गबन/भाग 21

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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नहलाए, किसे स्वादिष्ट चीजों का भोग लगाए। इसी भाति वकील साहब को भी पत्नी की जरूरत थी। रतन उनके लिए संदेह कल्पना मात्र थी जिससे उनकी आत्मिक पिपासा शांत होती थी। कदाचित् रतन के बिना उनका जीवन उतना ही सूना होता, जितना आंखों के बिना मुख।

रतन ने केस में से हार निकालकर वकील साहब को दिखाया और बोली-इसके बारह सौ रुपये मांगते हैं।

वकील साहब की निगाह में रुपये का मूल्य आनंददायिनी शक्ति थी। अगर हार रतन को पसंद है, तो उन्हें इसकी परवा न थी कि इसके क्या दाम देने पड़ेंगे। उन्होंने चेक निकालकर जौहरी की तरफ देखा और पूछा-सच-सच बोलो, कितना लिखें। अगर फर्क पड़ा तो तुम जानोगे।

जौहरी ने हार को उलट-पलटकर देखा और हिचकते हुए बोला-साढ़े ग्यारह सौ कर दीजिए। वकील साहब ने चेक लिखकर उसको दिया, और वह सलाम करके चलता हुआ।

रतन का मुख इस समय वसन्त की प्राकृतिक शोभा की भांति विसित था। ऐसा गर्व, ऐसा उल्लास उसके मुख पर कभी न दिखाई दिया था। मानो उसे संसार की संपत्ति मिल गई हार को गले में लटकाए वह अंदर चली गई। वकील साहब के आचार-विचार में नई और पुरानी प्रशाओं का विचित्र मेल था। भोजन वह अभी तक किसी ब्राह्मण के हाथ का भी न खाते थे। आज रतन उनके लिए अच्छी-अच्छी चीजें बनाने गई, अपनी कृतज्ञता को वह कैसे जाहिर करे?

रमा कुछ देर तक तो बैठा वकील साहब का योरप-गौरव-गान सुनता रहा, अंत को निराश होकर चल दिया।

इक्कीस

अगर इस समय किसी को संसार में सबसे दुखी, जीवन से निराश, चिताग्नि में जलते हुए प्राणी की मूर्ति देखनी हो, तो उस युवक को देखे, जो साइकिल पर बैठा हुआ, अल्फ्रेड पार्क के सामने चला जा रहा है। इस वक्त अगर कोई काला सांप नजर आए तो वह दोनों हाथ फैलाकर उसका स्वागत करेगा और उसके विष को सुधा की तरह पिएगा। उसकी रक्षा सुधा से नहीं, अब विष ही से हो सकती है। मौत ही अब उसकी चिंताओं का अंत कर सकती है, लेकिन क्या मौत उसे बदनामी से भी बचा सकती है? सवेरा होते ही, यह बात घर-घर फैल जायगी-सरकारी रुपैया खो गया और जब पकड़ा गया, तब आत्महत्या कर ली । कुल में कलंक लगाकर, मरने के बाद भी अपनी हंसी कराके चिंताओं से मुक्त हुआ तो क्या, लेकिन दूसरा उपाय ही क्या है।

अगर वह इस समय जाकर जालपा से सारी स्थिति कह सुनाए, तो वह उसके साथ अवश्य सहानुभूति दिखाएगी। जालपा को चाहे कितना ही दुख हो, पर अपने गहने निकालकर देने में एक क्षण को भी विलंब न करेगी। गहनों को गिरवी रखकर वह सरकारी रुपये अदा कर [ ९२ ]

सकता है। उसे अपना परदा खोलना पड़ेगा। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।

मन में यह निश्चय करके रमा घर की ओर चला, पर उसकी चाल में वह तेजी न थी जो मानसिक स्फूर्ति का लक्षण है। लेकिन घर पहुंचकर उसने सोचा–जब यही करना है, तो जल्दी क्या है, जब चाहूं मांग लूंगा। कुछ देर गप-शप करता रहा, फिर खाना खाकर लेटा। सहसा उसके जी में आया, क्यों न चुपके से कोई चीज उठा ले जाऊं? कुल-मर्यादा की रक्षा करने के लिए एक बार उसने ऐसा ही किया था। उसी उपाय से क्या वह प्राणों की रक्षा नहीं कर सकता? अपनी जबान से तो शायद वह कभी अपनी विपत्ति का हाल न कह सकेगा। इसी प्रकार आगा-पीछा में पड़े हुए सबेरा हो जायेगा। और तब उसे कुछ कहने का अवसर ही न मिलेगा।

मगर उसे फिर शंका हुई, कहीं जालपा की आंख खुल जाय? फिर तो उसके लिए त्रिवेणी के सिवा और स्थान ही न रह जायगा। जो कुछ भी हो एक बार तो यह उद्योग करना ही पड़ेगा। उसने धीरे से जालपा का हाथ अपनी छाती पर से हटाया, और नीचे खड़ा हो गया। उसे ऐसा ख्याल हुआ कि जालपा हाथ हटाते ही चौंकी और फिर मालूम हुआ कि यह भ्रम-मात्र था। उसे अब जालपा के सलूके की जेब से चाभिर्यों का गुच्छा निकालना था। देर करने का अवसर न था। नींद में भी निम्नचेतना अपना काम करती रहती है। बालक कितना ही गाफिल सोया हो, माता के चारपाई से उठते ही जाग पड़ता है, लेकिन जब चाभी निकालने के लिए झुका, तो उसे जान पड़ा जालपा मुस्करा रही है। उसने झट हाथ खींच लिया और लैंप के क्षीण प्रकाश में जालपा के मुख की ओर देखा, जो कोई सुखद स्वप्न देख रही थी। उसकी स्वप्न-सुख विलसित छवि देखकर उसका मन कातर हो उठा। हा|इस सरला के साथ मैं ऐसा विश्वासघात करूं? जिसके लिए मैं अपने प्रार्थों को भेंट कर सकता हूं, उसी के साथ यह कपट? जालपा का निष्कपट स्नेह-पूर्ण हृदय मानो उसके मुखमंडल पर अंकित हो रहा था। आह । जिस समय इसे ज्ञात होगा इसके गहने फिर चोरी हो गए, इसकी क्या दशा होगी? पछाड़ खायगी, सिर के बाल नोचेगी। वह किन आंखों से उसका यह क्लेश देखेगा? उसने सोचा-मैंने इसे आराम ही कौन सा पहुंचाया है। किसी दूसरे से विवाह होता, तो अब तक वह रत्नों से लद जाती। दुर्भाग्यवश इस घर में आई, जहां कोई सुख नहीं-उल्टे और रोना पड़ा।

रमा फिर चारपाई पर लेट रहा। उसी वक्त जालपा की आंखें खुल गईं। उसके मुख की ओर देखकर बोली-तुम कहां गए थे? मैं अच्छा सपना देख रही थी। बड़ी बाग है, और हम-तुम दोनों उसमें टहल रहे हैं। इतने में तुम न जाने कहां चले जाते हो, एक और साधु आकर मेरे सामने खड़ा हो जाता है। बिल्कुल देवताओं का-सा उसका स्वरूप है। वह मुझसे कहता है-बेटी, मैं तुझे वर देने आया हूं। मांग, क्या मांगती है। मैं तुम्हें इधर-उधर खोज रही हूं कि तुमसे पूछे क्या मांगू। और तुम कहीं दिखाई नहीं देते। मैं सारा बाग छान आई। पेड़ों पर झांककर देखा, तुम न जाने कहां चले गए हो। बस इतने में नींद खुल गई, वरदान न माँगने पाई।

रमा ने मुस्कराते हुए कहा-क्या वरदान मांगती?

‘मांगती जो जी में आता, तुम्हें क्या बता दूं?'

'नहीं, बताओ, शायद तुम बहुत-सा धन मांगता'।

'धन को तुम बहुत बड़ी चीज समझते होगे? मैं तो कुछ नहीं समझती।'

'हां, मैं तो समझता हैं। निर्धन रहकर जीना मरने से भी बदतर है। मैं अगर किसी देवता [ ९३ ]

को पकड़ पाऊं तो बिना काफी रुपये लिए न मानूं। मैं सोने की दीवार नहीं खड़ी करना चाहता, न राकफेलर और कारनेगी बनने की मेरी इच्छा है। मैं केवल इतना धन चाहता हूं कि जरूरत की मामूली चीजों के लिए तरसना न पड़े। बस कोई देवता मुझे पांच लाख दे दे, तो मैं फिर उससे कुछ न मांगूंगा। हमारे ही गरीब मुल्क में ऐसे कितने ही रईस, सेठ, ताल्लुकेदार हैं, जो पांच लाख एक साल में खर्च करते हैं, बल्कि कितनों ही का तो माहवार खर्च पांच लाख होगा। मैं तो इसमें सात जीवन काटने को तैयार हूं, मगर मुझे कोई इतना भी नहीं देता। तुम क्या मांगतीं? अच्छे-अच्छे गहने !'

जालपा ने त्योरियां चढाकर कहा-क्यों चिढ़ाते हो मुझे ! क्या मैं गहनों पर और स्त्रियों से ज्यादा जान देती हूं? मैंने तो तुमसे कभी आग्रह नहीं किया? तुम्हें जरूरत हो, आज इन्हें उठी ले जाओ, मैं खुशी से दे दूंगी।

रमा ने मुस्कराकर कहा-तो फिर बतलातीं क्यों नहीं?

जालपा-मैं यही मांगती कि मेरा स्वामी सदा मुझसे प्रेम करता रहे। उनका मन कमी मुझसे न फिरे।

रमा ने हंसकर कहा-क्या तुम्हें इसकी भी शंका है?

'तुम देवता भी होते तो शंका होती, तुम तो आदमी हो। मुझे तो ऐसी कोई स्त्री न मिली, जिसने अपने पति की निष्ठुरता का दुखड़ा न रोया हो। साल-दो साल तो वह खूब प्रेम करते हैं, फिर न जाने क्यों उन्हें स्त्री से अरुचि-सी हो जाती है। मन चंचल होने लगता है। औरत के लिए इससे बड़ी विपत्ति नहीं। उस विपत्ति से बचने के सिवा मैं और क्या वरदान मांगती?'-यह कहते हुए जालपा ने पति के गले में बांहें डाल दीं और प्रणय-सचित नेत्रों से देखती हुई बोली-सच बताना, तुम अब भी मुझे वैसे ही चाहने हो, जैसे पहले चाहते थे? देखो, सच कहना, बोलो।

रमा ने जालपा के गले से चिमटकर कहा-उससे कहीं अधिक, लाख गुना जालपा ने हंसकर कहा–झूठ। बिल्कुल झूठ । सोलहों आना झूठ ।

रमानाथ-यह तुम्हारी जबरदस्ती है। आखिर ऐसा तुम्हें कैसे जान पड़ा?

