पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/१०३

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सोलहवां परिच्छेद।

परीक्षा का समय पूरा हो आया, किन्तु मैं उन के प्रेम की ऐसी दासी बन गई थी कि मैंने मन ही मन स्थिर कर लिया था कि परीक्षा के समय बीत जाने पर यदि ये मुझे मार कर निकाल भी देंगे, तो भी इन के पास से न जाऊंगी। और अंत में यदि मेरे परिचय को पाकर भी ये मुझे अपनी विवाहिता स्त्री की भांति ग्रहण न करेंगे और यदि मुझे उपपलो की भांति भी इन के पास रहना पड़े, तौभी मैं रहूंगी और पति को पाकर लोकलाज से न डरूंगी। किन्तु यदि मेरे करम में इतना भी न बदा हो बस इसी डर के मारे छुट्टी पाते ही मैं अकेले में बैठकर रोया करती थी।

किन्तु यह भी मैंने समझ लिया था कि प्राणनाथ के भी पंख कट गये हैं। और अब उन में बड़ने की शक्ति नहीं है। उन के अनुरागरूपी अनत में अपरिमित घृताहुति पड़ रही थी। वे इस समय सब कामका छोड़ कर केवल मेरा मुंह निहारा करते थे। मैं घर के काम काज करती और वे बालक की भांति मेरे संग लगे डोलते थे। उन के चित्त का दुर्दमनीय बेग मुझे पग पग में दिखलाई देता, पर मेरे संकेत करते ही वे स्थिर हो जाते। कभी कभी वे मेरा पैर पकड़ कर रोने लगते और कहते―“प्यारी! मैं इन आठ दिनों तक तुम्हारी बात मानूंगा, पर तुम मुझे छोड़ कर चली मत जाना।” और सचमुच मैंने यह समझ लिया कि यदि मैं इन्हें छोड़ दूंगी तो इन की बड़ी बुरी दशा हो जायगी।

परीक्षा पूरी हो गई। अठवारे के बीतने पर बिना कुछ कहे सुने हम दोनों एक दूसरे के अधीन हुए। उन्हों ने मुझे कुलटा समझा था, यह बात भी मैं ने सहली। किन्तु मैं चाहे जो होऊं, पर यह भी समझ लिया था कि मैं हाथी के पैरों में सीकड़ डाल दिया है।