुर चुरमुर बोलै। बाबू खाने को मुँह खोलै॥
चना खावै तौकी मैना। बोलै अच्छा बना चबैना॥
चना खायं गफूरन मुन्ना। बोलै और नहीं कुछ सुन्ना॥
चना खाते सब बंगाली। जिन धोती ढीली ढाली॥
चना खाते मियां जुलाहे। डाढ़ी हिलती गाह बगाहे॥
चना हाकिम सब जो खाते। सब पर दूना टिकस लगाते॥
चने जोर गरम –– टके सेर।

नारंगीवाली–– नरंगी ले नरंगी –– सिलहट की नरंगी, बुटवल की नरंगी, रामबाग की नरंगी, आनन्दबाग की नरंगी। भई नींबू से नरंगी। मैं तो पिय के रंग न रंगी। मैं तो भूली लेकर संगी। नरंगी ले नरंगी। कंवला नीबू, मीठा नीबू, रंगतरा, संगतरा। दोनों हाथों लो –– नहीं पीछे हाथ ही मलते रहोगे। नरंगी ले नरंगी। टके सेर नरंगी।

हलवाई–– जलेबियां गरमा गरम। ले सेव इमरती लड्‌डू गुलाबजामुन खुरमा बुंदिया बरफी समोसा पेड़ा कचौड़ी दालमोट पकौड़ी घेवर गुपचुप। हलुआ हलुआ ले हलुआ मोहनभोग। मोयनदार कचौड़ी कचाका हलुआ नरम चभाका। घी में नरक चीनी में तरातर चासनी में चभाचभ। ले भूरे का लड्‌डू। जो खाय सो भी पछताय जो न खाय सो भी

[ ५७५ ]

पछताय। रेवड़ी कड़ाका। पापड़ पड़ाका। ऐसी जात हलवाई जिसके छत्तिस कौम हैं भाई। जैसे कलकत्ते के विलसन मन्दिर के भितरिए, वैसे अंधेर नगर के हम। सब समान ताजा। खाजा ले खाजा। टके सेर खाजा।

कुजड़िन–– ले धनिया मेथी सोआ पालक चौराई बथुआ करेमूँ नोनियाँ कुलफा कसारी चना सरसों का साग। मरसा ले मरसा। ले बैंगन लौआ कोहड़ा आलू अरुई बण्डा नेनुआँ सूरन रामतरोई तोरई मुरई ले आदी मिरचा लहसुन पियाज टिकोरा। ले फालसा खिरनी आम अमरूत निबुआ मटर होरहा। जैसे काजी वैसे पाजी रैयत राजी टकेसेर भाजी। ले हिन्दुस्तान का मेवा फूट और बैर।

मुगल–– बादाम पिस्ते अखरोट अनार बिहीदाना मुनक्का किशमिश अंजीर आबजोश आलूबोखरा चिलगोजा सेव नाशपाती बिही सरदा अंगूर का पिटारी। आमारा ऐसा मुल्क जिसमें अंगरेज का भी दाँत खट्टा ओ गया। नाहक को रुपया खराब किया। हिन्दोस्तान का आदमी लक लक हमारे यहाँ का आदमी बुंबक बुंबक लो सब मेवा टके सेर।

पाचकवाला––

चूरन अमल बेद का भारी। जिस को खाते कृष्ण मुरारी॥
मेरा पाचक है पचलोना। जिको खाता श्याम सलोना॥
चूरन बना मसालेदार। जिसमें खट्टे की बहार॥
मेरा चूरन जो कोइ खाय। मुझको छोड़ कहीं नहिं जाय॥
हिन्दू चूरन इस का नाम। विलायत पूरन इस का काम॥
चूरन जब से हिन्द में आया। इसका धन बल सभी घटाया॥
चूरन ऐसा हट्टा कट्टा। कीना दाँत सभी का खट्टा॥
चूरन चला डाल की मंडी। इसको खाएँगी सब रंडी॥
चूरन अमले सब जो खावैं। दूनी रुशवत तुरत पचावैं॥
चूरन नाटकवाले खाते। इस की नकल पचा कर लाते॥
चूरन सभी महाजन खाते। जिससे जमा हजम कर जाते॥
चूरन खाते लाला लोग। जिनको अकिल अजीरन रोग॥
चूर खावै एडिटर जात। जिन के पेट पचै नहिं बात॥
चूरन साहेब लोग जो खाता। सारा हिंद हजम कर जाता॥
चूरन पूलिसवाले खाते। सब कानून हजम कर जाते॥
ले चूरन का ढेर, बेचा टके सेर॥

