नूतन जोवन बारी मिली ही जोवन वारी, सेनापति धन-
बारी मन में विचारिये। तेरी चितषनि ताके चुभी चित
वनिता के उचित वनि ताके मया के पग धारिये॥ सुधि ना
निकेतन की चढ़ी उन के तन की पीर मीन केतन की जाइ कै
निवारिये। तो तजि अनवरत वाके और न वरत कीजै लाल
नव रत बाल न बिसारिये॥६॥
फूलन सों बाल की बनाइ गुही बेनी लाल भाल दीनी बेंदी
मृगमद की असित है। अंग अंग भूषन बनाइ बृज भूषन
जू बीरी निज कर कै खवाई अति हित है॥ ह्वै के रस बस
जब दीथे को महावर के सेनापति स्याम गह्यो चरन ललित
है। चूमि हाथ नाथ के लगाइ रही आँखिन सों कही प्रान
पति! यह अति अनुचित है॥७॥
जो पै प्रानप्यारे परदेस को पधारे तातें विरह तें भई ऐसी
ता तिय की गति है। करि कर ऊपर कपोलहिं कमल नैनी
सेनापति अनमनि बैठियै रहति है॥ कागहि उड़ावै कबौं
कबौं करै सगुनौती कबौ बैठि अवधि के वासर गिनति है।
पढ़ी पढ़ी पाती कबौं फेरि कै पढ़ति कबौं प्रीतम के चित्र में
स्वरुप निरखति है॥८॥
जनक नरिन्द नन्दिनी को बदनारविन्द सुन्दर बखानो
सेनापति बेद चारि कै। बरनी न जाइ जाकी नेकडू निकाइ
लोनुराई करि पंकज निसंक डारे मारिकै॥ बार बार जाकी
बराबरि को विधाता अब रचि पचि विधु को बनावत सुधारि
कै। पूनो को बनाय जब जानत न वैसो भयो कुहू के कपट
तब डारत बिगारि के॥९॥
चल्यो हनुमान रामबान के समान जान सीता सोध काज
दसकंधर मगर को। राम को जुहारि बाहु बल को सँभारि