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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/११९

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कविता-कौमुदी
 

भाव से इनके थोड़े से पद सूर सागर से चुनकर यहाँ लिखे जाते हैं—

मेरो मन अनंत कहाँ सुख पावै।

जैसे उड़ि जहाज को पच्छी फिरि जहाज पर आवै॥
कमल नयन को छाँड़ि महातम और देव को धावै।
परम गंग को छाँड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥
जिन मधुकर अंबुज रस चाख्यो क्यों करील फल खावै।
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥१॥

सोभित कर नवनीत लिये।

घुटुरुवन चलत रेनु तन मंडित मुख में लेप किये॥
चारु कपोल लोल लोचन छवि गौरोचन को तिलक दिये।
लर लटकन मानो मत्त मधुय गन माधुरी मधुर पिये॥
कठुला कंठ बज्र केहरि नख राजत है सखि रुचिर हिये।
धन्य सूर एकौ पल यह सुख कहा भयो सत कल्प जिये॥२॥

यशोदा हरि पालने झुलावैं।

हलरावैं दुलराइ मल्हावैं जोइ सोई कछु गांवैं।
मेरे लाल को आउ निदरिया काहे न आनि तू सुवावैं।
तू काहे न वेगी सी आवे तोकों कान्ह बुलावैं
कबहूँ पलक हरि मू़ँदि लेत हैं कबहू अधर फरकावैं।
सोवत जानि मौन ह्वै ह्वै रही कर कर सैन बतावैं॥
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि यशुमति मधुरै गावैं।
जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ सा नँद भामिनि पावैं॥३॥

लालन हौं वारी तेरे या मुख ऊपर।

माई मेरिहि डोढ़िन लागे तातें मसि विदा दयो भ्रू पर॥
सर्वसु मैं पहिले ही दोनों नान्हीँ नान्हीँ दँतुली दूपर।
अब कड़ा करें। निछावरि सूर यशोमति अपने लालन ऊपर॥४॥