मछलीवाली–– मछरी ले मछरी।

मछरिया एक टके कै बिकाय।
लाख टका के वाला जोबन, गांहक सब ललचाय।
नैन मछरिया रूप जाल में, देखतही फंसि जाय।
बिनु पानी मछरी सो बिरहिया, मिले बिना अकुलाय।

जातवाला (ब्राह्मण)–– जात ले जात,

टके से जात। एक टका दो, हम अभी अपनी जात बेचते हैं। टके के वास्ते ब्राह्मण से धोबी हो जायं और धोबी को ब्राह्मण कर दें, टके के वास्ते जैसी कहो वैसी व्यवस्था दें। टके के वास्ते झूठ को सच करैं। टके के वास्ते ब्राह्मण से मुसलमान, टके के वास्ते हिन्दू से क्रिस्तान। टके के वास्ते धर्म और प्रतिष्ठा दोनों बेचैं, टके के वास्ते झूठी गवाही दें। टके के वास्ते पाप को पुण्य मानैं, टके के वास्ते नीच को भी पितामह बनावैं। वेद धर्म्म कुल मरजादा सच्चाई बड़ाई सब टके सेर। लुटाय दिया अनमोल माल ले टके सेर।

बनियां–– आटा दाल लकड़ी नमक घी चीनी मसाला चावल ले टके सेर।

(बाबा जी का चेला गोबर्धनदास आता है और सब बेचनेवालों की आवाज सुन सुन कर खाने के आनन्द में बड़ा प्रसन्न होता है।)

गो.दा.–– क्यों भाई बणिये, आटा कितणे सेर?

बनियां–– टके सेर।

गो.दा.–– औ चावल?

बनियां–– टके सेर।

गो.दा.–– औ चीनी?

बनियां–– टके सेर।

गो.दा.–– औ घी?

बनियां–– टके सेर।

गो.दा.–– सब टके सेर से। सचमुच।

बनियां–– हां महाराज, क्या झूठ बोलूंगा।

गो.दा.–– (कुजड़िन के पास जाकर) क्यों भाई, भाजी क्या भाव?

कुजड़िन–– बाबा जी, टके सेर। निबुआ मुरई धनिया मिरचा साग सब टके सेर।

गो.दा.–– सब भाजी टके सेर। वाह वाह! बड़ा आनंद है। यहां सभी चीज टके सेर। (हलवाई के पास जाकर) क्यौं भाई हलवाई? मिठाई कितणे सेर?

हलवाई–– बाबा जी! लड़ुआ हलुआ जलेबी गुलाबजामुन खाजा सब टके सेर।

गो.दा.–– वाह! वाह!! बड़ा आनन्द है? क्यौं बच्चा, मुझसे मसखरी तो नहीं करता? सचमुच सब टके सेर?

हलवाई–– हां बाबा जी, शचमुच सब टके सेर। इस नगरी की चाल ही यही है। यहाँ सब चीज टके सेर बिकती है।

गो.दा.–– क्यौं बच्चा! इस नगरी का नाम क्या

[ ५७६ ]

है?

हलवाई–– अंधेर नगरी।

गो.दा.–– और राजा का क्या नाम है?

हलवाई–– चौपट्ट राजा?

गो.दा.–– वाह! वाह! अंधेर नगरी चौपट्ट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा (यही गाता है और आनन्द से बगल बजाता है)।

हलवाई–– तो बाबा जी कुछ लेना देना हो तो ले दो।

गो.दा.–– बच्चा, भिक्षा माँग कर सात पैसे लाया हूँ, साढ़े तीन सेर मिठाई दे दे, गुरु चेले सब आनन्दपूर्वक इतने में छक जायंगे।

हलवाई मिठाई तौलता है –– बाबा जी मिठाई लेकर खाते हुए और अंधेर नगरी गाते हुए जाते हैं।

(पटाक्षेप)

तीसरा दृश्य
(स्थान जंगल)