जालपा-आंखों से देखती हूं और कैसे जान पड़ा। तुमने मेरे पास बैठने की कसम खा ली है। जब देखो तुम गमसम रहते हो। मझसे प्रेम होता, तो मुझ पर विश्वास भी होता। बिना विश्वास के प्रेम हो ही कैसे सकता है? जिससे तुम अपनी बुरी-से-बुरी बात न कह सको, उससे तुम प्रेम नहीं कर सकते। हां, उसके साथ विहार कर सकते हो, विलास कर सकते हो। उसी तरह जैसे कोई वेश्या के पास जाता है। वेश्या के पास लोग आनंद उठाने हो जाते हैं, कोई उससे मन की बात कहने नहीं जाता। तुम्हारी भी वही दशा है। बोलो है या नहीं? आंखें क्यों छिपाते हो? क्या मैं देखती नहीं, तुम बाहर से कुछ घबड़ाए हुए आते हो? बातें करते समय देखती हूं, तुम्हारा मन किसी और तरंफ रहता है। भोजन में भी देखती हूं, तुम्हें कोई आनंद नहीं आता। दाल गाढ़ी है या पतली, शाके कम है या ज्यादा, चावल में कनी है या पक गए हैं, इस तरफ तुम्हारी निगाह नहीं जाती। बेगार की तरह भोजन करते हो और जल्दी से भागते हो। मैं यह सब क्या नहीं देखती? मुझे देखना न चाहिए। मैं विलासिनी हूं, इसी रूप में तो तुम मुझे देखते हो। मेरा काम है-विहार करना, विलास करना, आनंद करना। मुझे तुम्हारी चिंताओं से मतलब !मगर ईश्वर ने वैसा हृद्य नहीं दिया। क्या करूं? मैं समझती , जब मुझे जीवन ही [ ९४ ]

व्यतीत करना है, जब मैं केवल तुम्हारे मनोरंजन की ही वस्तु हैं, तो क्यों अपनी जान विपत्ति में डालें?

जालपा ने रमा से कभी दिल खोलकर बात न की थी। वह इतनी विचारशील है, उसने अनुमान ही न किया था। वह उसे वास्तव में रमणी ही समझता था। अन्य पुरुषों की भांति वह भी पत्नी को इसी रूप में देखता था। वह उसके यौवन पर मुग्ध था। उसकी आत्मा का स्वरूप देखने की कभी चेष्टा हो ने की। शायद वह समझता था, इसमें आत्मा है ही नहीं। अगर वह रूप-लावण्य की राशि में होती, तो कदाचित् वह उससे बोलना भी पसंद न करता। उसका सारा आकर्षण, उसकी सारी आसक्ति केवल उसके रूप पर थी। वह समझता था, जालपा इसी में प्रसन्न है। अपनी चिंताओं के बोझ से वह उसे दबाना नहीं चाहता था; पर आज उसे ज्ञात हुआ, जालपा उतनी ही चिंतनशील है, जितना वह खुद था। इस वक्त उसे अपनी मनोव्यथा कह डालने का बहुत अच्छा अवसर मिला था; पर हाय संकोच ! इसने फिर उसकी जबान बंद कर दी। जो बातें वह इतने दिनों तक छिपाए रहा, वह अब कैसे कहे? क्या ऐसा करना जालपा के आरोपित आक्षेपों को स्वीकार करना न होगा? हां, उसकी आंखों से आज भ्रम का परदा उठ गया। उसे ज्ञात हुआ कि विलास पर प्रेम का निर्माण करने की चेष्टा करना उसका अज्ञान था।

रमा इन्हीं विचारों में पड़ा-पड़ा सो गया, उस समय आधी रात से ऊपर गुजर गई थी। सोया तो इसी सबब से था कि बहुत सबेरै उठ जाऊंगा, पर नींद खुली, तो कमरे में धूप की किरणें आ आकर उसे जगा रही थीं। वह चटपट उठा और बिना मुंह-हाथ धोए, कपड़े पहनकर जाने को तैयार हो गया। वह रमेश बाबू के पास जाना चाहता था। अब उनसे यह कथा कहनी पड़ेगी। स्थिति का पूरा ज्ञान हो जाने पर वह कुछ-न-कुछ सहायता करने पर तैयार हो जाएंगे।

जालपा उस समय भोजन बनाने की तैयारी कर रही थी। रमा को इस भाति जाते देखकर प्रश्न-सूचक नेत्रों से देखा। रमा के चेहरे पर चिंता, भय, चंचलता और हिंसा मानो बैठी घूर रही थी। एक क्षण के लिए वह बेसुध-सी हो गई। एक हाथ में छुरी और दूसरे में एक करेला लिए हुए वह द्वार की ओर ताकतीं रही। यह बात क्या है, उसे कुछ बताते क्यों नहीं? वह और कुछ न कर सके, हमदर्दी तो कर ही सकती है। उसके जी में आया-पुकार कर पूछू, क्या बात है? उठकर द्वार तक आई भी; पर रमा सड़क पर दूर निकल गया था। उसने देखा, वह बड़ी तेजी से चला जा रहा है, जैसे सनक गया हो। न दाहिनी ओर ताकता है, न बाईं ओर। केवल सिर झुकाए पथिकों से टकराता, पैरगाड़ियों की परवा न करता हुआ, भागा चला जा रहा था। आख़िर वह लौटकर फिर तरकारी काटने लगी; पर उसका मन उसी ओर लगा हुआ था। क्या बात है, क्यों मुझसे इतना छिपाते हैं?

रमा रमेश के घर पहुंचा तो आठ बज गए थे। बाबू साहब चौकी पर बैठे संध्या कर रहे थे। इन्हें देखकर इशारे से बैठने को कहा। कोई आध घंटे में संध्या समाप्त हुई, बोले-क्या अभी मुंह-हाथ भी नहीं धोया, यही लीचड़पन मुझे नापसंद है। तुम और कुछ करो या न करो, बदन की सफाई तो करते रहो। क्या हुआ, रुपये का कुछ प्रबंध हुआ?

रमानाथ-इसी फिक्र में तो आपके पास आया हूं।

रमेश–तुम भी अजीब आदमी हो, अपने बाप से कहते तुम्हें क्यों हुए शर्म आती है? यही न होगा, तुम्हें ताने देंगे, लेकिन इस संकट से तो छूट जाओगे। उनसे सारी बातें साफ-साफ कह दो। ऐसी दुर्घटनाएं अक्सर हो जाया करती हैं। इसमें डरने की क्या बात है ! नहीं कहो, मैं [ ९५ ]

चलकर कह दें।

रमानाथ-उनसे कहना होता, तो अब तक कभी कह चुका होता ! क्या आप कुछ बंदोबस्त नहीं कर सकते?

रमेश-कर क्यों नहीं सकता; पर करना नहीं चाहता। ऐसे आदमी के साथ मुझे कोई हमदर्दी नहीं हो सकती। तुम जो बात मुझसे कह सकते हो, क्या उनसे नहीं कह सकते? मेरी सलाह मानो। उनसे जाकर कह दो। अगर वह रुपये न दें तब मेरे पास आना।

रमा को अब और कुछ कहने का साहस न हुआ। लोग इतनी घनिष्ठता होने पर भी इतने कठोर हो सकते हैं। वह यहां से उठा; पर उसे कुछ सुझाई न देता था। चौवैया में आकाश से गिरते हुए जल-बिंदुओं की जो दशा होती है, वही इस समय रमा की हुई। दस कदम तेजी से आगे चलता, तो फिर कुछ सोचकर रुक जाता और दस-पांच कदम पीछे लौट जाता। कभी इस गली में घुस जाता, कभी उस गली में।

सहसा उसे एक बात सूझी, क्यों न जालपा को एक पत्र लिखकर अपनी सारी कठिनाइयां कह सुनाऊं। मुंह से तो वह कुछ न कह सकता था; पर कलम से लिखने में उसे कोई मुश्किल मालूम नहीं होती थी। पत्र लिखकर जालपा को दे दूंगा और बाहर के कमरे में आ बैठूंगा। इससे सरल और क्या हो सकता है? वह भागा हुआ घर आया, और तुरंत पत्र लिखा।

'प्रिय, क्या कहूं, किस विपत्ति में फंसा हुआ है। अगर एक घंटे के अंदर तीन सौ रुपये का प्रबंध न हो। गया, तो हाथों में हथकड़ियां पड़ जाएंगी। मैंने बहुत कोशिश की, किसी से उधार ले लें, किंतु कहीं न मिल सके। अगर तुम अपने दो-एक जेवर दे दो, तो मैं गिरों रखकर काम चला लें। ज्योंही रुपये हाथ आ जाएंगे, छुड़ा दूंगा। अगर मजबूरी न आ पड़ती तो, तुम्हें कष्ट न देता। ईश्वर के लिए रुष्ट न होना। मैं बहुत जल्द छुड़ा दूंगा...'

अभी यह पत्र समाप्त न हुआ था कि रमेश बाबू मुस्कराते हुए आकर बैठ गए और बोले-कहा उनसे तुमने?

रमा ने सिर झुकाकर कहा-अभी तो मौका नहीं मिला।

रमेश–तो क्या दो-चार दिन में मौका मिलेगा? मैं डरता हूं कि कहीं आज भी तुम यों ही खाली हाथ न चले जाओ, नहीं गजब तो ही हो जाय !

रमानाथ-जब उनसे मांगने का निश्चय कर लिया, तो अब क्या चिंता !

रमेश–आज मौका मिले, तो जरा रतन के पास चले जानाः उस दिन मैंने कितना जोर देकर कहा था, लेकिन मालूम होता है तुम भूल गए।

रमानाथ-भूल तो नहीं गया, लेकिन उनसे कहते शर्म आती है।

रमेश-अपने बाप से कहते भी शर्म आती है? अगर अपने लोगों में यह संकोच न होता, तो आज हमारी यह दशा क्यों होती?

रमेश बाबू चले गए, तो रमा ने पुत्र उठाकर जेब में डाला और उसे जालपा को देने का निश्चय करके घर में गया। जालपा आज किसी महिला के घर जाने को तैयार थी। थोड़ी देर हुई, बुलावा आ गया। उसने अपनी सबसे सुंदर साड़ी पहनी थी। हाथों में जड़ाऊ कंगन शोभा दे रहे थे, गले में चन्द्रहार। आईना सामने रखे हुए कानों में झूमक पहन रही थी। रमा को देखकर बोली-आज सबेरे कहां चले गए थे? हाथ-मुंह तक न धोया। दिन-भर तो बाहर रहते ही हो, शाम-सबेरे तो घर पर रहा करो। तुम नहीं रहते, तो घर सूना-सूना लगता है। मैं अभी सोच रही [ ९६ ]
थी, मुझे मैके जाना पड़े, तो मैं जाऊ या न जाऊ? मेरा जी तो वहां बिल्कुल न लगे।

रमानाथ–तुम तो कहीं जाने को तैयार बैठी हो।

जालपा-सेठानीजी ने बुला भेजा है, दोपहर तक चली आऊंगी।

रमा की दशा इस समय उस शिकारी की-सी थी, जो हिरन को अपने शावकों के साथ किलोल करते देखकर तनी हुई बंदूक कंधे पर रख लेता है, और यह वात्सल्य और प्रेम की क्रीड़ा देखने में तल्लीन हो जाता है। उसे अपनी ओर टकटकी लगाए देखकर जालपा ने मुस्कराकर कहा-देखो, मुझे नजर न लगा देना। मैं तुम्हारी आंखों से बहुत डरती हूं।

