पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१२७

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( १०७ ) पुस्तक ‘रिसालए हनुमा' में चार जगत् कहे हैं-(१) जालमे नासूत-—भौतिक जगत , (२) जालमे मलकूत या मालमे रवाह-चित् जगत् या आत्म जगत् (३) माल जबरूत—श्रानंदमय जगत् जिसमें सुख दु:ख प्रादि द्वंद्र नहीं और (४) जालमे लातसत्य जगत् या ब्रह्म । कल्वरूह (मात्मा) और रूपात्मक जगत् के बीच का एक साधनरूप पदार्थ है । इसका कुछ स्पष्टीकरण दाराशिकोह के इस विवरण से होता है ‘दू श्य जगत् में जो नाना रूप दिखाई पड़ते हैं वे तो अनित्य हैं पर उन रूपों की जो भावनाएँ होती हैं वे अनित्य नहीं हैं । वे भावचिव नित्य हैं । उसो भावचित्र जगत् (जालमे मिसाल ) से हम ग्रात्मजगत् को जान सकते हैं जिसे ‘आाल व ’ ऑौर 'जालमे ख्वाब' भी कहते हैं । आंख म्ौंदने पर जो रूप दिखाई पड़ता है वही उस रूप की ग्रात्मा या सारसत्ता है। अत: यह स्पष्ट है कि मनुष्य को प्रात्मा उन्हीं रूपों की है जो रूप बाहर दिखाई पड़ते हैं, भेद इतना ही है कि अपनो सारसत्ता में स्थित रूप पिंड या शरीर से मुक्त होते हैं । सारांश यह कि ग्रात्मा प्रौर बाह्य रूपों का बिंब प्रतिबिंब संबंध है । स्वप्न की अवस्था में मात्मा का यही सूक्ष्म रूप दिखाई पड़ता है जिसमें नौंख, कान, नाक, ग्रादि सबको वृत्तियाँ रहती हैं पर स्थूल रूप नहीं रहते ।' इस विवरण से यह प्राभास मिलता है कि सूफियों के अनुसार ज्ञानया 'प्रत्यय' तो है मात्मा औौर जिसपर विविध ज्ञान या भावचित्र अंकित होते हैं वह है कल्ब’ वा हृदय । ऊपर जो चार जगत कहे गए हैं उनपर ध्यान देने से प्रथम को छोड़ शेष तीन जगत हमारे यहाँ के ‘सच्चिदानंदके विश्लेषण प्रतीत होंगे । सूफियों के अनुसार सत्’ ही चरम पारमाथिक सत्ता है । वह सत्य या ब्रह्म चित् या ात्म जगत् से भी परे है । हमारे यहाँ बहत से वेदांती भी ब्रह्म को प्रात्मस्वरूप या परमात्मा कहते हुए भो चिट्ठप कहना ठीक नहीं समझते । उनका कहना है कि आत्मा के सान्निध्य से जड़ बुद्धि में उत्पन्न धर्म ही चित् अर्थात् ज्ञान कहलाता है । अतः वृद्धि के इस धर्म का यूरोप आात्मा या ब्रह्मा परे उचित नहीं । ब्रह्मा को निर्गुण और अजेय ही कहना चाहिए । पारमाथिक वस्तु या सत्य के बोध के लिये कल्चस्वच्छ और निर्मल होना आवश्यक है । उसकी शुद्धि जिक्र (स्मरण) और म् राकबत (ध्यान) से होती है । स्मरण और ध्यान से ही मंज मन मुकुरका मल छंट सकता है । जिक्र या स्मरण की प्रथमावस्था है अहंभाब को त्याग अर्थात् अपने को भूल जाना और परमावस्था है। ज्ञाता और ज्ञान दोनों की भावना का नाश अर्थात् यह भावना न रहना कि हम ज्ञाता और यह किसी वस्तु का ज्ञान है बल्कि अर्थ या विषय के आकार का ही रह जाना। केंहने की नावश्यकता नहीं कि यह योग की निविकल्प या असंप्रज्ञात समाधि है । सूफी मत की भक्ति का स्वरूप प्रायः वही है जो हमारे यहाँ की भक्ति का। नफ्स के साथ जिहाद (धर्मयुद्ध ) विरति पक्ष है औौर जिक्र नौर मु राकवत (स्मरण गौर ध्यान) नवधा भक्ति पक्ष। रति औौर विरति इन दोनों पक्षों को लिए बिना अनन्य भक्ति की साधना हो नहीं सकती। हम व्यावहारिक सत्ता के बीच अपने होने का अनुभव करते हैं । जगत् केवल नामरूप प्रौर असत् सही, पर ये ।