पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६४२

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जातीय-राष्ट्रिय भावना गाली लातं खाते खाते अब तो गोली खाते हैं, किञ्चित् मात्र ऊंघ जानेमें जीसे मारे जाते हैं। हमने माना गोरा रङ्ग आज कल तुमको प्यारा है, पर हे श्याम ! सुना है काला भी तो रङ्ग तुम्हारा है। एक काला इसलिये गया पिण्डीमें गोलीसे मारा, पङ्खा करते एक गोरेको ऊंघ गया था बेचारा । इन कठोर अन्यायोंको भी जो कोई बतलावे न्याय, उसके हृदय और मस्तक दोंनोंकी फट गई है हाय ! यह मोटी मोटी बातें भी क्या नहीं देती दिखलाई ? आंखों आगे खड़ा न सूझे हा ! ऐसी चर्बी छाई । बतलाओ क्या पेटका भरना मनुष्यत्व कहलाता है, पेट पूछिये तो कूकर सूकरका भी भरजाता है। तुम जो अच्छे अच्छे वस्त्राभूषण तन पर धारे हो, औरोंको दुख देते नितप्रति अपने सुखके मारे हो। भाई-बन्धु तुम्हारे सारे दुखमें डूबे रहते हैं, तुम स्वारथपरतामें डूबे क्या सुख इसको कहते हैं ? हे सैय्यद बाबा दो दिनसे तुम धन पाके धनी हुए, बहुतेरे निर्धन पृथिवी पर धनी हुए मिटगये मुए। अच्छी भांति देखलो धन सब खानेमें नहीं आता है, मरने पीछे बांधके गठड़ी क्या कोई ले जाता है। लाख जोड़के रक्खो वा एक आना नित्य कमाओगे, आधसेर अन्नसे अधिक पेटके लिये नहीं पाओगे। फिर इस सारी हाहू कृतघ्नताका क्या होगा परिणाम ? मरजाने पर धन वैभव पद सब आवंगे किसके काम ? जीता रहना तुम ऐसोंका मरजाने हीके सम है, [ ६२५ ] ४०