(महन्त जी और नारायणदास एक ओर से 'राम' भजो इत्यादि गीत गाते हुए आते हैं और एक ओर से गोवर्धनदास अन्धेरनगरी गाते हुए आते हैं)

महन्त–– बच्चा गोवर्धन दास! कह, क्या भिक्षा लाया है? गठरी तो भारी मालूम पड़ती है।

गो.दा.–– बाबा जी महाराज! बड़े माल लाया हूँ, साढ़े तीन सेर मिठाई है।

महन्त–– देखूं बच्चा! (मिठाई की झोली अपने सामने रखकर खोल कर देखता है) वाह! वाह! बच्चा! इतनी मिठाई कहां से लाया? किस धर्मात्मा से भेंट हुई?

गो.दा.–– गुरुजी महाराज! सात पैसे भीख में मिले थे, उसी से इतनी मिठाई मोल ली है।

महन्त–– बच्चा! नारायण दास ने मुझसे कहा था कि यहां सब चीज टके सेर मिलती है, तो मैंने इसकी बात का विश्वास नहीं किया। बच्चा, यह कौन सी नगरी है और इसका कौन सा राजा है, जहाँ टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा है?

गो.दा.–– अन्धेरनगरी चौपट्ट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।

महन्त–– तो बच्चा! ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं है, जहां टके सेर भाजी और टके ही सेर

खाजा हो।

दोहा

सेत सेत सब एक से, जहां कपूर कपास।
ऐसे देस कुदेस में, कबहुं न कीजै बास॥

कोकिल बायस एक सम, पण्डित मूरख एक।
इन्द्रासन दाड़िम विषय, जहां न नेकु विवेक॥
बसिए ऐसे देस नहिं, कनक वृष्टि जो होय।
रहिए तो दुख पाइये, प्रान दीजिए रोय॥

सो बच्चा चलो यहाँ से। ऐसी अन्धेरनगरी में हजार मन मिठाई मुफ्त की मिलै तो किस काम की? यहां एक छन नहीं रहना।

गो.दा.–– गुरु जी, ऐसा तो संसार भर में कोई देस ही नहीं है; दो पैसा पास रहने ही से मजे में पेट भरता है। मैं तो इस नगर को छोड़कर नहीं जाऊँगा। और जगह दिन भर मांगो तो भी पेट नहीं भरता। वरंच बाजे बाजे दिन उपास करना पड़ता है। सो मैं तो यहीं रहूँगा।

महन्त–– देख बच्चा, पीछे पछतायगा।

गो.दा.–– आपकी कृपा से कोई दुःख न होगा; मैं तो यही कहता हूँ कि आप भी यहीं रहिए।

महन्त–– मैं तो इस नगर में अब एक क्षण भर नहीं रहूंगा। देख मेरी बात मान नहीं पीछे पछताएगा। मैं तो जाता हूं, पर इतना कहे जाता हूं कि कभी संकट पड़ै तो हमारा स्मरण करना।

गो.दा.–– प्रणाम गुरु जी, मैं आपका नित्य ही स्मरण करूँगा। मैं तो फिर भी कहता हूं कि आप भी यहीं रहिए।

(महन्त जी नारायण दास के साथ जाते हैं; गोवर्धन दास बैठकर मिठाई खाता है।)

(पटाक्षेप)

चौथा दृश्य
(राजसभा)

(राजा –– मन्त्री और नौकर लोग यथास्थान स्थित हैं)

१ सेवक–– (चिल्लाकर) पां खाइए महाराज।

राजा–– (पीनक से चौंक के घबड़ाकर उठता है) क्या कहा? सुपनखा आई ए महाराज। (भागता है)।

[ ५७७ ]

मन्त्री–– (राजा का हाथ पकड़कर) नहीं नहीं, यह कहता है कि पान खाइए महाराज!

