पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/१९२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
१८०
गल्प-समुच्चय

जमालखाँ ने विरक्त होकर कहा—चुप, चुप, रुस्तम! सुलतान का नाम लेने की क्या जरूरत है? जानते नहीं हो, हम लोग कहाँ हैं?—रुस्तम चुप हो गया। भूल उसी की थी।

जमालखाँ ने कहा—रुस्तम, कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। क्या नगर में इससे अच्छा स्थान मिलेगा? हम लोग यहीं विश्राम करेंगे। इधर देखो, क्या वे सब तारे हैं? अहो, क्या इस देश के तारों में इतना वर्ण-वैचित्र्य है? देखो तो सही, नीले, पीले,लाल और श्वेत तारागणों से, इस नभ-मण्डल की कैसी शोभा हो रही है!

रुस्तम—जनाब, आप भूल करते हैं। ये तारे नहीं, सोमनाथ के मन्दिर-शिखर में लगे हुए रत्न हैं।

जमाल—हाँ, सोमनाथ का क्या इतना ऐश्वर्य !

रुस्तम—जनाब, सोमनाथ का ऐश्वर्य विश्व-विश्रुत है।

जमाल—जब बाहर इतना है, तब भीतर न-जाने कितना होगा! पर रुस्तम, सच कहो, ऐसा कभी तुमने कहीं देखा भी था? ऊपर आकाश में चन्द्र की निर्मल ज्योति, नीचे उसी विमल ज्योति से प्लावित मन्दिर-चूड़ा में स्थित रत्नो की ज्योति ! रुस्तम,क्या कहीं और भी ऐसा होगा? मैं गुर्जर की यह नैसर्गिक शोभा देखकर मुग्ध हो गया।

रुस्तम—जनाब, और कहीं आप ऐसा न देखियेगा। सुलतान इसीलिये तो हस्तगत करना चाहते हैं और छद्म-वेष धारण कर हम लोगों के यहाँ आने का प्रयोजन भी यही है।