कह रैदास तेरी भगति दूर है भाग बड़े सों पाये।
तजि अभिमान मेटि आपा पर पिपलिक ह्वै चुनि खावै॥
४
पहले पहरे रैन दे बनजरिया तैं जनम लिया संसार वे।
सेवा चूकी राम की तेरी बालक बुद्धि गंवार वे॥
बालक बुद्धि न चेता तूँ भूला माया जाल वे।
कहा होय पीछे पछिताये जल पहिले न बाँधी पाल वे।
बीस बरस का भया अयाना थाँभि न सक्का भार वे।
जन रैदास कहै बनजरिया जनम लिया संसार वे॥
५
राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ। फल अरु मूल अनूप न पाऊँ॥
धनहर दूध जो बछरू जुठारी। पुहुप भँवर जल मीन बिगारी॥
मलयागिर बेधियो भुअंगा। विष अमृत दोउ एकै संगा॥
मन ही पूजा मन ही धूप। मन ही सेऊँ सहज सरूप॥
पूजा अरचा न जानूँ तेरी। कह रैदास कवन गति मेरी॥
६
रे चित चेत अचेत काहे बालक को देख रे।
जाति तें कोइ पद नहि पहुँचा राम भगति विशेष रे॥
खट क्रम सहित जे विप्र होते हरि भगति चित दृढ़ नाहिं रे।
हरि की कथा सोहाय नाहीं स्वपच तूलै ताहि रे॥
मित्र शत्रु अजात सबतें अन्तर लावे हेत रे।
लाग वाकी कहाँ जानै तीन लोक पवेत रे।
अजामिल गज गनिका तारी काटी कुंजर की पास रे।
ऐसे दुरमत मुक्त कीये तो क्यों न तरें रैदास रे॥