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कलम, तलवार और त्याग/११-डॉ. सर रामकृष्ण भंडारकर

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कलम, तलवार और त्याग  (1939) 
द्वारा प्रेमचंद

[ १५० ]डाक्टर भांडारकर का जीवन-चरित उन लोगों के लिए विशेष रूप से शिक्षाप्रद है जिनका संबन्ध शिक्षा-विभाग से है। उनके जीवन से हमको सबसे बड़ी शिक्षा यह मिलती है कि दृढ़संकल्प और धुन का पूरा मनुष्य किसी भी विभाग में क्यों न हो, मान और यश के ऊँचे से ऊँचे सोपान पर चढ़ सकता है। डॉक्टर भांडारकर में मानसिक गुणों के साथ अध्यवसाय और श्रम-शीलता का ऐसा संयोग हो गयी थी जो बहुत कम देखने में आता है, और जो कभी विफल नहीं रह सकता। इतिहास-विषयक खोज और अनुसंधान में कोई भारतीय विद्वान् आपकी बराबरी नहीं कर सकता। संस्कृत-साहित्य और व्याकरण के आप ऐसे प्रकाण्ड पण्डित थे कि युरोप-अमरीका के बड़े-बड़े भाषाशास्त्री आपके सामने श्रद्धा से सिर झुकाते थे। प्राकृत भाषाओं को अब देश में नाम भी बाक़ी नहीं। पाली, मागधी भाषाओं को समझना तो दूर रहा, इनके अक्षर बाँचनेवाले भी कठिनाई से मिलेगे। यूरोपीय विद्वानों ने इंधर ध्यान न दिया होता तो ये भाषाएँ अबतक नामशेष हो चुकी होतीं। भांडारकर प्राकृत भाषाओं के सर्वमान्य विद्वान् ही न थे, आपने उनमें कितनी ही खोजें भी की थीं। इतिहास, भाषा-विज्ञान और पुरातत्त्व की प्रत्येक शाखा पर डाक्टर भांडारकर को पूरा अधिकार प्राप्त था। जर्मनी के सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय ने आपको ‘डाक्टर' की उपाधि से सम्मानित किया था, सरकार ने भी के० सी० एस० आई० और 'सर' की उपाधियाँ प्रदान कर आपके पाण्डित्य का समादर किया।

