पृष्ठ:ऊर्म्मिला.pdf/४१३

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पचम सर्ग १ छूट्यो सँग सपनो, मिट्यो लघु सँयोग अभिशाप, चिर वरदान वियोग को, मिल्यो पापु ही आप । चले जाहु भोरे सजन, अनबोले, सकुचात, हिय की हिय मे रहि गई, नैकु न निकसी बात । ३ प्यार कहानी हृदय मे, अरुझानी अकुलाय, बाणी अटकी कठ मे, हे मेरे रसराय । वे स्वप्निल रतियाँ मधुर, वे बतियाँ चुपचाप, है विलीन हिय मे, बनी आज विछौह-विलाप । ५ साजन, , सस्मृति नेह की, खटकि-खटकि रहि जाय, अटकि-अटकि आसू झरे, भरै हृदय निरुपाय । ६ रसक्रीडा, ब्रीडा 1 सलज, पीडा बनी गभीर, रति सस्मृति निशिता अनी, बनी हिये की पीर । ३६६