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अमेरिका और भारत में ज्ञान तक सार्वभौमिक पहुंच, डॉ.सैम पित्रोदा की टिप्पणियां

14 जून, 2017, इंटरनेट आर्काइव, सैन फ्रांसिस्को

राजदूत वेंकटेशन अशोक, मेरे दोस्त, कार्ल, जिन्हें मैं अब कई सालों से जानता हूं और जिनके साथ मैंने भारत और अमेरिका में कभी-कभी काम किया है। हमारे मेजबाने श्री काहले. देवियो और सज्जनों। नमस्कार।

वास्तव में यह मेरे लिए विशेष सौभाग्य की बात है कि मैं, इस विशेष अवसर पर आपके साथ भारत और अमरीका के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान पर बात करूं।

इस परियोजना में मेरी रुचि वास्तव में तब शुरू हुई थी, जब मैं डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा संभवतः वर्ष 2006 के मध्य में स्थापित राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (Knowledge Commission) की अध्यक्षता कर रहा था। उस समय हम, ऐसे संस्थानों और बुनियादी ढांचे के निर्माण में रुचि रखते थे जिनकी भारत को 21 वीं सदी में, ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था को चलाने के लिये आवश्यकता होती।

हमने अनिवार्य रूप से ऐसी ज्ञान तक अपनी सार्वभौमिक पहुंच पर ध्यान केंद्रित किया, जिसमें पुस्तकालय, नेटवर्क, अनुवाद, सकारात्मक कार्य (Affirmative Action) संबंधी कार्यक्रम, आरक्षण, ब्रॉडबैंड नेटवर्क आदि शामिल थे। हमने प्राथमिक विद्यालय से लेकर माध्यमिक विद्यालय, व्यावसायिक विश्वविद्यालयी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा, दूरस्थ शिक्षा, ओपन कोर्सवेयर, शिक्षकों के प्रशिक्षण जैसी सभी प्रकार की शिक्षा पर विचार किया।

तब हम ज्ञान के सृजन, ज्ञान के सृजकों, और ज्ञान के सृजन की विधि पर भी विचार करते थे। इसके साथ-साथ हुमने कृषि, स्वास्थ्य, और छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों में बौद्धिक संपदा (Intellectual Property), पेटेंट्स, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और ज्ञान के । अनुप्रयोग (Application) पर भी विचार किया। अंततः शासन में ज्ञान की भूमिका पर भी विचार किया। इस पहल के परिणामस्वरूप, हमने नेशनल नॉलेज नेटवर्क का निर्माण किया। हमने पर्यावरण, ऊर्जा, जल, शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए कई पोर्टल तैयार किए हैं। इसके पश्चात अंतत: हमने महात्मा गांधी पर एक विशाल पोर्टल तैयार किया।

जब मैं 10 साल का था तब मैने एक गांधीवादी स्कूल में दाखिला लिया था। हमें रोज़ाना के जीवन में गांधीवादी मूल्यों के बारे में बताया जाता था। ओड़िशा में रहने वाले एक गुजराती परिवार होने के नाते, मेरे माता-पिता का गुजरात से जुड़ने या यूं कहे कि गुजराती पहचान के एक मात्र साधन थे गांधी। हम गांधीजी को, अपने विचारों में और दैनिक कार्यों में हमेशा बनाए रखते थे।

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