रमा एक ही उड़ान में वास्तविक संसार से कल्पना और कवित्व के संसार में जा पहुंचा। ऐसे अवसर पर जब जालपा की रोम-रोम आनंद से नाच रहा है, क्या वह अपना पत्र देकर उसकी सुखद कल्पनाओं को दलित कर देगा? वह कौन हृदयहीन व्याध है, जो चहकती हुई चिड़िया की गर्दन पर छुरी चला देगा? वह कौन अरसिक आदमी है, जो किसी प्रभात-कुसुम को तोड़कर पैरों से कुचल डालेगा? रमा इतना हदयहीन, इतना अरसिक नहीं है। वह जालपा पर इतना बड़ा आघात नहीं कर सकता। उसके सिर कैसी ही विपत्ति क्यों न पड़ जाए, उसकी कितनी ही बदनामी क्यों न हो, उसका जीवन ही क्यों न कुचल दिया जाए, पर वह इतना निष्ठुर नहीं हो सकता। उसने अनुरक्त होकर कहा-नजर तो न लगाऊंगा, हां, हदय से लगा लूंगा। इसी एक वाक्य में उसकी सारी चिंताएं, सारी बाधाएं विसर्जित हो गईं। सेह-संकोच की वेदी पर उसने अपने को भेंट कर दिया। इस अपमान के सामने जीवन के और सारे क्लेश तुच्छ थे। इस समय उसकी दशा उस बालक की-सी थी, जो फोड़े पर नश्तर की क्षणिक पीड़ा ने सहकर उसके फूटने, नासूर पड़ने, वर्षों खाट पर पड़े रहने और कदाचित् प्राणांत हो जाने के भय को भी भूल जाता है।

जालपा नीचे जाने लगी, तो रमाने कातर होकर उसे गले से लगा लिया और इस तरह भौंच-भींचकर उसे आलिंगन करने लगा, मानो यह सौभाग्य उसे फिर न मिलेगी। कौन जानता है, यही उसका अंतिम आलिंगन हो। उसके कर-पाश मानो रेशम के सहस्रों तारों से संगठित होकर जालपा से चिमट गए थे। मानो कोई मरणासन्न कृपण अपने कोष की कुंजी मुट्ठी में बंद किए हो, और प्रतिक्षण मुट्ठी कठोर पड़ती जाती हो। क्या मुट्ठी को बलपूर्वक खोल देने से ही उसके प्राण न निकल जाएंगे?

सहसा जालपा बोली-मुझे कुछ रुपये तो दे दो, शायद वहां कुछ जरूरत पड़े।

रमा ने चौंककर कहा-रुपये ' रुपये तो इस वक्त नहीं हैं।

जालपा–हैं हैं, मुझसे बहाना कर रहे हो। बस मुझे दो रुपये दे दो, और ज्यादा नहीं चाहती।

यह कहकर उसने रमा को जेब में हाथ डाल दिया, और कुछ पैसे के साथ वह पत्र भी निकाल लिया।

रमा ने हाथ बढ़ाकर पत्र को जालपा से छीनने की चेष्टा करते हुए कहा-कागज मुझे दे दो, सरकारी कागज है।

जालपा—किसका खत है बता दो?

जालपा ने तहे किए हुए पुरजे को खोलकर कहा-यह सरकारी कागज है ! झूठे [ ९७ ]
कहीं के ये तुम्हारा ही लिखा

रमानाथ–दे दो, क्यों परेशान करती हो ।

रमा ने फिर कागज छीन लेना चाहा; पर जालपा ने हाथ पीछे फेरकर कहा-मैं बिना पढ़े न दूंगी। कह दिया ज्यादा जिद करोगे, तो फाड़ डालूंगी।

रमानाथ-अच्छा फाड़ डालो।

जालपा–तब तो मैं जरूर पढूंगी।

उसने दो कदम पीछे हटकर फिर खत को खोला और पढ़ने लगी।

रमा ने फिर उसके हाथ से कागज छीनने की कोशिश नहीं की। उसे जान पड़ा, आसमान फट पड़ा है, मानो कोई भंयकर जंतु उसे निगलने के लिए बढ़ा चला आता है। वह धड़-धड़ करता हुआ ऊपर से उतरा और घर के बाहर निकल गया। कहां अपना मुंह छिपा ले? कहां छिप जाए कि कोई उसे देख न सके? उसकी दशा वही थी, जो किसी नंगे आदमी की होती है। वह सिर से पांव तक कपड़े पहने हुए भी नंगी था। आह | सारा परदा खुल गया | उसकी सारी कपट-लीला खुल गई । जिन बातों को छिपाने की उसने इतने दिनों चेष्टा की, जिनको गुप्त रखने के लिए उसने कौन-कौन-सी कठिनाइयां नहीं झेलों, उन सबों ने आज मानो उसके मुंह पर कालिख पोत दी। वह अपनी दुर्गति अपनी आंखों से नहीं देख सकता। जालपा की सिसकियां, पिता की दिग्दकियां, पड़ोसियों की कनफ़सकियां सुनने की अपेक्षा मर जाना कहीं आसान होगा। जब कोई संसार में न रहेगा, तो उसे इसकी क्या परवा होगी, कोई उसे क्या कह रहा है। हाय । केवल तीन सौ रुपयों के लिए उसका सर्वनाश हुआ जा रहा है, लेकिन ईश्वर की इच्छा है, तो वह क्या कर सकता है। प्रियजनों की नजरों से गिरकर जिए तो क्या जिए।

जालपा उसे कितना नीच, कितनो कपटी, कितना धूर्त, कितना गपोड़िया समझ रही होगी। क्या वह अपना मुंह दिखा सकता है?

क्या संसार में कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां वह नए जीवन का सूत्रपात कर सके, जहां वह संसार से अलग-थलग सबसे मुंह मोड़कर अपना जीवन काट सके। जहां वह इस तरह छिप जाय कि पुलिस उसका पता न पा सके। गंगा की गोद के सिवा ऐसी जगह और कहां थी। अगर जीवित रहा, तो महीने-दो महीने में अवश्य ही पकड़ लिया जाएगा। उस समय उसकी क्या दशा होगी–वह हथकड़ियां और बेड़ियां पहने अदालत में खड़ा होगा। सिपाहियों का एक दल उसके ऊपर सवार होगा। सारे शहर के लोग उसका तमाशा देखने जाएंगे। जालपा भी जाएगी। रतन भी जाएगी। उसके पिता, संबंधी, मित्र, अपने-पराए-सभी भिन्न-भिन्न भावों से उसकी दुर्दशा का तमाशा देखेंगे। नहीं, वह अपनी मिट्टी यों न खराब करेगा, न करेगा। इससे कहीं अच्छा है, कि वह डूब मरे !

मगर फिर खयाल आया कि जालपा किसकी होकर रहेगी ! हाय, मैं अपने साथ उसे भी ले डूबा | बाबूजी और अम्मांजी तो रो-धोकर सब्र कर लेंगे, पर उसकी रक्षा कौन करेगा? क्या वह छिपकर नहीं रह सकता? क्या शहर से दूर किसी छोटे-से गांव में वह अज्ञातवास नहीं कर सकता? संभव है, कभी जालपा को उस पर दया आए, उसके अपराधों को क्षमा कर दे। संभव है, उसके पास धन भी हो जाए, पर यह असंभव है कि वह उसके सामने आंखें सीधी कर सके। न जाने इस समय उसकी क्या दशा होगी । शायद मेरे पत्र को आशय समझ गई हो। शायद परिस्थिति का उसे कुछ ज्ञान हो गया हो। शायद उसने अम्मां को मेरा पत्र दिखाया हो और दोनों [ ९८ ]
घबराई हुई मुझे खोज रही हों। शायद पिताजी को बुलाने के लिए लड़कों को भेजा गया हो। चारों तरफ मेरी तलाश हो रही होगी। कहीं कोई इधर भी न आता हो। कदाचित मौत को देखकर भी वह इस समय इतना भयभीत न होता, जितना किसी परिचित को देखकर आगे-पीछे चौकन्नी आंखों से ताकता हुआ, वह उस जलती हुई धूप में चला जा रहा था-कुछ खबर न थी, किधर। सहसा रेल की सीटी सुनकर वह चौंक पड़ा। अरे, मैं इतनी दूर निकल आया? रेलगाड़ी सामने खड़ी थी। उसे उस पर बैठ जाने की प्रबल इच्छा हुई, मानो उसमें बैठते ही वह सारी बाधाओं से मुक्त हो जाएगा, मगर जेब में रुपये न थे। उंगली में अंगूठी पड़ी हुई थी। उसने कुलियों के जमादार को बुलाकर कहा-कहीं यह अंगूठी बिकवा सकते हो? एक रुपया तुम्हें दूंगा। मुझे गाड़ी में जाना है। रुपये लेकर घर से चला था, पर मालूम होता है, कहीं गिर गए। फिर लौटकर जाने में गाड़ी न मिलेगी और बड़ा भारी नुकसान हो जाएगा।

जमादार ने उसे सिर से पांव तक देखा, अंगूठी ली और स्टेशन के अंदर चला गया। रमा टिकट-घर के सामने टहलने लगा। आंखें उसकी ओर लगी हुई थीं। दस मिनट गुजर गए और जमादार का कहीं पता नहीं। अंगूठी लेकर कहीं गायब तो नहीं हो जाएगा। स्टेशन के अंदर जाकर उसे खोजने लगा। एक कुली से पूछा। उसने पूछा-जमादार का नाम क्या है? रमा ने जबान दांतों से काट ली। नाम तो पूछा ही नहीं। बतलाए क्या? इतने में गाड़ी ने सीटी दी, रमा अधीर हो उठी। समझ गया, जमादार ने चरका दिया। बिना टिकट लिए ही गाड़ी में आ बैठा। मन में निश्चय कर लिया, साफ कह दूंगा मेरे पास टिकट नहीं है। अगर उतरना भी पड़ा, तो यहां से दस पांच कोस तो चला ही जाऊंगा।

गाड़ी चल दी, उस वक्त रमा को अपनी दशा पर रोना आ गया। हाय, न जाने उसे कभी लौटना नसीब भी होगा या नहीं। फिर यह सुख के दिन कहां मिलेंगे। यह दिन तो गए, हमेशा के लिए गए। इसी तरह सारी दुनिया से मुंह छिपाए, वह एक दिन मर जायगा। कोई उसकी लाश पर आंसू बहाने वाला भी न होगा। घरवाले भी रो-धोकर चुप हो रहेंगे। केवल थोड़े-से संकोच के कारण उसकी यह दशा हुई। उसने शुरू ही से, जालपा से अपनी सच्ची हालत कह दी होती, तो आज उसे मुंह पर कालिख लगाकर क्यों भागना पडता। मगर कहता कैसे, वह अपने को अभागिनी न समझने लगती? कुछ न सही, कुछ दिन तो उसने जालपा को सुखी रक्खा। उसकी लालसाओं की हत्या तो न होने दी। रमा के संतोष के लिए अब इतना ही काफी था।

अभी गाड़ी चले दस मिनट भी न बीते होंगे। गाड़ी का दरवाजा खुला, और टिकट बाबू अंदर आए। रमा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। एक क्षण में वह उसके पास आ जाएगा। इतने आदमियों के सामने उसे कितना लज्जित होना पड़ेगा। उसका कलेजा धक्-धक् करने लगा। ज्यों-ज्यों टिकट बाबू उसके समीप आता था, उसकी नाड़ी की गति तीव्र होती जाती थी। आखिर बला सिर पर आ ही गई। टिकट बाबू ने पूछा-आपका टिकट?

