सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/३४९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२९४
कविता-कौमुदी
 

पूरब उत्तर मत चलौ बायें स्वर परकाश।
हानि होय बहुरे नहीं आचन की नहिं आश॥१९॥
दहिने चलत न चालिये दक्षिण पश्चिम जानि।
जो रे जाय बहुरे नहीं औ होवे कछु हानि॥२०॥
दहिने स्वर में जाइये पूरब उत्तर राज।
सुख सम्पति आनँद करै सभी होय शुभ काज॥२१॥
बायें स्वर में जाइये दक्षिण पश्चिम देश।
सुख आनँद मङ्गल करै जो रे जाय परदेश॥२२॥
दहिने सेती आयकर बायें पूँछे कोय।
जो बायेँ स्वर बन्द है सफल काज नहिं होय॥२३॥
बायें सेती आय कर जो दहिने पूँछै धाय।
जो दहिनों स्वर बन्द हैं कारज अफल बताय॥२४॥
जब स्वर भीतर को चलै कारज पूँछै कोय।
पैज बाँध वासों कहो मनसा पूरण होय॥२५॥
जब स्वर बाहिर को चले तब कोई पूँछै तोर।
बाको ऐसै भाषिये नहि कारज विधि कोर॥२६॥
बाईं करवट सोइये जल बायें स्वर पीव।
दहिने स्वर भोजन करै तो सुख पावै जीव॥२७॥
बाँये स्वर भोजन करै दहिने पीवै नीर।
दस दिन भूला यों करै पावै रोग शरीर॥२८॥
दहिने स्वर झाड़ें फिरै बाँये लघु शंकाय।
युक्ती ऐसी साधिये तीनो भेद बताय॥२९॥
आठ पहर दहिनों चलै बदलै नहिं जो पौन।
तीन वर्ष काया रहै जीव करै फिर जो गौन॥३०॥
दिन को तो चन्दा चलै चले रात को सूर।
यह निश्चय करि जानिये प्राण गमन बहु दूर॥३१॥