पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१३६

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श्राप ही तो सब कुछ हुथा, पर माया के भेद के अनुसार एक मोर तो ईश्वर (सर्वशक्तिमान विधायक और शासक) रूप में व्यवत हुआ और दूसरी ओोर जीव रूप में, जो उस ईश्वर को सिर नवाता है । ह्म और जीव, मात्मा और परमात्मा की एकता इस प्रकार भी समझाई। जाती है कि ‘जो ब्रह्मांड पिंड में है वही में है ।' इस तथ्य को ले कर साधना के क्षेत्र में एक विलक्षण रहस्यवाद की उत्पत्ति हई जिसकी प्रेरणा से योग में पिड या घट के भीतर ही वह का एक विशेष स्थान निदष्ट हुआा प्रौर उसके पास तक पहुँचानेवाले विकट माग (नभि से चल कर) की कल्पना की गई । रहस्यमयी जायसी ने इस भावना को स्वीकार किया सातौ दीप नवी खंड, ग्राठी दिशा जो चाहिए । जो बरह्मांड सो पिंड है, हेरत अंत न जाहि । और एक पूरा रूपक बाँधकर पिंड को ही ब्रह्मांड बनाया है क झाँकड़ें सात खंडा खड लखह पहिल खंड जो सनीचर नाज लखि न छूटकु पौ महूँ ठाऊँ दूसर बहस्पति खंड तवाँ । काम दुवार भोगघर जाँबाँ । तीसर खंड जो मंगल मानहूं । चौथ खंड जो आादित अहई । बाई दिसि प्रस्तन मह रहई नाभि कंवल मह मोहि अस्थानह ॥ पाचव खड बुक उपराहा कंठ माहें श्री जीभ तराहीं । कर बासा। दोउ भौंहन्ह के बीच निवासा । सातवें सोम कपार महेंकहा जो दसवें द्वार । जो वह पॉरि उघा, सो बड़ सिद्ध अपार । इसमें जायसी ने मनुष्य शरीर के पैर, ग्र दृद्रिय, नाभि, स्तनकंठ, दोनों भोहों के बीच के स्थान और कपाल को क्रमश: शनि, हस्पति मंगल, अााय शुक्र, बुध और सोमस्वरूप हैकि कवि ने कहा। । एक ऑौर ध्यान देने की बात यह है जिस क्रम से एक दूसरे के ऊपर ग्रहों की स्थिति लिखी है वह सूर्यसिद्धांत झा द ज्योतिष के ग्रंथों के अनुकल है। तत्व से पिंड की ' के निश्चय पर दृष्टि ‘ऑौर ह्मांड एकतापच जाने पर फिर उसी के अनुकूल साधना मार्ग सामने ग्राता है, शास्त्र के पतंजलि ने विभूतिपाद में नाभिच , कटकपकर्मनाड़ी घर मूर्धज्योति जो योग का विषय है। उल्लेख । किया है, पर हयोग में काव्यग्रह का विशेष विस्तार से वर्णन हैं का ही चर्चा पहले कर आए हैं । मूर्धयोति य ब्रह्मरंभ को जायसी ने ‘दसवा जिसकी कहा है को ले जाकर लीन के का साक्षात्कार जहाँ वृत्ति करने से T द्वार' सकता है । जायसी ने वेदांत के सिद्धांतों के साथ हयोग की बातों का भी समावश ब्रह्म स्वरूप हो वयों किया, इसका कारण उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो गया होगा। पश्चात उसके अनुकूल साधना होनी चाहिए । जब कि यह सिद्ध हो गया कि जा तत्वज्ञान के ब्रह्म में ब्रह्मांड में व्याप है। विश्व की मात्मा के रूप में भी है तब शरीर के भीतर ही उसके साक्षात्कार की साधना का निरूपण होना रहा वही मध्य के पिंड या शरीर ही चाहिए छह घं