पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/२२२

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विश्व की रचना और संहार। १८३ और पंचतन्मात्राएँ, इन सातों में ही आठवें मनतव को सम्मिलित कर के गीता में वर्णन किया गया है कि परमेश्वर का कनिष्ठ स्वरूप अर्थात् सल प्रकृति अष्टधा है (गी. ७.५)। इनमें से, केवल मन ही में दस इन्द्रियों का और पंचतन्मात्राओं में पंचमहाभूतों का समावेश किया गया है। अब यह प्रतीत हो जायगा कि, गीता में किया गया वर्गीकरण सांख्यों और वेदान्तियों के वर्गीकरण से यद्यपि कुछ भिन्न है, तथापि इससे कुल तत्वों की संख्या में कुछ न्यूनाधिकता नहीं हो जाती । सब जगह ताव पचीस ही माने गये हैं। परन्तु वर्गीकरण की उक्त भिनता के कारण किसी के मन में कुछ भ्रम न हो जाय इसलिये ये तीनों वर्गीकरण कोप्टक के रूप में एकत्र करके आगे दिये गये हैं। गीता के तेरहवें अध्याय (१३. ५) में वर्गीकरण के झगड़े में न पड़ कर, लांख्यों के पचीस तावों का वर्णन ज्यों का त्यों पृथक् पृथक् किया गया है; और, इससे यह यात स्पष्ट हो जाती है कि, चाई वर्गीकरण में कुछ भिसता हो, तथापि तत्वों की संख्या दोनों स्थानों पर वरायर ही है। पचीस मूलतत्त्वों का यर्गीकरण । सांख्यों का वर्गीकरण । तव । वेदान्तियों का वर्गीकरण। गीता का वर्गीकरण न-प्रकृति-न-विछति १ पुरुष परब्रह्म का श्रेष्ठ स्वरूप मूलप्रकृति १ प्रति अपरा प्रकृति १ महान् परनहा का कनिष्ठ ७ प्रति-विकति २१ अहंकार स्वरूप अपरा प्रति के ५ तन्मात्राएँ ) (आठ प्रकार का) आठ प्रकार 1 परा प्रकृति १६ विकार विकार होने के कारण) विकार होने के ५ युद्धोमियाँ। इन सोलह तत्वों को | कारण, गीता मेंदन ५ कर्मेंद्रियाँ वेदान्ती मूलतत्व नहीं पंह तच्चों की (५ महाभूत मानते। गणना मूलतत्त्वों में नहीं की गई है। २५ यहाँ तक इस बात का विवेचन हो चुका कि, पहले सूल साम्यावस्था में रहने- वाली एक ही अवयव-रहित जड़ प्रकृति में व्यक्त सृष्टि उत्पन्न करने की अस्वयंवेद्य 'पुद्धि कैसे प्रगट हुई। फिर उसमें अहंकार' से अवयव सहित विविधता कैसे उपजी; और इसके बाद 'गुणों से गुण ' इस गुणपरिणाम-वाद के अनुसार एक ओर साविक (अर्थात् सेन्द्रिय) सृष्टि की मूलभूत सूक्ष्म ग्यारह इन्द्रियाँ तथा दूसरी ओर तामस (अर्थात् निरिन्द्रय.) सृष्टि की मूलभूत पाँच सूक्ष्म तन्मानाएँ कैसे निर्मित हुई। अव इसके बाद की सृष्टि (अर्थात् स्थूल पंचमहाभूतों या उनसे उत्पन होनेवाले अन्य जड़ पदार्थों) की उत्पत्ति के क्रम का वर्णन किया जावेगा। सांख्यशाख में सिर्फ यही कहा है कि, सूक्ष्म तन्मात्राओं से । 'स्यूल पंचमहाभूत ,