रमा ने जरा सावधान होकर कहा-मेरा टिकट तो कुलियों के जमादार के पास ही रह गया। उसे टिकट लाने के लिए रुपये दिए थे। न जाने किधर निकल गया।

टिकट बाबू को यकीन न आया, बोला-मैं यह कुछ नहीं जानता। आपको अगले स्टेशन पर उतरना होगा। आप कहां जा रहे हैं?

रमानाथ–सफर तो बड़ी दूर का है, कलकत्ते तक जाना है।

टिकट बाबू-आगे के स्टेशन पर टिकट ले लीजिएगा। [ ९९ ] रमानाथ–यही तो मुश्किल है। मेरे पास पचास का नोट था। खिड़की पर बड़ी भीड़ थी। मैंने नोट उस जमादार को टिकट लाने के लिए दिया; पर वह ऐसा गायब हुआ कि लौटा ही नहीं। शायद आप उसे पहचानते हों। लंबी-लंबा चेचक-रू आदमी है।

टिकट बाबू-इस विषय में आप लिखा-पढी कर सकते हैं, मगर बिना टिकट के जा नहीं सकते।

रमा ने विनीत भाव से कहा- भाई साहब, आपसे क्या छिपाऊं। मेरे पास और रुपये नहीं हैं। आप जैसा मुनासिब समझें, करें।

टिकट बाबू-मुझे अफसोस है, बाबू साहब, कायदे से मजबूर हूं। कमरे के सारे मुसाफिर आपस में कानाफूसी करने लगे। तीसरा दर्जा था, अधिकांश मजदूर बैठे हुए थे जो मजूरी की टोह में पूरब जा रहे थे। वे एक बाबू जाति के प्राणी को इस भाँति अपमानित होते देखकर आनंद पा रहे थे। शायद टिकट बाबू ने रमा को धक्का देकर उतार दिया होता, तो और भी खुश होते। रमा को जीवन में कभी इतनी झेप न हुई थी। चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था। अभी तो जीवन की इस नई यात्रा का आरंभ हुआ है। न जाने आगे क्या-क्या विपत्तियां झेलनी पड़ेगी। किस-किसके हाथों धोखा खाना पड़ेगा। उसके जी में आया-गाड़ी से कूद पड़ू, इस छीछालेदार से तो मर जाना ही अच्छी। उसकी आंखें भर आई, उसने खिड़की से सिर बाहर निकाल लिया और रोने लगा।

सहसा एक बूढ़े आदमी ने, जो उसके पास ही बैठा हुआ था, पूछा-कलकत्ते में कहाँ जाओगे, बाबूजी?

रमा ने समझा, वह गंवार मुझे बना रहा है, झुंझलाकर बोला-तुमसे मतलब, मैं कहीं जाऊंगा ।

बूढे ने इसे उपेक्षा पर कुछ भी ध्यान न दिया, बोला-मैं भी वहीं चलूंगा। हमारा-तुम्हारा साथ हो जायगा। फिर धीरे से बोला-किराए के रुपये मुझसे ले लो, वहां दे देना।

अब रमा ने उसकी ओर ध्यान से देखा। कोई साठ-सत्तर साल का बूढ़ा घुला हुआ आदमी था। मांस तो क्या हड्डियां तक गल गई थीं। मूंछ और सिर के बाल मुड़े हुए थे। एक छोटी-सी बकुची के सिवा उसके पास कोई असबाब भी न था।

रमा को अपनी ओर ताकते देखकर वह फिर बोला-आप हबड़े हीं उतरेंगे या और कहीं जाएंगे?

रमा ने एहसान के भार से दबकर कहा-बाबा, आगे मैं उतर पडूगा। रुपये का कोई बंदोबस्त करके फिर आऊंगा।

बूढा-तुम्हें कितने रुपये चाहिए, मैं भी तो वहीं चल रहा है। जब चाहे दे देना। क्या मेरे दस-पांच रुपये लेकर भाग जाओगे। कहां घर है?

रमानाथ-यहीं, प्रयाग ही में रहता हूँ।

बूढ़े ने भक्ति के भाव से कहा-धन्य है प्रयाग । धन्य है। मैं भी त्रिवेणी का स्नान करके आ रहा हूं, सचमुच देवताओं की पुरी है। तो कै रुपये निकालें?

रमा ने सकुचाते हुए कहा-मैं चलते ही चलते रुपया न दे सकेंगा, यह समझ लो।

बूढे ने सरल भाव से कही-अरे बाबूजी, मेरे दस-पांच रुपये लेकर तुम भाग थोड़े ही जाओगे। मैंने तो देखा, प्रयाग के पण्डे यात्रियों को बिना लिखाए-पढ़ाए रुपये दे देते हैं। इस [ १०० ]
रुपये में तुम्हारा काम चल जाएगा?

रमा ने सिर झुकाकर कहा-हां, इतने बहुत हैं।

टिकट बाबू को किराया देकर रमा सोचने लगा-यह बूढ़ा कितना सरल, कितना परोपकारी, कितना निष्कपट जीव है। जो लोग सभ्य कहलाते हैं, उनमें कितने आदमी ऐसे निकलेंगे, जो बिना जान-पहचान किसी यात्री को उबार लें। गाड़ी के और मुसाफिर भी बूढ़े को श्रद्धा के नेत्रों से देखने लगे।

रमा को बूढे की बातों से मालूम हुआ कि वह जाति का खटिक है, कलकत्ते में उसकी शाक-भाजी की दुकान है। रहने वाला तो बिहार का है, पर चालीस साल से कलकत्ते ही में रोजगार कर रहा है। देवीदीन नाम है, बहुत दिनों से तीर्थयात्रा की इच्छा थी, बदरीनाथ की यात्रा करके लौटा जा रहा है।

रमा ने आश्चर्य से पूछा-तुम बदरीनाथ की यात्रा कर आए? वहां तो पहाड़ों की बड़ी-बड़ी चढ़ाइयां हैं।

देवीदीन-भगवान् की दया होती है तो सब कुछ हो जाता है, बाबूजी । उनकी दया चाहिए।

रमानाथ-तुम्हारे बाल-बच्चे तो कलकत्ते ही में होंगे?

देवीदीन ने रूखी हंसी हंसकर कहा–बाल-बच्चे तो सब भगवान् के घर गए। चार बेटे थे। दो का ब्याह हो गया था। सब चल दिए। मैं बैठा हुआ हूं। मुझी से तो सब पैदा हुए थे। अपने बोए हुए बीज को किसान ही तो काटता है।

यह कहकर वह फिर हंसा। जरा देर बाद बोला–बुढ़िया अभी जीती हैं। देखें, हम दोनों में पहले कौन चलता है। वह कहती है, पहले मैं जाऊंगी, मैं कहता हूं ,पहले मैं जाऊंगा। देखो किसकी टेक रहती है। बन पड़ा तो तुम्हें दिखाऊंगा। अब भी गहने पहनती है। सोने की बालियां और सोने की हसली पहने दुकान पर बैठी रहती है। जब कहा कि चल तीर्थ कर आवें तो बोली-तुम्हारे तीर्थ के लिए क्या दुकान मिट्टी में मिला दें? यह है जिंदगी का हाल। आज मरे कि कल मरे, मगर दुकान न छोड़ेगी। न कोई आगे, न कोई पीछे, न कोई रोने वाला, न कोई हंसने वाला, मगर माया बनी हुई है।अब भी एक-न-एक गहना बनवाती ही रहती है। न जाने कब उसका पेट भरेगा। सब घरों का यही हाल है। जहां देखोहाय गहने । हाय गहने | गहने के पीछे जान दे दें, घर के आदमियों को भूखा मारें, घर की चीजें बेचें। और कहां तक कहूं, अपनी आबरू तक बेच दें। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबको यही रोग लगा हुआ है। कलकत्ते में कहां काम करते हो, भैया?

रमानाथ-अभी तो जा रहा हूं। देखें कोई नौकरी-चाकरी मिलती है या नहीं?

देवीदीन–तो फिर मेरे ही घर ठहरना। दो कोठरियां हैं, सामने दालान है, एक कोठरी ऊपर है। आज बेचूं तो दस हजार मिलें। एक कोठरी तुम्हें दे दूंगा। जब कहीं काम मिल जाय, तो अपना घर ले लेना। पचास साल हुए घर से भागकर हबड़े गया था, तब से सुख भी देखे, दुख भी देखे। अब मना रहा हूं, भगवान् ले चलो। हां, बुढिया को अमर कर दो। नहीं, तो उसकी दुकान कौन लेगा, घर कौन लेगा और गहने कौन लेगा।

यह कहकर देवीदीन फिर हंसा। वह इतना हसोड़, इतनी प्रसन्नचित्त था कि, रमा को आश्चर्य हो रहा था। बेबात की बात पर हंसता था। जिस बात पर और लोग रोते हैं, उस पर उसे [ १०१ ]
हंसी आती थी। किसी जवान को भी रमा ने यों हंसते न देखा था। इतनी ही देर में उसने अपनी सारी जीवन-कथा कह सुनाई। कितने ही लतीफे याद थे। मालूम होता था, रमा से वर्षों की मुलाकात है। रमा को भी अपने विषय में एक मनगढंत कथा कहनी पड़ी।

देवीदीन–तो तुम भी घर से भाग आए हो? समझ गया। घर में झगड़ा हुआ होगा। बहू कहती होगी–मेरे पास गहने नहीं, मेरा नसीब जल गया। सास-बहू में पटती न होगी। उनका कलह सुन-सुन जी और खट्टा हो गया होगा।

रमानाथ–हां बाबा, बात यही है, तुम कैसे जान गए?

देवीदीन हंसकर बोला-यह बड़ा भारी मंत्र है भैया ! इसे तेली की खोपड़ी पर जगाया जाता है। अभी लड़के-बाले नहीं हैं न?

रमानाथ-नहीं, अभी तो नहीं हैं।

देवीदीन-छोटे भाई भी होंगे?

रमा चकित होकर बोला—हां दादा, ठीक कहते हो। तुमने कैसे जाना?

देवीदीन फिर ठट्टा मारकर बोला-यह सब मंत्रों का खेल है। ससुराल धनी होगी, क्यों?

रमानाथ-हां दादा, है तो।

देवीदीन-मगर हिम्मत न होगी।

रमानाथ- बहुत ठीक कहते हो, दादा। बड़े कम-हिम्मत हैं। जब से विवाह हुआ अपनी लड़कीं तक को तो बुलाया नहीं।

देवीदीन-समझ गया भैया, यही दुनिया का दस्तूर है। बेटे के लिए कहो चोरी करें, भीख मांगें , बेटी के लिए घर में कुछ है ही नहीं।

तीन दिन से रमा को नींद न आई थी। दिनभर रुपये के लिए मारा-मारा फिरती, रात-भर चिंता में पड़ा रहता। इस वक्त बातें करते-करते उसे नींद आ गई। गरदन झुकाकर झपकी लेने लगा। देवीदीन से तुरंत अपनी गठरी खोली; उसमें से एक दरी निकाली, और तख्त पर बिछाकर बोला-तुम यहां आकर लेट रहो, भैया ! मैं तुम्हारी जगह पर बैठ जाता हूं।

रमा लेटा रहा। देवीदीन बार-बार उसे स्नेह-भरी आंखों से देखा था, मानो उसका पुत्र कहीं परदेश से लौटा हो।

बाईस

जब रमा कोठे से धम-धम नीचे उतर रहा था, उस वक्त जालपा को इसका जरा भी शंका न हुई कि वह घर से भागा जा रहा है। पत्र तो उसने पद ही लिया था। जो ऐसा झुंझला रहा था कि चलकर रमा को खूब खरी-खरी सुनाऊं। मुझसे यह छल-कपट ! पर एक ही क्षण में उसके भाव बदल गए। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ है, सरकारी रुपये खर्च कर डाले हों। यही बात है, रतन के रुपये सराफ को दिए होंगे। उस दिन रतन को देने के लिए शायद वे सरकारी रुपये उठा लाए थे। यह सोचकर उसे फिर क्रोध आया-यह मुझसे इतना परदा क्यों करते हैं? क्यों मुझसे बढ़-बढ़कर बातें करते थे? क्या मैं इतना भी नहीं जानती कि संसार में अमीर-गरीब दोनों ही होते हैं? क्या सभी स्त्रियां गहनों से लदी रहती हैं? गहने न पहनना क्या कोई पाप है? जब और [ १०२ ]
जरूरी कामों से रुपये बचते हैं, तो गहने भी बन जाते हैं। पेट और तन काटकर, चोरी या बेईमानी करके तो गहने नहीं पहने जाते ! क्या उन्होंने मुझे ऐसी गई-गुजरी समझ लिया !

