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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१२४

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सूरदास
६९
 

जिन कोउ काहू के वश होहि।

ज्यों चकोर दिनकर बश डोलत मोह फिरावत मोहिं॥
हम तौ रीझ लटू भर लालन महा प्रेम जिय जानि।
बन्ध अबन्ध अमप्ति निशि वासर को सरझावति आनि॥
उरझे सङ्ग अङ्ग अङ्ग प्रति विरह बेलि की नाई।
मुकुलित कुसुम नैन निद्रा तजि रूप सुधा सियराई॥
अति आधीन हीन अति व्याकुल कहाँ लों करौं बनाइ।
ऐसी प्रीति करी रचना पर सूरदास बलि जाइ॥१८॥

कह्यो कान्ह सुन यशुमति मैया।

आवहिंगे दिन चार पाँच में हम हलधर दोउ भैया॥
मुरली वेत विषाण देखिये शृंगी बेर सबेरी।
लै जिनि जाइ चुराइ राधिका कछुक खिलौना मेरी॥
जादिन तें तुम से बिछुरे हम कोऊ न कहत कन्हैया।
भोरहिं नाहिं कलेऊ कीनो साँझ न पय पीयो थैया।
कहत न बन्यो सँदेशो मोपै जननि जितो दुःख पायो।
अब हम सों बसुदेव देवकी कहत आपनो जायो॥
कहिये कहा नंद बाबा सों बहुत निठुर मन कीनो।
सूर हमहिं पहुँचाइ मधुपुरी बहुरी सोध न लीनो॥१९॥

मधुकर हम न होहिँ वे बेली।

जिन भजि तजि तुम फिरत और रँग करत कुसुम रस केली॥
वारे ते वर बाजि बढ़ी है अरु पोषी पिय पानि।
बिनु पिय परस प्रात उठि फूलत होत सदा हित हानि॥
है बेली विरहा वृन्दावन उरझी श्याम तमाल।
पुहुप वास रस रसिक हमारे विलसत मधुप गोपाल॥
योग समीर धीर नहिं डोलत रूप डार डिंग लागि।
सूर परागनि तजति हिये ते श्री गुपाल अनुरागि॥२०॥