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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१५९

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कविता-कौमुदी
 

काम कुसुम-धनु-सायकलीन्हे सकलभुवन अपने बस कीन्हें
देषि तजिय संसय अस जानी भंजब धनुष राम सुनु रानी
सखी बचन सुनि भर परतीती मिटा विषाद बढ़ी अति प्रीती
तब रामहिं बिलोकि बैदेही सभयहृदय बिनवत जेहि तेही
मनहीं मन मनाय अकुलानी होउ प्रसन्न महेस भवानी
करहु सुफल आपन सेवकाई करि हित हरहु चाप गरुआई
गन नायक वर दायक देवा आजु लगे कीन्हेउँ तब सेवा
बार बार सुनि बिनती मोरी करहु चाप गरुता अति थोरी

देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली शरीर॥

नीके निरखि नयनभरि सोभा पितुपनसुमिरिवहुरि मन छोभा
अहह तात दारुन हठ ठानी समुझत नहिं कछु लाभ न हानी
सचिवसभय सिखदेई न कोई बुधसमाज बड़ अनुचित होई
कहँ धनुकुलिसहु चाहिकठोरा कहें स्यामल मृदुगात किसोरा
विधिकेहिभाँति धरउँ उरधीरा सिरिस सुमन-कन बेधि यहीरा
सकल सभा कै मति भइ भोरी अब मोहि सभु-चाप गति तोरी
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी होहु हरुअ रघुपतिहिं निहारी
अति परिताप सीय मन माहीँ लव निमेष जुग सय सम जाहीं

प्रभुहि चितइ पुनि चितइमहि राजत लोचन लाल।
खेलत मज सिजमीन जुग जनु बिधु मंडल डाल॥

गिराअलिनि मुखपंकज रोकी प्रगट न लाज निसा अवलोकी
लोचन जल रह लोचन कोना जैसे परम कृपन कर सोना
सकुची व्याकुलता बड़ि जानी धरिधीरज प्रतीति उर आनी
तनमन बचन मोर पन साचा रघुपतिपदसरोज चितु राचा
तौ भगवान सकल उर वासी करिहहि मोहिं रघुबर कै दासी
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू सो तेहि मिलइ न कछु संदेहु