उसने सोचा, रमा अपने कमरे में होगा, चलकर पूछूं, कौन से गहने चाहते हैं। परिस्थिति की भयंकरता का अनुमान करके क्रोध की जगह उसके मन में भय का संचार हुआ। वह बड़ी तेजी से नीचे उतरी। उसे विश्वास था, वह नीचे बैठे हुए इंतजार कर रहे होंगे। कमरे में आई तो उनका पता न था। साइकिल रक्खी हुई थी, तुरंत दरवाजे से झांका। सड़क पर भी नहीं। कहां चले गए? लड़के दोनों पढ़ने स्कूल गए थे, किसको भेजे कि जाकर उन्हें बुला लाए। उसके हृदय में एक अज्ञात संशय अंकुरित हुआ। फौरन ऊपर गई, गले का हार और हाथ का कंगन उतारकर रूमाल में बांधा, फिर नीचे उतरी, सड़क पर आकर एक तांगा लिया, और कोचवान से बोली-चुंगी कचहरी चलो। वह पछता रही थी कि मैं इतनी देर बैठी क्यों रही। क्यों न गहने उतारकर तुरंत दे दिए। रास्ते में वह दोनों तरफ बड़े ध्यान से देखती जाती थी । क्यों इतनी जल्द इतनी दूर निकल आए? शायद देर हो जाने के कारण वह भी तांगे ही पर गए हैं, नहीं तो अब तक जरूर मिल गए होते। तांगे वाले से बोली-क्यों जी, अभी तुमने किसी बाबूजी को तांगे परे जाते देखा?

तांगे वाले ने कहा-हो माईजी, एक बाबू अभी इधर ही से गए हैं।

जालपा को कुछ ढाढस हुआ, रमा के पहुंचते-पहुंचते वह भी पहुंच जाएगी। कोचवान से बार-बार घोड़ा तेज करने को कहती। जब वह दफ्तर पहुंची, तो ग्यारह बज गए थे। कचहरी में सैकड़ों आदमी इधर-उधर दौड़ रहे थे। किससे पूछे? न जाने वह कहां बैठते हैं।

सहसा एक चपरासी दिखलाई दिया। जालपा ने उसे बुलाकर कहा--सुनो जी, जरा बाबू रमानाथ को तो बुला लाओ।

चपरासी बोला—उन्हीं को बुलाने जा रहा हूं। बड़े बाबू ने भेजा है। आप क्या उनके घर ही से आई हैं।

जालपा–हां, मैं तो घर ही से आ रही हूं। अभी दस मिनट हुए वह घर से चले हैं। चपरासी-यहां तो नहीं आए।

जालपा बड़े असमंजस में पड़ी। वह यहां भी नहीं आए, रास्ते में भी नहीं मिले, तो फिर गए कहां? उसका दिल बांसों उछलने लगा। आंखें भर-भर आने लगीं। वहां बड़े बाबू के सिवा वह और किसी को न जानती थी। उनसे बोलने का अवसर कभी न पड़ा था, पर इस समय उसका संकोच गायब हो गया। भय के सामने मन के और सभी भाव दब जाते हैं। चपरासी से बोली-जरा बड़े बाबू से कह दो नहीं चलो, मैं ही चलती हूं। बड़े बाबू से कुछ बातें करती हैं।

जालपा का ठाट-बाट और रंग-ढंग देखकर चपरासी रोब में आ गया, उल्टे पांव बड़े बाबू के कमरे की ओर चला। जालपा उसके पीछे-पीछे हो ली। बड़े बाबू खबर पाते ही तुरंत बाहर निकल आए।

जालपा ने कदम आगे बढ़ाकर कहा-क्षमा कीजिए, बाबू साहब, आपको कष्ट हुआ। यह पंद्रह-बीस मिनट हुए घर से चले, क्या अभी तक यहां नहीं आए?

रमेश-अच्छा आप मिसेज रमानाथ हैं। अभी तो यहां नहीं आए। मगर दफ्तर के वक्त सैर-सपाटे करने की तो उसकी आदत न थी। जालपा ने चपरासी की ओर ताकते हुए कहा-मैं आपसे कुछ अर्ज करना चाहती हूं। [ १०३ ]रमेश-तो चलो अंदर बैठो, यहां कब तक खड़ी रहोगी। मुझे आश्चर्य है कि वह गए कहां ! कहीं बैठे शतरंज खेल रहे होंगे।

जालपा–नहीं बाबूजी, मुझे ऐसा भय हो रहा है कि वह कहीं और न चले गए हों। अभी दस मिनट हुए, उन्होंने मेरे नाम एक पुरजा लिखा था। (जेब से टटोलकर) जी हां, देखिए वह पुरजा मौजूद है। आप उन पर कृपा रखते हैं, तो कोई परदा नहीं। उनके जिम्मे कुछ सरकारी रुपये तो नहीं निकलते !

रमेश ने चकित होकर कहा-क्यों, उन्होंने तुमसे कुछ नहीं कहा?

जालपा-कुछ नहीं। इस विषय में कभी एक शब्द भी नहीं कहा।

रमेश-कुछ समझ में नहीं आता। आज उन्हें तीन सौ रुपये जमा करना है। परसों की आमदनी उन्होंने जमा नहीं की थी? नोट थे, जेब में डालकर चल दिए। बाजार में किसी ने नोट निकाल लिए। (मुस्कराकर) किसी और देवी की पूजा तो नहीं करते?

जालपा का मुख लज्जा से नत हो गया। बोली-अगर यह ऐब होता, तो आप भी उस इल्जाम से न बेचते। जेब से किसी ने निकाल लिए होंगे। मारे शर्म के मुझसे कहा न होगा। मुझसे जरा भी कहा होता, तो तुरंत रुपये निकालकर दे देती, इसमें बात ही क्या थी।

रमेश बाबू ने अविश्वास के भाव से पूछा-क्या घर में रुपये हैं? जालपा ने नि:शंक होकर कहा–तीन सौ चाहिए न, मैं अभी लिए आती हूँ।

रमेश-अगर वह घर पर आ गए हों, तो भेज देना।

जालपा आकर तांगे पर बैठी और कोचवान से चौक चलने को कहा। उसने अपना हार बेच डालने का निश्चय कर लिया। यों उसकी कई सहेलियां थीं, जिनसे उसे रुपये मिल सकते थे। स्त्रियों में बड़ा स्नेह होता है। पुरुषों की भांति उनकी मित्रता केवल पान-पत्ते तक ही समाप्त नहीं हो जाती; मगर अवसर नहीं था। सराफे में पहुंचकर वह सोचने लगी; किस दुकान पर जाऊं। भय हो रहा था, कहीं ठगी न जाऊं। इस सिरे से उस सिरे तक चक्कर लगा आई, किसी दुकान पर जाने की हिम्मत न पड़ी। उधर वक्त भी निकला जाता था। आखिर एक दुकान पर एक बूढे सराफ को देखकर उसका संकोच कुछ कम हुआ। सराफ बड़ा घाघ था, जालपा की झिझक और हिचक देखकर समझ गया, अच्छा शिकार फंसा।

जालपा ने हार दिखाकर कहा-आप इसे ले सकते हैं?

सराफ ने हार को इधर-उधर देखकर कहा-मुझे चार पैसे की गुंजाइश होगी, तो क्यों न ले लूंगा। माल चोखा नहीं है।

जालपा–तुम्हें लेना है, इसलिए माल चोखा नहीं है, बेचना होता, तो चोखा होता। कितने में लोगे?

सराफ-आप ही कह दीजिए। | सराफ ने साढ़े तीन सौ दाम लगाए, और बढ़ते-बढ़ते चार सौ तक पहुंचा। जालपा को देर हो रही थी; रुपये लिए और चले खड़ी हुई। जिस हार को उसने इतने चाव से खरीदा था, जिसकी लालसा उसे बाल्यकाल ही में उत्पन्न हो गई थी, उसे आज आधे दामों बेचकर उसे जरी भी दु:ख नहीं हुआ, बल्कि गर्वमय हर्ष का अनुभव हो रहा था। जिस वक्त रमा को मालूम होगा कि उसने रुपये दे दिए हैं, उन्हें कितना आनंद होगा। कहीं दफ्तर पहुंच गए हों तो बड़ा मजा हो। यह सोचती हुई वह फिर दफ्तर पहुंची। रमेश बाबू [ १०४ ]उसे देखते हुए बोले-क्या हुआ, घर पर मिले?

जालपा-क्या अभी तक यहां नहीं आए? घर तो नहीं गए। यह कहते हुए उसने नोटों का पुलिंदा रमेश बाबू की तरफ बढ़ा दिया।

रमेश बाबू नोटों को गिनकर बोले-ठीक है, मगर वह अब तक कहां हैं। अगर न आना था, तो एक खत लिख देते। मैं तो बड़े संकट में पड़ा हुआ था। तुम बड़े वक्त से आ गईं। इस वक्त तुम्हारी सूझ-बूझ देखकर जो खुश हो गया। यही सच्ची देवियों का धर्म है।

जालपा फिर तांगे पर बैठकर घर चली तो उसे मालूम हो रहा था, मैं कुछ ऊंची हो गई हैं। शरीर में एक विचित्र स्फूर्ति दौड़ रही थी। उसे विश्वास था, वह आकर चिंतित बैठे होंगे। वह जाकर पहले उन्हें खूब आड़े हाथों लेगी, और खूब लज्जित करने के बाद यह हाल कहेगीं, लेकिन जब घर में पहुंची तो रमानाथ का कहीं पता न था।

जागेश्वरी ने पूछा-कहां चली गई थीं इस धूप में?