डाक्टर भांडारकर के पिता एक छोटी तनख्वाह पानेवाले क्लर्क थे [ १५१ ]
और इतनी सामथ्रर्य न थी कि अपने लड़कों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए किसी शहर में भेज सकें। संयोगवश १८४७ ई० में उनकी बदली रत्नागिरी को हुई। यहाँ एक अंग्रेजी स्कूल खुला हुआ था। बालक रामकृष्ण ने इसी स्कूल में अंग्रेजी की पढ़ाई आरंभ की और छः साल मैं उसे समाप्त कर एलफिन्स्टन कालेज बंबई में भरती होने का हठ किया। बाप ने पहले तो रोकना चाहा, क्योंकि उनकी आमदनी इतनी न थी कि कालिंज की पढ़ाई का खर्च उठा सकते, पर लड़के को पढ़ने के लिए बेचैन देखा तो तैयार हो गये। इस समय तक बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना न हुई थी, और उपाधियाँ भी न दी जाती थीं। मिस्टर दादाभाई नौरोजी उस समय उक्त कालेज में प्रोफेसर थे। रामकृष्ण ने अपनी कुशाग्रबुद्धि और परिश्रम से थोड़े ही दिन में विद्यार्थी मण्डल में विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया और पढ़ाई समाप्त होने के बाद उसी कालिज में प्रोफेसर हो गये। उसी समय आपको संस्कृत पढ़ने का शौक़ पैदा हुआ और अवकाश का समय उसमें लगाने लगे। इस बीच बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, और प्रोफेसरों को ताकीद हुई कि वह बी० ए० की सनद हासिल कर लें, नहीं तो नौकरी से अलग कर दिये जायेंगे। डाक्टर भांडारकर ने अवधि के अन्दर ही एम० ए० पास कर लिया और हैदराबाद सिंध के हाई स्कूल के हेड मास्टर नियुक्त हुए। साल भर बाद अपने पुराने शिक्षा-स्थान रत्नागिरी स्कूल की हेडमास्टरी पर बदल दिये गये। यहाँ उन्होनें संस्कृत की पहली और दूसरी पोथियाँ लिखीं जो बहुत लोकप्रिय हुई। अब तक इनके बीसौं संस्करण हो चुके हैं। संस्कृत भाषा को अध्ययन इनकी बदौलत पहले की अपेक्षा बहुत सुगम हो गया। और इनका इतना प्रचार है कि किसी आरंभिक विद्यार्थी का बस्ता उनसे खाली न दिखाई देगा। दस साल तक आप एल्फिन्स्टन और डेकन कालेजों में असिस्टेण्ट प्रोफेसर की हैसियत से काम करते रहे। १८७९ में डाक्टर कीलहाने के पदत्याग के अन्तर डेकन कालिज में स्थायी रूप से प्रोफेसर हो गये और तब से पेंशन लेने तक उसी पद पर बने रहे। [ १५२ ]डाक्टर भांडारकर ने पुरातत्त्व की खोज में विश्वव्यापक ख्याति प्राप्त कर ली है। उन्हें यह शौक क्योंकर पैदा हुआ इसकी कथा बहुत मनोरंजक है, और उससे प्रकट होता है कि आप जिस काम को हाथ लगाते थे, उसे अधूरा नहीं छोड़ते थे। १८५० ई० में एक पारसी सज्जन को एक ताम्रपट हाथ लग गया। वह किसी पुराने खण्डहर मैं गड़ा था और उस पर प्राचीन काल की देवनागरी लिपि में कुछ खुदा हुआ था। उन्होंने उसे डाक्टर भांडारकर को दिया कि शायद वह उसके लेख का कुछ मतलब निकाल सकें। डाक्टर साहब उस समय तक प्राचीन लिपियों से अपरिचित थे; अतः उस लिखावट को न पढ़ सके। पर उसी समय से प्राकृत लिपियों की जानकारी प्राप्त करने की धुन पैदा हो गई। यूरोपीय विद्वानों ने इस क्षेत्र में रास्ता बताने और दिखाने का ही काम नहीं किया है, उन्हें इसका उद्धारक भी समझना चाहिए। डाक्टर भांडारकर ने इस विषय पर अनेक पुस्तकें इकट्ठी की और बड़ी तत्परता के साथ अध्ययन में जुट गये। फल यह हुआ कि उन्होंने साल भर के भीतर ही उस अभिलेख का अर्थ ही नहीं लगा लिया, विद्वानों की सभा में उस पर मारक़े का भाषण भी किया। यही नहीं, इस विषय से उन्हें अनुराग भी उत्पन्न हो गया और खोज-अनुसंधान का कार्य आरंभ हो गया। प्राचीन इतिहास और पुरातत्व पर आपने कितने ही निबन्ध लिखे। प्राकृत भाषाएँ और हमारे प्राचीन इतिहास की समस्याएँ एक दूसरे से इस तरह गुथी हुई हैं कि एक को जानना और दूसरे से अपरिचित रहना असंभव है। अतः डाक्टर भांडारकर ने प्राकृत पर भी भरपूर अधिकार प्राप्त कर लिया। १८७४ ई० में लन्दन में प्राच्य-विद्या विशारदों का एक सम्मेलन हुआ। अपको भी निमन्त्रण मिला। कुछ घरेलू अड़चनों से आप उसमें सम्मिलित न हो सके, पर एक खोजपूर्ण निबंध भेजा जिसके व्यापक अन्वेषण की बड़ी सराहना हुई।

