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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/११२

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गुरू नानक
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धरमदास यह अरज करतु हैं
सार सबद सुमिरन दै गैलों॥


 


गुरु नानक

गुरू नानक का जन्म सं॰ १५२६ वि॰ कार्तिक की पूर्णिमा के दिन चार घड़ी रात रहे कल्यान चन्द खत्री की धर्मपत्नी तृप्ता के गर्भ से हुआ। कल्यानचन्द, जिला लाहौर, तहसील शरकपुर के तलवंडी नगर के सूबाराय बुलार पठान के कारकुन थे।

गुरु नानक ने बालकपन ही में अपनी विलक्षण बुद्धि के अपूर्व चमत्कार दिखाये। ये बहुत सीधे सादे और संत स्वभाव के थे। सं॰ १५४५ वि॰ में इनका विवाह गुरुदासपुर के मूलचन्द खत्री की कन्या सुलक्षणी से हुआ। संवत् १५५१ और १५५३ वि॰ में सुलक्षणी देवी के गर्भ से क्रमशः श्रीचन्द्र और लक्ष्मीचंद्र, दो पुत्रों का जन्म हुआ। आगे चल कर श्री चंद्र उदासी साधू सम्प्रदाय का मूल पुरुष हुआ। और लक्ष्मीचंद्र के वंश के लोग अब तक वर्त्तमान हैं।

गुरू नानक जी के समय में मुसलमानों के अत्याचार से हिन्दू जाति त्राहि त्राहि कर रही थी। गुरू नानक जी के सदुपदेश से हिन्दुओं में एक ऐसा सिखसमुदाय पैदा हो गया जिस ने हिन्दुओं की मान मर्यादा ही नहीं बचाई बल्कि मुसलमानी सलतनत की जड़ तक हिला दी। विचार करके देखा जाय तो गुरू नानक जी ने हिन्दुओं का बड़ा भारी उपकार किया।

गुरु नानक जी ने संवत् १५५६ से १५७९ तक आगरा