जालपा–एक काम से चली गई थी। आज उन्होंने भोजन नहीं किया, न जाने कहां चले गए।

जागेश्वरी-दफ्तर गए होंगे।

जालपा-नहीं, दफ्तर नहीं गए। वहां से एक चपरासी पूछने आया था।

यह कहती हुई वह ऊपर चली गई, बचे हुए रुपये संदूक में रखे और पंखा झलने लगी। मारे गरमी के देह फुकी जा रही थीं, लेकिन कान द्वार की ओर लगे थे। अभी तक उसे इसकी जरा भी शंका न थी कि रमा ने विदेश की राह ली है।

चार बजे तक तो जालपा को विशेष चिंता न हुई लेकिन ज्यों-ज्यों दिन ढलने लगा, उसकी चिंता बढ़ने लगी। आखिर वह सबसे ऊंची छत पर चढ़ गई, हालाँकि उसके जीर्ण होने के कारण कोई ऊपर नहीं आता था, और वहां चारों तरफ नजर दौड़ाई, लेकिन रमा किसी तरफ से आता दिखाई न दिया।

जब संध्या हो गई और रमा घर न आया, तो जालपा का जी घबराने लगा। कहां चले गए? वह दफ्तर से घर आए बिना कहीं बाहर न जाते थे। अगर किसी मित्र के घर होते, तो क्या अब तक न लौटते? मालूम नहीं, जेब में कुछ है भी या नहीं। बेचारे दिनभर से न मालूम कहां भटक रहे होंगे। वह फिर पछताने लगी कि उनका पत्र पढ़ते ही उसने क्यों न हार निकालकर दे दिया। क्यों दुविधे में पड़ गई। बेचारे शर्म के मारे घर न आते होंगे। कहां जाय? किससे पूछे?

चिराग जल गए, तो उससे न रहा गया। सोचा, शायद रतन से कुछ पता चले। उसके बंगले पर गई तो मालूम हुआ, आज तो वह इधर आए ही नहीं।

जालपा ने उन सभी पार्कों और मैदानों को छान डाला, जहां रमा के साथ वह बहुधा घूमने आया करती थी, और नौ बजते-बजते निराश लौट आई। अब तक उसने अपने आंसुओं को रोका था, लेकिन घर में कदम रखते ही जब उसे मालूम हो गया कि अब तक वह नहीं आए, तो वह हताश होकर बैठ गई। उसकी यह शंका अब दृढ़ हो गई कि वह जरूर कहीं चले गए। फिर भी कुछ आशा थी कि शायद मेरे पीछे आए हों और फिर चले गए हों। जाकर जागेश्वरी से पूछा-वह घर आए थे, अम्माजी?

जागेश्वरी–यार-दोस्तों में बैठे कहीं गपशप कर रहे होंगे। घर तो सराय है। दस बजे घर से निकले थे, अभी तक पता नहीं। [ १०५ ]जालपा-दफ्तर से घर आकर तब वह कहीं जाते थे। आज तो आए नहीं। कहिए तो गोपी बू को भेज दें। जाकर देखें, कहां रह गए।

जागेश्वरी-लड़के इस वक्त कहां देखने जाएंगे। उनका क्या ठीक है। थोड़ी देर और देख । फिर खाना उठाकर रख देना। कोई कहां तक इंतजार करे।

जालपा ने इसका कुछ जवाब न दिया। दफ्तर की कोई बात उनसे न कहीं। जागेश्वरी सुनकर घबड़ा जाती, और उसी वक्त रोना-पीटना मच जाता। वह ऊपर जाकर लेट गई और पने भाग्य पर रोने लगी। रह-रहकर चित्त ऐसा विकल होने लगा, मानो कलेजे में शूल उठ रहा । बार-बार सोचती, अगर रातभर न आए तो कल क्या करना होगा? जब तक कुछ पता न ले कि वह किधर गए, तब तक कोई जाय तो कहां जाय ! आज उसके मन ने पहली बार वीकार किया कि यह सब उसी की करनी का फल है। यह सच है कि उसने कभी आभूषणों लिए आग्रह नहीं किया, लेकिन उसने कभी स्पष्ट रूप से मना भी तो नहीं किया। अगर गहने चोरी हो जाने के बाद इतनी अधीर न हो गई होती, तो आज यह दिन क्यों आता। मन की इस दुर्बल अवस्था में जालपा अपने भार से अधिक भाग अपने ऊपर लेने लगी; वह जानती थी, रमा रिश्वत लेता हैं, नोच-खसोटकर रुपये लाता है। फिर भी कभी उसने मन नहीं किया। उसने खुद क्यों अपनी कमली के बाहर पांव फैलाया? क्यों उसे रोज सैर-सपाटे की सूझती थीं? उपहारों को ले-ले- वह क्यों फूली न समाती थी? इस जिम्मेदारी को भी इस वक्त जालपा अपने ही ऊपर ले रही थी। रमानाथ ने प्रेम के वश होकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो सब कुछ करते थे। युवकों को यही स्वभाव है। फिर उसने उनकी रक्षा के लिए क्या किया? क्यों उसे वह समझ न आई कि आमदनी से ज्यादा खर्च करने का दंड एक दिन भोगना पड़ेगा। अब उसे ऐसी कितनी ही बातें याद आ रही थीं, जिनसे उसे रमा के मन को विकलता का परिचय पा लेना चाहिए था; पर उसने कभी उन बातों की ओर ध्यान न दिया।

जालपा इन्हीं चिंताओं में डूबी हुई न जाने कब तक बैठी रही। जब चौकीदारों की सीटियों की आवाज़ उसके कानों में आई, तो वह नीचे जाकर जागेश्वरी से बोली-वह तो अब के नहीं आए। आप चलकर भोजन कर लीजिए।

जागेश्वरी बैठे-बैठे झपकियां ले रही थी। चौंककर बोली-कहां चले गए थे? जालपा-वह तो अब तक नहीं आए।

जागेश्वरी-अब तक नहीं आए? आधी रात तो हो गई होगी। जाते वक्त तुमसे कुछ कहा कि नहीं?

जालपा-कुछ नहीं। जागेश्वरी-तुमने तो कुछ नहीं कहा?

जालपा-मैं भला क्यों कहती। जागेश्वरी-तो मैं लालाजी को जगाऊँ?

जालपा-इस वक्त जगाकर क्या कीजिएगा? आप चलकर कुछ खा लीजिए न।

जागेश्वरी-मुझसे अब कुछ न खाया जायगा। ऐसा मनमौजी लड़का है कि कुछ कहा न सुना, न जाने कहां जाकर बैठ रहा। कम-से-कम कहला तो देता कि मैं इस वक्त न आऊंगा। | जागेश्वरी फिर लेट रही, मगर जालपा उसी तरह बैठी रही। यहां तक कि सारी रात गुजर गई-पहाड़-सी रात जिसका एक-एक पल एक-एक वर्ष के समान कर रहा था। [ १०६ ]

तेईस


एक सप्ताह हो गया, रमा का कहीं पता नहीं। कोई कुछ कहता है, कोई कुछ। बेचारे रमेश बाबू दिन में कई-कई बार आकर पूछ जाते हैं। तरह-तरह के अनुमान हो रहे हैं। केवल इतना ही पता चलता है कि रमानाथ ग्यारह बजे रेलवे स्टेशन की ओर गए थे। मुंशी दयानाथ का खयाल है, यद्यपि वे इसे स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं करते कि रमा ने आत्महत्या कर ली। ऐसी दशा में यही होता है। इसकी कई मिसालें उन्होंने खुद आंखों से देखी हैं। सास और ससुर दोनों ही जालपा पर सारा इल्जाम थोप रहे हैं। साफ-साफ कह रहे हैं कि इसी के कारण उसके प्राण गए। इसने उसके नाकों दम कर दिया। पूछो, थोड़ी-सी तो आपकी आमदनी, फिर तुम्हें रोज सैर-सपाटे और दावत-तवाजे की क्यों सूझती थी। जालपा पर किसी को दया नहीं आती। कोई उसके आंसू नहीं पोंछता। केवल रमेश बाबू उसकी तत्परता और सद्बुद्धि की प्रशंसा करते हैं, लेकिन मुंशी दयानाथ की आंखों में उस कृत्य की कुछ मूल्य नहीं। आग लगाकर पानी लेकर दौड़ने से कोई निर्दोष नहीं हो जाता है।

एक दिन दयानाथ वाचनालय से लौटे, तो मुंह लटका हुआ था। एक तो उनकी सूरत यों ही मुहर्रमी थी, उस पर मुंह लटका लेते थे तो कोई बच्चा भी कह सकता था कि इनका मिजाज बिगड़ा हुआ है।

जागेश्वरी ने पूछा-क्या है, किसी से कहीं बहस हो गई क्या?

दयानाथ–नहीं जी, इन तकाजों के मारे हैरान हो गया। जिधर जाओ, उधर लोग नोचने दौड़ते हैं, न जाने कितना कर्ज ले रक्खा है। आज तो मैंने साफ कह दिया, मैं कुछ नहीं जानता। मैं किसी का देनदार नहीं हूं। जाकर मेमसाहब से मांगो। | इसी वक्त जालपा आ पड़ी। ये शब्द उसके कानों में पड़ गए। इन सात दिनों में उसकी सूरत ऐसी बदल गई थी कि पहचानी न जाती थी। रोते-रोते आंखें सूज आई थीं। ससुर के ये कठोर शब्द सुनकर तिलमिला उठी, बोली-जी हां। आप उन्हें सीधे मेरे पास भेज दीजिए, मैं उन्हें या तो समझा दूंगी, या उनके दाम चुका दून्गी । दयानाथ ने तीखे होकर कहा-क्या दे दोगी तुम, हजारों का हिसाब है, सात सौ तो एक ही सराफ के हैं। अभी कै पैसे दिए हैं तुमने?

जालपा-उसके गहने मौजूद हैं, केवल दो-चार बार पहने गए हैं। वह आए तो मेरे पास भेज दीजिए। मैं उसकी चीजें वापस कर दूंगी। बहुत होगा दस-पांच रुपये तावान के ले लेगा।

यह कहती हुई वह ऊपर जा रही थी कि रतन आ गई और उसे गले से लगाती हुई बोली-क्या अब तक कुछ पता नहीं चला?

जालपा को इन शब्दों में स्नेह और सहानुभूति का एक सागर उमड़ता हुआ जान पड़ा। यह गैर होकर इतनी चिंतित है, और यहां अपने ही सास और ससुर हाथ धोकर पीछे पड़े हुए हैं। इन अपनों से गैर ही अच्छे। आंखों में आंसू भरकर बोली-अभी तो कुछ पता नहीं चला बहन।

रतन—यह बात क्या हुई, कुछ तुमसे तो कहा-सुनी नहीं हुई?

जालपा-जरा भी नहीं, कसम खाती हूं। उन्होंने नोटों के खो जाने का मुझसे जिक्र ही [ १०७ ]
नहीं किया। अगर इशारा भी कर देते, तो मैं रुपये दे देती। जब वह दोपहर तक नहीं आए और मैं खोजती हुई दफ्तर गई, तब मुझे मालूम हुआ, कुछ नोट खो गए हैं। उसी वक्त जाकर मैंने रुपये जमा कर दिए।

रतन-मैं तो समझती हूं, किसी से आंखें लड़ गईं। दस-पांच दिन में आप पता लग जायगा। यह बात सच न निकले, तो जो कह दें।

जालपा ने हकबकाकर पूछा-क्या तुमने कुछ सुना है? रतन-नहीं, सुना तो नहीं; पर मेरो अनुमान है।

जालपा–नहीं रतन, मैं इस पर जरा भी विश्वास नहीं करती। यह बुराई उनमें नहीं है, और चाहे जितनी बुराइयां हों। मुझे उन पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। | रतन ने हंसकर कहा-इस कला में ये लोग निपुण होते हैं। तुम बेचारी क्या जानो?