राजा–– दुष्ट लुच्चा पाजी! नाहक हमको डरा दिया। मन्त्री इसको सौ कोड़े लगैं।

मन्त्री–– महाराज! इसका क्या दोष है? न तमोली पान लगाकर देता, न यह पुकारता।

राजा–– अच्छा, तमोली को दो सौ कोड़े लगैं।

मन्त्री–– पर महाराज, आप पान खाइए सुन कर थोड़े ही डरे हैं, आप तो सुपनख के नाम से डरे हैं, सुपनखा को सजा हो।

राजा–– (घबड़ाकर) फिर वही नाम? मन्त्री तुम बड़े खराब आदमी हौ। हम रानी से कह देंगे कि मन्त्री बेर बेर तुमको सौत बुलाने चाहता है। नौकर! नौकर! शराब।

२ नौकर–– (एक सुराही में से एक गिलास में शराब उझल कर देता है) लीजिए महाराज। पीजिए महाराज।

राजा–– (मुँह बनाकर पीता है) और दे। (नेपथ्य में –– दुहाई है दुहाई –– का शब्द होता है।)

कौन चिल्लाता है –– पकड़ लाओ।
(दो नौकर एक फर्यादी को पकड़ लाते हैं)

फ.–– दोहाई है महाराज दोहाई है। हमारा न्याव होय।

राजा–– चुप रहो। तुम्हारा न्याव यहाँ ऐसा होगा कि जैसा जम के यहाँ भी न होगा। बोलो क्या हुआ?

फ.–– महाराजा कल्लू बनिया की दीवार गिर पड़ी सो मेरी बकरी उसके नीचे दब गई। दोहाई है महाराज न्याव हो।

राजा–– (नौकर से) कल्लू बनिया की दीवार को अभी पकड़ लाओ।

मन्त्री–– महाराजा, दीवार नहीं लाई जा सकती।

राजा–– अच्छा, उसका भाई, लड़का, दोस्त, आशना जो हो उसको पकड़ लाओ।

मन्त्री[१]––महाराज! दीवार ईंट चूने की होती है, उसको भाई बेटा नहीं होता।

राजा–– अच्छा कल्लू बनिये को पकड़ लाओ।
(नौकर लोग दौड़कर बाहर से बनिए को पकड़ लाते हैं)
क्यों बे बनिए! इसकी लरकी, नहीं बरकी क्यों दबकर मर गई।

मन्त्री–– बरकी नहीं महाराज बकरी।

राजा–– हां हां, बकरी क्यों मर गई–– बोल नहीं अभी फांसी देता हूँ।

कल्लू–– महाराज! मेरा कुछ दोष नहीं। कारीगर ने ऐसी दीवार बनाया कि गिर पड़ी।

राजा–– अच्छा, इस मल्लू को छोड़ दो, कारीगर को पकड़ लाओ। (कल्लू जाता है, लोग कारीगर को पकड़ लाते हैं) क्यों बे कारीगर! इसकी बकरी किस तरह मर गई?

कारीगर–– महाराज, मेरा कुछ कसूर नहीं, चूनेवाले ने ऐसा बोदा बनाया कि दीवार गिर पड़ी।

राजा–– अच्छा, इस कारीगर को बुलाओ, नहीं नहीं, निकालो, उस चूनेवाले को बुलाओ। (कारीगर निकाला जाता है, चूनेवाला पकड़कर लाया जाता है) क्यों बे खैर सुपाड़ी चूनेवाले! इसकी कुबरी कैसे मर गई?

चूनेवाला–– महाराज! मेरा कुछ दोष नहीं, भिश्ती न चूने में पानी ढेर दे दिया, इसी से चूना कमजोर हो गया होगा।

राजा–– अच्छा, चुन्नीलाल को निकालो, भिश्ती को पकड़ो। (चूनेवाला निकाला जाता है, भिश्ती लाया जाता है) क्यों बे भिश्ती! गंगा जमुना की किश्ती! इतना पानी क्यों दिया कि इसकी बकरी गिर पड़ी दीवार दब गई।

भिश्ती–– महाराज! गुलाम का कोई कसूर नहीं, कस्साई ने मसक इतनी बड़ी बना दिया कि उसमें पानी जादे आ गया।

राजा–– अच्छा, कस्साई को लाओ, भिश्ती निकालो।
(लोग भिश्ती को निकालते हैं और कस्साई को लाते हैं)

क्यौं बे कस्साई, मशक ऐसी क्यौं बनाई कि दीवार लगाई बकरी दवाई?

