पृष्ठ:कुछ विचार - भाग १.djvu/१३९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
: :कुछ विचार : :
: १३२ :
 


ही दूर जाती है, उतनी ही अस्वाभाविक हो जाती है । बोल-चाल की भाषा भी अवसर और परिस्थिति के अनुसार बदलतो रहती है । विद्वानों के समाज में जो भाषा बोली जाती है, वह बाजार की भापा से अलग होती है। शिष्ट भाषा की कुछ-न-कुछ मर्यादा तो होनी ही चाहिये ; लेकिन इतनी नहीं कि उससे भाषा के प्रचार में बाधा पड़े । फारसी शब्दों में शीन-कान की बड़ी कैद है ; लेकिन क़ौमी भाषा में यह कैद ढीली करनी पड़ेगी। पंजाब के बड़े-बड़े विद्वान भी 'क' की जगह 'क' ही का व्यवहार करते हैं। मेरे खयाल में तो भाषा के लिए सबसे महत्त्व की चीज़ है कि उसे ज्यादा-से-ज्यादा आदमी, चाहे वे किसी प्रान्त के रहनेवाले हों, समझें, बोलें, और लिखें। ऐसी भापा न पंडिताऊ होगी और न मौलवियों की । उसका स्थान इन नों के बीच में है। यह जाहिर है कि अभी इस तरह की भाषा में इबारत की चुस्ती और शब्दों के विन्यास की बहुत थोड़ी गुञ्जायश है। और जिसे हिन्दी या उर्दू पर अधिकार है, उसके लिए चुस्त और सजीली भाषा लिखने का लालच बड़ा जोरदार होता है । लेखक केवल अपने मन का भाव नहीं प्रकट करना चाहता ; बल्कि उसे बना-सँवारकर रखना चाहता है। बल्कि यों कहना चाहिये कि वह लिखता है रसिकों के लिए, साधारण जनता के लिए नहीं। उसी तरह, जैसे कलावंत राग- रागिनियाँ गातं समय केवल संगीत के आचार्यों ही से दाद चाहता है, सुननेवालों में कितने अनाड़ी बैठे हैं, इसकी उसे कुछ भी परवाह नहीं होती। अगर हमें राष्ट्र-भाषा का प्रचार करना है, तो हमें इस लालच को दबाना पड़ेगा। हमें इबारत की चुस्ती पर नहीं, अपनी भाषा को सलीस बनाने पर खास तौर से ध्यान रखना होगा। इस वक्त ऐसी भाषा कानों और आँखों को खटकेगी ज़रूर, कहीं गंगा-मदार का जोड़ नज़र आयेगा, कहीं एक उर्दू शब्द हिन्दी के बीच में इस तरह डटा हुआ मालूम होगा, जैसे कौओं के बीच में हंस आ गया हो । कहीं उर्दू के बीच में हिन्दी शब्द हलुए में नमक के डले की तरह मजा बिगाड़ देंगे। पंडितजी भी खिलखिलायेंगे और मौलवी साहब भी नाक सिकीड़ग