जालपा दृढ़ता से बोली-अगर वह इस कला में निपुण होते हैं, तो हम भी हदय को परखने में कम निपुण नहीं होती। मैं इसे नहीं मान सकती। अगर वह मेरे स्वामी थे, तो मैं भी उनकी स्वामिनी थी।

रतन-अच्छा चलो, कहीं घूमने चलती हो? चलो, तुम्हें कहीं घुमा लावें।

जालपा-नहीं, इस वक्त तो मुझे फुरसत नहीं है। फिर घरवाले यों ही प्राण लेने पर तुले हुए हैं, तब तो जान ही न छोड़ेंगे। किधर जाने का विचार है?

रतन-कहीं नहीं, जरा बाजार तक जाना था। जालपा-क्या लेना है?

रतन-जौहरियों की दुकान पर एक-दो चीज देखेंगी। बस, मैं तुम्हारे-जैसा कंगन चाहती हूँ। बाबूजी ने भी कई महीने के बाद रुपये लौटा दिए। अब खुद तलाश करूंगी।

जालपा–मेरे कंगन में ऐसे कौन-से रूप लगे हैं। बाजार में उससे बहुत अच्छे मिल सकते।

रतन-मैं तो उसी नमूने का चाहती हूं।

जालपा-उस नमूने का तो बना-बनाया मुश्किल से मिलेगा, और बनवाने में महीनों का झंझट। अगर सब्र न आती हो, तो मेरा ही कंगन ले लो, मैं फिर बनवा लूंगी।

रतन ने उछलकर कहा-वाह, तुम अपना कंगन दे दो, तो क्या कहना है । मूसलों ढोल बजाऊ । छ: सौ का था न?

जालपा- हां, था तो छ: सौ की, मगर महीनों सराफ की दुकान की खाक छाननी पड़ी थी। जड़ाई तो खुद बैठकर करवाई थी। तुम्हारे खातिर दे दूंगी।

जालपा ने कंगन निकालकर रतन के हाथों में पहना दिए। रतन के मुख पर एक विचित्र गौरव का आभास हुआ, मानो किसी कंगाल को पारस मिल गया हो। यही आत्मिक आनंद की चरम सीमा है। कृतज्ञता से भरे हुए स्वर से बोली-तुम जितना कहो, उतना देने को तैयार हूं। तुम्हें दबाना नहीं चाहती। तुम्हारे लिए यही क्या कम है कि तुमने इसे मुझे दे दिया। मगर एक बात है। अभी मैं सब रुपये न दे सकेंगी, अगर दो सौ रुपये फिर दे दें तो कुछ हरज है?

जालपा ने साहसपूर्वक कहा- कोई हरज नहीं, जी चाहे कुछ भी मत दो।

रतन-नहीं, इस वक्त मेरे पास चार सौ रुपये हैं, मैं दिए जाती हूँ। मेरे पास रहेंगे तो किसी दूसरी जगह खर्च हो जाएंगे। मेरे हाथ में तो रुपये टिकते ही नहीं, करूं क्या। जब तक [ १०८ ]
खर्च न हो जाएं, मुझे एक चिंता-सी लगी रहती है, जैसे सिर पर कोई बोझ सवार हो।

जालपा ने कंगन की डिबिया उसे देने के लिए निकाली तो उसका दिल मसोस उठा। उसकी कलाई पर यह कंगन देखकर रमा कितना खुश होता था। आज वह होता तो क्या यह चीज इस तरह जालपा के हाथ से निकल जाती ! फिर कौन जाने कंगन पहनना उसे नसीब भी होगा या नहीं। उसने बहुत जब्त किया, पर आंसू निकल ही आए। | रतन उसके आंसू देखकर बोली-इस वक्त रहने दो बहन, फिर ले लूंगी, जल्दी ही क्या है।

जालपा ने उसकी ओर बक्से को बढ़ाकर कहा-क्यों, क्या मेरे आंसू देखकर? तुम्हारी खातिर से दे रही हूं, नहीं यह मुझे प्राणों से भी प्रिय था। तुम्हारे पास इसे देखूंगी, तो मुझे तस्कीन होती रहेगी। किसी दूसरे को मत देना, इतनी दया करना।

रतन-किसी दूसरे को क्यों देने लगी। इसे तुम्हारी निशानी समझेंगी। आज बहुत दिन के बाद मेरे मन की अभिलाषा पूरी हुई। केवल दुःख इतना ही है, कि बाबूजी अब नहीं हैं। मेरा मन कहता है कि वे जल्दी ही आयंगे। वे मारे शर्म के चले गए हैं, और कोई बात नहीं। वकील साहब को भी यह सुनकर बड़ा दु:ख हुआ। लोग कहते हैं, वकीलों का हृदय कठोर होता है, मगर इनको तो मैं देखती हूं, जरा भी किसी की विपत्ति सुनी और तड़प उठे।

जालपा ने मुस्कराकर कहा-बहन,एक बात पूछूं बुरा तो न मानोगी? वकील साहब से तुम्हारी दिल तो न मिलता होगा।

रतन का विनोद-रंजित, प्रसन्न मुख एक क्षण के लिए मलिन हो उठा। मानो किसी ने उसे उस चिर-स्नेह की याद दिला दी हो, जिसके नाम को वह बहुत पहले से चुकी थी। बोली-मुझे तो कभी यह खयाल भी नहीं आया बहन कि मैं युवती हूं और वे बूढ़े हैं। मेरे हृदय में जितना प्रेम, जितना अनुराग है, वह सब मैंने उनके ऊपर अर्पण कर दिया। अनुराग, यौवन या रूप या धन से नहीं उत्पन्न होता। अनुराग अनुराग से उत्पन्न होता है। मेरे ही कारण वे इस अवस्था में इतना परिश्रम कर रहे हैं, और दूसरा है ही कौन क्या यह छोटी बात है? कल कहीं चलोगी? कहो तो शाम को आऊं?

जालपा-जाऊंगी तो मैं कहीं नहीं, मगर तुम आना जरूर। दो घड़ी दिल बहलेगा। कुछ अच्छा नहीं लगता। मन डाल-डाल दौड़ता-फिरता है। समझ में नहीं आता, मुझसे इतना संकोच क्यों किया? यह भी मेरा ही दोष है। मुझमें जरूर उन्होंने कोई ऐसी बात देखी होगी, जिसके कारण मुझसे परदा करना उन्हें जरूरी मालूम हुआ। मुझे यही दुःख है कि मैं उनका सच्चा स्नेह न पा सकी। जिससे प्रेम होता है, उससे हम कोई भेद नहीं रखते।

रतन उठकर चली तो जालपा ने देखा-कंगन का बक्स मेज पर पड़ा हुआ है। बोली-इसे लेती जाओ बहन, यहां क्यों छोड़े जाती हो।

रतन-ले जाऊंगी, अभी क्या जल्दी पड़ी है। अभी पूरे रुपये भी तो नहीं दिए ! जालपा–नहीं, नहीं; लेती जाओ। मैं न मानूंगी। मगर रतन सीढ़ी से नीचे उतर गई। जालपा हाथ में कंगन लिए खड़ी रही।

थोड़ी देर बाद जालपा ने संदूक से पांच सौ रुपये निकाले और दयानाथ के पास जाकर बोली-यह रुपये लीजिए; नारायणदास के पास भिजवा दीजिए। बाकी रुपये भी मैं जल्द ही दे दूंगी। [ १०९ ]
दयानाथ ने झेंपकर कहा-रुपये कहां मिल गए?

जालपा ने निःसंकोच होकर कहा-रतन के हाथ कंगन बेच दिया। दयानाथ उसका मुंह ताकने लगे।

चौबीस

एक महीना गुजर गया। प्रयाग के सबसे अधिक छपने वाले दैनिक पत्र में एक नोटिस निकल रहा है, जिसमें रमानाथ के घर लौट आने की प्रेरणा दी गई है, और उसका पता लगा लेने वाले आदमी को पांच सौ रुपये इनाम देने का वचन दिया गया है, मगर अभी कहीं से कोई खबर नहीं आई। जालपा चिंता और दुःख से धुलती चली जाती है। उसकी दशा देखकर दयानाथ को भी उस पर दया आने लगी है। आखिर एक दिन उन्होंने दीनदयाल को लिखा-आप आकर बहू को कुछ दिनों के लिए ले जाइए। दीनदयाल यह समाचार पाते ही घबड़ाए हुए आए; पर जालपा ने मैके जाने से इंकार कर दिया। | दीनदयाल ने विस्मित होकर कहा-क्या यहां पड़े-पड़े प्राण देने का विचार है?

जालपा ने गंभीर स्वर में कहा-अगर प्राणों को इसी भांति जाना होगा, तो कौन रोक सकता है। मैं अभी नहीं मरने की दादाजी, सच मानिए। अभागिनों के लिए वहां भी जगह नहीं है।

दीनदयाल-आखिर चलने में हरज ही क्या है। शहजादी और बसन्ती दोनों आई हुई हैं। उनके साथ हंस-बोलकर जी बहलता रहेगा।

जालपा-यहां लाला और अम्मांजी को अकेली छोड़कर जाने को मेरा जी नहीं चाहता। जब रोना ही लिखा है, तो रोऊंगी।

दीनदयाल-यह बात क्या हुई, सुनते हैं कुछ कर्ज हो गया था, कोई कहता है, सरकारी रकम खा गए थे।

जालपा-जिसने आपसे यह कहा, उसने सरासर झूठ कहा।

दीनदयाल तो फिर क्यों चले गए? जालपा–यह मैं बिल्कुल नहीं जानती। मुझे बार-बार खुद यही शंका होती है।

दीनदयाल-लाला दयनाथ से तो झगड़ा नहीं हुआ?

जालपा-लालाजी के सामने तो वह सिर तक नहीं उठाते, पान तक नहीं खाते, भला झगड़ा क्या करेंगे। उन्हें घूमने का शौक था। सोचा होगा–यों तो कोई जाने न देगा, चलो भाग चलें।

दीनदयाल–शायद ऐसा ही हो। कुछ लोगों को इधर-उधर भटकने की सनक होती है। तुम्हें यहां जो कुछ तकलीफ हो, मुझसे साफ-साफ कह दो। खरच के लिए कुछ भेज दिया करूं?