कस्साई–– महाराज! गड़ेरिया ने टके पर ऐसी बड़ी भेंड़ मेरे हाथ बेंची की उसकी मशक बड़ी बन गई।

राजा–– अच्छा, कस्साई को लाओ, भिश्ती को लाओ।
(कस्साई निकाला जाता है गड़ेरिया आता है)
क्यौं बे ऊखपौंड़े के गड़ेरिया! ऐसी बड़ी भेड़ क्यौं बेचा कि बकरी मर गई?

गड़ेरिया–– महाराज! ऊधर से कोतवाल साहब की सवारी आई, सो उस के देखने में मैंने छोटी बड़ी भेड़ का ख्याल नहीं किया, मेरा कुछ कसूर नहीं।

राजा–– अच्छा, इस को निकालो, कोतवाल को

[ ५७८ ]

अभी सरबमुहर पकड़ लाओ।
(गड़ेरिया निकाला जाता है, कोतवाल पकड़ा आता है)

क्यौं बे कोतवाल! तैंने सवारी ऐसी धूम से क्यौं निकाली कि गड़ेरिये ने घबड़ा कर बड़ी भेड़ बेचा, जिस से बकरी गिर कर कल्लू बनियाँ दब गया?

कोतवाल–– महाराज महाराज! मैं ने तो कोई कसूर नहीं किया मैं तो शहर के इन्तजाम के वास्ते जाता था।

मंत्री–– (आप ही आप) यह तो बड़ा ग़जब हुआ, ऐसा न हो कि बेवकूफ, इस बात पर सारे नगर को फूंक दो या फांसी दे।

(कोतवाल से) यह नहीं, तुम ने ऐसे धूम से सवारी क्यौं निकाली?

राजा–– हां हां, यह नहीं, तुम ने ऐसे धूम से सवारी क्यौं निकाली कि उसकी दबरी दबी।

कोतवाल–– महाराज महाराज––

राजा–– कुछ नहीं, महाराज महाराज ले जाओ, कोतवाल को अभी फांसी दो। दरबार बरखास्त।

(लोग एक तरफ से कोतवाल को पकड़ कर ले जाते हैं, दूसरी ओर से मंत्री को पकड़ कर राजा जाते हैं)

(पटाक्षेप)

पांचवां दृश्य
(आरण्य)
(गोवर्धन दास गाते हुए आते हैं)


(राग काफी)

अंधेर नगरी अनबूझ राजा।
टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥
नीच ऊँच सब एकहि ऐसे।
जैसे भड़ुए पंडित तैसे॥
कुल मरजाद न मान बड़ाई।
सबै एक से लोग लुगाई॥
जात पांत पूछै नहिं कोई।
हरि को भजे सो हरि का होई॥
वेश्या जोरू एक समाना।
बकरी गऊ एक करि जाना॥
सांचे मारे मारे डोलैं।
छली दुष्ट सिर चढ़ि चढ़ि बोलैं॥
प्रगट सभ्य अन्तर छलधारी।
सोइ राजसभा बलभारी॥
सांच कहैं ते पनही खावैं।

झूठे बहुबिधि पदवी पावैं॥
छलियन के एका के आगे।
लाख कहौ एकहु नहिं लागे॥
भीतर होइ मलिन की कारो।
चहिये बाहर रंग चटकारो॥
धर्म अधर्म एक दरसाई।
राजा कैर सो न्याव सदाई॥
भीतर स्वाहा बाहर सादे।
राज करहिं अमले अरु प्यादे॥
अन्धाधुन्ध मच्यौ सब देसा।
मानहुं राजा रहत बिदेसा॥
गो द्विज श्रुति आदर नहिं होई।
मानहुं नृपति बिधर्म्मी कोई॥
ऊँच नीच सब एकहि सारा।
मानहुं ब्रह्म ज्ञान बिस्तारा॥
अंधेर नगरी अनबूझ राजा।
टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥

(बैठकर मिठाई खाता है)

गुरुजी ने हमको नाहक यहाँ रहने को मना किया था। माना कि देस बहुत बुरा है। पर अपना क्या? अपने किसी राजकाज में थोड़े हैं कि कुछ डर है, रोज मिठाई चाभना, मजे में आनन्द से राम-भजन करना।

(मिठाई खाता है)


(चार प्यादे चार ओर से आकर उस को पकड़ लेते हैं)