१८७६ ई० में प्रोफेसर विलसन के स्मारक-स्वरूप प्राचीन भाषाओं के प्रचार के लिए एक वार्षिक व्याख्यान-माला की व्यवस्था हुई और [ १५३ ]
डाक्टर भांडारकर इस उश्च पद पर नियुक्त किये गये। कई अंग्रेज़ विद्वानों के मुक़ाबले उन्हें तरजीह दी गई। भारत में वही इस पद के. सबसे बड़े अधिकारी थे। अपनी सहज तत्परता और एकाग्रता के साथ वह इस काम में जुट गये, और संस्कृत, प्राकृत तथा आधुनिक भाषाओं पर उन्होंने जो व्याख्यान दिये वह गंभीर गवेषण और ऐतिहासिक खोज की दृष्टि से बहुत दिनों तक याद किये जायँगे। उनकी तैयारी में डाक्टर भांडारकर को कठोर श्रम करना पड़ा, पर ऐसी सेवाओं का जो अच्छे से अच्छा पुरस्कार हो सकता है वह हाथ आ गया। विद्वानों ने दिल खोलकर दाद दी और सरकार को भी जल्दी ही अपनी गुणज्ञता का सक्रिय रूप में परिचय देने का अवसर मिल गया। कुछ दिनों से यह विचार हो रहा था कि प्राचीन अप्रकाशित संस्कृत ग्रन्थों की खोज की जाय और उनका संग्रह ऐतिहासिक खोज और समीक्षा के लिए विद्वानों के सामने रखा जाय। क्योंकि ऐतिहासिकों का विचार था कि भारत में प्राचीन काल का इतिहास तैयार करने के मसाले की कमी नहीं है। वह जहाँ-तहाँ पुराने खण्डहरों और निजी पुस्तकालयों में, आपत्काल में आत्मरक्षा के लिए छिपा पड़ा है। उसके अध्ययन से उस समय के इतिहास पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ सकता है। पर इन साधनों को ढूंढ़ निकालना सहज काम न था। यह गुरुकार्य डाक्टर भांडारकर को सौंपा गया है और उन्होंने जिस योग्यता के साथ उसका संपादन किया उसकी जितनी भी सराहना की जाय, कम होगी। केवल बहुसंख्यक अप्रकाशित ग्रंथ और लेख ही हूँ; नहीं निकाले, उन पर विस्तृत गवेषणापूर्ण रिपोर्ट भी लिखी जो पाँच बड़ी-बड़ी जिल्दों में पूरी हुई है। इस क्षेत्र में डाक्टर भांडारकर ने दूसरों के लिए रास्ता बताने और दिखाने का भी काम किया। उनके श्रम से औरों के लिए ऐतिहासिक अन्वेषण का रास्ता साफ हो गया। इस काम में उन्हें कैसी-कैसी बाधाओं का सामना करना पड़ा, इसे विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं। इस देश में जिस आदमी के पास भी कोई पुरानी पोथी है, चाहे वह [ १५४ ]
प्रेमकथा ही क्यों न हो, वह उसे सोना-चाँदी बनाने का नुस्खा समझे बैठा है। और उस पर किसी दूसरे की निगाह पड़ जाना भी उसे सहन नहीं। ऐसे लोगों को मनाना डाक्टर भांडारकर का ही काम था। आज यह लंबी-चौड़ी रिपोर्ट विद्वानों और इतिहास-प्रेमियों के लिए आश्चर्य का विषय बन रही है। और संभवतः कुछ दिनों तक लोग उसे गंभीर अध्ययन, शुद्ध वर्गीकरण और ऐतिहासिक अन्वेषण का नमूना समझते रहेंगे।

