पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२७५

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मुस्कान

सत्येन्द्र—सो बात नहीं है प्रिये! पाप सदा पाप है। पाप करने का किसी को भी अधिकार नहीं है। मैं सच कहता हूँ—स्वयं भगवती राजराजेश्वरी कल्याणसुन्दरी साक्षी हैं—कि जब तक तुम मुझे अपने हृदय से क्षमा नहीं कर दोगी, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी; क्योंकि तब तक मुँह खोलकर मैं अपने पाप को कहने का साहस ही नहीं कर सकूँगा। क्षमा! प्यारी क्षमा!

सुशीला ने साश्रुलोचना होकर कहा—नाथ! यदि मेरे ऐसा कहने ही से आपके हृदय को शान्ति मिल सकती है, तो मैं आपको क्षमा करती हूँ; पर मैं यह शब्द केवल आपके एकान्त अनुरोध से कह रही हूँ, नहीं तो मेरा निज का विचार है कि आप मेरे लिये सदा निष्पाप हैं। पाप आपके स्पर्शमात्र से पुण्य में परिणत हो सकता है, आप मेरे ईश्वर हैं।

सत्येन्द्र ने सजल नेत्र हो कर दोनों पत्र सुशीला के हाथ में दे दिये। सुशीला उन्हें बड़े मनोयोग-पूर्वक पढ़ने लगी। साद्यान्त पढ़ चुकने पर उसके मुख पर मन्द, मधुर मुस्कान दिखाई दी। सत्येन्द्र के गले में बड़े प्रेम से हाथ डालकर उसने कहा—बस इतनी ही‌ सी बात के लिए आपने आकाश-पाताल एक कर दिया था? सत्येन्द्र के लोचन-युगल से अश्रुधारा पतित होने लगी। सुशीला ने अपने अञ्चल से उनके आँसू पोंछ डाले और फिर उसने हार्मोनियम उठाकर इस चरण को बार-बार मधुर स्वर में गाना प्रारम्भ कर दिया—