१ प्या.–– चल बे चल, बहुत मिठाई खा कर मुटाया है। आज पूरी हो गई।

२ प्या.–– बाबा जी चलिए, नमोनारायन कीजिए।

गो.दा.–– (घबड़ा कर) हैं! यह आफ़त कहां से आई! अरे भाई, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो मुझको पकड़ते हौ।

१ प्या.–– आप ने बिगाड़ा है या बनाया है इस से क्या मतलब, अब चलिए। फांसी चढ़िए।

गो.दा.–– फांसी। अरे बाप रे बाप फांसी!! मैंने किस की प्राण मारे कि मुझ को फांसी!

२ प्या.–– आप बड़े मोटे हैं, इस वास्ते फांसी होती है।

गो.दा.–– मोटे होने से फांसी? यह कहां का न्याव है! अरे, हंसी फकीरों से नहीं करनी होती।

१ प्या.–– जब सूली चढ़ लीजिएगा तब मालूम होगा कि हंसी है कि सच। सीधी राह से चलते हो कि घसीट कर ले चलें?

गो.दा.–– अरे बाबा, क्यों बेकसूर का प्राण

[ ५७९ ]

मारते हौ? भगवान के यहाँ क्या जवाब दोगे?

१ प्या.–– भगवान को जवाब राजा देगा। हम को क्या मतलब। हम तो हुक्मी बन्दे हैं।

गो.दा.–– तब भी बाबा बात क्या है कि हम फकीर आदमी को नाहक फांसी देते हौ?

१ प्या.–– बात है कि कल कोतवाल को फांसी का हुकुम हुआ था। जब फांसी देने को उस को ले गए, तो फांसी का फन्दा बड़ा हुआ, क्योंकि कोतवाल साहब दुबले हैं। हम लोगों ने महाराज से अर्ज किया, इस पर हुक्म हुआ कि मोटा आदमी पकड़ कर फांसी दे दो, क्योंकि बकरी मारने के अपराध में किसी न किसी की सजा होनी जरूर है, नहीं तो न्याव न होगा। इसी वास्ते तुम को ले जाते हैं कि कोतवाल के बदले तुमको फांसी दें।

गो.दा.–– तो क्या और कोई मोटा आदमी इस नगर भर में नहीं मिलता जो मुझ अनाथ फकीर को फांसी देते हैं!

१ प्या.–– इस में दो बात है –– एक तो नगर भर में राजा के न्याव के डर से कोई मुटाता ही नहीं, दूसरे और किसी को पकड़ै तो वह न जानैं क्या बात बनावै कि हमी लोगों के सिर कहीं न घहराय और फिर इस राज में साधू महात्मा इन्हीं लोगों की तो दुर्दशा है, इस से तुम्हीं को फांसी देंगे।

गो.दा.–– दुहाई परमेश्वर की, अरे मैं नाहक मारा जाता हूँ! अरे यहाँ बड़ा ही अन्धेर है, अरे गुरू जी महाराज का कहा मैंने न माना उस का फल मुझ को भोगना पड़ा। गुरुजी कहां हौ! आओ, मेरे प्राण बचाओ, अरे मैं बेअपराध मारा जाता हूँ गुरुजी गुरुजी ––
(गोवर्धन दास चिल्लाता है, प्यादे लोग उस को पकड़ कर ले जाते हैं)

(पटाक्षेप)

छठां दृश्य
(स्थान श्मशान)


(गोवर्धन दास को पकड़े हुए चार सिपाहियों का प्रवेश)

गो.दा.–– हाय बाप रे! मुझे बेकसूर ही फांसी देते हैं। अरे भाइयो, कुछ तो धरम विचारो। अरे मुझ गरीब को फांसी देकर तुम लोगों को क्या लाभ होगा? अरे मुझे छोड़ दो। हाय! हाय! (रोता है और छुड़ाने

का यत्न करता है)

१ सिपाही–– अबे, चुप रह –– राजा का हुकुम भला कहीं टल सकता है? यह तेरा आखिरी दम है, राम का नाम ले –– बेफाइदा क्यों शोर करता है? चुप रह ––

