पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१६३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( १४३ ) सोने या चाँदी के महीन वरक या पत्नों के कटे हुए टुकड़े होते थे जिन्हें कानों के पास से लेकर कपोलों तक एक पंक्ति में चिपकाते थे। आाजकल हम रामलीला आादि में उसी रीति पर चमकी या सितारे चिपकाते हैं । स्त्रियाँ अब तक माथे पर इस प्रकार के वदे चिपकाती हैं । पत्नभंग शब्द से भी इसी बात का संकेत मिलता है । खैर जो हो, जायसी ने इस पत्रावलिरचना का उल्लेख पद्मावती के श्रृंगार के प्रसंग में (विवाह के उपरांत प्रथम समागम के अवसर पर) किया है रचि पत्नावलि, माँग सेंटूरू । भरे मोति नौ मानिक चूरू । प्राचीन काल में प्रधान राजमहिषी या पटरानी को पट्टमहादेवी' कहते थे । यह उस समय की बात है जब क्षत्निय लोग एक दूसरे को 'सलाम' नहीं करते थे और 'रानीशब्द के प्रागे ‘साहबा' नहीं लगता था-जब हमारा अपना निज का शिष्टाचर था, फारसी तहजीब की नकल मात्र नहीं । राजा रत्नसेन को चित्तौर से गए बहुत दिन हो जाने पर जब नागमती विरह से व्याकुल होती है तब दासियाँ समझातो हैं पाट महादेइ ! हिये न हारू । समुति जीउ चित चेत संभारू ॥ यह पाट महादेइ' शब्द पट्टमहादेवी’ का अपभ्रंश है । भारतीय 'वरपूजा' का प्रसंग बड़ी मामिकता से बड़े सुंदर अवसर पर जायसी लाए हैं । जिस समय बादल के साथ राजा रत्नसेन छूटकर आाता है उस समय पद्मावती बादल की प्रारती उतारती है पर पाबें राजा के रानी । पुनि ारति बादल कहें यानी ॥ पूजे बादल के भु जवंडा । तुरी के पाँव दाव करखेडा ॥ प्राचीन काल में वर्षाऋतु में सब प्रकार की यात्रा बंद रहती थी । शरद ऋतु अाते ही वणिकों की विदेशयात्रा और राजाओं की मुद्घयात्रा होती थी। शरत् के बर्णन में पुराने कवि राजाओं की युद्धयात्रा का भी उल्लेख करते हैं । इसी पुरानी रीति के अनुकूल गोरा बादल प्रतिज्ञा करते समय पत्रिनो से कहते हैं उए अगस्त हस्ति जब गाजा । नोर घटे घरआइदि राजा ॥ बरसा गएअगस्त के दीठी। परै पलानि तुरंगन्ह पीठी राजपूतों की भिन्न भिन्न जातियों के बहुत से नाम तो जायसी को मालूम थे पर इस बात का टीक ठीक पता उन्हें न था कि किस जाति का राज्य कहाँ था। यदि इसका पता होता तो वे रत्नसेन को चौहान न लिखते । रत्नसेन को जब सूली देने के लिये ले जाते थे तब भाँट ने राजा गंधर्वसेन से उनका परिचय इस प्रकार दिया था जंबूदीप चित्तउर देसा । चित्नसेन बड़ तहाँ नरेसा ॥ रतनसेन यह ताकर बेटा । कुल चौहान जाइ नहि मेटा ॥ यह इतिहासप्रसिद्ध बात है कि चित्तौर में बाप्पा रावल के समय से अंत तक सिसोदियों का राज्य चला आ रहा है ।