पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१२०

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जमुना कुंज अरविंद जगुंज डोर' भीर ही नती, । हलोर ओर थोर ज्या निसा चलत चंदनी । निकुंज-फूल मौल बेलि छत्र छांह से धरे, ' तटी फैलोल. कोक पुंज सोक संक दंदनी। 'आलम कवित्त चित्त रास के विलास ते, प्रकास वंदना करी बिलोकि विस्व यंदनी'। समीर. मंद मंद केलि कंद दोष दंद यो,' ' अनन्दः नन्दनंद के बिराजे . हंसनंदनी ॥२४४ा लता प्रसून डोल बोल कोकिला अलाप कि, लोल फोक फंठ त्यो प्रचंड भंग गुंज की। समीर.घास रास रंग रास के विलास पास, :: } . पास हंसनन्दिनी हिलोर केलि पुल की। 'आलम' रसालघन गान ताल काल सो, ii • विहंग घाय येगि चालि चित लाजलुंज को। सदा पसंत हंस सो सोक : देव लोक ते, .. __.. पिलोकि रीमि ही पाति माँति सो निकुंज की॥२४५२ . . . ct-