गो.दा.–– हाय! मैं ने गुरुजी का कहना न माना, उसी का यह फल है। गुरुजी ने कहा था कि ऐसे––नगर में न रहना चाहिये, यह मैं ने न सुना! अरे! इस नगर का नाम ही अंधेरनगरी और राजा का नाम चौपट्ट है, तब बचने की कौन आशा है। अरे! इस नगर में ऐसा कोई धर्मात्मा नहीं है जो इस फकीर को बचावै। गुरु जी! कहाँ हौ? बचाओ –– गुरुजी गुरुजी –– (रोता है, सिपाही लोग उसे घसीटते हुए ले चलते हैं)

(गुरु जी और नारायण दास आते हैं)

गुरु.–– अरे बच्चा गोवर्धन दास! तेरी यह क्या दशा है?

गो.दा.–– (गुरु को हाथ जोड़कर) गुरु जी! दीवार के नीचे बकरी दब गई, सो इस के लिए फांसी देते हैं, गुरु जी बचाओ।

गुरु.–– अरे बच्चा! मैंने तो पहिले ही कहा था कि ऐसे नगर में रहना ठीक नहीं, तैं ने तो मेरा कहना नहीं सुना।

गो.दा.–– मैं ने आप का कहा नहीं माना, उसी का यह फल मिला। आप के सिवा अब ऐसा कोई नहीं है जो रक्षा करै। मैं आप ही का हूं, आप के सिवा और कोई नहीं (पैर पकड़ कर रोता है)।

महन्त–– कोई चिन्ता नहीं, नारायण सब समर्थ है। (भौं चढ़ाकर सिपाहियों से) सुनो, मुझको अपने शिष्य को अन्तिम उपदेश देने दो, तुम लोग तनिक किनारे हो जाओ, देखो मेरा कहना न मानोगे तो तुम्हारा भला न होगा।

सिपाही–– नहीं महाराज, हम लोग हट जाते हैं। आप बेशक उपदेश कीजिए।

(सिपाही हट जाते हैं। गुरु जी चेले के कान में कुछ समझाते हैं)

गो.दा.–– (प्रगट) तब तो गुरु जी हम अभी फांसी चढ़ेंगे।

महन्त–– नहीं बच्चा मुझको चढ़ने दे।

गो.दा.–– नहीं गुरु जी, हम फांसी पड़ैंगे।

महन्त–– नहीं बच्चा हम। इतना समझाया नहीं मानता, हम बूढ़े भए, हमको जाने दे।

गो.दा.–– स्वर्ग जाने में बूढ़ा जवान क्या?

[ ५८० ]

आप तो सिद्ध हो, आपको गति अगति से क्या? मैं फांसी चढ़ूंगा।
(इसी प्रकार दोनों हुज्जत करते हैं––सिपाही लोग परस्पर चकित होते हैं)

१ सिपाही–– भाई! यह क्या माजरा है, कुछ समझ नहीं पड़ता।

२ सिपाही–– हम भी नहीं समझ सकते कि यह कैसा गबड़ा है।

(राजा, मंत्री कोतवाल आते हैं)

राजा–– यह क्या गोलमाल है?

१ सिपाही–– महाराज! चेला कहता है मैं फांसी पड़ूंगा, गुरु कहता है मैं पड़ूंगा; कुछ मालूम नहीं पड़ता कि क्या बात है?

राजा–– (गुरु से) बाबा जी! बोलो। काहे को आप फांसी चढ़ते हैं?

महन्त–– राजा! इस समय ऐसा साइत है कि जो मरेगा सीधा बैकुंठ जायगा।

मंत्री–– तब तो हमी फांसी चढ़ेंगे।

गो.दा.–– हम हम। हम को तो हुकुम है।

कोतवाल–– हम लटकैंगे। हमारे सबब तो दीवार गिरी।

राजा–– चुप रहो, सब लोग, राजा के आछत और कौन बैकुण्ठ जा सकता है। हमको फांसी चढ़ाओ, जल्दी, जल्दी।

महन्त––

जहाँ न धर्म्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजान समाज।
ते ऐसहिं आपुहि नसे, जैसे चौपटराज॥

(राजा को लोग टिकठी पर खड़ा करते हैं)
(पटाक्षेप)
इति

 
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  1. यहाँ टंकण की अशुद्धि से मूल पाठ में राजा छप गया है।