पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/९०

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गल्प-समुच्चय

'तो अब क्या हर्ज़ है? थोड़ी-सी खिड़की खोल दो, मेरी आँखों पर पट्टी बँधी है।

उन्होंने बहुत कहा; पर मैंने एक न सुनी और उठकर खिड़की खोल दी। सूरज ने तालियाँ वजाई और खिलखिलाकर हँसने लगा। उसकी हँसी देखने के लिए मैं अधीर हो गई; परन्तु आँखों पर पट्टी बँधी थी।

इतने में सूरज खिड़की पर चढ़ गया और खेलने लगा। वह इस समय बहुत ही प्रसन्न था। पंछियों की नाई चहकता था। उसे कोई विचार, कोई भय, कोई चिन्ता न थी।

"सूरज, शीशा छोड़ दो, टूट जायगा।"

परन्तु सूरज ने अनसुना कर दिया ओर शीशे के सामने खड़ा होकर अपना मुँह देखने लगा। एकाएक उसने (मैंने पीछे सुना था) शीशे में इस तरह मुँह बनाकर देखा कि वे सहसा चिल्ला उठे-"जरा देखना।”

मुझे अपनी अवस्था का विचार न रहा। मैं भूल गई कि यह समय बड़ा विकट है मैं अन्धी हूँ, मुझे एक दिन के लिए सन्तोष करना चाहिए। इस समय की थोड़ी-सी असावधानी मेरे सारे जीवन को नाश कर देगी और फिर मेरी आँखों को कोई शक्ति किसी उपाय से भी न खोल सकेगी, यह विचार न रहा मैं पागल हो गई। मेरी ऐसी अवस्था आज तक कभी न हुई थी। मेरे हाथ मेरे बस में न रहे। उन्होंने पट्टी को उतारकर भूमि पर फेंक दिया और मैंने आँखें खोली।