१८८६ ई० में वायना मैं पाच्यविद्या के पण्डितों का सम्मेलन फिर हुआ। अबकी डाक्टर भांडारकर ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और इस यात्रा में यूरोप की स्थिति को बारीकी के साथ देखा, समझा। इसके एक साल बाद भारत सरकार ने उन्हें सी० आई० ई० की उपाधि प्रदान कर उनकी विद्वत्ता का समादर किया। अध्ययन और अन्वेषण की यह कार्य जारी रहा। यहाँ तक कि पेंशन का समय आ पहुँचा और डाक्टर भांडारकर ने अवकाश ग्रहण कर पूने को अपना वासस्थान बनाया है पर देश को अभी उनकी सेवाओं की आवश्यकता थी! १९०१ में आप बंबई विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बनाये गये जो देश पर उनके सतत उपकारों को स्वीकार करना मात्र था।

उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त डाक्टर भांडारकर ने बांबे गजेटियर के लिए दक्षिण भारत का प्राचीन इतिहास लिखा, जो प्रत्येक दृष्टि से प्रामाणिक इतिहास कहा जा सकता है। वह घटनाओं की विस्तृत तालिका मात्र नहीं है, किन्तु उससे मुसलमानों के हमले के पहले की सामाजिक अवस्था, रीति-नीति, और नियम व्यवस्था का भी परिचय मिलता है। इस इतिहास का मसाला इधर-उधर बिखरा पड़ा था, उसे इकट्ठा करना, विभिन्न घटनाओं को काल-निर्णय और इस ‘कहीं का ईट कहीं को रोड़ा' से सुसंबद्ध इतिहास का सुविशाल प्रसाद खड़ा कर लेना कठिन कार्य था। सच तो यह है कि डाक्टर भांडारकर सहज वियानुरागी थे। ज्ञान से उन्हें उत्कट प्रेम था, एक प्यास थी जो किसी पकार न बुझती थी। प्रकृति ने उन्हें खोज और जाँच-पढ़[ १५५ ]
साल की असाधारण योग्यता प्रदान की थी। किसी प्रश्न को हाथ में लेते तो उसकी समीक्षा में तल्लीन हो जाते और उसकी जड़ तक पहुँचने की कोशिश करते। स्थूल ज्ञान से उनके अन्वेषण-प्रिय स्वभाव को सन्तोष न होता था। आधे मन से उन्होने कोई काम नहीं किया और अपने शिष्यों में भी इस दोष को कभी सहन नहीं किया। शास्त्रार्थ और वाद-विवाद में भी वे बड़े पटु थे। वह साधक-बाधक युक्तियों पर भली-भाँति विचार करके तब कोई सिद्धान्त स्थिर करते थे और फिर समालोचना-समीक्षा के तीखे से तीखे तीर भी उनका बाल बाँका नहीं कर सकते थे। पण्डिताऊ हठ भी उनमें काफी था और जब अड़ जाते तो किसी तरह नहीं टलते थे। वह एक समय में एक ही विषय की ओर झुकते थे और अपने दिमाग़ की सारी ताकत उसी में लगा देते थे। इसलिए जब कभी बहस की ज़रूरत होती, तो युक्ति, प्रमाण से पूरी तरह लैस होकर मैदान में उतरते थे।

