पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१५४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( १३४ ) दरब में निरगुन होई गुनवंता । दरव न कुज होइ रुपचंता है प्रस मन दरब देइ को पारा ? (ख) सटि होई जगह तेहि सववोला निसठजो पुरुष पात जम डोला है दरव रहै भई, दिपें लिलारा व सचिहि दिस्टि जोति होइ नैनो। निर्सट डोह, ख या न वैनी ॥ जायसी की जानकारी साहित्य की दृष्टि से जायसी की रचना की जो थोड़ी बहत समीक्षा हुई उससे यह तो प्रकट ही है कि उन्हें भारतीय काव्यपद्वति और भाषासाहित्य का अच्छा परिचय था। भम भिन्न ऑलंकारों की योज.काध्यसिद्ध उक्तियों का विस्तृत समावेश (जैसा कि नखशिख वर्णन में है) के प्रबंध काव्य के भीतर निर्दिष्ट वण्य विषयों को सन्निवेश (जैसे जलक्रीड़ा, समुद्रवर्णन ) प्रचलित काव्यरीति के परिशान के परिचायक हैं । यह परिज्ञान किस प्रकार का था, यह ठीक नहीं कहा जा सकता है। वे बहश्रत थे, बहत प्रकार के लोगों से उनका सत्संग था यह तो प्रारंभ में ही कही जा चुका है। प उनके पहले चारों के वीरकाव्यों प्रौर कबीर नादि कुछ निग़ा पासक भक्तों की वारियों के अतिरिक्त और नाम लेने लायक काव्यों का पता न होने से यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने काव्यों औौर रीतिग्रंथों का क्रम पूर्वक अध्ययन किया था । "नियर्सन साहब ने लैिखा है कि जायस में जाकर जायसी ने पंडितों से संस्कृत काव्यरीति का ध्ययन किया। इस मनमान का उन्होने कोई ग्राधार नहीं बताया। संस्कृतज्ञान का प्रन मान जायसी की रचना से तो नह! होता। उनका संस्कृत शब्दभंडार बहुत परि’त है । उदाहरण के लिये रु. और चंद्रये दो शब्द लीजिए जिनका ज़्यवहार जाय सी ने इतना अधिक किया है । जी ऊब जाता है। । इन दोनों शब्दों के कितने अधिक प्यय संस्कृत में। यह हिदी जाननेवाले भी जानते हैं । पर जायसी ने सूर्य के लिये रवि, भानू गौर दिन-र दिनकर) ऑौर चंद्र के लिये ससि, ससहर औौर मयंक (मृगांक) शब्दों का है व्यवहार किया है। सरी बात यह है कि संस्कृतायासी से चंद को स्त्रीरूप में कल्पित करत न वनगा। यह प्रारंभ में ही कह पाए हैं कि पद्मावत के ढंग के चरितकाव्य जायसी के पहल बन चुक थ ग्रतः जायसी ने काव्यशैली कि सी पंडित से न सीखकर किसी व वि से . खी। उस समय कायव्यवसायियों को प्राकृ त पर अपभ्रंश से पूण परिचित होना पड़ता था। छंद और रीति आदि के ज्ञान के लिये भाषाक विजन शाद्य त और श्रोश का सहारा लेते थे । ऐसे ही वि सी कवि से जायसी ने काव्य, र.ति से ख़ ह गी १दात में ' रि’, ‘रूर है', 'श हुठ 'भुवाल, विसहर’