पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३१४

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उदू अखबार कि यह पत्र पोलिटिकल बातोंसे बचता है। पर उद्देके अन्यान्य मासिक- पत्र इस चालपर नहीं चलते हैं। उनमें खूब पोलिटिकल लेख लिखे जाते हैं। एक और संकीर्णता उर्दू पढ़ मुसलमानोंमें यह है कि वह अपने शीन काफके फेर में बहुत पड़े रहते हैं। दूसरी भाषाएं कम पढ़ते हैं। भली उर्दु जाननेवाले मुसलमानोंमें ऐसे एकही दो आदमी निक- लंगे, जो हिन्दी भली तो क्या ग्वामी भी जानते हों। फिर बङ्गला, गुज- राती, मराठी आदिकी, और तो ध्यान करना दृर रहा। दूसरी भाषामें क्या लिया जाता है, दूसरी भाषाओंके पत्र क्या करते हैं, इन बातोंकी ओर बहुत कम ध्यान देते हैं । ___ उदाहरणको भांति हालको एक बातका उल्लंग्य किया जाता है। कई माम हुए प्रयागके "प्रवामी" नामक बङ्गला मासिकपत्रमें उर्दू माम- यिक माहित्यक नामसे एक लेग्ब निकला था, जिसमें उर्दू मासिक पत्रोंकी कुछ आलोचना की गई थी। उसमें कुछ बान बेअटकल भी थीं, पर कुछ बहुत ठीक थी और इस योग्य थीं कि उद मासिकपत्रवाले उन्हें जानं । इस प्रबन्धके लेग्वकने मोचा कि बंगला मासिक पत्रने जो बात उद मासिक पत्रोंके लिये लिग्बी है यदि उसका उर्दू तरजमा करके किसी उद्दे पत्रमें न छपने दिया जायगा तो किसी उर्दूवाले तक उसकी हवा भी न पहुंचेगी। इसीसे उसका अनुवाद अपनी एक छोटीसी भूमिकाके साथ मखजनमें भेज दिया गया। वह गत अप्रेल मासके मखजनमें छपा है। उसमें और बातोंको छोड़कर उसके सम्पादक स्वाद और जे जीमकी गलतियोंपर गये हैं। किसी हिंदीवालेने अंगरेजीमें मखजनका नाम जेरसे लिखनेकी जगह जेसे लिख दिया है, बस इसीपर मखजनके सम्पादक साहब कह उठे कि नागरी अक्षरों में उर्दू शब्दोंका ठीक उच्चारण नहीं हो सकता। इसी प्रकार एक उर्दू पत्रका नाम “असरे जदीद" है । बंगला कागजमें उसका नाम “आसारे जदीद' लिखा हुआ [ २९७ ]