पृष्ठ:गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र.djvu/३९६

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संन्यास और कर्मयोग। ३५७ श्रायु विताने का मार्ग। श्रेणी। गति। १. कामोपभोग को ही पुरुपार्य मान कर अई- कार से, आसुरी बुद्धि से, दम्भ ले, या लोभ से अधम नरक केवल चात्नसुख केलिये कर्म करना (गी. ६.१६) -आनुर अथवा राक्षसी मार्ग है। १. इस प्रकार परमेश्वर के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान न होने पर भी, कि प्राणिमात्र में एक ही मध्यम स्वर्ग आत्मा है, वेदों की भाज्ञा या शास्त्रों की माज्ञा (नीमांसको (मीमांसकों के अनुसार श्रद्धा और नीति से अपने-अपने के मत में के मत में काम्य-कर्म करना (गी. २. ४१-४४, और :- उत्तम) मोक्ष) २०) येवल फर्म, प्रवी धर्म, अथवा मीमांसक माग है। १. शास्त्रोक्त निष्काम कम से परनेवर का ज्ञान हो जाने पर अन्त में वैराग्य से समस्त कर्म छोड़, केवल ज्ञान में ही तृश हो रहना उत्तम मोक्ष गी. ५.२)- पेपल शान, सांप, अथवा स्मार्त मार्ग है। १. पहले चित्त की शुद्धि के निमित्त, और उससे परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर फिर सर्वोत्तम मोक्ष केवल लोकसंग्रहार्य, मरण-पर्यंत भगवान् के समान निष्काम-कर्म करते रहना (गी. ५.२)- शान-कर्म-समुच्चय, कर्मयोग या भागवत मार्ग है। सारांश, यही पक्ष गीता में सर्वोत्तम ठहराया गया है, कि मोक्ष प्राप्ति के लिये यद्यपि कर्म की आवश्यकता नहीं है, तथापि उसके साथ ही साथ दूसरे कारणों के लिये अर्थात्, एक तो अपरिहार्य समझ कर, और दूसरे जगत् के धारणपोपण के लिये आवश्यक मान कर-निष्काम बुद्धि से सदैव समस्त कसी को करते रहना चाहिये; अथवा गीता का अन्तिम मत ऐसा है, कि "कृतादिषु कर्तारः कर्तृपु प्रस- वादिनः" (मनु. १.६७) मनु, के इस वचन के अनुसार कर्तृत्व और ब्रह्मज्ञान का योग या सेल ही सब में उत्तम है, और निरा कतृत्व या कोरा प्रामज्ञान प्रत्येक एकदेशीय है। जनक वणित तीन निष्ठाएँ। गीता की दो निठाएँ।