पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१४४

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( १२४ ) भावात्मक शैली का ग्रवलंबन करता है, उसी प्रकार उन प्राचीन ऋषियों को भी विचार करते करते गंभीर मामिक तथ्य पर पहुँचने पर कभी कभी भावोन्मेष हो जाता था और वे अपनी उवि का प्रकाश रहस्यात्मक और अच्छे ढंग से कर देते थे। गीता के दसवें अध्याय में सर्ववाद का भावात्मक प्रणाली पर निरूपण है । वहाँ भगवान् ने अपनी विभूतियों का जो वर्णन किया है वह अत्यंत रहस्यपूर्ण है । सर्ववाद को लेकर जव भक्त को मनोत्ति रहस्योन्मुख होगी तब वह अंपने को जगत् के नाना रूपों के सहारे उस परोक्ष सत्ता की घोर ले जाता हुना जान पड़ेगा। वह खिले हुए फूलों में, शिशु के स्मित आानन में, सुंदर मेघमाला में, निखरे हुए चंद्रबिंव में उसके सोंदर्य का, गंभोर मेघगर्जन में, बिजली की कड़क में, वज्रपात में, भूकंप आादि प्राकृतिक विप्लवों में उसकी रौद्र मूति का,; संस/र के ग्र सामान्य ।रों, परंपकारियों और त्यागियों में उसकी शक्ति, शोल ग्रादि का साक्षात्कार करता है । इस प्रकार ग्रवतारवाद का मूल भी रहस्यभावना ही ठहरती है । पर अवतारवाद के सिद्धांत रूप में होत हो जाने पर राम कृष्ण के व्यक्त ईश्वर विष्णु के अवतार स्थिर हो जाने पर रहस्यदशा की एक प्रकार से समाप्ति हो गई । फिर राम मौर कृष्ण का ईश्वर के रूप में ग्रहण व्यक्तिगत रहस्यभावना के रूप में नहीं रह गया । वह समस्त जनसमाज के धामिक विश्वास का एक अंग हो गया । इसो व्यक्त जगत के बोत्र प्रकाशित राम कृष्ण की नरलोला भझतों के भावोट्रेक का विषय हुई । अत: रामकृष्णोपासकों की भक्ति रहस्यवाद की कोटि में नहीं जा सकती । यद्यपि समष्टि रूप में वैष्णवों को सगुणोपासना रहस्यवाद के अंतर्गत नहीं कही जा सकतोपर श्रीमद्भागवत के उपरांत कृष्णभक्ति को जो रू प्राप्त हुआा उसम रहस्यभावना को गंजाइश हुई । भक्तों की दष्टि से जब धोरे धीरे श्रीकृष्ण का लोकसंग्रही रूप हटने लगा और वे प्रेमति मान रह गए तब उनकी भावना ऐकांतिक हो चलो। भक्त लोग भगवान को अधिकतर अपने संबंध से देखने लगेजगत् के संबंध से नहीं । गोपियों का प्रेम जिस प्रकार एकांत प्रौर रूप- मर्य मात्र पर ग्राश्रित था उसी प्रकार भक्तों का भी हो चला । यहाँ तक कि कुछ स्त्रो भवतों में भगवान् के प्रति उसो रूप का प्रेमभाव स्थान पाने लगा जिस रूप का गोपियों का कहा गया था । उन्होंने भगवान् की भावना प्रियतम के रूप में की। बड़े बड़े मंदिरों में देवदासियों की जो प्रथा थो उससे इस ‘मा यंभाव' को ौर भी सहारा मिला । माता पिता कुमारी लड़कियों को मंदिर में दान कर ग्राते थे, जहाँ उनका विवाह देवता के साथ हो जाता था । अतः उनके लिये उस देवता की भक्ति पतिरूप में ही विधेय थी। इन देवदासियों में से कुछ उच्च कोटि की भक्तिमें भी निकल जाती थीं । दक्षिण में गंदाल इस प्रकार को भक्तिन थी जिसका जन्म विक्रम संवत ७७३ के ग्रासपास रहा था। यह बहत छोटी अवस्था में किसी साधको एक पेड़ के नीचे मिली थी। । साधु भगवान् का स्वप्न पाकर वह इसे विवाह के वस्त्र पहनाकर श्रीरंग जी के मंदिर में छौड़ आाया था । अंदाल के पद द्रविड़ भाषा में तिरुप्पावर्ड्सनामक पुस्तक में अबतक मिलते हैं । अंदाल एक स्थान पर कहती है-‘मैं पूर्ण यौवन को प्राप्त हैं और स्वामी कृष्ण ९