पृष्ठ:एक घूँट.djvu/२१

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एक घूँट

कुंज मंत्री––महोदय! मेरे मित्र श्रीरसालजी आपके परिचय-स्वरूप एक भाषण देना चाहते हैं। यदि आपकी आज्ञा हो तो आपके व्याख्यान के पहले ही––

आनन्द––(जैसे घबराकर) क्षमा कीजिये मैं तो व्याख्यान देना नहीं चाहता; परन्तु श्रीरसालजी की रसीली वाणी अवश्य सुनूँगा। आप लोगों ने तो मेरा वक्तव्य सुन ही लिया। मैं वक्ता नहीं हूँ। जैसे सब लोग बातचीत करते हैं, कहते हैं, सुनते हैं, ठीक उसी तरह मैंने भी आप लोगों से वाग्विलास किया है। (रसाल को देखकर सविनय) हाँ, तो श्रीमान् रसालजी!

प्रेमलता––किन्तु बैठने का प्रबन्ध तो कर लिया जाय!

वनलता––आनन्दजी इस बेदी पर बैठ जायँ और हम लोग इन वृक्षों की ठंडी छाया में बड़ी प्रसन्नता से यह गोष्ठी कर लेंगे।

आनन्द––हाँ-हाँ, ठीक तो है।

(सब लोग बैठ जाते हैं और वनलता एक वृक्ष से टिककर खड़ी हो जाती है। रसाल, आनन्द के पास खड़ा होकर, व्याख्यान देने की चेष्टा करता है। सब मुस्कराते हैं। फिर वह सम्हलकर कहने लगता है।)

रसाल––व्यक्ति का परिचय तो उसकी वाणी, उसके व्यवहार से वस्तुतः स्वयं हो जाता है; किन्तु यह प्रथा-सी चल पड़ी है कि.........

वनलता––(सस्मित, बीच में ही बात काटकर) कि जो उस

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