अपने शिष्यों के साथ डाक्टर भांडारकर का बर्ताव बहुत ही सौजन्य और सहानुभूति का होता था। अच्छे गुरु का कर्तव्य है कि अपने शिष्यों का पथप्रर्शक, मित्र और मंत्री हो। डाक्टर भांडारकर ने इस आदर्श को सदा सामने रखा। होनहार लड़कों को अन्य आवश्यकतानुसार आर्थिक सहायता भी दिया करते थे। उनके छात्रों को उन पर पूरा भरोसा रहता था और वह अपनी सब कष्ट कठिनाइयों में उन्हीं से सलाह लेते और उस पर अमल करते थे। अधिकांश अध्यापकों की तरह वह अपनी जिम्मेदारियों की सीमा लेकचर-हाल तक ही नहीं मानते थे। विद्यार्थियों के लिए उनके मकान पर किसी समय रोक-टोक न थी। एक सजीव उदाहरण से स्नान और सदाचार-शिक्षा के जो उद्देश्य सिद्ध हो सकते हैं वे उपदेशों के बड़े-बड़े पोथों से भी नहीं हो सकते। डाक्टर भांडारकर अपने छात्रों के लिए सहानुभूति, सौजन्य और स्वाधीनता के सजीव दृष्टान्त थे। और चूँकि यह गुण दिखाऊ नहीं, किन्तु सहज थे, इसलिए विद्यार्थियों के मन पर अंकित हो जाते थे। "संस्कृत के अध्यापकों को अकसर यह शिकायत रहती हैं कि [ १५६ ]
विद्यार्थी और विषयों की तुलना में संस्कृत की ओर कम ध्यान देते हैं। यद्यपि संस्कृत की ललित पदावली और कोमल कल्पनाएँ उनके लिए मनोरंजन की यथेष्ट सामग्री प्रस्तुत करती है। डाक्टर भांडारकर को कभी यह शिकायत नहीं हुई। उनके व्याख्यान सदा तन्मयता के साथ सुने जाते थे। कुछ तो विषय पर उनका पाण्डित्यपूर्ण अधिकार और कुछ उनका सहज उत्साह तथा विनोदशीलता विद्यार्थियों के ध्यान चुंबक की तरह अपनी ओर खींच लेती थी। आपके विद्यार्थियों में विरले ही ऐसे निकलेंगे जिन्हें संस्कृत भाषा के माधुर्य का चस्का न पड़ गया हो।

लोकव्यवहार में डाक्टर भांडारकर का ढंग स्वाधीनता और खरेपन का था। चापलूसी से उन्होंने कभी अपनी जान को अपवित्र नहीं किया। और संभवतः कभी बाहरी बातों से दबकर अपने सिद्धान्त और व्यवहार में विरोध नहीं होने दिया। उनका जीवन प्रलोभनों से उतना ही निर्लिप्त रहा है, जितना मनुष्य के लिए संभव है। उनकी आत्मा को संभवतः किसी बात से इतनी चोट नहीं पहुँचती थी जितनी उनके चरित्र पर अनुचित आक्षेप होने से। उन्होंने कभी किसी का अनुग्रह प्राप्त करने की भावना नहीं की। ख्याति और सम्मान की आकांक्षा से सदा दूर रहे। यह वह कमजोरियाँ हैं जो कभी-कभी सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों को भी पथभ्रष्ट कर देती हैं। पर स्वाधीन और खरे स्वभाव पर इनका जादू नहीं चलता। फिर भी सरकार की कृपादृष्टि उनकी ओर अवश्य रही। वह उच्चतम सम्मान और उपाधियों जिनके लिए लोग तरसते रहते हैं, उन्हें बेमाँगे मिल गई। सी० आई० ई० तो पहले ही हो चुके थे। राज्याभिषेक-उत्सव के अवसर पर के० सी० एस० आई० की उपाधि भी प्रदान की गई। सरकार का कृपापात्र बनने के लिए हमें अपने आत्मसम्मान और न्यायप्रियता की हत्या करने की कदापि आवश्यकता नहीं, इसके लिए अगर प्रमाण की अपेक्षा हो तो आपका उदाहरण इस बात का पर्याप्त प्रमाण है। जो लोग ऐसा समझते हैं----और इनकी गिनती अनगिनत है-वे केवल [ १५७ ]
अपनी नासमझी का ही सबूत नहीं देते, सरकार की नीयत, न्याय और बुद्धि को भी बदनाम करते हैं। यद्यपि दुःख के साथ कहना पड़ता है। कि सरकार की अनुग्रह-नीति कभी कभी इस धारण का पोषण करती हुई दिखाई देती है कि स्वाधीन-वृत्ति और न्यायशीलता की उसके लिए कुछ अधिक आवश्यकता नहीं।

