पृष्ठ:एक घूँट.djvu/४३

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एक घूँट


विचार कर रहा हूँ! इतनी ममता कहाँ छिपी थी प्रेमलता? लाओ एक घूँट पी लूँ।

वनलता––प्रेमलता के हाथ से महाशय! आज से यही इस अरुणाचल-आश्रम का नियम होगा उच्छृंखल प्रेम को बाँधने का। चलो प्रेमलता!

(वनलता के संकेत करने पर प्रेमलता सलज्ज अपने हाथों से आनन्द को पिलाती है––आश्रम की अन्य स्त्रियाँ पहुँचकर गाने लगती हैं, रसाल मुकुल और कुंज भी आकर फूल बरसाते हैं।)

मधुर मिलन कुंज में––

जहाँ खो गया जगत का––सारा श्रम-सन्ताप।
सुमन खिल रहे हों जहाँ––सुखद सरल निष्पाप॥

उसी मिलन कुंज में––

तरु लतिका मिलते गले––सकते कभी न छूट।
उसी स्निग्ध छाया तले––पी...लो...न...एक घूँट॥