जालपा ने गर्व से कहा-मुझे कोई तकलीफ नहीं है, दादाजी ! आपकी दया से किसी चीज की कमी नहीं है। [ ११० ]दयानाथ और जागेश्वरी, दोनों ने जालपा को समझाया; पर वह जाने पर राजी न हुई। तब दयानाथ झुंझलाकर बोले-यहां दिन-भर पड़े-पड़े रोने से तो अच्छा है।

जालपा-क्या वह कोई दूसरी दुनिया है, या मैं वहां जाकर कुछ और हो जाऊंगी। और फिर रोने से क्यों डरूं? जब हंसना था, तब हंसती थी, जब रोना है, तो रोऊंगी। वह काले कोसों चले गए हों; पर मुझे तो हरदम यहीं बैठे दिखाई देते हैं। यहां वे स्वयं नहीं हैं, पर घर की एकएक चीज में बसे हुए हैं। यहां से जाकर तो मैं निराशा से पागल हो जाऊंगी।

दीनदयाल समझ गए यह अभिमानिनी अपनी टेक न छोड़ेगी। उठकर बाहर चले गए। संध्या समय चलते वक्त उन्होंने पचास रुपये का एक नोट जालपा की तरफ बढ़ाकर कहा-इसे रख लो, शायद कोई जरूरत पड़े।

जालपा ने सिर हिलाकर कहा-मुझे इसकी बिल्कुल जरूरत नहीं है, दादाजी। हां, इतना चाहती हूं कि आप मुझे आशीर्वाद दें। संभव है, आपके आशीर्वाद से मेरा कल्याण हो। | दीनदयाल की आंखों में आंसू भर आए, नोट वहीं चारपाई पर रखकर बाहर चले आए।

क्वार का महीना लग चुका था। मेघ के जल-शुन्य टुकड़े कभी-कभी आकाश में दौड़ते नजर आ जाते थे। जालपा छत पर लेटी हुई उन मेघ-खंडों की किलोलें देखा करती। चिंता-व्यथित प्राणियों के लिए इससे अधिक मनोरंजन की और वस्तु ही कौन है? बादल के टुकड़े भाति-भांति के रंग बदलते, भांति-भाँति के रूप भरते, कभी आपस में प्रेम से मिल जाते, कभी रूठकर अलग-अलग हो जाते, कभी दौड़ने लगते, कभी ठिठक जाते। जालपा सोचती, रमानाथ भी कहीं बैठे यही मेघ-क्रीड़ा देखते होंगे। इस कल्पना में उसे विचित्र आनंद मिलता। किसी माली को अपने लगाए पौधों से, किसी बालक को अपने बनाए हुए घरौंदों से जितनी आत्मीयता होती है, कुछ वैसा ही अनुराग उसे उन आकाशगामी जीवों से होता था। विपत्ति में हमारा मन अंतर्मुखी हो जाता है। जालपा को अब यही शंका होती थी कि ईश्वर ने भी पापों का यह दंड दिया है। आखिर रमानाथ किसी का गला दबाकर ही तो रोज रुपये लाते थे। कोई खुशी से तो न दे देता। यह रुपये देखकर वह कितनी खुश होती थी। इन्हीं रुपयों से तो नित्य शौक श्रृंगार की चीजें आती रहती थीं। उन वस्तुओं को देखकर अब उसका जी जलता था। यहीं सारे दु:खों की मूल हैं। इन्हीं के लिए तो उसके पति को विदेश जाना पड़ा। वे चीजें उसकी आंखों में अब कांटों की तरह गड़ती थीं, उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थीं।

आखिर एक दिन उसने इन चीजों को जमा किया-मखमली स्लीपर, रेशमी मोजे, तरह-तरह की बेलें, फीते, पिन, कंघियां, आईने, कोई कहां तक गिनाए। अच्छा-खासा एक देर हो गया। वह इस ढेर को गंगा में डुबा देगी, और अब से एक नए जीवन का सूत्रपात करेगी। इन्हीं वस्तुओं के पीछे, आज उसकी यह गति हो रही है। आज वह इस मायाजाल को नष्ट कर डालेगी। उनमें कितनी ही चीजें तो ऐसी सुंदर थीं कि उन्हें फेंकते मोह आता था; मगर ग्लानि की उस प्रचंड ज्वाला को पानी के ये छींटे क्या बुझाते। आधी रात तक वह इन चीजों को उठाउठाकर अलग रखती रही, मानो किसी यात्रा की तैयारी कर रही हो। हां, यह वास्तव में यात्रा ही थी-अंधेरे से उजाले की, मिथ्या से सत्य की। मन में सोच रही थी, अब यदि ईश्वर की दया हुई और वह फिर लौटकर घर आए, तो वह इस तरह रहेगी कि थोड़े-से-थोड़े में निर्वाह हो जाय। एक पैसा भी व्यर्थ न खर्च करेगी। अपनी मजदूरी के ऊपर एक कौड़ी भी घर में न आने देगी। आज से उसके नए जीवन का आरंभ होगा। [ १११ ]ज्योंही चार बजे; सड़क पर लोगों के आने-जाने की आहट मिलने लगी। जालपा ने बेग उठा लिया और गंगा-स्नान करने चली। बेग बहुत भारी था, हाथ में उसे लटकाकर दस कदम भी चलना कठिन हो गया। बार-बार हाथ बदलती थी। यह भय भी लगा हुआ था कि कोई देख न ले। बोझे लेकर चलने का उसे कभी अवसर न पड़ा था। इक्के वाले पुकारते थे; पर वह इधर कान न देती थी। यहां तक कि हाथ बेकाम हो गए, तो उसने बेग को पीठ पुरे रख लिया और कदम बढ़ाकर चलने लगी। लंबा घूंघट निकाल लिया था कि कोई पहचान न सके। | वह घाट के समीप पहुंची, तो प्रकाश हो गया था। सहसा उसने रतन को अपनी मोटर पर आते देखा। उसने चाहा, सिर झुकाकर मुंह छिपा ले; पर रतन ने दूर हो से पहचान लिया, मोटर रोककर बोलीं-कहां जा रही हो बहन, यह पीठ पर बेग कैसा है?

जालपा ने घूंघट हटा लिया और नि:शंक होकर बोली-गंगा-स्नान करने जा रही हूं।

रतन–मैं तो स्नान करके लौट आई, लेकिन चलो, तुम्हारे साथ चलती हूँ। तुम्हें धर पहुंचाकर लौट जाऊंगी। बेग रख दो।

जालपा-नहीं-नहीं, यह भारी नहीं हैं। तुम जाओ, तम्हें देर होगी। मैं चली जाऊंगी।

मगर रतन ने न माना, कार से उतरकर उसके हाथ से बेग ले ही लिया और कार में रखती हुई बोली-क्या भरा है तुमने इसमें, बहुत भारी है। खोलकर देखें?

जालपा- इसमें तुम्हारे देखने लायक कोई चीज नहीं है। बेग में ताला न लगा था। रतन ने खोलकर देखा, तो विस्मित होकर बोली-इन चीजों को कहां लिए जाती हो?

जालपा ने कार पर बैठते हुए कहा-इन्हें गंगा में बहा दूंगी।

रतन में और भी विस्मय में पड़कर कहा-गंगा में कुछ पागल तो नहीं हो गई हो। चलो, घर लौट चल। बेग रखकर फिर आ जाना।

जालपा ने दृढता से कहा-नहीं रतन, मैं इन चीजों को डुबाकर ही जाऊंगी।

रतन–आख़िर क्यों?

जालपा-पहले कार को बढ़ाओ, फिर बताऊं।

रतन-नहीं, पहले बता दो ।

जालपा-नहीं, यह न होगा। पहले कार को बढ़ाओ। रतन ने हारकर कार को बढ़ाया और बोली- अच्छा अब तो बताओगी?

जालपा ने उलाहने के भाव से कहा-इतनी बात तो तुम्हें खुद ही समझ लेनी चाहिए थी। मुझसे क्या पूछती हो। अब वे चीजें मेरे किस काम की हैं। इन्हें देख-देखकर मुझे दुख होता है। जब देखने वाला ही न रहा, तो इन्हें रखकर क्या करूं?

रतन ने एक लंबी सांस खींची और जालपा का हाथ पकड़कर कांपते हुए स्वर में बोली–बाबूजी के साथ तुम यह बहुत बड़ा अन्याय कर रही हो, बहन। वे कितनी उमंग से इन्हें लाए होंगे। तुम्हारे अंगों पर इनकी शोभा देखकर कितना प्रसन्न हुए होंगे। एक-एक चीज उनके प्रेम की एक-एक स्मृति है। उन्हें गंगा में बहाकर तुम उस प्रेम का घोर अनादर कर रही हो।

जालपा विचार में डूब गई, मन में संकल्प-विकल्प होने लगा; किंतु एक ही क्षण में वह फिर संभल गई, बोली-यह बात नहीं है बहन ! जब तक ये चीजें मेरी आंखों से दूर न हों [ ११२ ]
जाएंगी, मेरा चित्त शांत न होगा। इसी विलासिता ने मेरी यह दुर्गति की है। यह मेरी विपत्ति की गठरी है, प्रेम की स्मृति नहीं, प्रेम तो मेरे हृदय पर अंकित है।

रतन—तुम्हारी हृदय बड़ा कठोर है जालपा, मैं तो शायद ऐसा न कर सकती।

जालपा-लेकिन मैं तो इन्हें अपनी विपत्ति का मूल समझती हूं।

एक क्षण चुप रहने के बाद वह फिर बोली-उन्होंने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है, बहन । जो पुरुष अपनी स्त्री से कोई परदा रखता है, मैं समझती हूं, वह उससे प्रेम नहीं करता। मैं उनकी जगह पर होती, तो यों तिलांजलि देकर न भागती। अपने मन की सारी व्यथा कह सुनाती और जो कुछ करती, उनकी सलाह से करती। स्त्री और पुरुष में दुराव कैसा।

रतन ने गंभीर मुस्कान के साथ कहा-ऐसे पुरुष तो बहुत कम होंगे, जो स्त्री से अपना दिल खोलते हों। जब तुम स्वयं दिल में चोर रखती हो, तो उनसे क्यों आशा रखती हो कि वे तुमसे कोई परदा न रखें। तुम ईमान से कह सकती हो कि तुमने उनसे परदा नहीं रखा?

जालपा ने सकुचाते हुए कहा-मैंने अपने मन में चोर नहीं रखा।

रतन ने जोर देकर कहा-झूठ बोलती हो, बिल्कुल झूठ, अगर तुमने विश्वास किया होता, तो वे भी खुलते।

जालपा इस आक्षेप को अपने सिर से न टाल सकी। उसे आज ज्ञात हुआ कि कपट का आरंभ पहले उसी की ओर से हुआ।

गंगा का तट आ पहुंचा। कार रुक गई। जालपा उतरी और बेग को उठाने लगी, किंतु रतन ने उसका हाथ हटाकर कहा-नहीं, मैं इसे न ले जाने दूंगी। समझ लो कि डूब गए।

जालपा–ऐसा कैसे समझ लें । रतन-मुझ पर दया करो, बहन के नाते।

जालपा–बहन के नाते तुम्हारे पैर धो सकती हूं, मगर इन कांटों को हृदय में नहीं रख सकती।

रतन ने भौंहें सिकोड़कर कहा-किसी तरह न मानोगी? जालपा ने स्थिर भाव से कहा-हां, किसी तरह नहीं।

रतन ने विरक्त होकर मुंह फेर लिया। जालपा ने बेग उठा लिया और तेजी से घाट से उतरकर जल-तट तक पहुंच गई, फिर बेग को उठाकर पानी में फेंक दिया। अपनी निर्बलता पर यह विजय पाकर उसका मुख प्रदीप्त हो गया। आज उसे जितना गर्व और आनंद हुआ, उतना इन चीजों को पाकर भी न हुआ था। उन असंख्य प्राणियों में जो इम समय स्नान-ध्यान कर रहे थे, कदाचित् किसी को अपने अंत:करण में प्रकाश का ऐसा अनुभव न हुआ होगा। मानो प्रभात की सुनहरी ज्योति उसके रोम-रोम में व्याप्त हो रही है।

जब वह स्नान करके ऊपर आई, तो रतन ने पूछा-डुबा दिया?

जालपा-हां।

रतन-बड़ी निठुर हो।

जालपा-यही निठुरता मन पर विजय पाती है। अगर कुछ दिन पहले निठुर हो जाती, तो ज़ यह दिन क्यों आता। कार चल पड़ी।