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कर्बला

गुलाम-नबी के बेटे पर खुदा की रहमत हो। अमीर ने आपको किसी बहुत ज़रूरी काम के लिए तलब किया है।

अब्बास-यह वक्त वलीद के दरबार का नहीं है।

गुलाम-हुजूर, कोई खास काम है।

हुसैन–अच्छा, तू जा। हम घर जाने लगेंगे, तो उधर से होते हुए जायगे।

[गुलाम चला जाता है।]

अब्बास-भाईजान! मुझे तो इस बेवक्त की तलबी से घबराहट हो गयी है। यह वक्त वलीद के इजलास का नहीं है। मुझे दाल में कुछ काला नज़र आता है। आप कुछ कयास कर सकते हैं कि किस लिए बुलाया होगा।

हुसैन-मेरा दिल तो गवाही देता है कि मुआबिया ने वफात पायी ।

अब्बास-तो वलीद ने आपको इसलिए बुलाया होगा कि आपसे यज़ीद की वैयत ले।

हुसैन-मैं यज़ीद की बैयत क्यों करने लगा। मुआबिया ने भैया इमाम हसन के साथ कसम खाकर शर्त की थी कि वह अपने मरने के बाद अपनी औलाद में से किसी को खलीफा न बनायेगा। हसन के बाद खिलाफत पर मेरा हक है। अगर मुबाबिया मर गया है,और यज़ीद को खलीफा बनाया गया है,तो उसने मेरे साथ और इस्लाम के साथ दग़ा की है। यज़ीद शराबी है,बदकार है,झूठा है, बेदीन है,कुत्तों को गोद में लेकर बैठता है। मेरी जान भी जाय,तो क्या,पर मैं उसकी बैयत न अख्तियार करूँगा। अब्बास [-मामला नाजुक है। यज़ीद की जात से कोई बात बईद नहीं। काश,हमें मुबाबिया की बीमारी और मौत की खबर पहले ही मिल गयी होती!

[गुलाम का फिर प्रवेश]

गुलाम-हुजूर तशरीफ़ नहीं लाये,अमीर आपके इन्तजार में बैठे

हुसैन-तुफ़ है तुझ पर! तू वहाँ पर गया भी कि रास्ते से ही लौट आया? चल,मैं अभी आता हूँ। तू फिर आना।