डाक्टर भांडारकर में एक बड़ा गुण यह था कि वह-स्वपाण्डिन्य, के अभिमान और पक्षपात से सर्वदा मुक्त थे। अन्य विद्वानों की तरह उन्होने अपने समकालीन ऐतिहासिकों और पुरातत्वज्ञों के प्रति कभी अनादर का भाव नहीं रखा, किन्तु आरंभ से ही उनकी यह नीति रही कि दूसरों के मन में भी खोज और अन्वेषण की रुचि उत्पन्न करें, उनका उत्साह बढ़ायें और परामर्श तथा पृथप्रदर्शन से उनकी सहायता करते हैं। जिसमें उनके बाद इस विषय से अनुराग रखनेवालों का टोटा न पड़े।

सारांश, डाक्टर भांडारकर का व्यक्तित्व भारत के लिए गर्व करने की वस्तु थी। आपने साबित कर दिया कि भारतवासी ज्ञान-विज्ञान के गहअंगों में भी पाश्चात्य विद्वानों के कंधे से कंधा भिड़ाकर चल सकते हैं। जर्मनी, फ्रांस, इंगलैंड सभी देशों के विद्वान आपके भक्त हैं, और हमारे लिए, जिन्हें उनके देशवासी होने का गर्व हैं, उनका जीवन एक खुली हुई पुस्तक है जिसमें मोटे अक्षरों में लिखा हुआ है---‘अध्यवसाय, व्यवस्था और ऊँचा लक्ष्य सफल जीवन के रहस्य हैं। जस्टिस चंदावरकर ने जिन्हें आपका शिष्य होने का गौरव प्राप्त है, आपके विषय में लिखा है--

(डाक्टर) सर भांडारकर ने विविध बाधाओं के रहते हुए भी अपने बर्तावों में कभी लगाव नहीं रखा। आपने सदा सत्य और न्याय का पक्ष लिया, पर सत्य पर मृदु-मधुर शब्दों की चाशनी चढ़ाकर असत्यप्रिय जनों के अनुरंजन का यत्न नहीं किया। आप ब्रह्मसमाज के अनुयायी हैं और जात-पाँत, छूत-छात के विभेद को राष्ट्रीयता का विरोधी और विघातक मानते हैं। भगवद्गीता और [ १५८ ]
उपनिषद् आपके जीवन की पथ-प्रवर्शक ज्योतियाँ हैं। यही आपके आध्यात्मिक समाधान और वित्त-शुद्धि के साधन हैं। मूर्तिपूजा में आपको विश्वास नहीं। वेदों, उपनिषदों या भगवद्गीता में आपको मूर्तिपूजा का कोई प्रमाण नहीं मिलता। बहुत खोज के बाद आपने यह निष्कर्ष निकाला है कि हिन्दुओं ने यह प्रथा जैन और बौद्ध सम्प्रदायों से ली है। जैन और बौद्ध यद्यपि सगुण ईश्वर को नहीं मानते, पर विद्वज्जनों और सन्त-महात्माओं के देहावसान पर स्माकर रूप में उनकी प्रतिमा स्थापित किया करते थे। हिन्दुओं ने उन्हीं से यह रीति ली और उसी ने अब प्रतिमा-पूजन का रूप ग्रहण कर लिया है। फिर भी बहुत-से शिक्षित हिन्दु मूर्तिपूजा पर ऐसे लट्टू, हैं और उस पर उनका ऐसा दृढ़ विश्वास है मानो यही हिन्दू- धर्म का प्राण हो। सामाजिक विषयों में आप सुधारवादी हैं और व्यवहारतः इसका प्रमाण दे चुके हैं। मई सन् १८९१ ई० में अपने अपनी विधवा लड़की का पुनर्विवाह कर अपने नैतिक साहस का परिचय दिया, जो अपने देश के सुधारवादियों में एक दुर्लभ गुण है। जिस जाति में ऐसी महान् आत्माएँ जन्म लेती हैं उसका भविष्य उज्ज्वल है, इसमें संदेह नहीं किया जा सकता।