फतहपुर के आश्रम में अब भी सुन्दरदाल के कपड़े और उनके हाथ की लिखी पुस्तकें आदि चीजें रक्खी है। जब मैं फतहपुर में था, तब एक दिन मेरे सहृदय मित्र बाबू केशव देवजी नेवटिया मुझे सुन्दरदास का आश्रम और इनके वस्त्र आदि दिखाने ले गये थे।
- इनके कुछ छन्द नीचे लिखे जाते हैं:—
काहू सोँ न रोष तोष काहू सों न राग द्वेष
काहू सोँ न बैर भाव काहू सौँ न घात हैं॥
काहू सोँ न बकबाद काहू सोँ नहीं विषाद
काहू सोँ न संग न तौ काहू पच्छपात हैं॥
काहू सोँ न दुष्ट बैन काहू सौँ न लेन देन
ब्रह्म को बिचार कछू और न सुहात है॥
सुन्दर कहत सोई ईसन को महाईल
सोई गुरुदेव जाके दूसरी न बात है॥१॥
कौन कुबुद्धि भई घट अंतर तू अपने प्रभु सूँ मन चौरे।
भूलि गयो बिषया सुख में सठ लालच लागि रह्यो अति थोरै॥
ज्यू को कंचन छार मिलावत लेकर पत्थर सूँ नग फोरें।
सुन्दर या नरदेह अमूलक तीर लगी नवका कित बोरै॥२॥
गेह तज्यो पुनि नेह तज्या पुनि खेह लगाइ के देह सँवारी।
मेघ सहै सिर सीत सहै तन धूप समै जु पँचागिति बारी॥
भूख सहै रहि रूख तरे पर सुन्दरदास समै दुःख भारी।
डासन छाड़ि के कासन ऊपर आसन मारिपै आस। न मारी॥३॥
बोलिये तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ
न तौ मुख मौन गहि चुप होइ रहिये।
जोरिये तौ तब जब जोरिये की जानि परै
तुक छंद अरथ अनूप जायें लहिय॥